बनारस भारत का अदभुत शोकेस है!

♦ अजय ब्रह्मात्‍मज

अविनाश, सालों पहले बनारस पर यह लेख लिखा था। अभी आप के साथ छह दिन बनारस में रहा। हम दोनों दूसरे दोस्‍तों के साथ ‘माहल्‍ला अस्‍सी’ की शूटिंग के गवाह रहे। लौट कर इस लेख को मैंने फिर से पढ़ा। देखना चाहता था कि लेख कितना पुराना पड़ गया है। आप पाएंगे कि इस लेख में कुछ नया जोड़ सकते हैं, पर निकालने के हिसाब से कुछ भी अप्रासंगिक या पुराना नहीं हुआ है। बनारस की खासियत इस लेख को छू गयी है। अगर आप इसे मोहल्‍ला पर जगह देंगे, तो रोमांच होगा : अजय ब्रह्मात्‍मज


बनारस की गंगा और घाटों की शृंखलाएं। छायाकार : मिहिर पंड्या

अब निबंध नहीं लिखा जाता। शहरों पर तो कतई नहीं। लगता है, जैसे कक्षा की कॉपियों के अलावा निबंधों का कोई अस्तित्‍व ही नहीं। निबंधों का कोई वर्तमान नहीं, उसका सिर्फ अतीत है। फिल्‍म पत्रकार अजय ब्रह्मात्‍मज अभी अभी बनारस रह कर मुंबई लौटे – लेकिन बनारस पर एक नया निबंध लिखने की जगह उन्‍होंने एक पुरानी कतरन भेजी है। निबंधों की अमर स्‍मृति का सम्‍मान करते हुए आइए, हम बनारस को फिर से जीते हैं : मॉडरेटर

नारस… वाराणसी… काशी… उत्तरप्रदेश में गंगा के तट पर स्थित इस प्राचीन नगर का जीवंत एहसास वहां जाकर ही किया जा सकता है। सदियों से पुण्यभूमि और तीर्थभूमि के रूप में प्रसिद्ध बनारस आज भी पर्यटकों, तीर्थयात्रियों और अन्वेषकों को निमंत्रित करता है। बनारस हर व्यक्ति के लिए अलग रूप से उद्घाटित होता है। धर्म, दर्शन और साहित्य से संपूर्ण मानव जगत का हित साधनेवाला यह शहर किसी घने रहस्य की तरह आकर्षक है।

बनारस का उल्लेख आते ही हमें बनारसी साड़ियों की याद आती है। लाल, हरी और अन्य गहरे रंगों की ये साड़ियां हिंदू परिवारों में किसी भी शुभ अवसर के लिए आवश्यक मानी जाती हैं। उत्तर भारत में अधिकांश बेटियां बनारसी साड़ी में ही विदा की जाती हैं। बनारसी साड़ियों की कारीगरी सदियों पुरानी है। जड़ी, बेलबूटे और शुभ डिजाइनों से सजी ये साड़ियां हर आयवर्ग के परिवारों को संतुष्ट करती हैं, उनकी जरूरतें पूरी करती हैं। सुहाग का प्रतीक मानी जाती हैं बनारसी साड़ियां। पारंपरिक हिंदू समाज में बनारसी साड़ी का महत्व चूड़ी और सिंदूर के समान है। उत्तर भारत की विवाहित और सधवा स्त्रियां विवाह के अवसर पर मिली इन साड़ियों को बड़े यत्न से संभालकर रखती हैं। टिन के बक्सों में अखबारों से लिपटी इस साड़ी के साथ जीवन के हसीन मोड़ विवाह की यादें जो जुड़ी होती हैं। केवल खास-शुभ अवसरों पर ही स्त्रियां इन साड़ियों को पहनती हैं।

बनारस अपने घाटों के कारण भी प्रसिद्ध है। सुबह के सूर्य की बलखाती व इठलाती ललछौंही प्रथम किरणों के आगमन के पहले ही ये घाट जाग जाते हैं। सलेटी रोशनी में आकृतियां घाटों की सीढियां उतरने लगती हैं। सुबह की नीरवता में हर डुबकी के साथ आती ‘छप’ की आवाज रात की तंद्रा तोड़ती है। धीरे-धीरे बजती घंटियों की लय एक कोरस बन जाती है और नगर जागता है। बनारस नगर अवश्य है, मगर यहां नगर की आपाधापी नहीं है। बनारस की क्षिप्र लय ही इसे बिखरने और बदलने से बचाती है। यहां सबकुछ धीरे-धीरे होता है। कुछ भी अचानक नहीं होता किसी आश्चर्य की तरह। बनारस के हिंदी कवि केदारनाथ सिंह की पंक्तियां हैं…

इस शहर में धूल धीरे-धीरे उड़ती है
धीरे-धीरे बजते हैं घंटे
शाम धीरे-धीरे होती है।

यह धीरे-धीरे होना
धीरे-धीरे होने की सामूहिक लय
दृढ़ता से बांधे है समूचे शहर को

बनारस वरुणा नदी और अस्सी नदी के बीच गंगा तट पर बसा है। यहां गंगा की दिशा बदल जाती है। पश्चिम से पूर्व की ओर बहती गंगा बनारस में उत्तर से दक्षिण की ओर बहती है। पावन गंगा के किनारे बने घाटों की सीढियां बरसों से भारतीय समाज की आस्था को सहारा देती हैं। बनारस किसी नये यात्री के लिए पूरा तिलिस्म है। यह तिलिस्म धीरे-धीरे खुलता है। सच है कि बनारस को जल्दबाजी में नहीं महसूस किया जा सकता। यहां के जीवन की लय आत्मसात करने के बाद ही आप इस शहर की धड़कन अपने अंदर सुन सकते हैं। बनारस जीवन और मृत्यु को जोड़ता जीवंत शहर है। यह संसार की नश्वरता का परिचय देता है। यहां मृत्यु शोक नहीं, मुक्ति है। आश्चर्य नहीं कि देश के कोने-कोने से लोग यहां पहुंचते हैं चिरनिद्रा के लिए। कहा जाता है कि बनारस में मृत्यु का वरण करें तो जीवनचक्र से मुक्ति मिल जाती है। विधवा, अशक्त और निरीह प्राणियों को मृत्यु के पूर्व जीवन देता है बनारस।

अस्सी घाट और राजघाट के बीच अनगिनत घाट हैं, इनमें से मुख्य है दशाश्वमेध घाट। दशाश्वमेध घाट पर कपड़ों और कैनवास की बनी छतरियों के नीचे बैठे पंडे बनारस की खासियत हैं। वे पुण्य, परमार्थ और मुक्ति में सहायता करते हैं आपकी। व्यवसाय का रूप धारण कर चुकी पंडिताई आक्रामक हो चुकी है, फिर भी वह खींचती है अपनी तरफ। दशाश्वमेध से कुछ दूरी पर स्थित हैं मणिकर्णिका घाट और हरिश्चंद्र घाट। ये दोनों घाट हिंदू रीति-रिवाज से अंतिम संस्कार के लिए प्रसिद्ध हैं। चिता से उठती लपटें भौतिकता से ग्रस्त तीर्थयात्रियों को जीवन की नश्वरता का संकेत देती हैं। आप यहां वितृष्णा से नहीं भरते और न ही विचलित होते हैं। आप जीवन के प्रति गंभीर हो जाते हैं। आपका अहं टूटता है यहां। पुनर्संस्कार करते हैं बनारस के घाट।

बनारस मंदिरों का शहर है। काशी विश्वनाथ, संकट मोचन, मानस मंदिर आदि श्रद्धालु हिंदुओं के प्रसिद्ध तीर्थस्थल हैं। बनारस के विश्वनाथ का महात्म्य कुछ अधिक है। अन्य मंदिरों में भी भीड़ लगी रहती है। ऐसा नहीं है कि सिर्फ शहर के बाहर से आये श्रद्धालु ही इन मंदिरों में दर्शन के लिए आते हों। बनारस स्वयं आध्यात्मिक शहर है। धर्म और आध्यात्म यहां के निवासियों के जीवन में है। यह उनकी आदत है। सुबह-सुबह गंगा जाने से आरंभ हुई दिनचर्या में मंदिर भी शामिल हैं।

बनारस के बारे में प्रसिद्ध दार्शनिक मार्क ट्वेन ने कहा था कि यह शहर इतिहास और किंवदंतियों से भी पुराना है। निश्चय ही, वे इस शहर के इतिहास के बारे में बातें नहीं कर रहे थे। वे शहर के जीवन में मौजूद इतिहास और किंवदंतियां देख रहे होंगे। बनारस के रोजमर्रा के जीवन की मस्ती उसे दूसरे शहरों से अलग करती है। चाय और पान की दुकानों पर दुनिया भर की समस्याओं को सुलझाते बनारसी सिर्फ समय बिताने के लिए ऐसा नहीं करते। वे उसमें लीन होते हैं। वे अपने पक्ष में तर्क देते हैं, बहस करते हैं और किसी अन्य की समस्या पर हाथापाई करने के लिए भी तैयार हो जाते हैं।

बनारसी पान दुनिया भर में मशहूर है। बनारसी पान चबाना नहीं पड़ता। यह मुंह में जाकर धीरे-धीरे घुलता है और सुवासित कर देता है मन को भी। बनारस जाने पर वहां इसे अवश्य चखें। बनारसी चाट का चटपटा स्वाद जीभ पर ठहर जाता है। यह अनोखा है। अनोखी हैं यहां की मिठाइयां। रबड़ी, रसगुल्ला, मलाई और छेने की अन्य मिठाइयां सिर्फ मुंह मीठा नहीं करतीं। वे आपके व्यक्तित्व में भी मिठास घोलती हैं। मशहूर कचौड़ी गली की खुशबू आपको आगे नहीं बढ़ने देगी।

कहते हैं कि कई विदेशी पर्यटक बनारस आने के बाद फिर से अपने देश नहीं लौट सके। वे बनारसी हो गये। ढल गये यहां की सादगी और धीमी रफ्तार जिंदगी में। एक व्यक्ति और क्या चाहता है? सुख, शांति और संतुष्टि … यह शहर इस दृष्टि से उपयुक्त है। इसी शहर में आप उस्ताद बिस्मिल्ला खान जैसे मशहूर शहनाई वादक को तहमद बांधे गलियों में आराम से घूमते देख सकते हैं (यह निबंध उस वक्‍त लिखा गया था, जब बिस्मिल्‍ला खां जीवित थे : मॉडरेटर)। दिखावा नहीं है इस शहर में। इस शहर में जीवन की मस्ती है। उसे भरपूर जीने की ललक है। बनारस भौतिकता और ओढ़ी हुई जीवनशैली को अनावृत्त करता है। वह सहज कर देता है आपको।

बनारस भारत का अदभुत शोकेस है। इस शोकेस में भारतीय धर्म और अध्यात्म की परंपराएं, विभिन्न जीवनशैलियां, सदियों का सांद्र अनुभव और भारतीय समाज की तंद्रिल आस्थाएं मौजूद हैं। बनारस शहर कौतूहल पैदा करता है। वह उस कौतूहल को शांत भी करता है, अगर आप हड़बड़ी में न हों। अंत में फिर से केदारनाथ सिंह की पंक्तियों में कहें तो,

किसी अलक्षित सूर्य को देता हुआ अर्घ्‍य
शताब्दियों से इसी तरह
गंगा के जल में
अपनी एक टांग पर खड़ा है यह शहर
अपनी दूसरी टांग से बिल्कुल बेखबर।

क्या आपने इस शहर को देखा है? अगर नहीं तो अवश्य जाएं और स्वयं का साक्षात्कार करें बनारस के आईने में।

(अजय ब्रह्मात्‍मज। मशहूर फिल्‍म समीक्षक। दैनिक जागरण के मुंबई ब्‍यूरो प्रमुख। सिनेमा पर कई किताबें – जैसे, ऐसे बनी लगान, समकालीन सिनेमा और सिनेमा की सोच। महेश भट्ट की किताब जागी रातों के किस्से : हिंदी फ़िल्म इंडस्ट्री पर अंतरंग टिप्पणी के संपादक। चवन्‍नी चैप नाम का ब्‍लॉग। उनसे brahmatmaj@gmail.com पर संपर्क करें।)

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