बादल बाबू भद्र मध्‍यवर्ग के चर्चित नाटककार थे…

♦ परवेज अख्‍तर

बादल सरकार का देहावसान भारतीय रंगमंच के एक युग का अंत है। बादल बाबू एक अन्वेषी नाट्य-रचनाकार थे। उनमें एक प्रकार की रचनात्मक बेचैनी पायी जाती थी और वे ‘कथ्य और ‘शिल्प’ दोनों ही स्तरों पर अनवरत सक्रिय रहे। अभिनव प्रयोग की उनकी अदम्य इच्छा आनेवाले कई दशकों तक नयी पीढ़ी के नाट्यकर्मियों को प्रेरित करती रहेगी। भद्र मध्य-वर्ग के लिए प्रारंभ, उनका रंगमंच अंततः निम्न-वर्गीय व्यापक दर्शक-समुदाय के लिए समर्पित हुआ।

उनकी स्मृतियों को सलाम!

भारतीय रंगमंच के बिहार चैप्‍टर की एक महत्‍वपूर्ण शख्‍सीयत परवेज अख्‍तर ने जब फेसबुक पर बादल सरकार को अपनी श्रद्धांजलि दी, तो युवा रंगकर्मी/अभिनेता मानवेंद्र त्रिपाठी ने उनसे बिहार के रंगमंच पर बादल सरकार के असर के बारे जिज्ञासा प्रकट की।

परवेज दा, क्‍या आप बता सकते हैं कि 70-80 के दशक में बिहार में काम कर रहे किन लोगों पर बादल दा का प्रभाव पड़ा था… या उसके बाद भी?

परवेज अख्‍तर ने जवाब दिया…

मानवेंद्र, पटना रंगमंच पर बादल सरकार के प्रभाव जैसी कोई बात नहीं है। हां, उस दौर में बादल बाबू के बहुत सारे नाटक पटना में मंचित जरूर हुए। उनमें जो नाम मुझे अभी याद आ रहे हैं, वे हैं :

पगला घोड़ा, बाकी इतिहास, एवम इंद्रजीत, राम श्‍याम जदु, बड़ी बुआजी, सॉल्‍यूशन एक्‍स, बल्‍लभपुर की रूपकथा, अंत नहीं, सारी रात, जुलूस, भोमा, स्‍पार्टाकस वगैरह।

लगभग उनके सभी नाटक पटना में मंचित हुए और उन्‍हें पसंद भी किया गया। ऐसा नहीं कहा जा सकता है कि उनका कोई प्रत्‍यक्ष प्रभाव पटना रंगमंच पर था। बल्कि, उस दौर के नाटकों के मंचन में शिल्‍पगत तारतम्‍यता नहीं थी। जो नाटक महानगरों में चर्चित होता, उसका मंचन यहां भी किया गया। हां, यह कह सकते हैं कि तब एक मध्‍यवर्गीय रुझान जरूर था और बादल बाबू उस दौर में भद्र मध्‍यवर्ग के चर्चित नाटककार थे।

(परवेज़ अख़्तर। वरिष्‍ठ रंग निर्देशक। बिहार रंगमंच को राष्‍ट्रीय पहचान दिलाने वालों में रहे। इप्‍टा से लंबे समय तक जुड़ाव और संगठन में सरकारी हस्‍तक्षेप के चलते इप्‍टा से अलग हुए। इन दिनों नटमंडप में। नटमंडप ने पटना में रूफ थिएटर को नया आयाम दिया है।
उनसे parvez29akhtar@rediffmail.com पर संपर्क किया जा सकता है।)

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