मध्यवर्ग के लिए भ्रष्टाचार ही मुद्दा हो सकता है, भूख नहीं

♦ समर

इससे पहले का हिस्‍सा यहां पढ़ें : मशाली संघर्ष परंपरा का मोमबत्ती पर्व था अन्ना का अनशन!

राष्ट्र को अपनी बपौती मानने वाले मध्यवर्ग की नैतिकता बहुत दिलचस्प होती है। उससे भी ज्यादा दिलचस्प होता है इस मध्यवर्गीय नैतिकता का कभी-कभी होने वाला विस्फोट, जो जॉर्ज बुश से एक कदम आगे जाकर ‘जो हमारे साथ नहीं है वह ‘राष्ट्रविरोधी’ है’ वाले अंदाज में आम से लेकर खास जन पर नाजिल होता है। जैसे कि मध्यवर्ग ही राष्ट्र हो, राष्ट्र ही मध्यवर्ग हो। ये और बात है कि मीडिया से लेकर सारे संसाधनों पर कब्जे वाले इस वर्ग के लिए अपनी आवाज को ‘राष्ट्र’ की आवाज बना कर पेश करने में कोई खास मुश्किल नहीं आती।

इसीलिए, दुनिया के इतिहास में कभी भी सड़कों पर उतर कर मुश्तरका संघर्ष न करने वाले वर्ग के बतौर पहचाने जाने वाले इस वर्ग का अन्ना हजारे के नेतृत्व वाले ‘भ्रष्टाचार विरोधी आंदोलन’ में यूं कूद पड़ना विश्वास नहीं सिर्फ संशय ही पैदा कर सकता है। खासतौर पर इसलिए भी कि यह मध्यवर्ग सिर्फ दो तरह की चीजों से परेशान होता है। पहला तब, जब हमला सीधे इसी वर्ग पर हो (जैसे बंबई पर हुए आतंकी हमलों में ताज से लेकर अन्य कई जगहों पर मध्यवर्ग ही सीधे निशाने पर था) या तब, जब मामला ‘धन’ का हो (जैसे कोमनवेल्थ घोटाला या फिर टू-जी स्पेक्ट्रम घोटाला)। बाकी हर जगह पर मध्यवर्गीय नैतिकता स्मृतिभ्रंश और ध्यानविचलन के स्थायी रोग से ग्रसित होती है।

इसीलिए सोचने की जरूरत है कि भ्रष्टाचार के खिलाफ गुस्से से उबल उबल पड़ रहा मध्यवर्ग इसी देश में लाखों किसानों की आत्महत्या पर क्यों नहीं उबलता? इसी मध्यवर्ग के सबसे प्यारे (फिर तो अंगरेजी ही होगा) अखबारों में से एक टाइम्स ऑफ़ इंडिया की आज की ही खबर कि अन्ना हजारे के ही राज्य महाराष्ट्र के मेलघाट नामक इलाके में हर दिन एक बच्चा भूख से मरता है, क्यों इसे उद्वेलित नहीं करती। याद रखिए कि क्रिकेट विश्वकप जीत कर अपना राष्ट्रगौरव पुनर्स्थापित करने में सफल रहे मध्यवर्ग का भारत वही भारत है, जिसके कुल बच्चों में से चालीस प्रतिशत से ज्यादा कुपोषित हैं, और आज भी जहां प्रसव के समय होने वाली मांओं की मृत्युदर तीस साल से गृहयुद्ध झेल रहे श्रीलंका से ज्यादा है।

पर मुतमईन रहें। इन तमाम मुद्दों पर मध्यवर्ग (और इसकी प्रतिनिधि सिविल सोसायटी) की चुप्पी किसी किस्म की हैरानी प्रकट करने वाला मसला नहीं है। यह चुप्पी एक खास राजनीति का हिस्सा है, उसी का प्रकटीकरण है। हैरानी की बात है कि इस देश के गरीब, शोषित, वंचित, दलित, मजदूर, किसानों आदि आदि की खुदमुख्तारी का दावा करने वाले वामपंथ से शुरू कर के समाजवादी राजनीति से रिश्ता रखने वाले तमाम संगठनों का अन्ना हजारे और बाबा रामदेवों के साथ खड़े हो जाना। मध्यवर्ग तो राजनीति को ‘गंदा’ मानता ही है, उससे नफरत भी करता है, पर इन लोगों की समझ को क्या हुआ था? क्या यह पार्टियां/लोग भी राजनीति की बुनियादी समझ गंवा चुके लोग हैं?

अपनी सरलतम परिभाषा में राजनीति को समाज के विभिन्न वर्गों द्वारा आपने हितों को चिन्हित कर उन्हें हासिल करने की लड़ाई के बतौर देखा जा सकता है। इसको यूं भी कह सकते हैं कि राजनीति एजेंडा सेटिंग और फिर उसके द्वारा नीति निर्धारण की प्रक्रिया है। कहने की जरूरत नहीं है कि एजेंडा सेटिंग की यह प्रक्रिया समाज के अंदर मौजूद शक्ति विभाजन और सामाजिक अंतर्संबंधों को प्रतिबिंबित करती है। और इस रोशनी में देखें, तो भ्रष्टाचार एक जरूरी मुद्दा होने के बावजूद सबसे जरूरी मुद्दा नहीं हो सकता। (यहां मेरा मतलब भ्रष्टाचार के मध्यवर्गीय अर्थ ‘आर्थिक भ्रष्टाचार’ से है)। बीस रुपये रोज से कम पर जिंदगी जी रही इस देश की 69 प्रतिशत आबादी के लिए जिंदा रहने की जद्दोजहद सबसे बड़ी समस्या है, भ्रष्टाचार नहीं। आखिर को रिश्वत देने के लिए भी पैसों की जरूरत होती है। मैं जानता हूं की यह तर्क तमाम लोगों को बहुत परेशान करेगा, पर एनडीटीवी से शुरू कर तमाम अखबारों के सेट किये एजेंडे से जरा सा ऊपर जाने की कोशिश करिए, आप को तमाम नयी चीजें समझ आएंगी। यह कि जिस आंदोलन को तमाम मध्यवर्ग के समर्थन के दावे किये जा रहे हैं, जिस आंदोलन को जेपी के बाद का सबसे बड़ा आंदोलन बताया जा रहा है, उस आंदोलन के समर्थन की जमीनी सच्चाई क्या है।

मध्यवर्ग मोटे तौर पर इस आंदोलन के साथ है – यह मानने में मुझे कोई दिक्कत नहीं है। पर इस आंदोलन को दूसरी क्रांति बताने वालों से क्या किसी ने पूछा है कि इस देश में मध्यवर्ग की आबादी क्या है? हम जैसे वामपंथियों की तो बात ही छोड़‍िए (हम तो एक करीबी लेफ्ट-लिबरल दोस्त की टिप्पणी के मुताबिक छिद्रान्वेषी लोग हैं), आंकड़ों की बात करते हैं। वह भी चलो अमेरिका के सपने देखने वाले मध्यवर्ग के सबसे बड़े तीर्थस्थल विश्वबैंक (World Bank) के दिये गये आंकड़ों की। कमसेकम उसको तो वामपंथी दुष्प्रचार का हिसा मान कर खारिज नहीं किया जाएगा। ‘इक्विटी इन अ ग्लोबलाइजिंग वर्ड’ शीर्षक वाले अपने नये प्रकाशन में वर्ल्ड बैंक की मशहूर अर्थशास्त्री नैन्सी बिर्ड्साल ने मध्यवर्ग की परिभाषा देते हुए कहा है कि विकासशील देशों में मध्यवर्ग आबादी का वह हिस्सा है, जो 10 अमेरिकी डॉलर प्रतिदिन (या करीब 450 भारतीय रुपये, या 13,500 रुपये प्रतिमाह) से ज्यादा कमाता है, पर देश के सबसे धनी पांच प्रतिशत लोगों के बाहर हो। यही वह वर्ग है, जिसके पास इतनी आर्थिक सुरक्षा होती है कि वह क़ानून के शासन, और स्थायित्व के बारे में सोच सके, और इसमें निवेश कर सके।

इस आधार पर भारतीय मध्यवर्ग की जनसंख्या क्या होगी, क्या आप इसका अंदाजा भी लगा सकते हैं? अगर विश्वबैंक और भारत सरकार के ही आंकड़े देखें, तो यह संख्या शून्य है। 13,500 रुपये से ज्यादा कमाने वाली सारी की सारी आबादी उच्चतम आय वाले पांच प्रतिशत खेमे में ही सिमटी हुई है।

(पूरी रिपोर्ट यहां पढी जा सकती है www.growthcommission.org)

अब जरा सोचिए कि जिस देश में कल के बारे में सोचने की फुर्सत सिर्फ पांच फीसदी आबादी के पास हो, जहां 95 फीसदी लोग किसी तरह आज जिंदा रह जाने के लिए ही युद्ध करने को अभिशप्त हों, वहां भ्रष्टाचार कितने प्रतिशत की समस्या होगी और भूख कितने की?

जिस देश में ५० फीसदी से ज्यादा लोगों के पास रहने को कोई स्थाई और सुरक्षित घर न हों, आजीविका के साधन के बतौर कोई जमीन न हो, वहां ऊंची दीवालों से घिरी और सुरक्षाकर्मियों की मौजूदगी वाली अपनी रिहाइशों से निकल कर मोमबत्तियां पकड़े मध्यवर्ग की समस्या उनकी समस्याओं के ऊपर कैसे खड़ी हो जाती है? जिस देश में साठ फीसदी से ज्यादा आबादी के पास किसी किस्म की स्वास्थ्य सुविधाओं तक कोई पंहुच न हो, वहां आर्थिक भ्रष्टाचार सबसे बड़ा मुद्दा कैसे बन जाता है?

पर फिर से याद करिए कि राजनीति एजेंडा सेटिंग का नाम है। और कम से कम 69 प्रतिशत आबादी के जिंदा रहने की जद्दोजहद के ऊपर, उनके मुद्दों के ऊपर भ्रष्टाचार को खड़ा करने की राजनीति इसी एजेंडा सेटिंग का कारनामा होता है, और यह एजेंडा कौन और क्यों सेट करता है – बहुत साफ साफ दिखता है। जो न दिखता है न समझ आता है – वह यह, कि वो कौन लोग हैं जो इस मध्यवर्गीय दुष्प्रचार की गिरफ्त में आकर मुल्क की 95 फीसदी आबादी को छोड़ पांच प्रतिशत के साथ खड़े हो जाते हैं? यह जानते हुए भी की उनका वहां खड़ा होना आंदोलन को वह ‘वैधता’ (legitimacy) देगा, जो बाद में हमारे संघर्षों के खिलाफ इस्तेमाल की जाएगी। जीत के तुरंत बाद अन्ना हजारे का नरेंद्र मोदी को महान बताना इस तरफ कुछ इशारा तो करता ही है। उन्हें बताना होगा कि इस आंदोलन के जनांदोलन होने का दावा करते समय उनके तथ्य क्या थे, और उन तथ्यों को उन्होंने तर्क और सच्चाई की कसौटी पर कसा क्यों नहीं? उन्हें बताना होगा कि मध्यवर्ग की राजनीति का मोहरा बनते हुए उन्हें कुछ तो शर्म आयी होगी, या फिर संघर्षों की अपनी मशालें मोमबत्तियों से बदलते हुए भी उनके चेहरे नैतिकता के तेज से चमक रहे थे?

(समर। रिसर्च स्‍कॉलर हैं और वामपंथी रुझान रखते हैं। कुछ इश्क कुछ इनकलाब में दिलचस्‍पी है और इसके बारे में कहते हैं, सिरफिरों का इसके अलावा शौक़ हो ही क्या सकता है! यह भी कि अब हम क्या करें कि इन दोनों में पढ़ना-लिखना जागती आंखों में सपने देखना और नींद में फलसफाना बहसें करना सब शामिल है। उनसे samaranarya@gmail.com पर संपर्क किया जा सकता है।)

103 Responses to मध्यवर्ग के लिए भ्रष्टाचार ही मुद्दा हो सकता है, भूख नहीं

  1. Tribhuwan says:

    Samar Ji,
    Please tell us what is the rationale behind opposing the middle class/movement by Anna Hazare?. if he is not a right person or his approach is righteous, then why do not you people start a movement in any way(non violent), public will accept it. as far as middle class is concerened, since is it is more or less urban centric, will you please start a movement in Kalahandi/Chikmangloore/halflang/Sonemarg/or any place where you feel poor public will listen yourmodel and ideology.

    Waiting for your response.

  2. Tribhuwan says:

    read your lines -
    जिस देश में ५० फीसदी से ज्यादा लोगों के पास रहने को कोई स्थाई और सुरक्षित घर न हों, आजीविका के साधन के बतौर कोई जमीन न हो, वहां ऊंची दीवालों से घिरी और सुरक्षाकर्मियों की मौजूदगी वाली अपनी रिहाइशों से निकल कर मोमबत्तियां पकड़े मध्यवर्ग की समस्या उनकी समस्याओं के ऊपर कैसे खड़ी हो जाती है? जिस देश में साठ फीसदी से ज्यादा आबादी के पास किसी किस्म की स्वास्थ्य सुविधाओं तक कोई पंहुच न हो, वहां आर्थिक भ्रष्टाचार सबसे बड़ा मुद्दा कैसे बन जाता है?

    now what else can be reason for not taking action against corruption?

  3. raj says:

    lekhak ne jo stats diye hai us per sirf hansa ja sakata hai …. isliye hans raha hun…. ha ha ha…

    Desh ki 95 fisadi janata gareeb hai aur corruption aur poverty ke beech koi rishta nahi hai…. ha ha ha

  4. vaibhav says:

    त्रिभुवअन , आप अपना टाइम ख़राब कर रहे हो. समर जैसे लेखक ” शानदार ” दिमाग वाले हैं इसका पता उनके दिए आकड़ों से ही लगता हैं .उसने अपने परिचय में ये बता दिया हैं की वो सिरफिरा हैं . नींद में बडबडाने की आदत हैं उसकी …टाइम खोटी मत करो .. बेकार के सवाल पूछने से कोई फायदा नहीं हैं ..

  5. Suman says:

    Dear Samar,

    Kahe paglaye ghum rahe ho? Samajh men nahi ata?
    Tumhari tark sakti par ab to log hasne lage hain..

    Jis desh men bhrastachar ke mudde par Rajiv Gandhi ki sarkar ud sakti hai.. Pyaj ki keemat BJP ki sarkar hata sakti hai.. us desh ko usi ki nazar se samjhnae ki koshish karo..nahi to sari vidya, budhhi vyarth jayegi..kitabon ki tarah baat karte ho to hansi ati hai..khair isme tumhara dosh nahi hai..jabani jama kharch karke hi ab tak kranti lane ka theka uthaye ho.. uthaye rakho..
    par bhaiya marx marx chillate ho usse itna to samjho ki kisi bhi badlab men yahi madhya varg ka ek pragtisheel tabka netritva pradan karega..tum bhi usi se aye ho? aur Anna ke movement men kaise tumhe pura madhya varg dikh gaya.. muskil se hazar-2 hazar log par day aye the.. 5 dino men 10 hazar hue.. ab desh ke pure madhya varg ko ghatakar itne par mat la dena..5 % par to la hi chuke ho..

  6. Suman says:

    Han ek baat aur,

    Ab jab Anna roopi saap sine par se gujar chuka hai to lakir pit ke kya hoga..kahe ka syapa.. Apni lakir badi ho iski taiyari karo.. isime bhala hai sabka..

  7. जनाब समर भाई, आप जिन आंकड़ों का सहारा अपने लेख के लिए कर रहे हैं, उनके लिंक भी लगे हाथ बढ़ा देते तो बात का वजन बढ़ता। मैं अपनी तरफ से कोई टिप्‍पणी नहीं कर रहा हूं, आपके लेख को समझने के लिए बस कुछ और तफसील की मांग कर रहा हूं। जैसे कि…

    [1] भारत के चालीस प्रतिशत से ज्‍यादा बच्‍चे कुपोषित हैं, इस आंकड़े का स्रोत क्‍या है?
    [2] इस देश की 69 फीसदी आबादी 20 रुपये से कम पर रोज गुजारा करती है, यह आंकड़ा किस सर्वे में आया है?
    [3] वर्ल्‍ड बैंक की जिस टिप्‍पणी का आपने उल्‍लेख किया, वह कोई आंकड़ा है या वर्ल्‍डबैंक की मध्‍यवर्ग के बारे में दी हुई परिभाषा?
    [4] हमारे देश में पचास फीसदी से ज्यादा लोगों के पास रहने के लिए कोई स्थायी और सुरक्षित घर नहीं है, यह आंकड़ा आपने कहां से लिया है?
    [5] साठ फीसदी से ज्यादा आबादी के पास किसी किस्म की स्वास्थ्य सुविधा नहीं पहुंची है, इस आंकड़े का आधार भी जानना चाहूंगा।

    मुझे कोई शक नहीं है कि आपको इस मुल्‍क से बेइंतहां मोहब्‍बत है और यकीनन इसकी बेहतरी की चिंताएं भी हैं। मैं आपके लेख को लफ्फाजी नहीं समझता हूं, इसलिए जानता हूं कि ये सारे आंकड़े बिल्‍कुल दुरुस्‍त होंगे। सिर्फ अपना भरोसा मजबूत करने के लिए इन आंकड़ों का स्रोत एक बार जान लेना चाहता हूं।

  8. rajesh kumar says:

    आज के मोमबतियो वाली क्रान्ति का सही चित्रण किया है .लेकिन माद्यम वर्ग ही देश का निति नियता हैभलेही वह वोट देने जाय या न जाय वही बाज़ार के उत्पादों को खरीदने का समर्थ रखता है इस लिए मीडिया में खबरे भी उसी के पसंद की बनती है

  9. Dilip khan says:

    अविनाश जी ये बहुत सामान्य से आंकड़े हैं.
    १. ग्लोबल हंगर इंडेक्स का डाटा है.
    २. अर्जुन सेनगुप्ता समिति की रिपोर्ट है… हालांकि उसमे यह ७७ फीसदी से भी ज्यादा बताया गया है.
    ४. nss की रिपोर्ट है.
    ५. अभी एकदम से यह रिपोर्ट यद् नहीं आ रही.. लेकिन who health stat देखने से भी यह तस्वीर साफ़ हो जाती है…

  10. vivek says:

    Nice Article!

  11. मनीश says:

    interesting !

  12. vivek says:

    समर भाई के जवाब का लिंक
    http://www.mofussilmusings.com/2011/04/blog-post_13.html

  13. vivek says:

    समर भाई से पूछा कि अविनाश जी के सवालों का जवाब तो दें, तो उन्होनें कहा कि जवाब पोस्ट करने की कोशिश कर रहा हूँ पर हो नहीं रहा, उन्होनें कहा कि जवाब अविनाश को मेल से भेज दिया है है। मैंनें भी उनके नाम से वो टिप्पणी करनी चाही(मेरे पूछने के बाद समर ने जवाब वाला मेल मुझे भी forward किया था)पर जाने क्यों nice article वाली टिप्पणी तो आ गयी पर जवाब वाली हुई नहीं। सो मैंने उनके ब्लाग का लिंक दे दिया है।
    धन्यवाद

  14. khelawan says:

    जनाब मोडरेटर साहब,

    समर भाई का जवाब अगर किसिस तकनीकी दिक्कत की वजह से नहीं आ पा रहा, तो इसे तत्काल दुरुस्त किया जाना चाहिए. क्योंकि इससे गलत सन्देश जा रहा है.

    शुक्रिया

    • अविनाश says:

      खेलावन भाई, टिप्‍पणी लंबी थी, लोड नहीं ले पायी। समर ने अलग से अपनी जमीन पर उसे रोप दिया है – उसका लिंक उनके मित्र ने मुहैया भी कराया है। वैसे आप कहेंगे तो उसे अलग से पोस्‍ट कर दूंगा।

  15. Satnam says:

    मैं कुछ बात कहना चाहता हूं। एक तो अविनाश जी की ओर से किए सवालों पर समर के उत्तर इस बहस में होने चाहिए थे। लेकिन अगर नहीं हैं तो इसका कारण चाहे जो भी हो दिये गये लिंक पर जाकर उत्तर पढ़ने पर पता चलता है कि समर ने उचित तरीके से उत्तर दिया है। हालांकि अविनाश जी ने जैसा सवाल किया था वह अपने आप में इतना हल्का था कि उस पर हंसी आ रही थी। कोई बहुत कम पढ़ने-लिखने वाला व्यक्ति ही इस तरह के प्रश्न कर सकता है। ये तो जगजाहिर सच्चाइयां हैं अविनाश जी। आपने कमेंट बॉकस मे बड़े प्रभावी क्रम से अपने प्रश्न रखे थे, लेकिन वह केवल सजावट के लिए अच्छा था। उसी तरह समर के उत्तर भी यहां आने चाहिए था। किसी महान विभूति के प्रति आस्था होना आस्चर्यजनक नहीं है। लेकिन हमे यह भी याद रखना चाहिए कि आस्था भावनाओं के आधार पर चलती है और अविनाश जी के प्रश्न भी केवल भावुकता पर आधारित थे। तथ्य का अध्ययन करना और उन पर विचार करना अविनाश जी के लिए लाभकारी रहेगा। वे अच्छा साइट चलाते हैं। मैं तो अक्सर प्रभावित होता हूं। और बेनामी या झूठे नामों से टिप्पणी करने वाले बेवकूफों की बातों पर तभी सोचा जाना चाहिए जब उनकी बातों में कोई दम हो। सिरफ उछलकूद करने वाले के बात पर ध्यान नहीं देना चाहिए।

  16. समर.. says:

    खेलावन जी और सतनाम जी..
    इस बहस में हस्तक्षेप का शुक्रिया कहते हुए भी अविनाश जी पर किसी भी किस्म के व्यक्तिगत आक्षेप का मैं पुरजोर विरोध करता हूँ. लोकतांत्रिक बहसों और अभिव्यक्ति की स्वतंत्रता के प्रति उनका निर्मम आग्रह (उनके अपने स्वयं के खिलाफ व्यक्तिगत आक्षेप भरी टिप्पणियां भी इसी मोहल्ला पर देखीं हैं, और उनको मोडरेट ना करने का अविनाश जी का दुराग्रह भी) बावजूद इसके की हम कुछ मित्रों का उनसे लगातार का कहना रहा है की व्यक्तिगत आक्षेपों वाली बेनामी टिप्पणियां हटाई जानी चाहियें.

    इसके बाद से पर मेरी सहमती है. अविनाश जी के पूछे सवालों का उत्तर, बिन्दुवार, मैंने उनके प्रशन करने के एक आध घंटे के भीतर ही दे दिया था. जब तमाम कोशिशों के बावजूद वह जवाब यहाँ अपलोड ना हो सका तो उसकी सूचना भी मैंने उन्हें तत्काल दे दी थी. उनकी प्रतिक्रिया आश्वस्तकारी थी, कि वह कोशिश करेंगे और अगर नहीं हो सका तो अलग पोस्ट के बतौर उसे मोहल्ला में जगह मिलेगी.

    मैं अभी भी चाहता हूँ, मनाता हूँ कि वह जवाब यहीं, इसी बहस में आना चाहिए. अविनाश जी से भी इस सन्दर्भ में मेरी यही मांग रहेगी.

    समर

  17. समर.. says:

    अविनाश जी
    आपके लोकतान्त्रिक मूल्यों और जिम्मेदार बहस की परंपरा में मेरा पुरजोर यकीन है. इसीलिये, आप की पिछली टिप्पणी से थोडा आहत महसूस कर रहा हूँ.

    आपने सुबह कुछ सवालों के जवाब मांगे थे, मैंने तुरंत दे भी दिए थे, जिन भी कारणों से वह अपलोड ना हो सके,(मुझे नहीं लगता जवाब की लम्बाई कोई कारण रहा होगा क्योंकि उससे बहुत ज्यादा लम्बी टिप्पणियां मैंने इसी मोहल्ले में की हैं. निश्चित रूप से वह किसी और और तकनीकी दिक्कत की वजह से हुआ होगा, इसीलिये मैंने आपको तुरंत सूचित भी किया था.

    आप जानते हैं कि मोहल्ला एक लोकप्रिय पोर्टल है, और इसमें हम सब के काफी सारे साझा मित्र भी हैं. उनमे से कई सारे लगातार फोन करके पूछते रहे कि मैं जवाब क्यों नहीं दे रहा, या कि मेरे पास जवाब हैं ही नहीं. अंततः मुझे अपनी जमीन पर जवाब लिखना पड़ा (वह बहुत खुशी से नहीं था, पर सार्वजनिक बहसों में देर तक चुप रहना कई बार झूठा साबित कर देता है, और त्रिभुवन, राज, सुमन, वैभव जैसे कई बेनामियों को फर्जी विजय का अहसास भी देने लगता है.)

    मेरी गुजारिश है की उस जवाब को यहाँ स्थान मिले, क्योंकि यही उस बहस की सही जगह है (गाँव का हूँ जनता हूँ कि धान बोने के बाद दूसरे खेत में रोपा जाता है और अच्छी फसल के लिए यह जरूरी होता है)..
    (वैसे मैं भी फिर से कोशिश करता हूँ)

    साभार..

  18. समर.. says:

    जवाब का पूरी तरह हिन्दी में अनूदित रूप..
    Reply
    |
    samar
    to avinash

    show details 15:54 (3 hours ago)

    अविनाश भाई..
    सुबह से बहुत सारे प्रयास कर के हार गया, जवाब पेस्ट नहीं हुआ तो नहीं हुआ. एक दोस्त ने भोपाल से भी मेरा ही जवाब मेरे ही नाम से पेस्ट करने की कोशिश की, नहीं हुआ. मैंने जवाब की भाषा बदली, पूरी तरह से हिन्दी में लिखा, नहीं हुआ. नहीं जानता यह कैसे और क्यों कर हो रहा है..
    खैर, अब जवाब को पूरी तरह से हिन्दी में अनूदित कर ही लिया है तो आपको भेज रहा हूँ..

    आंकड़े बताते हैं कि इस देश का असली मुद्दा भ्रष्टाचार नहीं भूख है, गरीबी है!
    अविनाश जी
    माफी चाहता हूँ की इन आंकड़ों के लिए लिंक नहीं लगाये थे. ये खता सिर्फ इस वजह से हुई थी की ये सारे आंकड़े इतने चर्चित हुए थे, इन पर टाइम्स ऑफ़ इण्डिया से लेकर दैनिक जागरण तक में इतनी खबरें छपी थीं, इन पर इतनी बहसें हुई थी, की मैंने मान लिया आप जैसे सुधीजन तो जानते ही होंगे..

    बिन्दुवार जवाब दे रहा हूँ, बस उसके पहले यह बता दूँ..की विश्वबैंक वाले आंकड़े को छोड़कर यह सभी आंकड़े भारत सरकार के हैं और इनमे से भी ज्यादातर मिलेनियम डेवेलपमेंट गोल्स की प्रगति रिपोर्ट के तहत यूएनडीपी को भारत सरकार द्वारा सौंपी गयी रिपोर्ट से हैं. लिंक है–
    http://asiapacific.endpoverty2015.org/pdf/MDGGOIreport.pdf

    यह रिपोर्ट भारत सरकार के सांख्यिकी एवं कार्यक्रम क्रियान्वयन मंत्रालय के अंतर्गत आने वाले केन्द्रीय सांख्यिकी संगठन (Central Statistical Organization, Ministry of Statistics and Programme Implementation ) द्वारा छापी गयी है.

    ध्यान दें कि यह रिपोर्ट खुद भारत सरकार की है.. मेरी या किसी और ‘वामपंथी प्रोपेगेंडा’ मशीन की नहीं..

    अब बिन्दुवार–
    [1] भारत के चालीस प्रतिशत से ज्‍यादा बच्‍चे कुपोषित हैं, इस आंकड़े का स्रोत क्‍या है?
    यही रिपोर्ट.. वैसे मेरे आंकड़े एक साल पीछे चल रहे थे. भारत में कुपोषित बच्चों की संख्या अब 46 फीसदी है, माने कि २००८ के आंकड़ों से ६ प्रतिशत बढ़ गयी है.

    [2] इस देश की 69 फीसदी आबादी 20 रुपये से कम पर रोज गुजारा करती है, यह आंकड़ा किस सर्वे में आया है?
    यह आंकड़ा भारत सरकार द्वारा बनाई गयी अर्जुन सेनगुप्ता की कमेटी जिसका नाम था Conditions of Work and Promotion of Livelihood in the Unorganised सेक्टर का है. यह आंकड़ा १९९३-९४ के वित्तीय सत्र से लेकर २००४-०५ तक के सरकारी आंकड़ों पर ही आधारित है. इस कमेटी की पूरी रिपोर्ट आप यहाँ पढ़ सकते हैं..
    http://nceus.gov.in/Condition_of_workers_sep_2007.pdf

    (ध्यान दें कि यह कमेटी भारत सरकार के योजना आयोग को रिपोर्ट कर रही थी. आप तो खैर जरूर पढेंगे , बेनामियों को बता दूँ कि इस कमेटी के मुताबिक प्रतिशत से आगे जाकर वास्तविक संख्या में देखें तो इस देश के ८३ करोड़ साठ लाख लोग २० रुपये रोज से कम में गुजारा कर रहे थे.

    [3] वर्ल्‍ड बैंक की जिस टिप्‍पणी का आपने उल्‍लेख किया, वह कोई आंकड़ा है या वर्ल्‍डबैंक की मध्‍यवर्ग के बारे में दी हुई परिभाषा?
    दोनों. वर्ल्ड बैंक ने उस रिपोर्ट में पहले तो मध्यवर्ग को परिभाषित किया है, फिर आंकड़ों के आधार पर दुनिया के अलग अलग विकासशील देशों में उन्हें गिना है.. उस रिपोर्ट का लिंक मैंने वहीं लगा दिया था.. फिर से लगा देता हूँ..
    http://www.growthcommission.org/storage/cgdev/documents/volume_equity/ch7equity.pdf

    [4] हमारे देश में पचास फीसदी से ज्यादा लोगों के पास रहने के लिए कोई स्थायी और सुरक्षित घर नहीं है, यह आंकड़ा आपने कहां से लिया है?
    भारत सरकार की उसी पहली रिपोर्ट से. इसमें यह भी जोड़ लें कि विश्व स्वास्थ्य संगठन और यूनिसेफ के एक स्वतंत्र सेर्वे ने यह संख्या और ऊपर..६६.५ करोड़ आंकी थी जो तब की आबादी के आंकड़ों पर ५८ प्रतिशत बनता था.. पर कोई नहीं सरकारी आंकड़े ही स्वीकार कर लेते हैं..

    [5] साठ फीसदी से ज्यादा आबादी के पास किसी किस्म की स्वास्थ्य सुविधा नहीं पहुंची है, इस आंकड़े का आधार भी जानना चाहूंगा।
    इस विषय पर कोई सीधा सरकारी आंकड़ा नहीं मिलाता क्योंकि सरकार अगर कहीं सिर्फ एक हस्पताल है तो उसे हस्पताल मानती है चाहे वहां एक भी डाक्टर ना हो. हाँ आप सरकार की और रिपोर्टों से यह बात साफ़ साफ़ देख सकते हैं. जैसे की स्वास्थ्य मंत्रालय भारत सरकार की यह रिपोर्ट देख लें..
    http://mohfw.nic.in/Health%20English%20Report.pdf

    २०१० की यह रिपोर्ट साफ़ साफ़ बताती है, कि “मानव संसाधन और विकसित मेडिकल तेक्नोलाग्जी का ७५ प्रतिशत, इस देश के कुल १५,०९७ अस्पतालों का ६८ प्रतिशत, और कुल ६, २३, ८१९ बिस्तरों का ३७ प्रतिशत निजी क्षेत्र में है. इनमे से ज्यादातर (सरकार संख्या नहीं दे रही) शहरी क्षेत्रों में हैं. और सबसे ज्यादा चिंता का विषय है ग्रामीण परिधि पर अयोग्य लोगों द्वारा दी जा रही घटिया स्तर की स्वास्थ्य सुविधाएं. स्वास्थ्य मंत्रालय, २०१०” (अनुवाद मेरा है, कोई भ्रम की गुंजाइश ना रहे इसीलिये मौलिक अंग्रेजी रिपोर्ट का यह हिस्सा यह रहा
    “Over 75 per cent of the human resources and advanced medical technology, 68 per cent of an estimated 15,097 hospitals and 37 per cent of 6,23,819 total beds in the country are in the private sector. Most are located in urban areas. Of concern is the abysmally poor quality of services being provided at the rural periphery by the large number of unqualified persons.” (MOH, 2010)

    अप स्वयं देख सकते हैं की सरकारी आंकड़े क्या कह रहे हैं..

    इसमें यह भी जोड़ लें कि विश्व की सबसे सम्मानित स्वास्थ्य जर्नल लांसेट की २०११ की रिपोर्ट बताती है.. कि भारत के ग्रामीण इलाकों में कुल बीमारियों के २८ प्रतिशत हिस्सा किसी किस्म की चिकित्सा प्राप्त नहीं कर पता. शहरी क्षेत्रों में यह प्रतिशत २० है..(संख्याएं जोड़ के देखें कि कितने लोगों के पास किसी किस्म की स्वास्थ्य सुविधा नहीं है, झोला छाप डाक्टरों की भी नहीं)
    इसमें यह जोड़ें कि पब्लिक हेल्थ पर कुल जमा सरकारी खर्चा २० प्रतिशत है, यानी की बंगलादेश जैसे राज्यों से कम.. और ऐसे में २० रुपये से कम पर जीने वाली जनता स्वास्थ्य सुविधाओं तक कैसे पंहुचती होगी..

    खैर.. कमसेकम कोई चिकित्सा ना पाने वाले गाँव के २८ फीसदी मरीजों को शहर के २० प्रतिशत मरीजों से जोड़ दें.. इनमे झोला छाप वालों के चिकित्सा पाने वालों को जोड़ लें..संख्या ६० के ऊपर ही जायेगी नीचे नहीं..

    अविनाश भाई.. उम्मीद है कि आप बेनामियों को सिर्फ गालीगलौज करने की जगह कुछ पढने लिखने की सलाह भी देंगे..

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    samar
    to vivekkumarjnu

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    From: samar
    Date: 2011/4/13
    Subject: जवाब का पूरी तरह हिन्दी में अनूदित रूप..
    To: avinash das

    अविनाश भाई..
    सुबह से बहुत सारे प्रयास कर के हार गया, जवाब पेस्ट नहीं हुआ तो नहीं हुआ. एक दोस्त ने भोपाल से भी मेरा ही जवाब मेरे ही नाम से पेस्ट करने की कोशिश की, नहीं हुआ. मैंने जवाब की भाषा बदली, पूरी तरह से हिन्दी में लिखा, नहीं हुआ. नहीं जानता यह कैसे और क्यों कर हो रहा है..
    खैर, अब जवाब को पूरी तरह से हिन्दी में अनूदित कर ही लिया है तो आपको भेज रहा हूँ..

    आंकड़े बताते हैं कि इस देश का असली मुद्दा भ्रष्टाचार नहीं भूख है, गरीबी है!
    अविनाश जी
    माफी चाहता हूँ की इन आंकड़ों के लिए लिंक नहीं लगाये थे. ये खता सिर्फ इस वजह से हुई थी की ये सारे आंकड़े इतने चर्चित हुए थे, इन पर टाइम्स ऑफ़ इण्डिया से लेकर दैनिक जागरण तक में इतनी खबरें छपी थीं, इन पर इतनी बहसें हुई थी, की मैंने मान लिया आप जैसे सुधीजन तो जानते ही होंगे..

    बिन्दुवार जवाब दे रहा हूँ, बस उसके पहले यह बता दूँ..की विश्वबैंक वाले आंकड़े को छोड़कर यह सभी आंकड़े भारत सरकार के हैं और इनमे से भी ज्यादातर मिलेनियम डेवेलपमेंट गोल्स की प्रगति रिपोर्ट के तहत यूएनडीपी को भारत सरकार द्वारा सौंपी गयी रिपोर्ट से हैं. लिंक है–
    http://asiapacific.endpoverty2015.org/pdf/MDGGOIreport.pdf

    यह रिपोर्ट भारत सरकार के सांख्यिकी एवं कार्यक्रम क्रियान्वयन मंत्रालय के अंतर्गत आने वाले केन्द्रीय सांख्यिकी संगठन (Central Statistical Organization, Ministry of Statistics and Programme Implementation ) द्वारा छापी गयी है.

    ध्यान दें कि यह रिपोर्ट खुद भारत सरकार की है.. मेरी या किसी और ‘वामपंथी प्रोपेगेंडा’ मशीन की नहीं..

    अब बिन्दुवार–
    [1] भारत के चालीस प्रतिशत से ज्‍यादा बच्‍चे कुपोषित हैं, इस आंकड़े का स्रोत क्‍या है?
    यही रिपोर्ट.. वैसे मेरे आंकड़े एक साल पीछे चल रहे थे. भारत में कुपोषित बच्चों की संख्या अब 46 फीसदी है, माने कि २००८ के आंकड़ों से ६ प्रतिशत बढ़ गयी है.

    [2] इस देश की 69 फीसदी आबादी 20 रुपये से कम पर रोज गुजारा करती है, यह आंकड़ा किस सर्वे में आया है?
    यह आंकड़ा भारत सरकार द्वारा बनाई गयी अर्जुन सेनगुप्ता की कमेटी जिसका नाम था Conditions of Work and Promotion of Livelihood in the Unorganised सेक्टर का है. यह आंकड़ा १९९३-९४ के वित्तीय सत्र से लेकर २००४-०५ तक के सरकारी आंकड़ों पर ही आधारित है. इस कमेटी की पूरी रिपोर्ट आप यहाँ पढ़ सकते हैं..
    http://nceus.gov.in/Condition_of_workers_sep_2007.pdf

    (ध्यान दें कि यह कमेटी भारत सरकार के योजना आयोग को रिपोर्ट कर रही थी. आप तो खैर जरूर पढेंगे , बेनामियों को बता दूँ कि इस कमेटी के मुताबिक प्रतिशत से आगे जाकर वास्तविक संख्या में देखें तो इस देश के ८३ करोड़ साठ लाख लोग २० रुपये रोज से कम में गुजारा कर रहे थे.

    [3] वर्ल्‍ड बैंक की जिस टिप्‍पणी का आपने उल्‍लेख किया, वह कोई आंकड़ा है या वर्ल्‍डबैंक की मध्‍यवर्ग के बारे में दी हुई परिभाषा?
    दोनों. वर्ल्ड बैंक ने उस रिपोर्ट में पहले तो मध्यवर्ग को परिभाषित किया है, फिर आंकड़ों के आधार पर दुनिया के अलग अलग विकासशील देशों में उन्हें गिना है.. उस रिपोर्ट का लिंक मैंने वहीं लगा दिया था.. फिर से लगा देता हूँ..
    http://www.growthcommission.org/storage/cgdev/documents/volume_equity/ch7equity.pdf

    [4] हमारे देश में पचास फीसदी से ज्यादा लोगों के पास रहने के लिए कोई स्थायी और सुरक्षित घर नहीं है, यह आंकड़ा आपने कहां से लिया है?
    भारत सरकार की उसी पहली रिपोर्ट से. इसमें यह भी जोड़ लें कि विश्व स्वास्थ्य संगठन और यूनिसेफ के एक स्वतंत्र सेर्वे ने यह संख्या और ऊपर..६६.५ करोड़ आंकी थी जो तब की आबादी के आंकड़ों पर ५८ प्रतिशत बनता था.. पर कोई नहीं सरकारी आंकड़े ही स्वीकार कर लेते हैं..

    [5] साठ फीसदी से ज्यादा आबादी के पास किसी किस्म की स्वास्थ्य सुविधा नहीं पहुंची है, इस आंकड़े का आधार भी जानना चाहूंगा।
    इस विषय पर कोई सीधा सरकारी आंकड़ा नहीं मिलाता क्योंकि सरकार अगर कहीं सिर्फ एक हस्पताल है तो उसे हस्पताल मानती है चाहे वहां एक भी डाक्टर ना हो. हाँ आप सरकार की और रिपोर्टों से यह बात साफ़ साफ़ देख सकते हैं. जैसे की स्वास्थ्य मंत्रालय भारत सरकार की यह रिपोर्ट देख लें..
    http://mohfw.nic.in/Health%20English%20Report.pdf

    २०१० की यह रिपोर्ट साफ़ साफ़ बताती है, कि “मानव संसाधन और विकसित मेडिकल तेक्नोलाग्जी का ७५ प्रतिशत, इस देश के कुल १५,०९७ अस्पतालों का ६८ प्रतिशत, और कुल ६, २३, ८१९ बिस्तरों का ३७ प्रतिशत निजी क्षेत्र में है. इनमे से ज्यादातर (सरकार संख्या नहीं दे रही) शहरी क्षेत्रों में हैं. और सबसे ज्यादा चिंता का विषय है ग्रामीण परिधि पर अयोग्य लोगों द्वारा दी जा रही घटिया स्तर की स्वास्थ्य सुविधाएं. स्वास्थ्य मंत्रालय, २०१०” (अनुवाद मेरा है, कोई भ्रम की गुंजाइश ना रहे इसीलिये मौलिक अंग्रेजी रिपोर्ट का यह हिस्सा यह रहा
    “Over 75 per cent of the human resources and advanced medical technology, 68 per cent of an estimated 15,097 hospitals and 37 per cent of 6,23,819 total beds in the country are in the private sector. Most are located in urban areas. Of concern is the abysmally poor quality of services being provided at the rural periphery by the large number of unqualified persons.” (MOH, 2010)

    अप स्वयं देख सकते हैं की सरकारी आंकड़े क्या कह रहे हैं..

    इसमें यह भी जोड़ लें कि विश्व की सबसे सम्मानित स्वास्थ्य जर्नल लांसेट की २०११ की रिपोर्ट बताती है.. कि भारत के ग्रामीण इलाकों में कुल बीमारियों के २८ प्रतिशत हिस्सा किसी किस्म की चिकित्सा प्राप्त नहीं कर पता. शहरी क्षेत्रों में यह प्रतिशत २० है..(संख्याएं जोड़ के देखें कि कितने लोगों के पास किसी किस्म की स्वास्थ्य सुविधा नहीं है, झोला छाप डाक्टरों की भी नहीं)
    इसमें यह जोड़ें कि पब्लिक हेल्थ पर कुल जमा सरकारी खर्चा २० प्रतिशत है, यानी की बंगलादेश जैसे राज्यों से कम.. और ऐसे में २० रुपये से कम पर जीने वाली जनता स्वास्थ्य सुविधाओं तक कैसे पंहुचती होगी..

    खैर.. कमसेकम कोई चिकित्सा ना पाने वाले गाँव के २८ फीसदी मरीजों को शहर के २० प्रतिशत मरीजों से जोड़ दें.. इनमे झोला छाप वालों के चिकित्सा पाने वालों को जोड़ लें..संख्या ६० के ऊपर ही जायेगी नीचे नहीं..

    अविनाश भाई.. उम्मीद है कि आप बेनामियों को सिर्फ गालीगलौज करने की जगह कुछ पढने लिखने की सलाह भी देंगे..

  19. Vinayak Sharma says:

    yeh desh vibhinn vargon, phir sah-vargon aur up-vargo aadi mein banta hua hai aur sabki apni soch , swarth aur apni-apni prathmiktayein hain.Ham apni spni soch , swarth aur prathmiktaon ke hisaab se hee apna rasta tay karte hain.
    Sabhi prakar ke aankade vashp hote hain aur hawa mein hee vicharte hain . Vayumandal se dharti par aate hee inko roop aur ho jata hai. Isee prakaar tathyon ko bhee haal hai…unhein bhee apne swarth aur vichardharanusaar hee parosa jaata hai.
    Sabhee andolan matra apne varg ke swarth hetu hee kiye jaate hain ya sabhee andolano mein ham apne swarth ko dekhte huye hee shamil hote hain….Aanna jee ka Jan Lokpal vidheyak hetu kiya gaya jan-andolan bhee ho sakta hai ki Madhyam-varg ke kaaran hee saphal raha ho parantu yah samajh mein nahi aata ki desh ya rajyon mein vyapt aneko-anek samajik buraiyo ke liye un rajyo ya desh kee sarkaron ko dosh dene ke bajaye Anna jee ko kyun kar ismein ghsita ja raha hai…..? Andolan kee saphalta ya viphalta…dono kee hee alochna hoti hai ,prantu andolan se hat kar kisee anya baat ke liye alochna kee jaye to thoda atpata sa lagta hai….lagta hai shayad Andolan kee saphalta se Jalan ho rahee hai.
    Dharam , Jatiyon , Rajnaitik dalon ke andolan ya phir Arakshan lene ya virodh mein hone wale andolan kariyon se koi yeh kyun nahin poochhta kee desh ya pranton kee anya samasyan ko chhod kar aap apne nihit swarth hetu jan sadharan ko kyun kasht ya asuvidhjanak paristhiti mein daal rahe ho…..?

  20. S K Maurya says:

    Very Good Dear Samar.
    You have closed everybody’s mouth.
    This government and members of the so called civil society can deny their own reports like in the case of 2G Scam Kapil Sibal was denying the report of CAG.
    If GOI follows his own reports and constitution, most of the problems of this country will be solved easily.

  21. ईश्वर दोस्त says:

    “मध्यवर्ग के लिए भ्रष्टाचार ही मुद्दा हो सकता है, भूख नहीं”

    त्रासद सिर्फ यह है कि खाते-पीते क्रांतिकारियों के लिए न भूख मुद्दा है और न भ्रष्टाचार। भोजन के अधिकार का मुद्दा भी ज्यादातर एनजीओ या सामाजिक आंदोलनों के पास है। क्रांति का नशा इन सब मुद्दों से काफी बड़ा है।

  22. Tribhuwan says:

    Samar Ji,
    you are talking about “Jai-parajay”. But you have not replied to my questions. answer straight. I am not farzi. I am what I am, need not to hide under any pseudo name or character.
    Samar, I thought you to be an intelligent person who was disagreeing with this movement due to some ideological differences(which is quite possible),BUT by calling all your opponents as farzi, you have stooped to nadir on ideological frame.
    If you are having guts and vision then plan for a better movement.Your Jai-Prajay will be clear.need not to talk to you on this issue as you do not have any sound clear vision.
    As far Anna’s Movement is concerned it was a small step step in right direction. with out any action we do not have right to abuse or criticize just because we are not agreeing with his/her ideology.

  23. Tribhuwan says:

    Few Straight questions which i want to ask -
    1.what is reason of hunger/poverty in the nation?
    2.whether by eradicating corruption ,hunger and poverty can be controlled or not?
    3.If Lokpal bill is not competent then what action/agenda you have to fight against corruption/poverty/hunger.
    your data show that situation is very grave and alarming in rural India,please come out with your plan.

  24. समर.. says:

    त्रिभुवन जी–
    शुक्रिया की आपने भूतकाल में ही सही मुझे बुद्धिमान समझा था. बाकी, अब अगर आप को यह गलत लग रहा हो तो यह मेरी गलती तो नहीं है. आपने समझा, अब आप राय बदल लें. बाकी बेनामियों से मुझे हमेशा ही दिक्कत रही है, खासतौर पर इसलिए की घटिया प्रहार कर भाग जाने की जो सहूलियत बेनामियों के पास होती है वह हम नाम/पते/ब्लॉग के साथ यहाँ मौजूद लोगों को कहाँ..

    खैर सीधे आपने सवाल पूछे हैं.. सीधे जवाब ले लें..
    1.what is reason of hunger/poverty in the nation?
    skewed distribution of resources and power in society, maintained by the caste system.
    हिन्दी में यही बात हुई, समाज में संसाधनों और शक्ति का असमान वितरण, जिसे स्थापित किये रहने में जाती व्यवस्था की बड़ी भूमिका है. (अगर आप भ्रष्टाचार समझ रहे थे तो यह आपकी गलती है, समझदारी की कमी है)

    2.whether by eradicating corruption ,hunger and poverty can be controlled or not?
    नहीं. क्योंकि भ्रष्टाचार ख़त्म करने से लोगों को जमीनें नहीं मिल जातेंगी, वह कुछ सामंतों के पास ही सिमटी रहेंगी. नहीं क्योंकि भ्रष्टाचार ख़त्म होने से लोगों को नौकरियाँ नहीं मिल जायेंगी, उसके लिए तब भी डिगरिया चाहिए होंगी और वह डिग्रियां तब भी बाजार में बिकेंगी. गरीब तबका तब भी अपने बच्चों को अंगरेजी वाले स्कूलों में नहीं भेज पायेगा.

    3.If Lokpal bill is not competent then what action/agenda you have to fight against corruption/poverty/hunger.
    राजनैतिक लड़ाई. सिस्टम को अन्दर से साफ़ करने की कोशिश. वैसे आप यह क्यों नहीं बता देते की आपने लोकपाल बिल पढ़ा भी है या नहीं अब तक. बस हवा में तलवार भंज रहे हैं?

    your data show that situation is very grave and alarming in rural India,please come out with your plan.
    क्या कहूँ? क्रान्ति? जिससे आप हँस सकें? .. जैसे अन्ना की क्रान्ति और उसके आप जैसे समर्थकों पर मैं हंस रहा हूँ.. जनाब हम जैसे तमाम लोग बहुत सालों से इन कोशिशों में लगे हुए हैं, कभी जीत कभी हार के साथ. जब आप अपनी ‘बेनामियत’ छोड़ कर सीधे सामने आयेंगे तो उस पर भी बात होगी. अभी तो बस आइये तर्कों की बात करते हैं, आंकड़ों की..

  25. समर.. says:

    त्रिभुवन
    और हाँ आप तो काफी लोकतांत्रिक मालूम पड़ते हैं, की आप ही तय करेंगे किसे आलोचना करने का अधिकार है किसे नहीं.. जो कुछ नहीं करेगा वह आलोचना नहीं कर सकता.. मेरी छोडिये, तो फिर इस देश के मजदूर/किसानों को किसी की आलोचना का अधिकार नहीं है क्योंकि वह तो जिन्दगी की जद्दोजहद में इतने फंसे होते हैं की किसी आन्दोलम में शामिल होने का वक्त कहाँ से लायेंगे?

  26. sanjay jha says:

    SAMAR BHAI……….APKE JAWAW SE BENAMI BHAI……SAHMAT…HUE HONGE…

    SADAR.

  27. raj says:

    बहस समझदारों से की जाती है। किस पगले के चक्कर में पड़े हैं आप लोग? इस समर नाम के जीव को आप जितना भी समझा दीजिएगा ये गलथोथई ही करेगा। कहते हैं कि कुत्ते की पूंछ टेढ़ी की टेढ़ी ….

    दुनिया में गरीबी और भ्रष्टाचार के संबंध में दो ही सिद्धांत हैं। एक यह कहता है कि गरीबी की वजह से भ्रष्टाचार है और दूसरा कहता है कि भ्रष्टाचार की वजह से गरीबी है। मतलब गरीबी और भ्रष्टाचार के बीच सीधा रिश्ता है।

    दूसरी बात। केंद्र और राज्य की सरकारें दोनों मिल कर लाखों करोड़ रुपये अलग-अलग परियोजनाओं में खर्च करती हैं। घरेलु उद्योग से लेकर बड़ी बड़ी परियोजनाओं में अरबों-खरबों रुपये खर्च किए जाते हैं। अगर भ्रष्टाचार पर लगाम लगती तो देश का विकास काफी बेहतर हो सकता था। लेकिन समर जैसे मूर्खों को ये बात समझ में नहीं आती।

  28. सMर says:

    संजय जी..
    ये लोग यूँ ही समझ जाएँ तो फिर कहने ही क्या..

    राज..
    का भैया.. पागलखाने में नर्स हो का? (घबड़ाओ मत.. दोस्ताना देखे होगे तो जानते होगे की पुरुष नर्स भी होते हैं, जेंडर का कोई परेशानी नहीं होगा)
    कि ‘जंतु-विशेष’ से करीबी रिश्ता है? बहुत एक्सपर्ट मालूम पड़ते हैं उसके..

  29. Tribhuwan says:

    Samar Ji,
    Thanks for posting your answers. you can contact me on praju111@hotmail.com,just to tell you that I am Not farzi. Any way, I am driving my view further on your answers, see how-
    हिन्दी में यही बात हुई, समाज में संसाधनों और शक्ति का असमान वितरण, जिसे स्थापित किये रहने में जाती व्यवस्था की बड़ी भूमिका है. (अगर आप भ्रष्टाचार समझ रहे थे तो यह आपकी गलती है, समझदारी की कमी है). OK in your POV(point of view) I am not intelligent and am on fault. Now tell me can all have equal resources?Is it possible?? Samar it not possible because equal distribution can be done by state only .From our experience we have seen this in ex Soviet block and erstwhile communist countries. You must be aware also that in these nations, leaders were talking about welfare for workers/peasants,but in the last few powerful people minted money at the cast of others.There were no castism in these nations. You must have some fade shades of USSR/Hungary/Czechoslovakia(erstwhile)/East Germany/Poland/Romania etc.
    Even China had to change its state controlled model to meet the requirement of its 1+ billion population.In India,see what happened to West Bengal in last 37 years. So please do not propagate a theory which has made more than 1.8 billion people to suffer in past 60 years across the Globe.
    Even if all resources are distributed equally then what will happen? will it guarantee for growth for all?? NO WAY. because first of all,our nation does not have enough resources for 1.2 billion population to survive for ever.
    Samar it is opportunity which should be given for every person, for example you are from Basti in UP but you had to go to new Delhi for Study. there would have been many Samars, if the same opportunities were available to local degree colleges. But since all is concentrate at one location or another, many are left in lurch. This is a sort of corruption because opportunities need to be distributed at equal level, for every one,you may call this as distribution of resources.

    2.क्योंकि भ्रष्टाचार ख़त्म करने से लोगों को जमीनें नहीं मिल जातेंगी, वह कुछ सामंतों के पास ही सिमटी रहेंगी. नहीं क्योंकि भ्रष्टाचार ख़त्म होने से लोगों को नौकरियाँ नहीं मिल जायेंगी, उसके लिए तब भी डिगरिया चाहिए होंगी और वह डिग्रियां तब भी बाजार में बिकेंगी. गरीब तबका तब भी अपने बच्चों को अंगरेजी वाले स्कूलों में नहीं भेज पायेगा.
    land was distributed in Bengal but now what happened? land will in increase @ the growth in population.then what will you suggest? population control/elimination like that? come on you must have some sense or logic. agriculture alone can not sustain the growth in population.
    As far as English and degree are concerned ,when opportunities are made equal course is same and examination will be of knowledge not of English or Degree,then there is no need to complain.Why teachers are not teaching in Govt. School?? just blame it on corruption. same is for PHC,where Docs do not sit to serve the needy. This is due to corruption only. because teachers/doctors/sarkari babaus know that they will go Scot free with some sort of connection or jugad. This is the sole reason why despite having infrastructure we are not making progress in past 20 years.
    Thing is to ensure that opportunities are made available to every one with out any favourism and implementation should be pucca.

    राजनैतिक लड़ाई. सिस्टम को अन्दर से साफ़ करने की कोशिश. वैसे आप यह क्यों नहीं बता देते की आपने लोकपाल बिल पढ़ा भी है या नहीं अब तक. बस हवा में तलवार भंज रहे हैं?

    Samar at least have some basic manners. why without reading it should I argue. I have read it it can be an effective tool.

    और हाँ आप तो काफी लोकतांत्रिक मालूम पड़ते हैं, की आप ही तय करेंगे किसे आलोचना करने का अधिकार है किसे नहीं.. जो कुछ नहीं करेगा वह आलोचना नहीं कर सकता.. मेरी छोडिये, तो फिर इस देश के मजदूर/किसानों को किसी की आलोचना का अधिकार नहीं है क्योंकि वह तो जिन्दगी की जद्दोजहद में इतने फंसे होते हैं की किसी आन्दोलम में शामिल होने का वक्त कहाँ से लायेंगे?

    there are many who are concerned about poor not through blog/post but in action also with a constructive approach.
    Samar you (others like you),may have copy right for shouting as pro poor.You may be champion in this cause, but think and ponder whether you score a ground or not. I am not in habit of giving verdicts and sermons as you have.

    Hope you will revert soon with your reply

  30. Tribhuwan says:

    Samar JI
    why are you writing in dual mode? सMर and समर.. are same.
    at least maintain your gravitas.

  31. Tribhuwan says:

    तो फिर इस देश के मजदूर/किसानों को किसी की आलोचना का अधिकार नहीं है क्योंकि वह तो जिन्दगी की जद्दोजहद में इतने फंसे होते हैं की किसी आन्दोलम में शामिल होने का वक्त कहाँ से लायेंगे?

    Maximum movements are done by workers and peasant. only please check your facts even in India. please refresh your history(India and World both)

  32. सMर says:

    त्रिभुवन जी
    आप ही के सवाल का जवाब था यह.. भूल गए हों तो अपनी पुराणी टिप्पणी देखें जहाँ आपने मुझे ‘ज्ञान’ दिया था की आलोचना के लिए आन्दोलन में शामिल होना जरूरी है.. पर कोई बात नहीं.. आप जैसों को भूलने की बीमारी आनु’सांघिक’ रूप से होती है.

    और व्यंजना समझाने भर का अदब लाइए आपने अन्दर.. मैंने आपसे पूछा था की तब तो आपके मुताबिक़..
    “तो फिर इस देश के मजदूर/किसानों को किसी की आलोचना का अधिकार नहीं है क्योंकि वह तो जिन्दगी की जद्दोजहद में इतने फंसे होते हैं की किसी आन्दोलम में शामिल होने का वक्त कहाँ से लायेंगे?”

    मैं किसान मजदूर आन्दोलनों की धारा से ही हूँ, धारा का ही हूँ. सवाल आपसे था.. खैर..

  33. सMर says:

    आगे..
    इतनी जल्दी निष्कर्ष ना निकाला करें.. समर नाम से कमेंट्स अपलोड नहीं हो पा रही हैं.. कुछ तकनीकी समस्या है..इसलिए करना पड़ा है..
    हाँ gravity और gravitas अलग अलग अर्थ वाले शब्द हैं.. आप का मतलब पता नहीं किससे था..

  34. Tribhuwan says:

    Samar Ji
    “if he is not a right person or his approach is righteous, then why do not you people start a movement in any way(non violent), public will accept it. as far as middle class is concerened, since is it is more or less urban centric, will you please start a movement in Kalahandi/Chikmangloore/halflang/Sonemarg/or any place where you feel poor public will listen your model and ideology.

    This was my first post where i had asked you to elaborate your movement/plan.
    Still your answer is pending ??

  35. Tribhuwan says:

    it was gravitas

  36. सMर says:

    Tribhuwan–
    And how exactly do you know that I/we are/am not part of such movements? Are you some astrologer who can see things without even getting close to people?
    Told you earlier as well that I have been a part and parcel of the movements ranging from right to food to right to employment.. that too from Shankargadh on UP/MP border to Bhilai to Bywar to latehar..

    Wont discuss any of them with you for the simple reason I have told you earlier as well.. That I feel very uncomfortable with benaamee/fake profiles like yrs.. those who take liberty in hiding behind anonymity offered by the cyber world cannot be trusted you know, for the simple fact that unlike me and many others who are here with our faces, names, blogs, you are just an anonymous ‘thing’.
    I don’t even have a way to know if you/vaibhav/raj all are not the same..
    Dare to come out with a face and then discuss we have done what, where and when,..
    Regards

  37. Tribhuwan says:

    when i am giving you my id what is problem?Even mohalla live can trace my id and ip. this will establish that whether I am farzi or writing under 3-4 pen names as you think. Samar I need not to hide but yes if you are having any explanation or answer to my points which i have posted above you can mail me and believe me i will reply asap.But do not propagate an idea which has been rejected world wide. I am not associated a with any ideology but yes what ever I find good or right I accept that, no matter where from it comes.

  38. समर says:

    It’s not about whether you are real or not in the ‘real’ world. Of course I understand that there must be someone typing with his/her fingers replying to these articles/comments on that. Of course, I know that the world is yet to make a comp which can actually carry on a discussion with a human being. What I pointed out, and what seems to be lost on you perennially, is the anonymity you enjoy under this name and what I don’t, and don’t even want to.
    I am not some ‘detective’ who will be hell bent on tracing you and replying to you to quest your thirst for ‘knowledge’, or the lack of it.
    Thus, we reach the most important part of this discussion, the fact that how easily you can ‘befool’ yourself.
    Which ideology has been rejected worldwide Mr Tribhuwan(or whoever you are)? Name it to enlighten me.. Or you don’t really read a thing about this world..
    And how come you, ‘who is not associated with any ideology’ so bothered about that ‘one’ ideology has been rejected worldwide.
    And what then gives you courage to claim that you are open to accept whatever you find good or right. Maybe you wanted to say that whatever barring from that ideology.

  39. Tribhuwan says:

    Samar Ji,
    you are having a blog site and when you are posting it,necessarily people will read it and pass comment on it. now what is the importance ion the name? I am unable to comprehend?? can you explain it how name makes difference, on the contrary, in my opinion it is thoughts which makes difference. So i do not accept your comment that I am hidden and you are open,because what ever we are writing is in public domain.
    may be you are not aware with IP address(internet protocall),unique number for every computer/laptop; which helps in tracking the network but any system administrator of this type of site understands and uses IP address for tracking. This is your Problem.

    Ideology which is failed is Marxism in current form. thats all.

  40. समर says:

    Aaah.. such words of wisdom(or shall I call them pearls?).. Seems Shakespeare has reincarnated himself on the face of this mother earth.. and is himself asking me what is there in a name..

    Aah.. this enlightenment I received on IP addresses and all.. Never knew about any of that.. Why dint you help me with further knowledge on DNS, IP-6 and IP4 and all that.. Despite the fact that I had told you clearly that I am not a detective and don’t even intend to be one..

    Aah the assertion that these are the thoughts which make a difference not the person.. such a direct import from gandhian dictum of Khadi is not clothing, it’s a thought..

    Aah yr claim that you are not hidden all because u r writing in public domain despite the fact that anyone can reach me and none can reach you.

    Aah the final assertion that It is Marxism that has FAILED.. Aah this honesty, and this ignorance coupled in one person.. as if Latin America never happened, is not happening.. As if Nepal exists on planet Venus and is not a neighbouring country..

    Enlighten me more my friend.. It’s fun knowing how blind can one be to his times.. Carry on.. I am listening

  41. Tribhuwan says:

    Latin America see what’s status and Nepal yes it is on earth but how much has it grown in Marxist regime? please Enlighten me.

  42. समर says:

    One who had taken pledge to remain blind and oblivious to happenings around the world can not be enlightened!
    you don’t know what’s happening in Latin America? Google at least.. though i know google is the limit of yr knowledge in any case..
    Nepal.. is there a Marxist regime in Nepal? or even Maoist? and why did u run to discuss development? India was never ruled by Marxists but then it is behind even in Bangladesh on many counts..

    और हाँ त्रिभुवन जी.. इतनी गलत, अशुद्ध अंगरेजी लिखने से अच्छा हिंदिये में काहे नहीं लिखते..अज्ञान तब भी दिखेगा, भाषा नाजी आती यह तो बच जायेगा.. (यह स्पष्ट कर दूं की भाषा की शुद्धता का यह आग्रह आप जैसे फर्जी ज्ञानियों से है. वरना तो अपन ने गाँव के अनपढ़ बाबाओं से बहुत कुछ सीखा है)

  43. Tribhuwan says:

    I am not a bhashavid, but if you can tell me my mistake i will rectify them. PLEASE TELL.

  44. समर says:

    Latin America see what’s status
    वाक्य देख लें और अर्थ समझा दें संभव हो तो..
    Ideology which is failed is Marxism in current form.
    फिर से वही..
    thats all
    फिर से वही

    आदि आदि..हिन्दी में ही लिख लें प्रभु, इससे बात का वजन कम नहीं होगा और अंगरेजी में लिखने से बढ़ नहीं जाएगा!

  45. vaibhav says:

    भैया भांति भांति के डाटा दिए जा रहे हैं तो हमने सोचा की क्यों न कुछ latest दे दिया जाये . तो ये रहा link
    http://data.worldbank.org/country/india

    आप लोग देखो ध्यान से पढो .. और जनता को चु*** मत बनाओ …
    समर भाई ये काम तो सत्ताधारियों का हैं आप कबसे करने लगे ? .. पाला बदल दिया हैं क्या ?

  46. vaibhav says:

    सन २००५ में १०% जनता purchasing power के हिसाब से ६० रु के हिसाब से थी. अगर real value में convert करें तो वो २० रु आता हैं .. वो भी हर दिन का एक आदमी का. अब सन २०११ चल रहा हैं. आप सब को पता हैं की किस हिसाब से income change हुयी हैं. एक मजदूर की बात करते हैं. ( जो की शायद सबसे relevant होगा ). उस समय उसकी मजदूरी ८० रु थी.अब वो बढ़ कर १६० से २०० हो गयी हैं. तो जाहिर हैं की वो नंबर जो की १०% था. अब कितना होगा वो अंदाज़ा आप खुद ही लगा लो. बाकि तो यहाँ इतने समझदार लोग हैं की पूछना ही नहीं हैं .

    जब सबसे ताकतवर तर्क का ये हाल हैं तो बाकि भगवान् ही मालिक हैं. वैसे ऊपर दिए हुए link में ढेर सारे चार्ट मिल जायेंगे. जो की हर विषय पर हैं . थोडा खोज बीन जारी रखिये.देखने से लगता हैं की यहाँ कई सारे research wale hain.

  47. समर says:

    वैभव
    अब तक कहाँ थे ज्ञान शिरोमणि.. विद्योत्तमा से विवाह के पहले के कालिदास..इ डेटा से कहना का कहते हैं प्रभु.. ज्ञान वर्धन करें जरा..
    एक बार फिर से पढ़िए.. ऊपर की पूरी बहस.. अबकी जा ध्यान से.. ‘सरकारी’ गरीबी रेखा की बात ही नहीं हो रही है कहीं.. हुई ही नहीं है.. सरकार तो हमेशा सवाल ऐसे बनाती है कि ‘रेखा’ नीचे आये गरीबी चाहे ऊपर चली जाए..

    इसीलिये बात बहुत सीधे और सपाट तर्कों की थी.. भारत में कौन एक दिन में कमाता कितना है.. २० रुपये ROJ से कम वालों को सरकार गरीब ना माने ना माने.. आप भी नहीं मानेंगे? ऐसा डेटा ना दिया करिए कि ज्ञान फूट फूट पड़े..
    (और नहीं तो एक बार पूरा चेक मारिये और एक जगह गरीबी रेखा का जिक्र दिखाइये..)

    ४६ प्रतिशत बच्चे कुपोषित हैं और गरीब देश में ३० प्रतिशत भी नहीं हैं? कैसे भाई? माँ बाप जनसँख्या नियन्त्र के सारकारी आग्रह का पालन बच्चों को भूखा मार कर रहे हैं? कुल मिला के ६० प्रतिशत लोगों के पास बीमारी के इलाज का पैसा नहीं है और गरीब केवल २८ प्रतिशत हैं? (कुछ खा ‘पी’के तो ये डेटा नहीं ढूंढें थे? खैर..

  48. समर says:

    वैभव
    अब कहाँ का डेटा ले कर उप्राये हैं प्रभु? तीन दिन से यही खोज रहे थे क्या?
    हम को नहीं पता है किस हिसाब से इनकम चेंज हुई है, और किसकी हुई है.. बता दें.. (डेटा के साथ बताइयेगा)

    मजदूर की मजदूरी ८० रुपये से बढ़कर १६० हो गयी है.. नरेगा तक तो १०० रुपये से ज्यादा दे नहीं रहा ये १६० कहाँ हो गयी भाई..बता दीजियेगा?
    आगे,इस देश में कितने लोगों को सरकारी मजदूरी मिलती है? संगठित क्षेत्र के मजदूरों की कुल संख्या आप जानते हैं इस देश में?

    सबसे ताकतवर तर्क का हाल क्या है बताइये? अर्जुन सेन गुप्ता कमेटी की रिपोर्ट खारिज कर दिए आप? असंगठित क्षेत्र के मजदूरों के जीवन स्तर पर रिपोर्ट थी, आप खारिज किये सरकारी मजदूरी का रेट बता के.. महान हैं प्रभु.. अमेरिका की न्यूनतम मजदूरी का आंकड़ा ही दे दिए होते इतनी जल्दी थी तो..

    विश्वबैंक बता रहा है इस देश में १० डॉलर, माने ४५० रूपया ज्यादा से ज्यादा कमाने वाले इस देश की कुल आबादी का सिर्फ ५ प्रतिशत हैं, ये डेटा खारिज कर दिए? बिना संख्या बताये? १६० आपको ४५० से ज्यादा लग रहा होगा…

    पर कोई नहीं.. इस देश में विवाह के पहले वाले कालिदासों की लम्बी परम्परा है वैभव जी.. और आप तो वैसे भी परम्परा वादी ठहरे..
    हाँ बोलने में और बकने में बहुत फर्क होता है पर छोडिये भी.कुछ लोगों की कूद पड़ने की आदत होती है.. कूदिये..

  49. vaibhav says:

    समर या तो तुम परले दर्जे के जो भी हो .. या फिर तुम्हारी बदनसीबी ये हैं की तुम जहाँ कहीं भी रिसर्च कर रहे हो वहां के कमरे से बाहर नहीं निकले हो .. या तो पूरी बात पढ़ लिया करो .. तब मुंह खोला करो .. या फिर बंद ही रखा करो .. जब बोला हैं की ध्यान से पढो खोजबीन करो तो उसमें कई सारे लिंक हैं जिसपर क्लिक करने से पॉइंट दर पॉइंट डीटेल हैं .. पहले सब पढ़ लेते .. फिर उछलते .. पर नहीं ..

    ये लो ..
    http://data.worldbank.org/indicator/SI.POV.DDAY/countries/IN?display=graph
    ऐसे ही कई सारे सेक्सन हैं .. क्लिक कर कर के पढ़ लेना ..

    ध्यान से मन लगा के पढना .. फिर थोडा सोचना भी .. , और हाँ .. कल एक काम और करना .. अपने कमरे से बाहर निकलना ..कही न कही construction हो रहा होगा .. वहां जा के एक मजदूर पकड़ना और उस-से पूछना की बेटा एक दिन काम करना हैं .. कितना लोगे ? वो तुमको बताएगा .. ?
    वैसे मनरेगा में १५७ मिलता हैं
    http://articles.timesofindia.indiatimes.com/2010-09-07/goa/28250915_1_mgnrega-wages-valpoi

    अब ये मत कहने लगना की ..तुमने १६० लिखा था .. ..लोगो को चु*** बनाना बंद करो .. दाल कहीं और गलाओ ..

  50. vaibhav says:

    समर या तो तुम परले दर्जे के जो भी हो .. या फिर तुम्हारी बदनसीबी ये हैं की तुम जहाँ कहीं भी रिसर्च कर रहे हो वहां के कमरे से बाहर नहीं निकले हो .. या तो पूरी बात पढ़ लिया करो .. तब मुंह खोला करो .. या फिर बंद ही रखा करो .. जब बोला हैं की ध्यान से पढो खोजबीन करो तो उसमें कई सारे लिंक हैं जिसपर क्लिक करने से पॉइंट दर पॉइंट डीटेल हैं .. पहले सब पढ़ लेते .. फिर उछलते .. पर नहीं ..

    ये लो ..
    http://data.worldbank.org/indicator/SI.POV.DDAY/countries/IN?display=graph

    ऐसे ही कई सारे सेक्सन हैं .. क्लिक कर कर के पढ़ लेना ..

    ध्यान से मन लगा के पढना .. फिर थोडा सोचना भी .. , और हाँ .. कल एक काम और करना .. अपने कमरे से बाहर निकलना ..कही न कही construction हो रहा होगा .. वहां जा के एक मजदूर पकड़ना और उस-से पूछना की बेटा एक दिन काम करना हैं .. कितना लोगे ? वो तुमको बताएगा .. ?
    वैसे मनरेगा में १५७ मिलता हैं
    http://articles.timesofindia.indiatimes.com/2010-09-07/goa/28250915_1_mgnrega-wages-valpoi

    अब ये मत कहने लगना की ..तुमने १६० लिखा था .. ..लोगो को चु*** बनाना बंद करो .. दाल कहीं और गलाओ ..

  51. vaibhav says:

    समर या तो तुम परले दर्जे के जो भी हो .. या फिर तुम्हारी बदनसीबी ये हैं की तुम जहाँ कहीं भी रिसर्च कर रहे हो वहां के कमरे से बाहर नहीं निकले हो .. या तो पूरी बात पढ़ लिया करो .. तब मुंह खोला करो .. या फिर बंद ही रखा करो .. जब बोला हैं की ध्यान से पढो खोजबीन करो तो उसमें कई सारे लिंक हैं जिसपर क्लिक करने से पॉइंट दर पॉइंट डीटेल हैं .. पहले सब पढ़ लेते .. फिर उछलते .. पर नहीं ..

    ये लो ..
    ” data. worldbank. org/ indicator/ SI.POV.DDAY/ countries/ IN?display = graph ”

    (copy paste the link and remove spaces )
    ऐसे ही कई सारे सेक्सन हैं .. क्लिक कर कर के पढ़ लेना ..

    ध्यान से मन लगा के पढना .. फिर थोडा सोचना भी .. , और हाँ .. कल एक काम और करना .. अपने कमरे से बाहर निकलना ..कही न कही construction हो रहा होगा .. वहां जा के एक मजदूर पकड़ना और उस-से पूछना की बेटा एक दिन काम करना हैं .. कितना लोगे ? वो तुमको बताएगा .. ?

    अब ये मत कहने लगना की ..तुमने १६० लिखा था .. ..लोगो को चु*** बनाना बंद करो .. दाल कहीं और गलाओ ..

  52. समर says:

    वैभव..
    भाई आप जैसे लोगों की सबसे अच्छी बात यही लगती है.. पहले तो जंतु विशेष (रामायण की परम्परा वाले) की तरह बहस में कूद पड़ो (हाहाकार मचा कर बन्दर….. वाले अंदाज में) फिर मार पड़े तो गालियाँ बकने वाले अपने खांटी औकात पर उतर आओ..
    कहाँ क्लिक करते मियाँ.. ये भी तो बता दो..
    विद्योत्तमा से विवाह के पहले के कालिदास के बुद्धि स्तर के वैभव बाबू..
    बहस गरीबी रेखा के आंकड़े पर नहीं हो रही है.. बहस प्रति व्यक्ति आय पर हो रही है..
    फिर से पूछूं.. अर्जुन सेन गुप्ता कमेटी रिपोर्ट को गलत साबित कर रहे हो?
    तब उसके लिए डेटा दो ना.

    विश्वबैंक की रिपोर्ट गलत साबित कर रहे हो..
    तब उसके लिए दो..

    या फिर उस अंदाज वाले जंतु विशेष हो की हम तो सिर्फ खौखियाने के अलावा कुछ जानते ही नहीं..
    बहस चाहे जहाँ हो हम यही डेटा देंगे..

  53. समर says:

    वैभव
    और हाँ.. कहाँ इतनी मजदूरी मिलती है नरेगा में भाई? हर राज्य में?
    की कुछ जगह उछल के देखे कुछ जगह छूट गया..
    और यह जो मैंने पूछा था की भारत में जनसँख्या का कितना प्रतिशत संगठित असंगठित क्षेत्र में काम करता है..

    क्या कहोगे इस पर?
    फिर से खौं खौं करोगे?

  54. vaibhav says:

    च च च …, अब हर राज्य का कुछ परसेंट राज्य को भी देना होता हैं .. अब आप उसमें भी केंद्र की सरकार की गलती घुसेड देंगे … जो राज्य जितना सेट कर दे ..वो काम तो राज्य की सरकारों को ही करना होगा न मेरे लाल .. , अब भारत की जनसँख्या का कितना प्रतिशत कहाँ काम करता हैं उसको .. छोड़ो मेरे भाई .. उससे भी बड़ी गिनती ले लो (जो की काम न करने वालो भी समाहित किये हैं ) .. और देखो की क्या हाल हैं , और तुम्हारे समझ में एक सीधी सी बात काहे नहीं आ रही हैं .. की संगठित या असंगठित .., तुम क्यों नहीं बाहर निकल के एक सर्वे कर लेते .. , कोई भी आदमी अगर वो कुछ भी करता होगा तो .. २० रु रोज से ज्यादा की कमाता होगा.. एक किसी सेनगुप्ता की १० साल पहले की रिपोर्ट मिल गयी तुमको, ले के बैठ गए . मस्त हैं यार.

  55. Tribhuwan says:

    samar ji,
    Now I understood why are you so upset? shortcut writing (which is a normal form in current cyber world ) is causing you problem. Thank you, now I will try to write complete sentences. I may make mistake because I am not Bhashavid as told you earlier.As far Hindi is concerned, my System is not configured with Devanagari font so that I can not write it,and of course I can not dare to write Hindi in Roman font.Reason is that , this may again cause problem.

    By the way we were talking about failed ideology,which is Marxism. can you tell me the reason why it failed in USSR/East Germany/Romania/Czechoslovakia/Yugoslavia/Hungary?
    This will help me to understand the real cause of failure in these countries, because some countries do not exist as on date?

    Another question is why Marxism is not attracting common people,even in its old bastion like West Bengal/Kanpur/Kerala etc?

    Please explain me, Samar Sir.

  56. समर says:

    वैभव
    एक अवधी कहावत है कि बेवकूफों का कोई गांव नहीं बसता, कहीं भी मिल जाते हैं. जैसे आप मिल गए हैं यहाँ..
    दिमाग की कमी आपको बहुत है यह तो पहली टिप्पणी से ही पता चल गया था, है ही नहीं यह अब. पर बरखुरदार, अर्जुनसेन गुप्ता कमेटी रिपोर्ट १० साल पहले की कैसे हो गयी?
    क्लिक कर लिए होते तो बेवकूफी ऐसे ना खुलती ना.. काहे अपना जुलूस निकलवाने पे तुले हुए हो..

    और राज्य का कुछ परसेंट माने क्या? सवाल सीधा था.. कि नरेगा की मजदूरी १५७ रूपया बता रहे थे मैंने पूछा हर राज्य में है? तो दौड़ के यहाँ भाग गए.. इ बताओ भाई.. खाली दौड़ना कूदना आता है? आदमी के पूर्वजों से कुछ ख़ास रिश्ता है क्या?

    और इसके बाद तो बेवकूफी की उल्टी ही कर दिए हो भाई जी आप तो.. दुनिया भर में लोग काम और रोजगार की चिंता में मरे जा रहे हैं, कुल डेटा इस पर ही फोकस रहता है कि आबादी का काम कर सकने वाला कितना हिस्सा है..जो काम कर सकता है और एक आप हो उससे भी बड़ी गिनती गिन रहे हो (उससे भी बड़ी गिनती ले लो (जो की काम न करने वालो भी समाहित किये हैं )) गिनाओ.. डेटा दो..

    कि एक बार हनुमान सेना टाइप का कूदे एक कुछ मिला ले के धम्म.. फिर उलटे मुंह गिरे तो अपनी ‘औकात’ पर उतर आये और लगे अपने को “चु***” बताने..
    भैया दिमाग नहीं है उ तो ठीक है, भाषा तो ठीक रखो..

    और हाँ अर्जुन सेन गुप्ता कमेटी का टाइम देख लेना नहीं तो गजब बेवकूफ साबित होगे..

  57. समर says:

    त्रिभुवन जी
    आपका अंदाज-ए- बयान तो ऐसा लग रहा है कि बस पकड़ लिए समरवा को.. अब पछाड़ ही देंगे.
    पर प्रभु, किसने बता दिया आपको कि इन सब जगहों में मार्क्सवाद फ़ैल हो गया?
    कि आपका दिल करता है कि मार्क्सवाद फेल हो जाय तो आप उसे फेल कर ही देंगे..

    पूंजीवाद का इतिहास जानते हैं जरा भी? कब से बना? कितने साल या दशक या सदियों का इतिहास है? उसमे २ विश्वयुद्ध हुए वह असफलता नहीं है?
    हिटलर का जेर्मनी? बुरी तरह टूटा.. वह भी तो पूंजीवादी देश था.. वह पूंजीवाद की असफलता नहीं है? इटली? जापान? नहीं.. ये तो नाजीवाद था, फासीवाद था, ये था वो था..
    सब पूंजीवाद के विकृत मोडल थे.. टूट गए..

    पर सोवियत संघ, पूर्वी जर्मनी आदि आदि में जो टूटा वह मार्क्सवाद था! वाह रे तर्क..
    फिर जो क्यूबा में है वह क्या है? और अल्बानिया में? और पूरे के पूरे लातिन अमेरिका में? और चीन में? और उतर कोरिया में?
    वियतनाम का नाम तो मैंने लिया ही नहीं शायद..(अमेरिका की विश्व इतिहास में इकलौती हार)
    अब धम्म से विकास का मुद्दा पटकिये.. जैसे पूंजीवादी देश सब विकास ही कर गए.. जैसे इंडोनेसिया, मलेसिया जैसी पूंजीवादी ‘चीता’ अर्थव्यस्थाओं ने कितना विकास कर लिया..
    या भारत ने ही..माने.. मीठा मीठा गप्प.. कड़वा कड़वा थू..

    आप इसे तर्क पद्धति भी समझाते होंगे.. शुभकामनाएं..

  58. समर says:

    त्रिभुवन जी
    और हाँ ये आप और वैभव हमेशा एक साथ ही काहे टिप्पणी करते हैं? बिलकुल एक समय में.. १० मिनट आगे पीछे? व्यक्ति तो अलग अलग ही हैं? इतने सक्रिय आदमी हैं आप तो, ब्लॉगव्लोग काहने नहीं बना लेते.. या फेसबुक पर ही सामने कहे नहीं आ जाते..
    भ्रम ही ख़त्म हो जाए..

  59. बाब मार्क्स says:

    samar bhai kya upar wala comment aapke hee kisee article ka hissa hai. aap us article ka ullekh kyo nahi karte hain?

    aur haa ye daadi to banwa lo. ab isq aur inklaab ke liye marx jaisi dadi aur baal badana jaroori hain kya?

    aur haa bhaiya aap bade kab honge?

    aaj bhi collage ke jamaane ka marx baitha hai. maine to suna tha umr ke saath saath aadmi gambhir ho jata hai lekin aap to aage hee nahi badte hain.

    Khair kranti ke naam par indino kya chal raha hai..

  60. बेभाव के संग चतुर्भुवन says:

    समर बाबू,
    आप दोनों के आगे-पीछे टिप्पणी करने से काहे परेसान हैं जी…
    नाम तो पढ़िए रहे होंगे इनका…। वैभव और त्रिभुवन…। यानी दोनों में एक चीज कॉमन है- “भव”
    इसके बाद उ है त तिरी है तो ई है त ऊ है…

    रहा बात (परेसान मत होइएगा…. हमारा लिंग-भेद वाला स्थिति थोड़ा खराब है) दोनों के हवाबाजी करने का तो जिन मूरखों को इतना भी पता नहीं है कि उ का कह रहे हैं, ओसे बहस करेंगे आप…।

    अर्जुन सेनगुप्ता समिति या तेंदुलकर समिति की बात करेंगे तो भी इ भागेंगे आउर व्यवहारिक बात करेंगे त उसका जवाब भी नहीं देंगे।

    जब ये कहते हैं कि दस साल पहले- त हंसिए।

    जरा इनको पूछिए तो कि सरकार ने नरेगा का सौ दिन काम देने का रहम किया है उस सौ दिन में केतना कमाई हो पाता है एक मजदूर का साल भर में। बाकी जो समय खाली बैठे रहते हैं उस दौरान का मजदूरी वैभव बबुआ के घर से जाता है का।

    आ बैभाव बबुआ से पूछिए त जरा कि गरीबी रेखा का पैमाना आज भी इहे काहे है- गांव में बारह रुपए और शहर में सत्रह रुपए…

    जरा पूछिए कि सरकारा काहे कहती है राज्यवन से कि गरीबी रेखा से नीचे का संख्या छत्तीस फीसद से निच्चे रखो।

    गांव में बारह रुपए में आउर शहर में सत्रह रुपए में आप का खा सकत हैं।

    आउर हां, औसत आय का फर्जीवाड़ा भी बता दीजिएगा। देस में एगो झारखंड नाम का राज है। ऊंहा का औसत आय बहुत सारा विकसित राज्यवन से लड़ाई करता हूआ दिखता है। ई का पइमाना इ है कि अगर हमारा आमदनी एक लाख आउर आपका दू रुपइया तो औसत आमदनी हुआ पचास हजार एक रुपइया प्रति व्यक्ति।

    अब इ देस में करोड़ और अरब के पतियन की संख्या बेभाव आ तिरीभुबन बाबू को कहिए गिनन के खातिर आ तब बोलिए कि आंकड़ा लेके पसारेगा आ दूसर के अउकात के बात करेगा…

    बेकूफ कहीं के… खुदे गदहा है त सभे गदहे देखाई देता है..

  61. Tribhuwan says:

    Samar Ji I am on face book,if you wish you can send me a link. I will accept your friend request. search Tribhuwan.
    Samar Sir, nations, which are named above were followers of Marxism. but they failed. one USSR broke into 15 parts or more. some nations banished, i wanted to know the reason,since you are very intelligent, I thought that you can provide me the reasons.
    Samar Sir,how did you understand that I am supporting capitalism?I am afraid to say but your logic and interpretation are at fault. As I have stated earlier that what ever i find correct/appropriate/right, I accept that no matter where it comes from?
    Germany(Birth country of Marx),Italy, japan all did wrong in the second world war and they paid but today they are far better than your Erstwhile Communist countries/China/North Korea etc.
    China-Samar Sir, what do you think about current China. Mr. Tung has become a history and has been comfortably kept aside. it has become a nation, where open economy,free trade etc has become the key words.
    North Korea- A nation which is giving 100% guarantee for MAD to Japan and South Korea.
    Cuba- How long will uncle Castro,wave the flag of Marxism, only time will tell.
    What are Growth/Prosperity/Health Index etc. for these countries vis a vis to their neighbors? this question may answer to your questions.

    Samar Sir,”America”?? I wonder where did this nation come in our discussion? I did not mention this nation so far because it was no where in the debate. Any way USA did wrong in Vietnam and was defeated. But why again Vietnam is aligning towards USA. An explanation from you will help me to understand the real reasons.

    SE Asian nations- These nations have achieved a lot by applying open economy in past 30 years. At least Data says like that.

    But, still you did not cite any reason for failure of communism in above mentioned nations. You did not explain why Marxism is not attracting Indian now days even in its bastion.

  62. Tribhuwan says:

    Why are you thinking that me and Vaibhav are one? at least when we are talking seriously,you should debate seriously. but you are raising fringe issues like thinking about defeat-victory /pen name/double name etc.

    I wanted to know the answers only.

  63. Tribhuwan says:

    And Yes I have send link on your blog post so that you can clear your mind from trivial doubts.

  64. समर says:

    बाबा मार्क्स
    बाब मार्क्स से फिर बाबा मार्क्स हो गए भाई? लगभग मृत बहुरूपिया कला को पुनर्जीवित करने का भारी बोझ अपने कमजोर कन्धों पर उठा रहे हैं.. शुभकामनाएं रहेंगी.. बाब/बाबा/बेनामी महोदय!

    ऊपर वाला कमेन्ट? कौन सा भाई? ऊपर तो मेरे बहुत कमेन्ट हैं आपकी ‘बटन’ से भी तेज आँखों में कौन सा खटका है.. बताएं जरा..

    दाढी बनवा लें? काहे भाई? जिसने दाढी रखना गैरकानूनी करार दिया था उस पागल सुलतान के कबीले के कोई भागे हुए लठैत तो नहीं हैं आप कि तय करें लोग दाढी रखेंगे कि बनवायेंगे?

    मैं बड़ा कब होऊंगा? आह.. वात्सल्य रस से सराबोर ऐसा प्रश्न? मेरी तो आँखें ही भीग गयीं..
    कालेज के जमाने का मार्क्स.. आपकी बातें पढ़ के तो नहीं लगता कि आप का कालेज जाने के अलावा भी कालेज से कभी कोई रिश्ता रहा होगा..

    खैर.. क्रान्ति के नाम पर आप जैसे बाब/बाबा/बेनामियों को देख रहा हूँ.. समझ रहा हूँ..

  65. समर says:

    बेभाव के संग चतुर्भुवन
    आपकी टिप्पणी मोटा मोटा अच्छी लगी.. पर साहब बेनामियत से मेरा एक पंगा तो है.. और साहब सच बोलने के लिए वैभव वाली भाषा पर उतर आना थोड़े ही जरूरी है.
    हाँ तर्क जोरदार हैं आपके..

  66. समर says:

    त्रिभुवन
    वजह भी बता ही देंगे सरकार.. पहले आप यह तो बता दें कि आप बहस को भारत से भगाकर सोवियत संघ क्यों पंहुचाना चाहते हैं?
    क्या भारत वाले सारे तर्क ख़त्म हो गए? और ढूंढ लीजिये.. शायद एकाध मिल जाए कहीं..

    मैंने कब कहा कि आप कैपिटलिज्म का समर्थन कर रहे हैं.. मैंने तो सिर्फ यह पूछा था कि जिन तर्कों पर आप मार्क्सवाद को असफल घोषित कर रहे हैं उन्ही तर्कों पर पूंजीवाद के बारे में क्यों नहीं कहते..
    लगता है बात लग गयी आपको..
    व्यवसाय विशेष (चोरी वाला) व्यक्ति की दाढी में तिनके जैसा कुछ मसला तो नहीं हैं ना?

    खैर.. मार्क्सवाद पर बहस होगी, जरूर होगी पर इधर वाला बता दें कि क्या भारत से भाग रहे हैं? भ्रष्टाचार से भी?

  67. समर says:

    त्रिभुवन..
    झूठ भी बोलना है तो थोडा तो दिमाग लगा लिया करिए.. कहाँ भेजा आपने अपना लिंक.. हमें तो कहीं मिला नहीं.. या बस बोलने के लिए बोल दिया था प्रभु..

  68. समर says:

    त्रिभुवन
    हाँ भारत पर तर्क ना मिलें तो अपने आल्टर-इगो (क्षमा करें हिन्दी शब्द नहीं मिला पर गलत व्याकरण वाली अंगरेजी लिखने के उस्ताद आप जैसे विद्वान् तो अर्थ समझ ही गए होंगे) वैभव से पूछ लिया होता..
    फिर से कोई नया (९और गलत) डेटा खोज लाते..

  69. बाब मार्क्स says:

    are bhai hum ne to youn hee le liye tha aapne dil pe liya. khair aap dus din na nahaye ya terah din se hume kya? agar aapke na nahane se hee kranti aa jayegi to intjaar hai aisi kranti ka..

    waise ye bataiye ki aapki kranti kee rooprekha kya hai ?

    kuch mahat ke bindu hain jise lekar janta ke aapse sawaal hain-

    1 bina ganja peekar kranti sambhav hain. uske sath kaam nahi chalega ?

    2 kranti ke bheetar love kee sambhavnaao ke lekar kya koi nitigat badlaav laya jayega ?

    3 kya kranti delhi se hee sambhav ho sakti hain. lodhi wodhi park se sasura. tribal ke sath jaye binaa kaam chalegaa ?

    4 kya kranti me kuch naye gajedhiyon ko mahatpoorn pado par rakha jana sambhav banayega. batour ek gajedibaaj prashan par dhyanpoorvak sochiyega.

    5 kya kranti me kuch aur karne kee jarurat hai ? ek aham kaam yahan aap kar rahe hain. isse to mil hee jayegi sasura shanti kee badi bahan kranti.

    to apne kuratko aur marx ko badnaam karte huye kitne samay me aap kranti kar denge /

    age to kafi lagti hai aapki kab pass kiya collage ?

  70. समर says:

    बाब मार्क्स–
    फिर से? वापस बाब?
    और हिन्दी तो ठीक से लिख लेते भगवन (मार्क्स को इससे कम पे कैसे संबोधित करें )
    “अरे भाई हम ने तो यूं ही ले लिए था आपने दिल पे लिया.” यह क्या है प्रभु? आपने लिया की हमने लिया की किसने लिया?
    आपसे ऐसी बेवकूफी की उम्मीद नहीं है भगवन.. या फिर यह कोई बाल सुलभ लीला है.. आप कहीं मार्क्स के बाल्यावतार तो नहीं प्रभु?

    “अगर आपके न नहाने से ही क्रांति आ जाएगी तो इन्तजार है ऐसी क्रांति का ”
    बिकुल ठीक कहा प्रभु.. आपके पोखर पोखर नहाने से, नाली नाली आचमन से, सीवर सीवर पूजन से हिन्दू राष्ट्र तो बना नहीं..हमारे ना नहाने से क्रांति कैसे आ जायेगी.. (बाकी छोडिये, उपरोक्त वाक्य में अनुप्रास अलंकार की छटा तो देखिये)

    बाकी आपके सवालों का जवाब–

    1 bina ganja peekar kranti sambhav hain. uske sath kaam nahi chalega ?
    नहीं साहब.. शिव भक्तों का धतूरा पिए बिना, नागा साधुओं का गांजा पिए बिना, भाजपाइयों का कोकीन पिए बिना (बाप की अस्थी विसर्जन वाले दिन तक राहुल महाजन से नहीं छूटी) क्रांतिकारियों की कैसे छूट सकती है?

    2 kranti ke bheetar love kee sambhavnaao ke lekar kya koi nitigat badlaav laya jayega ?
    नहीं साहब. वह किसी भी दिन बिना शादी के दामाद वाले बाजपेयी/भाजपाई रिश्तों की परंपरा से बेहतर है.. इसमें फिर से प्रमोद महाजन की हत्या के कारणों की महान सांस्कृतिक परंपरा की बात भी जोड़ लें..

    3 kya kranti delhi se hee sambhav ho sakti hain. lodhi wodhi park se sasura. tribal ke sath jaye binaa kaam chalegaa
    चल जाएगा साहब.. सब क्रांतिकारी दिल्ली में ही तो बैठे हैं, रायपुर, बस्ती, हर्रैया, ब्यावर, लातेहार, सालेतून्गरी यह सब दिल्ली के ही तो मोहल्ले हैं..

    4 kya kranti me kuch naye gajedhiyon ko mahatpoorn pado par rakha jana sambhav banayega. batour ek gajedibaaj prashan par dhyanpoorvak sochiyega.
    आपकी सूचना गलत है.. मैं वायुसेना समर्थक नहीं हूँ.. जमीन से जुड़ा हूँ, सहज उपलब्ध जलसेना पर यकीन करता हूँ.. आपकी तरह सर्वाहारी नहीं हूँ..

    5 kya kranti me kuch aur karne kee jarurat hai ? ek aham kaam yahan aap kar rahe hain. isse to mil hee jayegi sasura shanti kee badi bahan kranti.
    सब आपका आशीष है बाबा.. पर जाने क्यूँ आपके शब्दों से गहन वंचना की पीड़ा झलक रही है.. सम्भालियेगा.. कहीं कवी ना हों जाएँ..

    to apne kuratko aur marx ko badnaam karte huye kitne samay me aap kranti kar denge /
    पता नहीं बाबा.. पर संभल के रहिएगा.. आपका गांजा सप्लाई बंद हो जाएगा उसी दिन..
    age to kafi lagti hai aapki kab pass kiya collage ?
    बाबा क्या मजाक कर रहे हैं.. मेरे तीन साल पहले से कालेज में थे आप. पास नहीं होके जूनियर हो अगये तो उम्र भी कम ही बताइयेगा?

  71. बाब मार्क्स says:

    :)samara sorry samar baba marx ko gaali dete ho. de do hum le lenge. mana nahi karenge.

    :) umr to 40 ke aaspaas lagti hai lekin chidte bachcho ki tarah ho…

    :)bhai ganje ka rate kya chal raha hai taaki pata lag sake ki kranti pana abhi kitni door hai..

    :) bachche bane raho ki jaha tum jawa huye mati me khelne ka maja bhool jaoge.

    kaash marx ko padh liya hota to unki itni bejati na karwate.

    marx tumhe sadbudhhui de.

    anyway jai baba junior marx urm samar hahahahaha

  72. Tribhuwan says:

    Hello there,

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    This is your Blogpost’s reply on my id praju111@hotmail.com. now tell me who is liar?
    Samar I am not running away from India. I has asked about West Bengal/Kerala/kanpur etc. Please read comment in totality, before proving that others are fool.
    And yes,during serious discussion,pun is not required or your Lakshna/vyanjna.

  73. Tribhuwan says:

    Avinash Ji

    Why are you considering my comments for moderation ??
    Samar has asked blamed me to be a liar, I am posting reply from his Blogpost.
    As a fair play you should not moderate it.

  74. समर says:

    बाबा मार्क्स
    इतनी स्माइलीज तो लोग तभी लगाते हैं जब लगी बहुत तगड़ी हो..तो लगी तो आपको बहुत तगड़ी है पर कहाँ लगी ये भी बता देते भाई..
    उम्र का अंदाजा भी गलत लगाये.. ४० नहीं है भाई.. उससे बहुत बहुत ज्यादा है.. चश्मे का नंबर बदलिए..
    गांजा का रेट? आप खरीद के पीते हैं? हम तो इतने छोटे बाबा हैं फिर भी बच्चे ही समर्पित कर देते हैं..
    :) bachche bane raho ki jaha tum jawa huye mati me khelne ka maja bhool jaoge.
    अब इ बिना सर पैर की बात का क्या जवाब दें? आप को खुद ही नहीं पता चला होगा की कहना क्या चाहेंगे..

  75. बाब मार्क्स says:

    are samara sorry samar len den kee process me tribhuvan aur vaibhav ne aisa kya dar dala ki aapki bolti band ho gai.

    hume to lag raha tha aap denhu dendhu marx marx phir karenge..

    lekin anyway pahle sahla lijiye. hum yahi hai..

    :)bade cartoon maloom dete ho.

    waise hum marx aur uske vaad kee bahut ijaat karte hain magar bharat me agar marx aur uske vaad kee sameeksha karni ho aur uske fatehaal halaton par najar daalni ho to aap jaise churkut tathakathit isqbaaj (usme bhi bakar hee kee hogi wo kaam bhi dang se kiya hota tab bhi halat aisee nahi rahti) )ek chota sa magar aham bindu hai.

    jaisye sik jaye to phir aanaa.. :)

  76. समर says:

    बाब मार्क्स
    फिर से स्माइलीज़.. दर्द बरदास्त की हदों के बाहर लगता है साहब का.. आयोडेक्स मलिए साहब.. (झंडू बाम नहीं, उससे आपको अपना चरित्र याद आ जाएगा)
    ना मिले, तो वैभव/त्रिभुवन से मांग लीजियेगा.. दोनों लोग तो लम्बी फरारी काट चुके हैं.. वापस आये ही नई.. शायद डेटा ढूंढ रहे होंगे..
    बाकी इश्क के बारे में आपकी टिप्पणी गहरी वंचना से निकली दिखाई पड़ती है.. वियोगी कवी ना बन जाइएगा साहब कहीं..
    भाषा के स्तर पर अपनी सही ‘असलियत’में उतर आने की बधाई ग्रहण करें. सामान्य भाषा बोलने में आपको बड़ी दिक्कत हो भी रही होगी.. अच्छा हुआ आप यहाँ पंहुचे..
    आयोडेक्स मल के लौटें, बात होती है
    समर..

  77. Tribhuwan says:

    samr,
    My comments are being blocked by Moderator.
    Moderator pl post my yesterday’s comment.

    • अविनाश says:

      सर, ये सही आरोप नहीं है। आपके एक भी कमेंट को ब्‍लॉक नहीं किया गया है…

  78. Tribhuwan says:

    Avinash Ji,
    I had posted one comment on sunday at 11.40 am, which was under consideration and same was been blocked later on. Pl arrange to post that message so that Samar can get reply.

    • अविनाश says:

      शायद जिस कमेंट की बात आप कर रहे हैं, वह मुझसे रिमूव हो गया था। मैंने री-स्‍टोर कर दिया है।

  79. Tribhuwan says:

    Thanks!

  80. Tribhuwan says:

    Samar,
    Avinash has restored my comment. Pl see it above.

  81. समर says:

    त्रिभुवन
    So that was you faking yourself or P Raju.means here you are communicating with the name Tribhuwan, and then suddenly you come up as P Raju.

    This is what called LYING and ATTEMPT to CHEAT people with fake/nameless identities. You know what, this is what makes me very uncomfortable dealing with people like you in this era of all the PHISHING scams and identity thefts.

    If you are as genuine as you claim, why could not you have an identity in yr name, the name you use while you communicate with people.

    And whoever told you Mr Tribhuvan, that ‘pun’ is not a part of serious discussions.. That would rubbish all the writings of George Orwell!
    Anyways.. Blogs have an options of following, just that that requires an ‘identity’!

  82. Tribhuwan says:

    Samar,You are a real nut/stupid. praju111 is my mail id name because i was not getting my desired ID name so i had to opt his one. Any problem in that??. It means you have only to make false arguments. and why did not you send me link for Facebook because I am could no get any Samar. if you are there send me a link. I am not George Orwell .I was discussing some thing serious because I found you to be a passionate writer and supporter of Marxism. Anyway send me link for Facebook if you have any,Even you can mail me in case you do not want to make it public.

    Samar, You may not have answer ,it is OK. One thing where I am with you is that you are not an anti-national element.When you have not done any crime or wrong ,then why are you so much scared about PHISHING or identity thefts. You are SAMAR and you will be SAMAR only. thats your identity and it is not under crisis.
    Further,Moderator is looking after these things,so if not on me you can rely on Avinash he is a neutral and impartial man.

  83. Tribhuwan says:

    SAMR JI
    For you , see how is life in Cuba. news is from BBC,
    क्यूबा: घर खरीदने पर लगी रोक हटी

    कम्युनिस्ट पार्टी के महाधिवेशन का मकसद साम्यवादी व्यवस्था में नई जान फूंकना है.

    क्यूबा में 1959 में हुई कम्युनिस्ट क्रांति के बाद निजी संपत्ति खरीदने पर लगी रोक हटा दी गई है.

    क्यूबा के नागरिक अब तक सिर्फ अपनी पैतृक संपत्ति के मालिक ही हो सकते थे.

    पिछले 50 साल से घर खरीदने पर लगी रोक के कारण घर या तो माता-पिता से बच्चों को हस्तांतरित होते थे या फिर उन्हें आपस में बदला जा सकता था. हालांकि इस अदल-बदल की प्रशासनिक प्रक्रिया बेहद जटिल थी.

    यह घोषणा, पिछले 14 सालों में पहली बार हो रहे क्यूबा की कम्युनिस्ट पार्टी के महाधिवेशन के दौरान की गई. महाधिवेशन का मकसद साम्यवादी व्यवस्था में नई जान फूंकना है.

    व्यवस्था में बदलाव
    1959 में हुई क्यूबा की क्रांति का नेतृत्व करने वाले फीडल कास्त्रो ने सरकारी मीडिया में छपे अपने एक लेख में कहा है कि वो व्यवस्था में हो रहे इन बदलावों से पूरी तरह सहमत हैं.
    फिलहाल इस बारे में कोई जानकारी नहीं दी गई है कि घर इत्यादि खरीदने-बेचने के लिए किस तरह की योजना बनाई जा रही है. हालांकि क्यूबा के राष्ट्रपति राउल कास्त्रो ने चेतावनी दी कि इस छूट के चलते संपत्ति एकत्रित किए जाने जैसी गतिविधियों पर कड़ी नज़र रखी जाएगी.

    इससे पहले महाधिवेशन के संबोधन भाषण में राष्ट्रपति राउल कास्त्रो ने कहा था कि राष्ट्रपति सहित किसी भी राजनीतिक पद पर कोई भी व्यक्ति अब दो कार्यकाल यानि दस साल से अधिक नहीं रह सकेगा.

    उन्होंने कहा कि पार्टी को ताज़ा नेतृत्व की ज़रूरत है और उसे अपने प्रति आलोचनातमक रवैया अपनाना होगा.

    क्यूबा की साम्यवादी व्यवस्था के लिए इस तरह के फेरबदल नई बात हैं.

    इस बीच 1959 में हुई क्यूबा की क्रांति का नेतृत्व करने वाले फीडल कास्त्रो ने सरकारी मीडिया में छपे अपने एक लेख में कहा है कि वो व्यवस्था में हो रहे इन बदलावों से पूरी तरह सहमत हैं.
    Any Comment SAMAR Sir.

  84. Tribhuwan says:

    बदला नज़रिया
    राष्ट्रपति राउल जिस तरह के आर्थिक परिवर्तनों का प्रस्ताव कर रहे हैं चीन और वियतनाम ने पहले ही उन्हें अपना लिया है.

    लेकिन वे कुछ वैचारिक मतभेदों के आगे जाने की बात करते हैं.

    अभी क्यूबा की अधिकांश आर्थिक गतिविधियों पर सरकार का नियंत्रण है

    उदाहरण के तौर पर 1960 के बाद पहली बार क्यूबा के लोगों को यह अधिकार मिल जाएगा कि वे किसी और व्यक्ति को अपने यहाँ काम पर रख लें.

    अब तक वहाँ का संविधान इस तरह से किसी को काम पर रखे जाने को शोषण मानता रहा है.

    इसके अलावा सरकार अगले साल अप्रैल से क़रीब पाँच लाख लोगों की सरकारी नौकरियाँ ख़त्म करने जा रही है. अब सरकार चाहती है कि लोग या तो स्वरोज़गार करें या फिर कोई नया व्यवसाय शुरु करें.

    इसके लिए उन्हें बैंकों से कर्ज़ भी दिए जाएँगे और वे कोई जगह किराए पर ले पाएँगे या हो सकता है कि उन्हें जगह ख़रीदने की अनुमति भी मिल जाए.

    जब सोवियत संघ ने क्यूबा को ख़स्ता आर्थिक हालात के साथ छोड़ा था तो क्यूबा में कुछ छोटे पारिवारिक कारोबार की अनुमति दी गई थी. लेकिन उन्हें हमेशा ही बुरी नज़र से देखा जाता रहा और जैसे ही क्यूबा की आर्थिक हालत कुछ सुधरी उन पर टैक्स और लालफ़ीता शाही का शिकंजा कुछ इस तरह से कसा गया कि उनमें से ज़्यादातर कारोबार बंद ही हो गए.

    लेकिन नई मार्गदर्शिका में ज़ोर देकर कहा गया है कि स्वरोज़गार कोई बुरा शब्द नहीं है और वो लोग जो अपने लिए काम करेंगे उन्हें कलंकित घोषित नहीं किया जाएगा.

    अगले साल होने वाली कांग्रेस शायद आख़िरी कांग्रेस होगी जिसका नियंत्रण उस पीढ़ी के पास होगा जिसने 1959 की क्रांति में हिस्सा लिया था.

    राउल कास्त्रो की व्यवहारिक नीतियों ने भले ही उनके भाई फ़िदेल कास्त्रो के यूटोपियाई आदर्शों का स्थान ले लिया हो लेकिन सच यह है कि सारे उद्योग अभी भी सरकार के नियंत्रण में ही रहेंगे.

    नई प्रस्तावित नीति में भी ज़ोर देकर कहा गया है कि आर्थिक नीतियाँ केंद्रीय समिति ही तय करेगी न कि बाज़ार की ताक़तें

  85. समर says:

    त्रिभुवन
    बेवकूफी कौन कर रहा है, बारहा, यह तो दिख ही रहा है. अगर आपका इमेल आपके नाम से नहीं है, डिजायर्ड आईडी आपको नहीं मिली, तो आपको इसका जिक्र अपने मेल में करना चाहिए की मैं ‘त्रिभुवन’ हूँ. यहाँ किसी को सपना नहीं आता की praju 111 और त्रिभुवन एक ही व्यक्ति होंगे/हो सकते हैं.
    और फिर, फिशिंग स्कैम्स की आपकी समझदारी पे तो ठीक से तरस भी नहीं आता, पहचानों की चोरी सिर्फ सरकारें नहीं करतीं, पहचानों की चोरी और लोग भी करते हैं, आर्थिक सन्दर्भों से शुरू कर चरित्र हनन तक के लिए. और इसीलिये, मेरा एक सीधा निर्णय है, फेसबुक से लेकर जीमेल तक मेरे अकाउंट्स पर बेनामियों/फर्जियों/अनजानों के लए जगह नहीं है. (बस अनजान का तर्क थोडा अलग है, अगर आप मेरे कुछ मित्रों के भी मित्र है तो मैं उनसे पूछ लेता हूँ)

    तो पीराजू उर्फ़ त्रिभुवन जी.. किसी को मेल भेजते हुए आप वह नाम भी लिख दें जिससे आप उनसे संवाद कर रहे हैं.. जैसे आपने यहाँ त्रिभुवन लिख दिया होता तो मैं समझ जाता..

  86. समर says:

    त्रिभुवन–
    इतना लम्बा आलेख (कहाँ से यह सन्दर्भ आपने नहीं दिया) कोपी पेस्ट करने के बाद आप मेरी राय मांग रहे हैं.. पर इस लेख को आपने पढ़ लिया होता तो ज्यादा अच्छा था.. किसी भी शासन पद्धति में कुछ नीतियाँ तो बदलती ही हैं.. पर मूल वही रहना चाहिए..

    या आप यह कहना चाह रहे हैं कि १९५९ वाली पीढी अमरत्व प्राप्त करे और क्यूबा में सत्तासीन रहे? फिर तो आपकी समझदारी पर ही शक पैदा हो जायेंगे साहब!

    बाकी आपके इस लेख की अंतिम दो पंक्तियाँ यह रहीं..
    “राउल कास्त्रो की व्यवहारिक नीतियों ने भले ही उनके भाई फ़िदेल कास्त्रो के यूटोपियाई आदर्शों का स्थान ले लिया हो लेकिन सच यह है कि सारे उद्योग अभी भी सरकार के नियंत्रण में ही रहेंगे.

    नई प्रस्तावित नीति में भी ज़ोर देकर कहा गया है कि आर्थिक नीतियाँ केंद्रीय समिति ही तय करेगी न कि बाज़ार की ताक़तें.”
    यही मेरा जवाब भी है, आर्थिक नीतियाँ केन्द्रीय समिति ही आय करेगी ना कि बाजार, तो फिर समस्या क्या है? बदला क्या है?

  87. meenakshy says:

    प्रिय समर जी,
    आप सच कहते हैं। 20 रुपया रोज पर जीनेवाली लगभग 70 प्रतिशत आबादी के लिए भ्रष्‍टाचार मुद़दा नहीं हो सकता। उनकी आंखों में तो बस जीवन की बुनियादी जरूरतें हासिल कर पाने का सपना पलता है और इसके लिए वे ताउम्र जद्दोजहद करते हैं। छोटे छोटे कारखानों में वे 12-14 रूपये तक की दिहाड़ी पर 12 से लेकर 14 घंटे तक खटते हैं, भीषण परिस्थितियों में किसी किस्‍म के सुरक्षा उपकरण के बिना काम करते हैं, दुर्घटनाओं में अपने हाथ पैर गंवा कर काम से बाहर कर दिये जाते हैं उन्‍हें तो ऐसे कामों के लिए भी बचाव का कोई उपाय मुहैया नहीं होता जहां उनकी जिंदगी दांव पर लगी होती है।
    हम 21वीं शताब्‍दी में जी रहे हैं लेकिन क्‍या आप विश्‍वास कर पायेंगे कि कई कारखानों में स्‍त्री मजदूरों के इस्‍तेमाल के लिए किसी शौचालय तक की व्‍यवस्‍था नहीं होती जहां सुबह से लेकर शाम तक उन्‍हें मजदूरी करनी होती है। इसी डर से वे पानी तक नहीं पीतीं।
    मजदूर इन्‍हीं न्‍यायसंगत मांगों और गरिमापूर्ण जीवन जीने के अधिकार को लेकर ‘मजदूर मांग पत्रक’ आन्‍दोलन चला रहे हैं, अपने साथी मजदूरों का हस्‍ताक्षर जुटा रहे है और पहली मई को जंतरमंतर पर प्रदर्शन कर रहे हैं। मेरा जमीर मुझे चुप नहीं बैठने देगा मैं उनके समर्थन में जंतर मंतर जा रही हूं। क्‍या आप भी आयेंगे
    मुझे जिस लिंक से इस आंदोलन के बारे में जाना वह आपको भी भेज रहीं। आप और लोगों को भी बतायें। मुझे भरोसा है इंसाफ और इंसानियत का जज्‍बा रखनेवाला हर व्‍यक्ति इसमें शरीक होगा।
    http://dgroups.org/ViewDiscussion.aspx?c=51ecc6ec-9dc9-4aff-b399-8130698414ab&i=39317fa9-e323-468c-a5eb-b6fc0a424117

  88. समर says:

    मीनाक्षी जी
    आप का कहना सच है.. दिल्ली में तमाम संगठन यह सारे मुद्दे उठाते रहे हैं.. स्त्री अधिकार संगठन ने अभी काफी काम किया था इस पर कि शौचालय ना होना सिर्फ एक भूल का नहीं वरन स्त्रियों की मोबिलिटी को उनकी गतिशीलता को नियंत्रित करने की सोची समझी साजिश के तहत होता है… पर वही कि यह सब मुद्दे कौन उठाता है.. सिविल सोसायटी वाले तो किसी मैकडोनाल्ड में घुस के ‘निपट’ लेते है, पर गरीब वर्ग के लोग यह साहस कहाँ से लायें..

    रैली की जानकारी देने का शुक्रिया.. वैसे हर साल वहां होता हूँ, इस साल भी रहूँगा.. और दोस्तों को सूचित भी करूंगा….
    सादर

  89. Raj says:

    After reading so much from so many intellectuals about poverty, hunger, unemployment, corruption etc, may be I am not upto level of thoughts of those who pushed their words through this blog but still I want to raise some simple questions: Is it justifiable to compare two major problems we have in front of us. I and even a significant population in India might be agreeing that poverty and appetite is a bigger threat than corruption. It may also be possible that corruption will not be able to end poverty completely (as per author’s assumption) but does it mean we should not fight against corruption until poverty is eradicated entirely. Should we not encourage people having different opinions and priorities than us on their mind and most importantly working for their superior cause wholeheartedly? Will it not be unfair to doubt their countryman ship?
    It is almost like comparing Terrorism and Maoism with the arguments that maoism is a bigger problem (just a consideration) and formulation of NIA as a step to fight terrorism is completely rubbish as we should only fight terrorism after completely eliminating maoism from country. Can we not fight both of our threats together? Should we not support NIA, ATS etc, as their activities are not in our list on top? Of course yes, but let’s focus on from main stream discussion.
    Is there really no relation between corruption and poverty? Is there really no effect of corruption on most unprivileged section of our society? I think most of readers are aware of the way of governance which in order to establish socio-economic equalities, collect taxes on the basis of economic earnings and redistribute it in public welfare so that life of our most unprivileged section can be improved (Ideally). But unfortunately if the process encounters with corruption at any stage then who do you think would be the biggest victim of this, whether poor to whom that money was destined to or middle or upper middle class who paid this money as their taxes. This is not that I don’t want to fight poverty, if somebody stand for it, I’ll definitely support and do whatever I will be able to…

  90. prof.Jagdish Lohra says:

    Nice one.

  91. ANUJ GUPTA says:

    GOOD SAMER BHAI. I AGREE WITH U. KYA AAP IS ARTICLE KO HAMARE AKHBAR ‘SHILPKAR TIMES’ ME AAPKE NAAM SE CHAAPNE KI IJAJAT DENGE?

  92. Mahendra Singh says:

    samar to ekdam chutia hai…ye saale communist hamesha se hi aise rahe hain…ab itna hi communism se pyaar hai to kyon nahi china me jaakar bas jaate ho…sara markswaad bhool jayega….

  93. Mahendra Singh says:

    ae tribhuvan ji ab koi samar se pooche ki jakar Cuba me kyon nahi bas jaate aur fidel castro ka joota chatate…tab samajh me aayega ki loktantra kya hota hai….

  94. Kalidas says:

    arey yaar ab tum sab log ghar jao. kyon bekar mein internet ka bill badha rahe hon.
    OK TATA BYE BYE

  95. नितिन वागले says:

    गंभीर और विचारोत्तेजक लेख. पठनीयता के लिए थोड़ा छोटा किया जा सकता था पर ऐसे भी ठीक है. साधुवाद

  96. नितिन वागले says:

    और हाँ, यह कहना छूट ही गया था कि हम लोग कितना कम जानते हैं चीजों को और कितना सतही ढंग से जानते हैं यह बात भी साफ़ हो रही है. इतनी सारी बातें थी भ्रष्टाचार पर और इस नजरिये से कोई सोच ही नहीं रहा था.

  97. महर्षि अरविन्द says:

    लेख अच्छा है पर निराशा में भीगा हुआ है. लेखक को कुण्डलिनी जागृत करनी चाहिए.. हम सुधरेंगे युग सुधरेगा…

  98. शिप्रा महाजन says:

    पाठक को उसके कम्फर्ट ज़ोन से बहार खींच असहज कर देने वाला लेख है. ऐसा लेख जिसके तर्कों से सहमत होने का दिल नहीं करता फिर भी असहमति ढूंढना मुश्किल सा काम लगता है.
    बधाई इतने शानदार लेख के लिए. आपके और भी लेख ढूंढती/पढ़ती हूँ.

    आप अपने ब्लॉग का लिंक दे सकें तो शुक्रगुजार होउंगी.

  99. Robert Pappu says:

    ठेक लिखा है. अच्चा आर्ग्यूमेंट है. बस थोडा पेसिमिस्ट है.

  100. भाई समर गरीबी का सीधा संबंध
    भ्रष्टाचार ​ से भी होता ह किसी बूढ़े ने ​भ्रष्टाचार ​ के खिलाफ आवाज उठाई तो बुरा किया ह आप भुखमरी के खिलाफ आवाज​ बुलंद करो दिक्त आ कहा रही ह ​

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