समीक्षा किसी और ने लिखी, छपी किसी और के नाम से!

♦ शचींद्र आर्य

मैं .ये तो मान सकता हूं कि एक विचार दो तीन क्या लाखों करोड़ों के मस्तिष्क में एक साथ आ सकता है, पर क्या उसकी अभिव्यक्ति वे एक ही भाषा एक ही वाक्य में कर सकते हैं? ये भी मान लिया जाए कि समीक्षा दो व्यक्तियों से अलग अलग करवायी गयी, पर क्या ये संभव है कि दोनों शब्दशः एक ही बात को उठाएं और एक ही क्रम में अपनी स्थापनाओं को स्थापित करें?

पहली बार में आप ये कह सकते हैं कि शायद नहीं, ये असंभव है।

पर ये कारनामा आज एक अखबार ने कर दिखाया है। समीक्षा छापी कमलेश्वर के आखिरी उपन्यास ‘अंतिम सफर’ की, जो उन्होंने इंदिरा गांधी पर लिखा था। समीक्षक ‘अलोक रंजन झा’ हैं, पर वहां नाम किन्‍हीं प्रदीप कुमार का चमक रहा है।

जिन महोदय को यह समीक्षा हस्तगत की गयी थी, उनसे संपर्क करने पर वे बतलाते हैं, उन्होंने किसी और से ये समीक्षा करवायी है – जबकि आज भी उनके द्वारा दी गयी समीक्षार्थ प्रति आलोक के पास सुरक्षित है। अब इस स्थिति में क्या किया जा सकता है, आप में से कोई विद्वान मार्गदर्शन कर सकते हैं क्या? या कॉपीराइट से लेकर बौद्धिक संपदा अधिकार क्या सिर्फ लेखों में बजाये जाने वाले झुनझुने हैं?

अखबार का नाम है हिंदुस्तान। पेज ग्यारह। पन्ने का नाम शब्द। दिन इतवार। तारीख एक मई… शायद आज मजदूर दिवस भी है!

(शचींद्र आर्य। दिल्‍ली विश्‍वविद्यालय में बीए प्रोग्राम के छात्र। करनी चापरकरन पर इनकी ब्‍लॉगिंग का नजारा लें। उनसे karnichaparkaran@gmail.com पर संपर्क किया जा सकता है।)

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