अब बंगाल में जनता के साथ जो होगा, वह अकल्पनीय है!

♦ विश्वजीत सेन
पश्चिम बंगाल विधानसभा चुनाव के नतीजे अब सामने आ चुके हैं। इन नतीजों की उम्मीद सभी अखबारों ने की थी। चुनाव के पहले जो सर्वे किये जाते हैं, उनमें भी करीब इन्हीं नतीजों को भविष्यवाणी के रूप में पेश किया जा रहा था। संक्षेप में कहना हो, तो यही कहना होगा कि मीडिया की अटकलें सच साबित हुईं।
इन नतीजों की व्याख्या कई प्रकार से दी जा सकती है। आप यह कह सकते हैं कि जनता बदलाव चाह रही थी। लालू शासन के खात्में पर भी इसी प्रकार की व्याख्या दी गयी थी। लेकिन दोनों स्थितियों के बीच एक महत्वपूर्ण फर्क है। लालू शासन से जनता की ऊब के कई कारण ऐसे थे, जिन्हें आप नजरअंदाज नहीं कर सकते। शायद कोई पश्चिम बंगाल के बारे में भी इसी तर्क को दोहराये। लेकिन यह भी उतना ही बड़ा सच है कि पश्चिम बंगाल वाममोर्चे के खाते में कई महत्वपूर्ण उपलब्धियां थीं, जिनसे नजर चुराना गलत होगा। आगे उन उपलब्धियों का बच पाना संदिग्ध होगा।
वाममोर्चे ने महत्वपूर्ण ऑपरेशन बर्गा को अंजाम दिया। संपूर्ण भारत में यह अकेला उदाहरण है, जब भूमि पर खेत मजदूरों के हक को स्वीकृति मिली। वाममोर्चे ने पश्चिम बंगाल को खाद्यान्नों के मामले में आत्मनिर्भर बनाया। वाममोर्चे ने व्यापक ढंग से शिक्षा का जनवादीकरण किया। पश्चिम बंगाल के गांव गांव में विद्यालय खुल गये। शिक्षा जनता के दरिद्रतम हिस्से तक पहुंचने लगी। कॉलेजों की संख्या में भी अभावनीय बढ़त आयी। जनता की जरूरतों के प्रति उदासीन कोई सरकार कतई इन कामों को नहीं करती। इसे याद रखना आवश्यक है कि आजादी के बाद से वाममोर्चे के आने से पहले तक पश्चिम बंगाल पर कांग्रेस का ही शासन रहा। उपरोक्त कदमों को लागू करना कांग्रेस से संभव क्यों नहीं हुआ? यह स्पष्ट है कि कांग्रेस पश्चिम बंगाल के शासन में बैठकर पूंजीपति-धनी किसान हितों की रखवाली ही केवल कर रही थी।
अब तृणमूल-कांग्रेस गंठजोड़ की शक्ल में वही रखवाला पुनः सत्ता में वापस हो रहा है। संपूर्ण वामपंथी आंदोलन के लिए यह दिन गहरा शोक का है, और शायद आत्ममंथन का भी। ऐसा क्यों हुआ, इस सवाल का जवाब जनता उन्हीं से मांगेगी। आत्ममंथन कर जिन नतीजों पर वे पहुंचेंगे – वे आगे भी उनके काम आएंगे, चूंकि उन्हें अभी एक लंबी दूरी तय करनी है। एक चुनाव में हार या जीत का कोई महत्व नहीं है। लेकिन पश्चिम बंगाल जैसे राजनीतिक रूप से सचेत प्रदेश में वामपंथ का हाशिये पर चला जाना चिंतनीय बात है। यह बात अधिक चिंतनीय इसलिए बन जाती है, चूंकि आगामी सत्ता के केंद्र में एक ऐसी महिला हैं, जो विचारधारा से पूरा का पूरा रिक्त हैं। उनका लक्ष्य केवल एक है – सत्ता में आना, चाहे उसके लिए घटिया से घटिया तत्वों हाथ क्यों न मिलाना पड़े।
एक ओर ममता बनर्जी “फीकी” (फेडरेशन आफ इंडियन चेबर आफ कामर्स एंड इंडस्ट्रीज) के प्रधान अमित मित्र से जुड़ी हुई हैं। दूसरी ओर उनका गंठजोड़ माओवादिओं के साथ है। दोनों, आर्थिक-सामाजिक चिंतन के परस्पर विरोधी ध्रुव हैं, लेकिन मिल ममता बनर्जी में रहे हैं। क्या यह आश्चर्यजनक नहीं है? लेकिन इस रणनीति की तह में जाना भी शायद उतना मुश्किल काम नहीं है। मजदूर आंदोलनों पर लाठी मित्र महोदय बरसाएंगे और वामपंथी कार्यकर्ताओं की हत्या माओवादी करेंगे। ममता बनर्जी के दोनों हाथों में लड्डू है।
जब वामपंथी, बुर्जुआ व्यवस्था की सीमा के भीतर काम करेंगे तो उनसे गल्तियां भी होनी है। यह संभव है कि पश्चिम बंगाल के वामपंथियों ने इन गलतियों पर उचित ध्यान नहीं दिया हो। यह भी संभव है कि एक लंबे समय तक सत्ता में रहने के बाद वे जनता के प्रति आवश्यकता से अधिक आश्वस्त हो गये हों। इन मुद्दों पर भी सोचने की जरूरत है।
केंद्रीकृत बुर्जुआ राज्यसत्ता के अधीन एक प्रदेश में अगर वामपंथी सत्ता में आते हैं, तब उन्हें जो रणनीति अख्तियार करनी है, उस पर भी बात करने की जरूरत है। दुनिया तेजी से बदल रही है। अब साम्राज्यवाद भी उतना शक्तिशाली नहीं रहा। आंख बंद कर यह मान लेना कि भारतीय पूंजीपति वर्ग से वामपंथियों का रिश्ता हमेशा छत्तीस का ही रहेगा, गलत होगा।
लेकिन जिस बात को केंद्र में होनी चाहिए, वह है मेहनतकशों द्वारा आजादी के बाद से आज तक अर्जित अधिकार। उन पर किसी किस्म का समझौता नहीं होना चाहिए। और अगर उन अधिकारों पर हमले होते हैं, तब अपनी सारी ताकत जुटाकर उन अधिकारों के पक्ष में खड़ा होना चाहिए। भारत का संविधान कुछ व्यक्तियों का ईजाद किया हुआ नहीं है। उसके पीछे स्वतंत्रता आंदोलन के लंबे अनुभव थे, जिस आंदोलन में मेहनतकशों की भी हिस्सेदारी थी। “मजदूर अधिकार नियम” किसी की कृपा नहीं है। मजदूरों ने अपने खून पसीने से उसे अर्जित किया है। वामपंथियों को उनकी रक्षा में स्वयं को अर्पित करना चाहिए। आज के दिन उनके सामने सबसे बड़ा कर्त्तव्य यही दिखता है।
(विश्वजीत सेन। पटना में रहने वाले चर्चित बांग्ला कवि। पटना युनिवर्सिटी से इंजीनियरिंग की पढ़ाई। बांग्ला एवं हिंदी में समान रूप से सक्रिय। पहली कविता 1967 में छपी। अब तक छह कविता संकलन। पिता एके सेन आम जन के डॉक्टर के रूप में मशहूर थे और पटना पश्िचम से सीपीआई के विधायक भी रहे। उनसे vishwajitsen1967@gmail.com पर संपर्क किया जा सकता है।)










you forgot to mention what happen in Singur and Nandigram…..
These are also left front’s acheievments…
दादा, आपके कहने का कुल लब्बोलुआब ये है कि सीपीएम सरकार से कोई गलती नहीं हुई और जनता ने सीपीएम के साथ धोखा किया है। मुझे लगता है कि यह सही प्रतिक्रिया नहीं है। यह वो समय है, जब सीपीएम को सोचना चाहिए कि वाकई गलती कहां हुई? जनता का भरोसा इस कदर क्यों धराशायी हुआ कि ममता की आरती उतारने लगी? बुद्धदेव बाबू खुद क्यों बुरी तरह से हारे। विधानसभा चुनाव में सोलह हजार वोटों से हारना मायने रखता है। ठीक है कि आपके मुताबिक ममता विचारधारा से रिक्त है, लेकिन यह कुछ उसी तरह की प्रतिक्रिया है, जिस तरह की प्रतिक्रिया एक वरिष्ठ वामपंथी नेता ने चुनाव प्रचार के दौरान ममता के बारे में की थी कि वो सोनागाछी की रंडी है। एक सीपीएम नेता ने चुनाव प्रचार के दौरान ही धोती उठा कर लोगों से कहा कि ममता का इससे भी बड़ा है। विरोधी राजनीतिज्ञों के लिए आप जैसे नेताओं के ऐसे वक्तव्य दरअसल किस विचारधारा से संचालित होते हैं, यह विचारणीय है। मुझे लगता है कि चुनाव परिणामों के बारे में विनम्र विश्लेषण की इस वक्त जरूरत है और जनता के बीच जाकर माफी मांगने का वक्त है और यह पूछने का भी कि बताइए, हमसे गलती कहां हुई।
very good article.I am also very shocked by left debacle in bengal.Mamta is a fascist.Now bengal will be disturbed for a very long time.Killings will happen there left activist targetd,all the achievment will be dinigrated. and media will sing the chrous of the face of old reactionary landlord expressing itself in mamata banerji. A devere setback have inflicted on left,democratic and progressive forces of this country.By the loss of bengal left,an international symbol of left have been lost.see what happens in the coming days.But very bad days are ahead for the poor,downtrodden people of india.
अपनी करारी हार के बाद बाद दल से जुड़े बुद्धिजीवी अब अपनी कलम के माध्यम से जनता को डराने में लगे हैं…. भाई साहब जिस सरकार का अभी गठन नहीं हुआ है , जिसका शासन लोगो ने नहीं देखा उससे कैसा डर ???? इतिहास गवाह है लम्बे समय तक शासन निरंकुशता को जन्म देती है .. बंगाल में भी यही हुआ है … चुनाव प्रचार के दौरान आपके नेताओ ने जिस जिस तरह की भाषा का प्रयोग किया उस से तो यही लगता है की हार का अंदेशा उन्हें पहले से था और वो बस खिसियानी बिल्ली की तरह खम्भा नोच रहे हैं… खैर ३४ साल का किला ममता की आंधी में रेत का किला साबित हुआ है .. इसे स्वीकारना ही चाहिए ….इसे झटका नहीं सफाया कहते हैं ..
अविनाश जी मेरे आलेख में ममता बनर्जी पर कोई भौड़ा इशारा बहीं है सिर्फ़ इतना कहा गया है कि वो विचारधारा से रिक्त हैं इसमें इतना तिल्मिलाने की क्या बात है?इस बात का क्या जवाब है कि एक ओर तो वो कहती हैं कि वो बंगाल को लालमुक्त करेंगी और दूसरी ओर खुद को वाम्पंथी भी घोषित भी करने लगती हैं कैसा है ये लालमुक्त वामपंथ? ’’ मां-माटी-मनुष्य ’’ में बाल ठाकरे के मराठी मानुष की प्रतिध्व्नि सुनायी देती है.मेरे आलेख में साफ़ उल्लेख है कि आत्म्मंथन करना चाहिये आप इस बात को दूसरी भाषा में कह रहे हैं और वामपंथ को नसीहत दे रहे हैं और आरोप भी लगा रहे हैं
वामपंथ को नसीहत देने के लिये कोई भी नागरिक स्वतंत्र है क्योंकि वामपंथ पर उसका अधिकार है लेकिन नसीहत देते समय कुछ बातों को विस्मॄत करना गलत है.जिस बारीकी से वामपंथ ने बंगाल को खाद्दान्नों के मामले में आत्म्निर्भर बनाया,जिस तरह बंगाल में पंचायती राज अस्तित्व में आया,जिस मिहनत से भूमिसुधार का कार्यक्र्म लागू किया इन बातों का विस्मॄत होना गलत है.कल ही आपसे बात हुई थी कि अगर छापें तो वाम्पंथ की गलतियों पर विस्तॄत लेख लिख सकता हूं अनेक लेख लेखे जा सकते हैं और केवल घर-घर घूम कर माफ़ी मांगने और नसीहत देने से नहीं होगा फ़िर सी वामपंथ को कारगर बनाना है तो महामाया बाबू के स्टाइल में नहीं होगा वामपंथ के संपूर्ण इतिहास का उल्लेख करना होगा और उससे सीख लेनी होगी. वामपंथ ने इससे भी बड़ी-बड़ी विपदाओं से खुद को मुक्त किया है और आज तक अस्तित्व में है.
अविनाश जी आपको बताउं की चुनाव परिणाम आने के बाद से अब तक तीन जगहों पर सी.पी.एम के दफ़्तरों को आग के हवाले कर दिया गया है.मैं इसे नहीं मानता कि इसे ममता के संग्यान के बगैर ये हमला हुए होंगे?ऐसे हमले अभी वामपंथ पर और होंगे.अब वामपंथ को आत्म्मंथन ही नहीं आत्मरक्षा भी करनी होगी.
यह तो होन ही था, बस देखते जाइये कि ये तृणमूल कोंग्रेस वाले क्या-क्या जलाते हैं.लेकिन आप यह बता सकते हैं कि कहाँ-कहाँ इन्होने तीन जगह सीपीएम का ऑफिस जलाया.
While agreeing with most of the contentions made by Bishwajit Babu, I want to place some points for his considerations. First, after the first round of achievements, the LF did not go ahead to create employment opportunities and build modern industries. The result was the exodus of labour from West Bengal. Second, LF forgot the Leninist teaching that at any particular point of time there could be several enemies but only one main enemy and fighting it should be the prime task. The CPI(M), however, always suffered from anti-Congressism and treated Congress as its main enemy in practice. From JP movement till now it has not hesitated in joining hands with all kinds of forces including communal and casteist ones without hesitation in order to attack the Congress. Third, Stalinism has always dominated the approach of CPI(M)leadership. Its refusal to permit Jyoti Babu to become PM and the treatment of Somenath Babu in recent times illustrate this. Several other examples can be given. Last, it has always behaved with CPI and other allies with arrogance. Besides, it has always preferred members to non-members in public affairs.
तो विश्वजीत सेन को समझ में हीं नहीं आ रहा है कि गलती कहाँ हुई.
कामरेड! नंदीग्राम कोई तालिबान के नियंत्रण वाले क्षेत्र में नहीं है वो बंगाल में है और कल तक माकपा के अधीन हीं था. क्या किया था वहाँ आपने? पूंजीपति थे वे गाँव वाले?
माना कि आपके मंत्री-मुख्यमंत्री भर्ष्टाचार के आरोपी नहीं लेकिन निचले स्तर पर कैडरों ने खूब लूटा है.
आज माकपा के तीन कार्यालय के जलने का बड़ा दर्द हो रहा है, विरोधी दलों के कितने जलाये हैं इसकी गिनती भी कभी कर लीजियेगा.
वैसे कहूँगा तो अच्छा नहीं लगेगा, लेकिन भारत के संसदीय लोकतंत्र में वामपंथी आशाओं की मृत्यु हुई है. कोई अनहोनी न हुआ तो अब माकपा, बंगाल में नहीं लौटने वाली. पश्चिम बंगाल हीं नहीं बल्कि देश भर का इतिहास यही बताता है कि दशकों तक राज करने वाले जाते हैं तो लौट कर आते नहीं. 34 साल पहले कांग्रेस हारी तो बंगाल में कभी लौट नहीं सकी. 15 साल के राज के बाद लालू यादव बिहार से गए तो फिर लौट नहीं सके और लौटेंगे भी नही. कुछ ऐसा हीं कांग्रेस के साथ भी हुआ था बिहार और उत्तरप्रदेश में. जनता जब साढे तीन दशक बाद आपको सत्ता से बाहर करती है तो मतलब समझिए.
अब बच्चे सामान्य ज्ञान की पुस्तक में पढेंगे कि कोई वामपंथी गठ्जोर था जिसने 34 साल राज किया बंगाल में, देखने का सौभाग्य उन्हें नहीं मिलेगा.
पश्चिम बंगाल के चुनाव परिणाम क्या आने वाले हैं इससे कहीं न कहीं हम सभी वाकिफ थे, और इसी तरह के चुनाव परिणाम के अंदाज़ भी लगा रहे थे। मीडिया और ममता ने मिलकर एक स्वर में कहा था कि बहुमत दीदी के साथ ही हाथ मिलाएगा। इस बहुमत के निर्माण में जिसकी भी जो भी भूमिका रही हो बहुमत आ चुका है हारने और जीतने वाले पक्षों ने विनम्रता से स्वीकार किया है यही लोकतन्त्र का तक़ाज़ा भी है। पर ममता के जीत के साथ कई और घोषणायें भी हो रही है। एक बात जिसे भयानक तरीके से प्रचारित किया जा रहा कि यह वामपंथ की हार है, मुझे लगता है वास्तव में यह पश्चिम बंगाल के वामपंथियों की हार है इसमें कोई शक नहीं की वामपंथ ने बहुत सारे ऐसे काम किए थे जिनका खामियाजा संसदीय लोकतन्त्र में किसी भी पार्टी को भुगतना पड़ता और वह वाम दलों को भी पड़ा। जिस बात पर वामपंथियों और उनसे सहानुभूति रखने वाले लोगों को चिंता होनी चाहिए वह है युवा वोटरों का वामपंथ के प्रति झुकाव नहीं होना।
दरअसल, उदारवादियों ने पिछले 20 सालों में देश भर के स्कूलों और विश्वविध्यालयों में जिस तरह से ज्ञान निर्माण की प्रक्रिया को अपने कब्जे में लिया है यह उसकी जीत है, अगर वामपंथी इससे नहीं चेते, और अपने विश्वविध्यालयों और स्कूलों को उससे मुक्त नहीं कराया। अगर वामपंथी उसे बदलने का दबाव नहीं बना पाये तो जल्द ही वामपंथ भी हार जाएगा। हमें मानना होगा की केरला और बाँकी देश के ज्ञान के निर्माण की जो व्यवस्था जिससे एक पीढ़ी बन कर तैयार हुई है उसमें फर्क है और यही फर्क आज बंगाल में उभर कर सामने आया है …..
ममता ने साफ माना है कि जो नए वोटर हैं उन्हें रिझाने में वामपंथ नाकामयाब रहा हमें इस नकामयाबी के कारणों को क्षणों में नहीं बल्कि वर्षों में ढूँढना चाहिए। ये नए वोटर एक खास तरह की शिक्षण पद्धति से ढल कर निकले हैं जिस पद्धति में साम्यवाद या वामपंथ सिर्फ इतिहास की एक घटना है। इस पूरे समय में जो नया ‘मैनेजर’ और ‘प्रोफेशनल’ पैदा हुआ है उसका परिचय सिर्फ लाभ कमाने के उधयोग से है किसी विचारधारा से नहीं। और अगर वह इस व्यवस्था के द्वारा निर्मित, अधिक से अधिक पैसा कमाने की इच्छा रखने वाले ‘व्यक्ति’ से अलग कुछ है तो वह या तो ‘हिन्दू’ है या ‘मुसलमान’ या इसी तरह की कोई धार्मिक अस्मिता। इसलिए अगर हम ममता की जीत पर शंखनाद सुनते हैं तो हमें आश्चर्य नहीं करना चाहिए। राजनीतिक चेतना में आयी यह गिरावट खतरे की निशानी है इसे हमने बिहार में भी देखा है और अब बंगाल भी इसका उदाहरण है।
‘माँ’, ‘माटी’ और ‘मानुष’ के जिस नारे को ममता ने बुलंद किया है वह निश्चित रूप से वामपंथ की प्रेरणा ही है। जिसकी ज़रूरत उन्हें ठेट बंगाली वोटरों को रिझाने के लिए पड़ी लेकिन ममता ने जीत के बाद कहा कि वो बंद और बुलेट की राजनीति नहीं करेगी, बुलेट की राजनीति को इस देश की जनता ने कई बार नकारा है पर बंद की राजनीति का विरोध ममता जैसी नेत्री को शोभा देता है क्या? शायद दिनकर की पंक्तियाँ हैं “हर ज़ोरों ज़ुल्म की टक्कर में हड़ताल हमारा नारा है, एका हथियार हमारा है”। क्या ममता ने पूंजीपतियों की बात खुद के मुंह से नहीं कह दी है ? कई सवाल हैं, हर सवाल का कोई जबाब नहीं
वामपंथ की हार ,यह जुमला सही नहीं है . लोकतंत्र में जनता अपनी समझ के अनुसार सरकर का चयन करती है. हो सकता है की बुद्धिजीवी वर्ग को शायद न अच्छा लगे. परिवर्तन प्रकर्ति का नियम है. इस बात से तो हर कोई वाकिफ है. मगर ममता और उनकी टीम के सामने चुनौतियाँ बहुत कठिन है.
एक बार में हि सब कुछ नहीं हो जाता है. अतः बहुत परिश्रम की आवश्यकता होगी.
ये परिवर्तन होना ज़रुरी था.हम देख सकते है कि इतने सालों से बंगाल मे वामपंथी सरकार थी.वामपंथियों को समाज का बुद्धिजीवी वर्ग माना जाता है.परन्तु चुनाव प्रचार के दौरान उन्होने जिस तरह का अशोभनीय वयानबाजी किया उससे यही निष्कर्ष निकलता है कि सता मे बने रहने का गरुर उन पर हावी हो चुका था।परन्तु वहांं की ने यह दिखा दिया की सता किसी के बाप की जागीर नही है………………..॒॒॒॒
देश में कोई भी राजनितिक पार्टी की सरकार 34 साल तो छोडो 24 साल ही लोगों के बीच रह कर काम कर बता दे, वामपंथ गलत है या अमेरिकी साम्राज्यवादी फंड (NGOs के माध्यम से), माओवादी बन्दूक धारी, आम जनता का नाटक कर, बंगाल में कितना दखल दी है वो पूर्वाग्रह से ग्रस्त या बैमानी शैतानी कर आली शान घर और चमचमाती कार खरीदने की मानसिकता रखने वाले लोगों की छमता मै नहीं कि इसे समझ भी सके,वो तो इस इंतज़ार में है के हम से देश मै कुछ भी करा लो, लोग देश में भूखे मर रहे हों लेकिन हमसे खुजली पर शोध करा लो और अमेरिका पढने भेज दो, ताकि में पढ़ लिख कर अमेरिका मै रह जाऊं और देश भक्त कहलाऊँ ? , दर असल ये खुजली देश के लोगों के शरीर मै नहीं बल्कि अमेरिका जा कर वहां बसने की खुजली है.
हाँ हमें ये मानना होगा की साम्राज्यवादी फंड और माओवादी बन्दूक धारी का मुकाबला फंड और बन्दूक से नहीं किया गया और कभी किया भी नहीं जायेगा चाहे सरकार से बाहर रहकर ही जनता की लड़ाई क्यूँ ना लड़नी पड़े, कुछ लोगों को लगता है कि सी पी एम् बंगाल के साथ ख़तम हो गयी, केरल और तमिलनाड में वामपंथ ने क्या किया, कांग्रेस 63 सीट लड़ कर 5 हासिल कर सकी, सी पी एम् 12 सीट लड़ कर 10 पे जीती, हाँ अगर साम्राज्यवाद और माओवाद अपनी आर्थिक और आतंकी ताक़त केरला और तमिल मै वामपंथ के खिलाफ लगाता तो शायद वहां भी हमारी हार होती —– ओसामा बिन लादेन को रूस के खिलाफ खडा कर अक़ल्मंदी की उलटी और पेचिश का शिकार हो कर भी साम्राज्यवाद सीख नहीं लेता — यह लडाई सीपीएम् और तृणमूल की नहीं वामपंथ और साम्राज्यवाद की है जहां साम्राज्यवाद जनता के कंधे से हो कर आ रहा है, FICCI का एक आदमी ऐसे ही नहीं चुनाव लड़ लेता है, मुमकिन है ये कहानी अभी समझ मै नहीं आये,लेकिन आएगी ज़रूर. जब टीपू सुलतान अंग्रेजों से आखरी वक़्त तक लड़ता रहा तब वो हारा भी और मारा भी गया , औलाद भी नहीं बचे, लेकिन इसका ये मतलब नहीं की वो गलत था – हाँ वो साम्राज्यवादी छलावे को समझ ना सका था . जब राजगुरु, सुखदेव, भगत सिंह, चन्द्र शेखर आज़ाद, अशफाक उल्लाह फांसी पर चड़ने को तैयार थे तब बड़ी तादाद मै युवा अंग्रेजों की दावत पर सिविल सर्विसेस ज्वाइन कर रहे थे, और कुछ लोग शेरवानी मै गुलाब, पैजामा मै कलफ, कुरते मै इतर और टोपी संभाल रहे थे और क्रांतिकारियों को गलियन भी दे रहे थे, ऐसा हमेशा से होता रहा है, और होता रहेगा — इस से घबराने की ज़रुरत नहीं
Waise to in revisionist(CPM, CPI, CPI(ML), SUCI etc) ke baren main koi bat karne ka fayada nahin hai lekin ek bat jiske taraf main Vishwajit ka dhyan akarshit karna chahunga woh hai INDIAN CONSTITUTION jo khud undemocratically banaya gaya h.Jyada janane ke liye ap ye link dekh sakte hain.
http://bigulakhbar.blogspot.com/
और बंगाल में अब तक जो होता रहा है उसकी कल्पना तो खुद कार्ल मार्क्स कर गए थे. है न विश्वजीत सेन जी?
अब बंगाल में जनता के साथ जो होगा, वह अकल्पनीय है! और हिंदुस्तान में जनता के साथ जो हो रहा है वो तो हकीकत है.और लगता है माकपा ने अपनी राष्ट्रीय ज़ुमेवारी बहुत पहले भुला दी थी.अब समय है पुनर्विचार करने का कि राष्ट्रीय मुक्ति क्रांति को विकसत करने के सुनिहरी इमकानात को साकार न कर पाने में हमने कया कया भूल की.हर समय पर ठीक होने का अहंकार अब पूर्ण तौर पर ले डूबेगा. अब लेफ्ट का भविष्य इस बात पर निर्भर है कि लोकराज के लिए देशव्यापी आन्दोलन में वह कितनी उम्दा अगवाई दे पाएँगे.
[...] राजकिशोर विश्वजीत सेन का एक राइटअप तो है। आप कुछ [...]
सद्रे भाई आपने दिल खुश कर दिया बहुत दिनों के बाद ऐसी सटीक टिप्प्णी देखी.ध्न्यवाद आप ऐसी और टिप्प्णी करें
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