कोई भी मुहिम ‘लक’ के सहारे आगे नहीं बढ़ती

♦ राजीव रंजन प्रसाद

हुप्रतीक्षित तारीख 5 अप्रैल। शुरू है अन्ना हजारे का आमरण अनशन। इस मुहिम में हर देशवासी शामिल है – अपरोक्ष या परोक्ष रूप से। लोकतांत्रिक व्यवस्था की सड़ांध और सत्ता के नकारापन को दूर करने के लिए गांधीवादी चिंतक तथा सामाजिक एक्टिविस्ट 74 वर्षीय अन्ना हजारे ने जन लोकपाल विधेयक को बिना शर्त लागू कराने के लिए यह मार्ग चुना है।

गांधी के सिद्धांतों को अडिग आस्था और विश्वास के साथ मानने वाले अन्ना हजारे के साथ इस वक्त तकरीबन 80 हजार लोग शामिल हैं। न्यू मीडिया के फेसबुक संस्करण पर करीब 23 हजार लोग हमराही या हमकदम बन चुके हैं। एक अनुमान के मुताबिक लगभग 25 लाख लोगों के इस आंदोलन में शामिल होने की आस है। युवा सहित कई सज्जन-लोग पूछ रहे हैं यह अनशन क्यों…? किसलिए…? किसके लिए…? बताने वाले बता रहे हैं सबकुछ।

इसी क्रम में नंबर 022-615000792/61550789 पर एक मिसकॉल करने का आग्रह भी कर रहे हैं। दिल्ली के जंतर-मंतर पर देश भर से जुटे हजारों लोग उपवास के साथ अनशन कर रहे हैं। इस बात की सूचना मय देशवासियों को विविध माध्यम से दी जा चुकी है और अभी भी दिये जाने की प्रक्रिया जारी है।

अधिकांश भारतीय इस घड़ी उनींदी अवस्था में हैं या फिर अलसाये हुए से। कल तक वे क्रिकेट विश्वकप जीते जाने की प्रसन्नता में रात्रि-जागरण के अभियान में लगे थे। ‘विजयी विश्व तिरंगा प्यारा’ की धुन बजाते हुए खूब हो-हल्ला, हुल्लड़ और आतिशबाजियां की थीं। अंतरराष्ट्रीय निगाह में राष्ट्रगौरव की सबसे बेशकीमती थाती पाये ऐसे युवादिल भारतीयों को देश में व्याप्‍त भ्रष्टाचार का भान है, लेकिन वे साफ मौन हैं क्योंकि उन्हें इस बारे में मुंह खोलने के मायने समझ में नहीं आते हैं। देश की संपत्ति-परिसंपत्ति का लूट और बंटाधार जारी है, लेकिन इस बाबत कुछ कहने से जी डरता है कि कहीं स्वयं की मुनाफा वाली जेब न कट जाए।

वे निहाल हैं कि देश के वर्तमान प्रधानमंत्री से लेकर भावी प्रधानमंत्री का टैग लटकाये कांग्रेस युवराज तक उनके साथ क्रिकेटिया जुनून में शामिल हो चुके हैं। सो वे देश की सत्ता, शासन और नौकरशाही के भ्रष्ट आचरण के खिलाफ आयोजित इस अभियान का अर्थ नहीं थाह पा रहे हैं। वे अंदाज रहे हैं, आमरण अनशन का हासिल क्या होगा…? इरोम शर्मिला, जो दस वर्षों से ऐसे ही गांधीवादी सत्याग्रह और आमरण अनशन में मर-खप रही हैं या फिर खुद जंतर-मंतर स्वयं ऐसे कई बिंबों-प्रतीकों का गवाह रहा है, क्या बात कभी सुनी गयी?

हम उन्हें आश्वस्त कर रहे हैं, हां इस दफा सुनी जाएगी। आपसे गुजारिश है कि इस विश्वास और मुहिम की लकीर लंबी करने की खातिर आप भी हां करें और इस अभियान को जरूरी संबल दें क्योंकि नयी लकीर लक के सहारे आगे नहीं बढ़ती, उसकी उम्र हम लंबी करते हैं।

(राजीव काशी हिंदू विश्वविद्यालय, वाराणसी के शोध छात्र हैं…)

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