कहां सीखा डंसना, विष कहां पाया?

♦ लक्ष्‍मीधर मालवीय

लक्ष्‍मीधर मालवीय जापान के क्योतो शहर में रहते हैं। वहां उन्‍हें समयांतर मिला, तो अज्ञेय पर लिखी अजय सिंह की टिप्‍पणी से दुखी होकर उन्‍होंने जनसत्ता के संपादक ओम थानवी को एक पत्र लिखा। हालांकि थानवी जी पहले ही समयांतर के अज्ञेय विरोधी अभियान का जवाब दे चुके थे, इस पत्र को भी उन्‍होंने कल जनसत्ता में प्रकाशित किया है। चूंकि हमने पहले भी इस मसले पर ओम जी का अनंतर कट-पेस्‍ट किया था, लक्ष्‍मीधर मालवीय जी का पत्र भी हम प्रकाशित कर रहे हैं। अज्ञेय की जासूसी और रामजानकी यात्रा से जुड़े तमाम प्रसंगों पर अफवाहों की धुंध साफ करने के साथ ही उन्‍होंने सुभाष चंद्र बोस की अस्थियों का एक महत्‍वपूर्ण मामला भी इस पत्र में उठाया है : मॉडरेटर

कहा गया है कि क्या अज्ञेय ने अमेरिकी सरकारी महकमों से गठबंधन किया था, और अमेरिकी खुफिया एजेंसी के पैसों के बल पर चलने वाली संस्थाओं में वे अगुआ न थे? उन्हें बार-बार अमेरिका और जापान जाने का राह खर्च कहां से मिलता था, और वे वहां क्यों गये?

गिनायी हुई अमेरिकी संस्थाओं के नाम मैंने भी जान कर छोड़ दिये हैं क्योंकि पिछले पचास-साठ बरसों से देखता आ रहा हूं कि इन नामों को व्यक्तियों के साथ वैसे ही नत्थी किया जाता रहा है, जिस मनोवृत्ति से मोहल्ले की ताइयां कहा करती हैं, ‘अरे बीबी, फलानी तो फंसी है फलाने से।’

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अज्ञेय की जय जानकी यात्रा की परिणति बाबरी मस्जिद के ढाये जाने में हुई?

यह तर्क मारूं घुटना फूटे आंख जैसा लगता है। हां, सिंह का यह सवाल मन को गुदगुदाता है, ‘अज्ञेय आज यदि जीवित होते तो वह कहां (पर) खड़े होते?’

मैं तो कहूंगा कि वह पैदा ही न हुए होते तो बहुत सारा टंटा पटा गया होता!

प्रिय थानवी जी,

मेरी आपसे प्रत्यक्ष भेंट कभी हुई, और न भविष्य में होने की आशंका है, फिर आप क्यों मुझे लाल चादर दिखलाने की तरह कुछ-न-कुछ छपे हुए चिरकुट भेज दिया करते हैं!

‘समयांतर’ पता नहीं क्या चीज है, जबकि मैं इस शब्द का अर्थ ही नहीं बूझ पाता! पैंतालीस बरस हो गये, भारत को बाइ-बाइ टाटा किये हुए, जितनी हिंदी पहले कभी आती थी, वह सब भूल-बिसरा गयी होगी!

‘अज्ञेय’ और ‘अजय सिंह’ पर नजर पड़ते ही सोचा, ये नाम तो कमोबेश सुने हुए हैं। पढ़ने लगा। ‘अज्ञेय की जन्मशती नहीं मनानी चाहिए’ इससे और आगे भी पढ़ने का मन हुआ। कुछ सतरें पढ़ने से समझ में आ गया, मुझे चिढ़ाने के इरादे से आपने यह कुपाठ छापा मुझे भिजवाया है। तो फिर मेरा उत्तर भी ध्यान देकर पढ़िए।

मैंने कहा न, हिंदी और मैं एक दूसरे को भूल चुके हैं, इसलिए ‘जीवन मूल्यों की रोशनी में आज के सवालों के जवाब ढूंढ़ने की कोशिश’ जैसे वाग्जाल में फड़फड़ाहट ही मुझे सुनाई देती है। अर्थ अंग्रेजी में उल्था करने पर, वह भी थोड़ा-थोड़ा, पल्ले पड़ता है! कुछ ‘इन द लाइट ऑव’ जैसा समझ में आता है – दिल्ली में बिजली चली जाया करती है, सोचा टार्च-वार्च की बात होगी।

(इसके आगे भी उनके लेख से उद्धरण देते समय, छटांक भर बात कहने के लिए पसेरी भर शब्द वाली उनकी गुट्ठल हिंदी का सुबोध हिंदी में तर्जुमा कर रहा हूं।)

जी हां, अजय सिंह जी ने अज्ञेय की जन्मशती पर पाबंदी के पक्ष में ताजीराते-हिंद की अमुक-अमुक दफा न गिना कर चार सवाल पूछे हैं। जवाब आप दे चुके, पर कुछ मेरी राय भी ले लीजिए।

सन 1943 और 46 के बीच अज्ञेय क्या ‘अंग्रेजों के जासूस’ थे?

भारत में लाखों नहीं तो हजारों व्यक्ति यह जानते हैं कि अज्ञेय इस दौरान भारतीय सेना में भरती थे। तब सेना ही नहीं देश भी अंग्रेजों का था, इसलिए जी हां, अज्ञेय अंग्रेज सेना में असम के मोर्चे पर काम करते थे।

जासूस शब्द का प्रयोग अजय सिंह लगता है, जासूसी उपन्यास ज्यादा पढ़ने के सबब कर गये हैं! यदि ऐसा नहीं, उनका आशय ‘स्पाइ’ से है तो यह पूछ कर उन्होंने भारी नादानी की है। कैसी, यह बता दूं।

रिहार्द जोर्गे का नाम उन्होंने शायद अब तक न सुना हो – इंटरनेट पर देखें तो प्रचुर सामग्री मिल जाएगी। पिछले महायुद्ध के दौरान तोक्यो में पत्रकार के छद्म में तैनात अकेले इस जर्मन द्वारा बेतार से भेजे गये गुप्त संदेशों की बदौलत, पूर्व की ओर जापान से बेखटके हो, सोवियत संघ की लाल सेना ने अपना पूरा बल पश्चिमी मोर्चे पर झोंक दिया। अंतत: जापानी खुफिया पुलिस, किंपेताइ, ने जोर्गे को धर पकड़ा और उन्हें फांसी चढ़ा दिया। तोक्यो में मेरे घर से लगे हुए विशाल कब्रिस्तान में जोर्गे की कब्र है – कई बार मैं उसके सामने जाकर खड़ा हुआ हूं। यह सोच कर जी थर्रा उठा है कि इसने अपने प्राण न होमे होते तो नात्सी जर्मन सेना एक ओर से और दूसरी ओर से जापानी सेना सारे भारत को रौंदती हुई आकर मिली होतीं, सिंध नदी के किनारे। जापानियों ने चीन पर कैसा कहर बरपा किया, उसकी बड़ी झीनी-सी झांकी देखने को मिल जाएगी, पोर्ट ब्लेयर के सेलुलर जेल के दफ्तर में टंगे बहुत सारे फोटो में।

जी नहीं, अज्ञेय इस कोटि के ‘जासूस’ न थे – उनका जापानियों से, तब, कोई संबंध न था। यदि सिंह का आशय मुखबिर या ‘इन्फॉर्मर’ से है – वह भी ऐसा मुखबिर] जिसने सेना में रहते हुए या उसके पहले कि बाद में किसी हमवतन को पुलिस के हवाले किया हो, तो यह प्रश्न मुंह से बाहर उगलने से पहले खूब सोच-विचार कर लेना चाहिए था! यह इसलिए कि अज्ञेय को लेकर ऐसी बतकही भले ही सुनी-सुनायी गयी हो, इसका कोई भी कच्चा-पक्का प्रमाण नहीं है।

इसे उनकी नादानी ही कहूंगा, क्योंकि अगर वह चुप रह जाते तो अगला प्रसंग भी न उठता। सब जानते हैं, कौवा और कोयल समान रूप से कुरूप दिखते हैं। मगर चुप रहने तक ही। बोलते ही ‘काक: काक: पिक: पिक:’ हो जाता है। ऐसा यों भी कि यह सवाल उछाल कर उन्होंने दिवंगत साहित्यकार यशपाल को, फिर से, संदेह के घेरे में घेर दिया है। (देखें नीचे प्रकाशित दस्तावेज : इमेज पर क्लिक करके उसे बड़े रूप में देखा जा सकता है…)

इसकी चर्चा पहले भी खूब हो चुकी है। मैंने इसके पक्ष और विपक्ष में दिये गये सभी तर्कों को खूब ध्यान से पढ़ा है। यह कोई मामूली बात नहीं, चंद्रशेखर आजाद के उस रोज कंपनी बाग में होने की जानकारी यशपाल और सुखदेवराज को ही होने से, कंपनी बाग में आजाद के साथ सुखदेवराज के होने से, आजाद से विश्वासघात करने का ही नहीं, उन्हें मौत के मुंह में झोंकने का आरोप यशपाल पर है। यहां इतना ही कहना पर्याप्त होगा कि धर्मेंद्र गौड़ ने सीआईडी के पत्र को प्रमाण के रूप में प्रकाशित किया तो यशपाल जी ने अपनी सफाई देने और ‘उज्रे गुनाह, बदतर अज गुनाह!’ करने के बजाय – या कि उनके बाद उनके परिवार वालों ने – गौड़ को खींच कर अदालत में खड़ा क्यों न किया!

‘साम्राज्यवादी’, ‘फासीवादी’ आदि ‘बादी’ की छह तक तो मैंने गिनती गिनी, फिर हार मान कर छोड़ दिया – सिंह में ‘बादी’ जरा जियादा है। ‘बादी’ इमले की भूल नहीं है, संस्कृत के किसी भी पंडित-पंडिता से पूछें तो पता चलेगा कि ‘व’ और ‘ब’ में अदला बदली खूब होती है। मैंने तो सिंह की सेहत का खयाल कर बादी या चर्बी की बात उठायी। क्योंकि यह बादी या चर्बी एक बार अगर दिमाग पर चढ़ गयी तो घंटों शीर्षासन करने पर भी उतरेगी नहीं। इस बादी से सावधान होकर ही तो कामरेड देंग ने फरमाया था, ‘बिल्ली काली हो कि सफेद, चूहा मारे, हमें तो इससे सरोकार।’ देख लीजिए, चीन को फुटबाल की तरह किक मार कर चढ़ा दिया आकाश में।

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नहीं, हमारे यहां ‘कुछ’ चुक गया है, तभी तो रेलों की भिड़ंत हो कि बम विस्फोट, दुर्घटना स्थल पर चमरगिद्ध बाद में उतरते हैं, टीवी कैमरा लिये बदहवास रिपोर्टर पहले, यह पूछते हुए कि ‘अधिक लाशें किधर हैं?’ खेद के साथ कहना पड़ता है, अजय सिंह की तड़ाफड़ी ‘लाश’ की तलाश में है। वरना अज्ञेय की जन्मशती का मुखर विरोध करने के बजाय आप उनकी रचनाएं न पढ़ते! जम कर लोकतांत्रिक ढंग से बहस करते या कि (अपने) मुंह पर पट्टी बांध लेते।

हा गया है कि क्या अज्ञेय ने अमेरिकी सरकारी महकमों से गठबंधन किया था, और अमेरिकी खुफिया एजेंसी के पैसों के बल पर चलने वाली संस्थाओं में वे अगुआ न थे? उन्हें बार-बार अमेरिका और जापान जाने का राह खर्च कहां से मिलता था, और वे वहां क्यों गये?

गिनायी हुई अमेरिकी संस्थाओं के नाम मैंने भी जान कर छोड़ दिये हैं क्योंकि पिछले पचास-साठ बरसों से देखता आ रहा हूं कि इन नामों को व्यक्तियों के साथ वैसे ही नत्थी किया जाता रहा है, जिस मनोवृत्ति से मोहल्ले की ताइयां कहा करती हैं, ‘अरे बीबी, फलानी तो फंसी है फलाने से।’

दूसरे की नहीं जानता, निज का अनुभव बताता हूं। मेरी बड़ी बेटी हाईस्कूल में थी, इलाहाबाद में। मैंने अपने किसी काम से उसे युनिवर्सिटी भेजा था। क्लर्क ने उसका परिचय सुनते ही कहा, ‘सुना, तुम्हारे पापा तो जापान में रह कर भारत में एफबीआई के स्टेशन चीफ का काम करते हैं!’

जी हां, अमेरिका में अज्ञेय कैलिफोर्निया में पढ़ाते थे और उनको जापान मैं बुलाया करता था। एक बार हम तोक्यो छोड़ कर इजु प्रायद्वीप की ओर भी गये थे – इजु खाड़ी में ही रिहार्द जोर्गे एक मछुआरे की नाव पर से बेतार द्वारा कोड संदेश मास्को के लुब्यंका हेडकार्टर को भेजते थे। हम भी एक मछुआरे के घर टिके थे। (इसके आगे यह न बताऊंगा कि हमने भी वहां से इंटरनेट पर संदेश किस पते पर भेजे!)

डालमिया-साहू जैन का पुरस्कार अज्ञेय को क्यों दिया गया, शमशेर, नागार्जुन या साकल्ले को क्यों नहीं?

मैं इतना बेहिचक कह सकता हूं कि वह पुरस्कार तो शमशेर को दिलाने में मैं असमर्थ था, मगर मेरे पास उनकी जो भी सामग्री थी – फोटो, पत्र और उनके कविता पाठ के लंबे टेप – यह सब मैंने ओसाका युनिवर्सिटी लाइब्रेरी के अलावा भारत में कई लोगों के पास जमा कर दिये हैं, ताकि यह सामग्री सुरक्षित रहे। नागार्जुन के मेरे नाम लिखे गये पत्र मैंने उनके बड़े बेटे को सौंप दिये।

अजय सिंह को शमशेर की वास्तव में चिंता है तो उन्होंने भी कुछ हाथ-पैर डुलाया होगा। शमशेर ने मेरे नाम 3-8-85 के पत्र में अपने ‘पचासों चित्र लखनऊ में’ होने की बात लिखी थी। सिंह आसानी से पता कर सकते हैं, लखनऊ वाले चित्र अब कहां, किसके पास हैं। समय रहते उस सामग्री को प्रकाशित करा देना चाहिए।

अज्ञेय की जय जानकी यात्रा की परिणति बाबरी मस्जिद के ढाये जाने में हुई?

यह तर्क मारूं घुटना फूटे आंख जैसा लगता है। हां, सिंह का यह सवाल मन को गुदगुदाता है, ‘अज्ञेय आज यदि जीवित होते तो वह कहां (पर) खड़े होते?’

मैं तो कहूंगा कि वह पैदा ही न हुए होते तो बहुत सारा टंटा पटा गया होता!

‘साम्राज्यवादी’, ‘फासीवादी’ आदि ‘बादी’ की छह तक तो मैंने गिनती गिनी, फिर हार मान कर छोड़ दिया – सिंह में ‘बादी’ जरा जियादा है। ‘बादी’ इमले की भूल नहीं है, संस्कृत के किसी भी पंडित-पंडिता से पूछें तो पता चलेगा कि ‘व’ और ‘ब’ में अदला बदली खूब होती है। मैंने तो सिंह की सेहत का खयाल कर बादी या चर्बी की बात उठायी। क्योंकि यह बादी या चर्बी एक बार अगर दिमाग पर चढ़ गयी तो घंटों शीर्षासन करने पर भी उतरेगी नहीं। इस बादी से सावधान होकर ही तो कामरेड देंग ने फरमाया था, ‘बिल्ली काली हो कि सफेद, चूहा मारे, हमें तो इससे सरोकार।’ देख लीजिए, चीन को फुटबाल की तरह किक मार कर चढ़ा दिया आकाश में।

त्तरकांड के लंकाकांड का समापन करने से पहले कुछ अपनी ओर से कहने की छूट चाहता हूं। अब से हमारे यहां ऐसा ही हुआ करेगा कि जो न करना था, वही अदबदा कर किया। यों है तो यह ‘बादी’ छृगाल रोदन ही!

चंद्रशेखर आजाद का शव पुलिस ने जनता की आंखों में धूल झोंक कर, कि उनका कोई नाते-रिश्तेदार उसे लेने वाला नहीं, गुपचुप दारागंज के बजाय रसूलाबाद में ले जाकर फूंक देना चाहा था। पुरुषोत्तमदास टंडन आदि ने खोजबीन कर बनारस के शिवविनायक मिश्र को, जिनके यहां आजाद आया-जाया करते थे, आनन-फानन में इलाहाबाद बुलाया। मिश्र जी रसूलाबाद पहुंचे तब चिता जल चुकी थी। बहुत कहा-सुनी के बाद चिता बुझायी गयी और अधजले शव का धार्मिक संस्कार पूरा करने के बाद उसका दाह हुआ।

शिवविनायक जी आजाद की भस्म अपने साथ बनारस ले गये थे; दसवां और श्राद्ध किया था। इसके पीछे उन्हें पुलिस के हाथों क्या-क्या कष्ट सहना पड़ा, याद कर रोम-रोम कांप उठता है। रोटी का वसीला उनका प्रेस बंद हुआ, रहने का मकान गया मगर आजाद का अस्थिकलश पुलिस न पा सकी। उसे शिवविनायक जी ने अपने किराये के घर की दीवार में चिन दिया था।

आजाद के उस अस्थिकलश पर दिसंबर, सन 77 में उत्तर प्रदेश के राज्यपाल जीडी तपासे ने लखनऊ में फूल चढ़ाये थे और बड़े तामझाम के साथ उसे ले जाकर राज्य संग्रहालय में रखा था।

आज आजाद का अस्थिकलश न राज्य संग्रहालय लखनऊ में है और न इलाहाबाद संग्रहालय में। वह कहां फरार हो गया, इसका पता क्या न लगाना चाहिए?

हड्डियों का ही जिक्र आगे भी है।

नेताजी का बित्ता भर लंबा नाम हवाई अड्डे के आगे जुड़ गया, मैदान में उनकी अष्टावक्र मूर्ति खड़ी हो गयी, मुबारक हो, मगर तोक्यो के सुगिनामि मुहल्ले के एक मंदिर की भुसौली जैसी कोठरी में पड़ी उनकी हड्ड‍ियों की पोटली पचास बरस बाद भी वहीं क्यों पड़ी है! यदि वह असल में उनका अवशेष है, तो – और यदि वह किसी और का है अब तो और भी – उठा ले जाइए उसे भारत। उनकी दो सौवीं सालगिरह पर बहा दीजिए उसे हुगली में। उसे जापान में रख कर भारत को कलंकित क्यों करते हैं? क्या बीच-बीच में भारत के ‘गण्यमान्य’ वीआईपीओं से वहां पहुंच, मंदिर की ओर से परसा गया जलपान चाभ कर इनकिलाब जिंदाबाद के बियर उत्तेजित नारे लगवाने के लिए?

भी सुना करता था, ‘मरणांतानि वैराणि’ – किसी के मरने के साथ ही उससे वैर-विरोध का भी अंत हो जाना चाहिए। क्योंकि महाकाल द्वारा अंगीकृत किये हुए तक फिर कोई भी मनुष्य नहीं पहुंच सकता। अरथी पर ले जाये जाते मुर्दे को भी, अगर ढोने वाले व्यक्ति कम दिखें तो अपरिचित आदमी भी थोड़ी दूर तक कंधा दे आता। और नहीं तो सिर पर लगी टोपी उतार कर हाथ जोड़ दिया करता था। बाहर भी दिवंगत का सम्मान किया जाता है। पिछले महायुद्ध में स्तालिनग्राद के मोर्चे पर हुए घमासान युद्ध के मैदान में बिखरी हुई हजारों लाशें। उनके बीच सोवियत सैनिकों को एक लाश की वर्दी औरों से भिन्न दिखलाई दी – जेबों से मिले कागजात से पता चला, वह जर्मन जनरल स्टेमरमान्न का शव था। सोवियत सैनिकों ने उसे सैनिक सम्मान सहित दफनाया था।

यहां इन पैंतालीस बरसों में मैंने पत्नी के पांच अति निकट संबंधियों के शव को छोड़ दैवी दुर्घटना, भूकंप सैलाब, आदि में मरने वालों में से एक का भी शव नहीं देखा। पुलिसकर्मी पहुंचते ही उसे चारों ओर तिरपाल से घेर देते हैं, ऊपर चंदोवा तान देते हैं। कोई भी टीवी चैनल घायल, मृतक को दिखलाने की जुर्रत नहीं कर सकता।

नहीं, हमारे यहां ‘कुछ’ चुक गया है, तभी तो रेलों की भिड़ंत हो कि बम विस्फोट, दुर्घटना स्थल पर चमरगिद्ध बाद में उतरते हैं, टीवी कैमरा लिये बदहवास रिपोर्टर पहले, यह पूछते हुए कि ‘अधिक लाशें किधर हैं?’

खेद के साथ कहना पड़ता है, अजय सिंह की तड़ाफड़ी ‘लाश’ की तलाश में है। वरना अज्ञेय की जन्मशती का मुखर विरोध करने के बजाय आप उनकी रचनाएं न पढ़ते! जम कर लोकतांत्रिक ढंग से बहस करते या कि (अपने) मुंह पर पट्टी बांध लेते। मैं भी हनुमान चालीसा की तरह असाध्य वीणा का नित्य पारायण तो करता नहीं। और हां, मैंने दिव्या और झूठा सच भी पढ़ा है। (अचरज न हुआ कि तमस उससे कहीं अधिक प्रभावशाली लगा…)

और पांचवां प्रश्न?

वह मेरे एक ‘नये मित्र’ ने पूछा था –
‘ कहां सीखा डंसना,
विष कहां पाया? ’

इत्यलम।

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