टेक वन। एक्‍शन। सीन। कट कट कट। वन्‍स एगेन…

♦ अविनाश

निवार का दिन एक जापानी रेस्‍टोरेंट से शुरू हुआ, जहां बरसों बाद झींगा मछली खाने को मिली। चॉकलेट शेक, दो सादी तवा रोटी और झींगा मछली। आईबा नाम के इस रेस्‍टोरेंट के मालिक एक जापानी सज्‍जन हैं, जिन्‍होंने यहां एक हिंदुस्‍तानी लड़की से शादी कर ली है। सरहदों से अनमने ये रिश्‍ते बनारस जैसे शहरों के लिए सहज हैं, जहां भारी तादाद में विदेशी पर्यटक आते-जाते रहते हैं। शाम में जागरण के क्राइम रिपोर्टर अजय मिश्र से जब हमने इस रेस्‍टोरेंट के बारे में बताया, तो उन्‍होंने जानकारी दी कि यह बनारस का पहला रेस्‍टोरेंट है, जिसकी नक्‍काशी में लोककला को तरजीह दी गयी है। हमने देखा, एक नयी-नयी जवान हुई हिंदुस्‍तानी जोड़ी कोने में चिपक कर बैठी थी। एक परदेसी नौजवान अकेला एक मेज पर बैठा कविता सोचने की मुद्रा में कुछ सोच रहा था। कुल मिलाकर शांति थी, स्‍वाद था, मजा आया।

फिर अस्‍सी की तरफ निकले, जहां पार्किंग से निकल कर शहर की ओर आने वाली सड़क पर शूटिंग चल रही थी। लोग जमा थे और वे दुकानों की छांह बटोरे खड़े थे। तीखी धूप सिर्फ यूनिट के लोगों को मयस्‍सर थी। एक रंगीन छतरी डायरेक्‍टर की कुर्सी के पास हमेशा मौजूद रहती, जहां से पोर्टेबल टीवी में सीन देखते हुए वे एक्‍शन और ओके की आवाज देते। आज के सीन में कन्‍नी गुरु कैथरीन को शहर घुमा रहे हैं, नाव में बैठा कर गंगा की घाटों के दर्शन करा रहे हैं और शाम में गोलगप्‍पे खिला रहे हैं।

सड़क वाला दृश्‍य शूट करने के बाद डॉक्‍टर चंद्रप्रकाश द्विवेदी और मंदिरा जी के साथ हम उनके वैनिटी वैन की तरफ चले, तो डॉक्‍टर साहब ने पूछा कि मोहल्‍ला लाइव पर कितने कमेंट्स आ रहे हैं। अब हम उन्‍हें क्‍या बताते कि जिस बदमाशी के बारे में सोच कर हम दिल्‍ली से बनारस आये थे, वह हो जाती, तो अभी प्रतिक्रियाओं की बारिश हो रही होती। हमने मोहल्‍ला अस्‍सी के बारे में शहर का मिजाज जानने की कोशिश की और उन कठकव्‍वे लोगों को भी छेड़ने की कोशिश की जो आमतौर पर किसी भी रचना के बीच में अपनी टांग अड़ाने से बाज नहीं आते – वे सबके सब मौन मिले। ज्‍यादा से ज्‍यादा मिठाई लाल की तरह यह कहते मिलते कि भोंसड़ी वाले फिलिम बना रहे हैं और हमको पूछ ही नहीं रहे।

परसों शाम में पप्‍पू की चाय दुकान पर अफलातून जी ने जिन पत्रकार संत तुलसीदास से मिलाया, वे इस बात से बेहद दुखी और गमगीन थे कि वाटर में ऐसा कुछ भी नहीं था, तब तो सालों ने हंगामा कर दिया – इस फिल्‍म में शिवलिंग हटा कर कमोड लगाया जा रहा है – तब भी चुप हैं। वे झुंझलाये से थे कि कोई विरोध क्‍यों नहीं कर रहा। उससे एक दिन पहले पप्‍पू के लड़के ने डॉ काशीनाथ सिंह से शिकायत की थी कि बहुत नाइंसाफी हो रही है गुरुजी – मेरा नाम कहीं नहीं आ रहा है। काशीनाथ जी ने उससे कहा, तुम्‍हारे बाप का नाम तो आ रहा है न। इस पर पप्‍पू के लड़के ने जवाब दिया कि लेकिन सेवा तो शुरू से हम ही कर रहे हैं गुरुजी। यह बनारस के लोगों की अपनी फिक्र है, जिसमें सबके सब इस फिल्‍म का हिस्‍सा बनना चाहते हैं।

मेरा अपना ऑब्‍जर्वेशन है कि इससे पहले बनारस पर जितनी भी फिल्‍में बनी हैं, उनमें लोकेशन और स्‍थापत्‍य के जरिये बनारस दिखाया गया है। मोहल्‍ला अस्‍सी पहली फिल्‍म होगी, जिसमें लोगों के भीतर बसे बनारस को शूट किया गया होगा।

खैर, वैनिटी वैन में डॉक्‍टर साहब फ्रेश हुए, मंदिरा जी ने चना और मूढ़ी का एक ठोंगा मंगवाया और फिर उसे फांकते हुए हम सब घाट की तरफ चले। अब नाव पर बैठे कन्‍नी गुरु और कैथरीन का दृश्‍य फिल्‍माया जाना था। हमारी नाव अलग थी, जिस पर काशीनाथ सिंह, उनके बहू-बेटे, समर और अखिलेशधर दुबे थे। डॉक्‍टर साहब ने अपने से अलग करते हुए हमें कहा कि महान लोग एक साथ एक नाव पर बैठेंगे और हम मजदूर लोग दूसरी नाव पर। हमारी नाव पर धूप से बचाने के लिए तिरपाल टांग दी गयी थी (यहां एक स्‍माइली लगायी जा सकती है… काश कि इंटरनेटी स्‍माइली का कुछ शाब्दिक अनुवाद होता…)।


सिनेमैटोग्राफर विजय अरोड़ा के साथ डॉ चंद्रप्रकाश द्विवेदी।

शाम करीब पांच बजे अस्‍सी घाट से ऊपर मंदिर तक जाती सीढियों पर इफरात लोग जमा हो गये। कुछ महिलाएं चंद मुंडेरों पर खड़ी थीं। रविकिशन कैथरीन के साथ चाट वाले के पास खड़े थे। गोलगप्‍पे खा रहे थे। डॉक्‍टर साहब अपनी कुर्सी पर बैठे एक्‍शन कहने ही वाले थे। स्‍पॉट अपनी स्‍लेट ऊपर नीची करके टेक वन कहने ही वाला था कि रविकिशन ने महिलाओं की ओर देख कर आंख मार दी। सबकी सब खिलखिला कर हंस पड़ी।

थोड़ी देर की उलझन बनी, जब कैमरे में दूर एक गुमटी की खड़ी टीन पर मोबाइल लिखा हुआ दिखा। असिस्‍टेंट साक्षी ने उस पर काला पर्दा लगाने को कहा और जैसे ही कुछ स्‍पॉट ब्‍वॉय उस काला पर्दा डालने को हुए, डॉक्‍टर साहब लगभग चिल्‍लाये – अरे हटाओ काला पर्दा। सबके सब तूफान की तरह भागे। इस बीच एक आदमी ने रविकिशन से चिल्‍ला कर पूछ लिया, कइसन गोलगप्‍पा है। रविकिशन ने जवाब दिया – परम आनंदित हूं।

टेक वन हुआ। एक्‍शन हुआ। सीन हुए ओर कट कट कट कहा गया। टेक टू हुआ। एक्‍शन हुआ। सीन हुए और कट कट कट कहा गया। टेक थ्री हुआ। एक्‍शन हुआ। सीन हुए और इस बार ओके कहा गया। तीस सेकंड की इस पूरी कवायद में करीब एक घंटे का वक्‍त लगा। ऐेसे तमाम घंटों के गवाही हम देते रहेंगे, दो-ढाई घंटे की फिल्‍म बन जाने तक।

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