राजभाषा : आजकल झारखंड में है जेरे-बहस ये मुद्दआ

भाषा संख्या से नहीं संस्कृति से जानी जाती है

♦ अश्‍िवनी कुमार पंकज

झारखंड सरकार के अनुसार राज्य में 87 भाषाएं हैं। इनमें 46 भाषाएं बोलने वालों की संख्या एक सौ से कम है। 27 भाषाएं ऐसी हैं, जिन्हें अधिकतम दस व्यक्ति जानते हैं – जबकि आठ भाषा-भाषियों की संख्या झारखंड में मात्र एक-एक है। यह सूची झारखंड सरकार की है, जिसे 20 अप्रैल को राजभाषा के मुद्दे पर आयोजित सर्वदलीय बैठक में वितरित किया गया है। हैरत की बात है कि इस सूची में 4725927 लाख खोरठा, 1242586 लाख नागपुरी, 193769 पंचपरगनिया और 368853 कुड़माली भाषा-भाषी एकसिरे से ‘गायब’ हैं। इसी के साथ सूची में भोजपुरी, अंगिका आदि भाषाओं का भी जिक्र नहीं है। ध्यान देने वाली बात यह है कि राज्य में खोरठा, नागपुरी, पंचपरगनिया और कुड़माली भाषाओं की पढ़ाई विश्वविद्यालय स्तर पर होती है और ये सदान-वर्ग की प्रमुख भाषाएं हैं। इस तरह राज्य सरकार की भाषाई सूची न सिर्फ अचंभे में डालती है बल्कि यह भी बताती है कि कैसे आंकड़ों के खेल में उलझा कर झारखंडी भाषाओं को उनके हक से वंचित करने राजनीति की जा रही है। दरअसल बांग्ला-उड़िया आदि गैर-झारखंडी भाषाओं को द्वितीय राजभाषा बनाने की यह पूरी कवायद ‘आम सहमति’ के नाम पर सीधे-सीधे झारखंडी भाषा एवं सांस्कृतिक अस्मिता पर हमला है।

दुनिया की कोई भी भाषा अपने समुदाय की सांस्कृतिक अभिव्यक्ति होती है। भाषा ही वह तत्व है, जिसमें समुदाय विशेष की संस्कृति, जीवन-दर्शन, ज्ञान-विज्ञान, जीवनानुभव आदि संरक्षित एवं प्रवाहमान रहते हैं। इस कसौटी पर झारखंडी भाषाएं ही खरी उतरती हैं न कि बांग्ला या उड़िया। बंगभाषी और उड़िया समुदाय की अपनी सांस्कृतिक परंपराएं और भाषा हैं। वर्षों झारखंड में रहने के बावजूद उन्होंने झारखंडी पर्व-त्योहारों और रीति-रिवाजों को नहीं अपनाया है। कोई भी बांग्ला अथवा उड़ियाभाषी संगठन मागे, करमा, सरहुल आदि झारखंडी सांस्कृतिक उत्सवों का आयोजन नहीं करता। न ही व्यक्तिगत रूप में वे इन्हें स्वीकार करते हैं। जब बांग्ला और उड़िया भाषा-भाषी समुदाय किसी भी स्तर पर झारखंडी संस्कृति का प्रतिनिधित्व ही नहीं करते, और न ही उसे अंगीकार करने को तैयार हैं, फिर किस आधार पर ये राजभाषा बनने का दावा कर रहे हैं? लिहाजा ऐसी कोई भी भाषा जो राज्य के सांस्कृतिक चरित्र के विरुद्ध हो, महज संख्या बल के आधार पर द्वितीय राजभाषा बनाये जाने का निर्णय अनुचित है। संख्या बल की ही बात करें, तो पश्चिम बंगाल और उड़ीसा सहित देश के कई राज्यों में हिंदीभाषियों की आबादी लाखों में है। परंतु वह राजकाज की भाषा नहीं बनायी गयी है। पश्चिम बंगाल में 5747099 हिंदी, 2247113 संताली, 208769 तेलुगु और 1653739 ऊर्दू भाषी रहते हैं। लेकिन प बंगाल सरकार ने इन भाषाओं को राजभाषा के रूप में मान्यता नहीं दी है। इसी तरह उड़ीसा में 490857 लाख, बिहार में 443426 लाख और महाराष्ट्र में 310137 लाख बंगभाषी हैं। पर इनमें से किसी भी राज्य में बांग्ला को राजभाषा का दर्जा नहीं मिला है। फिर झारखंड में ही क्यों बांग्ला-उड़िया को राजभाषा घोषित करने के लिए सरकार ‘आम सहमति’ बनाने पर तुली है?

झारखंड के साथ ही छत्तीसगढ़ का भी निर्माण हुआ। वहां अलग राज्य के लिए न कोई आंदोलन था और न ही सांस्कृतिक अस्मिता की मांग का उभार। देखा जाए, तो संघर्ष और राजनीतिक चेतना के मामले में वह हमसे काफी पीछे था। पर सांस्कृतिक अस्मिता के सवाल पर वह आगे निकल गया। आज छत्तीसगढ़ की राजभाषा हिंदी के साथ छत्तीसगढ़ी भी है। देशज-आदिवासी स्वायत्तता के सवाल पर झारखंड ने जिस तरह से देश को राह दिखायी, भाषाई सम्मान के मामले में अब छत्तीसगढ़ देश को राह दिखा रहा है। छत्तीसगढ़ी को राजभाषा घोषित कर के उसने बता दिया है कि भाषाई सम्मान के सवाल पर कोई भी समझौता जनता के साथ गद्दारी है। राज्य में राजभाषा बनने का अधिकार सिर्फ देशज-आदिवासी भाषाओं को ही है। अगर अपने साथ जन्मे और पड़ोसी राज्य की भाषा नीति से हमारे राजनीतिक दल कोई सबक नहीं ले पा रहे हैं, तो इससे बड़ी राजनीतिक अदूरदर्शिता और कुछ नहीं हो सकती। इसका दूसरा निहितार्थ यह भी है कि कोड़ा सरकार की ही तरह मौजूदा सरकार और यहां के राजनीतिक दलों का भी ‘मास्टरमाइंड’ कोई और है। और जो है, वह राज्य का हितैषी नहीं है।

बांग्ला और उड़िया किसी भी दृष्टि से राजभाषा बनने की अधिकारी नहीं हैं। भौगोलिक, ऐतिहासिक, सांस्कृतिक और राजनीतिक, किसी भी दृष्टिकोण से। अगर इन भाषाओं को यहां राजभाषा बनाया गया, तो भविष्य में इसके गंभीर परिणाम सामने आएंगे। ग्रेटर झारखंड की मांग से तो हम पीछे हटेंगे ही, सीमावर्ती जिले भी आगे चल कर झारखंड से छीने जा सकते हैं। मुख्यमंत्री अर्जुन मुंडा का परंपरागत क्षेत्र के तीन जिले – सरयाकेला खरसावां, पूर्वी और पश्चिमी सिंहभूम पर उड़ीसा तथा धनबाद, देवघर, साहिबगंज जिले, रांची का पंचपरगना क्षेत्र आदि पर पश्चिम बंगाल की भाषाई दावेदारी हम उपहार में दे देंगे। चिंता का विषय है कि बांग्ला की तरफदारी झामुमो और आजसू जैसी पार्टियां कर रही हैं, जो पश्चिम बंगाल और उड़ीसा के चुनावों के वक्त ‘ग्रेटर झारखंड’ का मुद्दा चीख-चीख कर उठाते रहे हैं। परंतु झारखंड में पलटी मारते हुए बांग्ला-उड़िया की गोद में जा दुबकते हैं। इसलिए राजभाषा का मुद्दा उन्हें अपनी झारखंडी प्रतिबद्धता साबित करने का सबसे सटीक अवसर दे रहा है, बशर्ते वे झारखंडी अस्मिता व स्वाभिमान का अर्थ समझें और बिना किसी दबाव में आये यहां की आदिवासी एवं सदान भाषाओं को राजभाषा बना दें।

(अश्‍िवनी कुमार पंकज। वरिष्‍ठ पत्रकार। झारखंड के विभिन्‍न जनांदोलनों से जुड़ाव। रांची से निकलने वाली संताली पत्रिका जोहार सहिया के संपादक। इंटरनेट पत्रिका अखड़ा की टीम के सदस्‍य। इन दिनों आलोचना की एक पुस्‍तक आदिवासी सौंदर्यशास्‍त्र लिख रहे हैं।
उनसे akpankaj@gmail.com पर संपर्क किया जा सकता है।)

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