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तद-अभाव की भाव कथा : प्रसंगवश एक अवांतर प्रसंग

23 March 2011 No Comment

वेदव्यास-गणेश संवाद : एक साहित्यिक प्रहसन : अंक पांच

♦ लेखक : कलियुगी वेदव्यास

(परदा उठता है। वन में एक वृक्ष की छांव में आसन लगाये भोजपत्र और कलम-दवात लिये ज्ञानियों के ज्ञानी भगवान गणेश बैठे हैं। वे सामने ध्यानमग्न वेदव्यास के मुखारविंद से निकले अमूल्य शब्दों को लिपिबद्ध करने के महती प्रयोजन में लगे हैं। बगल में प्रदूषित यमुना का जल बह रहा है, जिसकी भीषण दुर्गंध से वेदव्यास और भगवान गणेश दोनों ही बेचैन और व्याकुल हो रहे हैं…)

गणेश : महर्षि, आज आप कुछ उद्विग्न से नजर आ रहे हैं? कुरुक्षेत्र में कोई नयी समस्या आ गयी है क्या? आपकी इस उद्विग्नता के चलते महाभारत को लिपिबद्ध करने का काम अधर में लटका हुआ है। कुछ करें महर्षि।

वेदव्यास : नहीं ऐसी कोई बात नहीं है प्रभु। आप तो जानते ही हैं कि यह कलयुगी महाभारत है, इसमें सब कुछ विचित्र और उत्तर आधुनिक तरीके से चल रहा है। इस महाभारत में बीच-बीच में कई क्षेपक भी हैं। आज आपको मैं उन क्षेपकों की ही एक कथा सुनाने जा रहा हूं। दरअसल, यमुना की इस दुर्गंध ने अचानक ही मुझे स्मृतियों में धकेल दिया और एक करुणा विगलित कथा याद हो आयी।

गणेश : कहें महर्षि, मैं तैयार हूं।

वेदव्यास : आप तो जानते हैं प्रभु, कुरुक्षेत्र की यह यमुना अवध प्रदेश से होकर आती है। साथ ही अपने साथ वहां का कुछ प्रदूषण और किस्से भी साथ ले आती है। उन्हीं किस्सों में एक किस्सा अवध प्रांत की राजधानी से निकलने वाली और सबसे प्रतिष्ठित मानी जाने वाली साहित्यिक पत्रिका ‘तद्-अभाव’ का है। इसके संपादक, संस्थापक अवशेष जी अब उम्र के पांचवें दशक में पहुंच रहे हैं। अवशेष जी पहले फ्रीलांसर थे। लंबे समय तक फ्रीलांसर रहे। नौकरियां उन्हें कभी रास नहीं आयीं। करते छोड़ते रहे। अभाव में रहे। अभाव उनको सालता रहा। इसी अभाव ने उनको तद्-अभाव नामक पत्रिका निकालने की प्रेरणा दी। यह अलग बात है, जिस भव्य ढंग से तद्-अभाव निकली, उसके सामने हिंदी की तमाम पत्रिकाएं सचमुच अभावग्रस्त नजर आने लगीं। तमाम वीर योद्धा इसके पीछे के रहस्य का सुराग आज तक लगा रहे हैं कि कैसे पहले अंक से तद्-अभाव का अभाव दूर हो गया। कुछ तो इसमें आदर्श सोसायटी या टू जी स्पैक्ट्रम टाइप का घोटाला भी देखते हैं और लगातार इसकी सीबीआई जांच की मांग करते रहे हैं। मगर सब अवशेष जी के ठेंगे से। वे यारबाश आदमी हैं। कहते हैं – यारी है ईमान मेरा, यार मेरी जिंदगी। इसी के चलते बिना रजिस्ट्रेशन के भी तद्-अभाव को सरकारी विज्ञापनों की कभी कमी नहीं हुई। वे वरिष्ठों के जितने प्रिय हैं, उतने ही युवाओं के भी। अफसरों के जितने प्रिय हैं, उतने ही बेरोजगारों के भी। अफसरों का तो ऐसा है कि उन्होंने इन अफसरों की सहस्र अक्षौहिणी सेना ही बना डाली और उसी के दम पर मध्य प्रदेश के जाबाल नरेश की चहल-पहल बंद करा दी। अब वे अकेले खड़े घंटा बजा रहे हैं। अफसरों की इसी सेना में पितामह भीष्म को भी गाहे-बगाहे कभी कोई निराला, तो कभी कोई मुक्तिबोध मिल जाता है। तो हे गजानन, इस तरह म्यूचुअल अंडरस्टैंडिंग से यह सारा कारोबार चल रहा है और तद्-अभाव का विजय रथ चहुंओर अपनी विजय पताका फहरा रहा है।

गणेश : लेकिन महर्षि, कलयुग की इस साहित्यिक महाभारत में इस अवांतर कथा का क्या प्रयोजन?

व्यास : आप नहीं जानते गजानन, कलयुग की इस उत्तर आधुनिक महाभारत में अवांतर कथाओं का बड़ा महत्व है। बल्कि कई बार तो अवांतर कथाएं ही मुख्य कथा बन जाती हैं और मुख्य कथा हाशिये पर चली जाती है। सो, प्लीज ट्राइ टू अंडरस्टैंड एंड नोट इट। अब अगली कथा फिर कभी। तब तक विश्राम…

(परदा गिरता है। गणेश जी और महर्षि व्यास प्रस्थान करते हैं।)

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