टैगोर वहां गये जहां न बुलबुलों को बुलावा था न कवियों को

संजय कृष्ण

साहित्य के इकलौते नोबेल पुरस्कार पाने वाले कवींद्र-रवींद की 150 वीं जयंती देश-दुनिया में मनायी जा रही है। उनकी कविताओं, उनके व्यक्तित्व, राष्ट्रवाद पर उनके विचार आदि को खंगाला जा रहा है। पर, रवींद्र नाथ टैगोर ने उत्तरप्रदेश के गाजीपुर में भी प्रवास किया था, वहां रहकर मानसी की अधिकांश कविताएं लिखीं थीं, नौका डूबी के कई अंश गाजीपुर में लिखे गये या उससे संबंधित हैं, यह बहुतों को नहीं पता। कई टैगोर के अधिकारी विद्वानों से भी चर्चा की, तो उन्होंने अनभिज्ञता प्रकट की। जबकि रवींद्र नाथ टैगोर गाजीपुर में छह मास रहे। वहां का एक छोटा सा इतिहास भी लिखा। गाजीपुर वे क्यों गये, इसके बारे में खुद उन्‍होंने लिखा भी है।

रवींद्र नाथ टैगोर ने मानसी की सूचना में लिखा है…

[ बचपन से ही पश्चिमी हिंदुस्तान मेरे लिए रूमानी कल्पना का विषय था। यहीं विदेशियों के साथ इस देश का लगातार संपर्क और संघर्ष होता रहा है। यहां ही सदियों से इतिहास की विराट पट भूमि पर बहुत से साम्राज्यों के उत्थान-पतन की और नये-नये ऐश्वर्यों के विकास-विलय अपने विचित्र रंगीन चित्रों की कतार बनते जा रहे हैं। बहुत दिनों से सोच रहा था कि इसी पश्चिमी हिंदुस्तान की किसी एक जगह कुछ दिन रह कर विराट, विक्षुब्ध अतीत का स्पर्श दिल में महसूस करूं। आखिर में एक बार सफर के लिए तैयार हुआ। इतनी जगहों के बावजूद गाजीपुर को ही क्यों चुना – इसके दो कारण हैं। सुन रखा था कि गाजीपुर में गुलाब के बगीचे हैं। मैंने मन ही मन जैसे गुलाब-बिलासी सिराज का चित्र बना लिया था। उसी का मोह मुझे बहुत जोरों से खींचता रहा। वहां जाकर देखा – व्यापारियों के गुलाब के बगीचे। वहां न तो बुलबुलों को बुलावा है, न कवियों को। खो गयी वह छवि। दूसरी ओर, गाजीपुर के महिमा मंडित प्राचीन इतिहास के कोई बड़े निशान देखने को नहीं मिले। मेरी निगाहों में उसका चेहरा एक सफेद साड़ी पहनी विधवा सा लगा, वह भी किसी बड़े घर की नहीं।

फिर भी गाजीपुर ही रह गया। इसका एक बड़ा कारण यह भी था कि मेरे दूर के रिश्तेदार गगनचंद्र राय यहीं अफीम विभाग में बड़ अफसर थे। उनकी मदद से मेरे लिए यहां रहने का इंतजाम बड़ी आसानी से हो गया। एक बड़ा सा बंगला मिल गया, गंगा-तीर पर ही, ठीक गंगा तीर पर भी नहीं। करीब मिल भर का लंबा रेत पड़ गया है। उसमें जौ, चने और सरसों के खेत हैं। गंगा की धारा दूर से दिखती है। रस्सी से खींची जा रहीं नावें मंद गति से चलती हैं। घर से सटी काफी जमीन परती पड़ी है। बंगला देश की मिट्टïी होती तो जंगल हो जाता। निस्तब्ध दोपहर में कुएं से कलकल शब्द करती हुई पुर चलती है। चंपा की घनी पत्तियों में से दोपहर की धूप जली हवाओं से होती हुई कोयल कूंक आती है। पश्चिमी कोने पर एक बहुत बड़ा और पुराना नीम का-सा पेड़ है। उसकी पसरी हुई घनी छाया में बैठने की जगह है। सफेद धूलों से भरा रास्ता घर के बगल से चला गया है? दूर पर खपरैल के घरों वाला मोहल्ला है।

गाजीपुर दिल्ली-आगरा के समकक्ष नहीं है। सिराज-समरकंद से भी इसकी तुलना नहीं चलती। फिर भरी अबाध अवकाश में मन रम गया। अपने एक गीत में मैंने कहा है – ‘मैं सुदूर का प्यासा!’ परिचित दुनिया से यहां आकर मैं उस दूरी से ही घिर गया। आदत के भारी हाथों की पकड़ के बाहर होते ही मन को आजादी मिल गयी। इस वातावरण में मेरी काव्य रचना का एक नया पर्व अपने आप ही उभर आया। अपनी कल्पना पर नये-नये परिमंडलों का प्रभाव पड़ते मैंने बार-बार देखा है। इसी से जब अल्मोड़ा में था, मेरी कलम ने शिशु कविताओं की ओर हठात नयी राह ली। हालांकि उस तरह की कविताओं की प्रेरणा का कोई उपलक्ष ही वहां नहीं था। यह पहले की रचना धारा से स्वतंत्र एक नये काव्य रूप का प्रकाश था। मानसी भी वैसी ही है। नये वातावरण में मानो इन कविताओं ने सहसा नयी देह धारण कर ली है। …मानसी में ही छंदों के नये-नये रूप आने लगे। कवि के साथ जैसे एक कलाकार आ मिला। ]

रवींद्र नाथ टैगोर की मानसी व अन्य कविताओं के अनुवादक डा सरजू तिवारी ने लिखा है, कवि प्रवास की कोई खास छाप गाजीपुर के जन-जीवन पर पड़ने के उदाहरण नहीं मिलते। किंतु कवि मन पर यहां के जन-जीवन की गहरी छाप पड़ी थी। उनकी अन्य रचनाओं में भी इनका विस्तृत उल्लेख मिलता है। उनके विख्यात उपन्यास नौका डूबी के कथानक का एक तृतीयांश गाजीपुर पर ही केंद्रित है। गाजीपुर प्रवास के चौवालिस साल बाद कवि का पुनश्च काव्य संग्रह प्रकाशित हुआ। इसमें स्मृति नामक कविता कवि के गाजीपुर वास के बिंबों को पुन: उकेरती है। कविता की पंक्तियों पर गौर करें…

पश्चिम में शहर
उसी के एक किनारे निर्जन में
दिन की धूप जकड़े है एक अनादृत घर
झुके हुए छज्जे चारों ओर
कमरों में चिर काल की छाया पड़ी है मुंह के बल,
और चिरबंदी पुरनियों की गंध।

फर्श पर पीला जाजिम,
किनारों पर ठप्पा मारी बंदूकधारी बाघ शिकारी की तस्वीर।

उत्तर ओर शीशम के नीचे से
चली गयी है कच्ची राह, उड़ रही है धूल
प्रखर धूप की देह पर, हल्की ओढऩी जैसे।

सामने के रेते पर गेहूं, अरहर, ककड़ी, तरबूजों के खेत,
दूर में झलमल करती गंगा,
बीच बीच में गोन-बंधी नावें
स्याही की लकीरों से चित्र बन रहे हों जैसे।

कविता लंबी है, लेकिन एक चित्र उकेरा है गुरुदेव ने।

बिजनकृष्ण चौधरी ने लिखा है कि मानसी की कविताओं की रचना का समय 1887 से 1890 के बीच है। इन पर गौर करने से पता चलता है कि इनकी शुरुआत कलकत्ते में हुई थी। फिर गाजीपुर, महाराष्ट्र में शोलापुर-खिड़की, कलकत्ता, शांतिनिकेतन होते हुए इंग्लैंड जाने की जहाज म्योसेलिया और अपने देश लौटने की जहाज टेम्स में पूरी हुई। गाजीपुर में कवि सन 1888 के फागुन से क्वार की शुरुआत तक रहे। इस बीच बैसाख से आषाढ़ के दरम्यान 28 कविताओं की रचना की।

गाजीपुर में रहते हुए गुरुदेव ने गाजीपुर का इतिहास नामक एक रोचक इतिहास भी लिखा। इतिहास के अंत में उन्होंने लिखा, केवल 1888 ई में ऐसी एक घटना यहां घटी, जो गाजीपुर के इतिहास में अमर रहेगी। यह घटना कुछ और नहीं, गाजीपुर में गुरुदेव का प्रवास ही था।

(संजय कृष्‍ण। वरिष्‍ठ पत्रकार। साहित्‍य और समाज के मसलों पर लगातार लिखते हैं। उनके ब्‍लॉग सोच पर आप उनकी लिखी रपटें, आलेख पढ़ सकते हैं। इन दिनों दैनिक जागरण के रांची संस्‍करण से जुड़े हैं। उनसे s_krisn@yahoo.co.in पर संपर्क किया जा सकता है।)

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