जाति की गिनती से जुड़े हैं कई असमंजस, कृपया ध्‍यान दें

विषय : जातिवार जनगणना का संसद में किया गया वादा पूरा किया जाए। शैक्षणिक स्तर और नौकरियों समेत आर्थिक आंकड़ों के बिना होने वाली गिनती निरर्थक। जनगणना कानून, 1948 के तहत हो जातियों की गिनती।

म इस बात का स्वागत करते हैं कि पहली बार केंद्र सरकार ने जाति आधारित व्यापक आंकड़े जुटाने की घोषणा की है। दिसंबर, 2011 तक यह काम पूरा करने का वादा किया गया है। जाति भारत की सच्चाई है और इस सच्चाई को नकार कर जातिवाद से नहीं लड़ा जा सकता। ओबीसी के लिए विकास योजनाओं पर धन आवंटित होता है, लेकिन आंकड़ों के बिना अंधेरे में रहकर इन पर अब तक अमल किया जाता रहा है। केंद्र सरकार की ताजा घोषणा को हम एक कदम आगे बढ़ने के रूप में देख रहे हैं।

लेकिन सरकार की मौजूदा घोषणा ने कई भ्रम पैदा किये हैं। हम चाहते हैं कि सरकार इसका जल्द से जल्द स्पष्टीकरण दे। ये सवाल इस तरह हैं :

♦ क्या दिसंबर, 2011 के बाद देश के सामने ऐसे आंकड़े होंगे कि विभिन्न जातियों की शैक्षणिक स्थिति क्या है? क्या यह पता चलेगा कि किस जाति में कितने लोग पोस्ट ग्रेजुएट, ग्रेजुएट, मैट्रिक पास, साक्षर और निरक्षर हैं?

♦ क्या इस गणना के बाद यह पता चल पाएगा कि सरकारी नौकरियों में किस जाति के कितने लोग हैं और क्लास वन, टू और थ्री में किस जाति के लोगों की कितनी हिस्सेदारी है?

♦ क्या यह गणना देश के सामने यह तथ्य लेकर आएगी कि किस जाति के लोगों के पास पक्के मकान ज्यादा हैं और किन जातियों के कितने प्रतिशत मकान कच्चे हैं? इसी तरह घरों में बिजली होने या न होने से लेकर शौचालय होने और न होने के आंकड़े मिलेंगे या नहीं?

♦ क्या यह गणना बताएगी कि किन जातियों के पास टीवी, मोबाइल ज्यादा हैं और किनके पास कम?

♦ क्या यह सही है कि इस गणना में आंकड़े जुटाने का काम महात्मा गांधी नरेगा के मजदूर भी करेंगे? क्‍या जनगणना की तरह इस काम में सरकारी शिक्षकों को नहीं लगाया जाएगा?

♦ इस गणना के लिए कागज के फॉर्म का इस्तेमाल क्यों नहीं किया जा रहा है?

♦ यह गणना जनगणना अधिनियम, 1948 के तहत क्यों नहीं करायी जा रही है?

अगर यह गणना जातियों के शैक्षणिक स्तर और नौकरियों समेत आर्थिक स्तर के बारे में विश्वसनीय आंकड़े नहीं जुटाती है, तो यह निरर्थक कवायद होगी। जनहित अभियान ने जातिवार जनगणना को राष्ट्रीय मुद्दा बनाया है और इसे लेकर होने वाली गड़बड़ी का हम विरोध करेंगे। आप इस बात को जानते हैं कि पिछले साल इस सवाल पर देश में और संसद में काफी चर्चा हुई थी। 6 और 7 मई, 2010 को लोकसभा में इस बात पर सहमति बन गयी थी कि 2011 की जनगणना में जाति को शामिल किया जाएगा। सरकार ने 2011 की जनगणना जाति को शामिल कराए बिना पूरी करा ली। अब जिस तरह से जाति की गणना करने की घोषणा की जा रही है, वह भरोसा पैदा नहीं कर पा रही है कि सरकार वास्तव में जातियों के बारे में समुचित जानकारियां इकट्ठा करना चाहती है। लिहाजा सरकार को तत्काल इस संबंध में स्थिति स्पष्ट करनी चाहिए।

सधन्यवाद
राजनारायण
संयोजक, जनहित अभियान
Email janhitabhiyan@gmail.com, Phone 9891309626

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