नगरवधुएं अखबार नहीं पढ़तीं, आप कहानी पढ़ेंगे?

♦ योगेंद्र आहूजा

क्‍या हम कभी सोच सकते है कि एक कहानी संग्रह की सूचना हेडलाइन के तौर पर दी जा सकती है। थोड़ा मुश्किल है, क्‍योंकि हिंदी में कहानियां अपने समाज की कहानी कम, अपनी कल्‍पनाओं के तिलस्‍म की कहानी ज्‍यादा कहते हैं। शायद हम पहली बार एक सूचना आपको दे रहे हैं और वह भी एक नये कहानी संग्रह की। पेशे से पत्रकार और मिजाज से आवारा अनिल यादव ने पिछले कुछ सालों में उतनी ही कम कहानियां लिखी हैं, जितनी अधिक कुछ दूसरे नया ज्ञानोदयी कथाकारों ने लिखी है। यह हिंदी की अपनी कलाबाजी है कि कम लेकिन जरूरी कहानियां लिखने के बाद भी अनिल यादव पर कोई स्‍वतंत्र चर्चा नहीं हो पायी है। खैर, अंतिका प्रकाशन ने उनका नया कहानी संग्रह छापा है। उम्‍मीद है, संग्रह के बहाने अनिल यादव के कथाकार को समझने की कोशिश अब तेज होगी : मॉडरेटर

हिंदी में कहानी की दुनिया में इस वक्त एक खलबली, एक उत्तेजना, एक बेचैनी है। एक जद्दोजहद जारी है कहानियों के लिए एक नया स्वरूप, नयी संरचना, नया शिल्‍प पाने की। इस जद्दोजहद का हिस्सा अनिल यादव की कहानियां भी हैं। इस समय जबकि संकल्पनाएं टूट रही हैं, प्राथमिकताएं बदल रही हैं, हमारे राष्‍ट्रीय और सामाजिक जीवन में नयी सत्ताएं और गठजोड़ उभर रहे हैं, आर्थिक संबंध तेजी से बदल रहे हैं और उसके नतीजे में सामाजिक ढांचा और यथार्थ जटिल से जटिलतर होते जा रहे हैं – स्वाभाविक है कि उन्हें व्यक्त करने की कोशिश में कहानी का स्वरूप वही न रहे, उसका पारंपरिक रूपाकार भग्न हो जाये। लेकिन अपने समकालीनों से अनिल यादव की समानता यहीं तक है, इतनी ही – और उनकी कहानियों का वैशिष्‍ट्य इसमें नहीं है।

अनिल जानते हैं कि नये शिल्‍प के माने यह नहीं कि कहानी शिल्‍पाक्रांत हो जाये या भाषिक करतब को ही कहानी मान लिया जाए। ऐसी रचना जिसमें चिंता न हो, विचार न हो, कोई पक्ष न हो, किसी तरह की बौद्धिक मीमांसा न हो, वह महज लफ्जों का एक खेल होती है, कहानी नहीं। अनिल का सचेत चुनाव है कि वे कहानी की दुनिया में चल रहे इस फैशनेबल, आत्महीन खेल से बाहर रहेंगे। वे कहानियों के लिए किसी ऐसे समयहीन वीरान में जाने से इनकार करते हैं, जहां न परंपरा की गांठें हों, न इतिहास की उलझनें। वे अपने ही मुश्किल, अजाने रास्ते पर जाते हैं। तलघर, भग्न गलियों, मलिन बस्तियों, कब्रिस्तान, कीचड़, कचरे और थाने जैसी जगहों से वे कहानियां बरामद कर लाते हैं। तभी लिखी जाती हैं ‘नगरवधुएं अखबार नहीं पढ़तीं’ और ‘दंगा भेजियो मौला’ जैसी अद्वितीय ‘डार्क’ कहानियां, इस पुरानी बात को फिर याद दिलाती हुईं कि एक संपूर्ण और प्राणवान रचना केवल अनुभवों, विवरणों या सूचनाओं से या केवल भव्य और आकर्षक शिल्‍प से नहीं बनती, वह बनती है दोनों की एकता से। ‘लोक कवि का बिरहा’ और ‘लिबास का जादू’ में, अन्य कहानियों में भी, हम देखते हैं कहन का एक नया अंदाज, नैसर्गिक ताना बाना और संतुलित और सधा हुआ शिल्‍प, लेकिन अंततः उन्हें जो कहानी बनाता है, वह है जीवन की एक मर्मी आलोचना। इन कहानियों का अनुभवजगत जितना विस्तृत है, उतना ही गझिन और गहरा भी। आज के कथा परिदृश्‍य में ‘लोक कवि का बिरहा’ जैसी कहानी का, जो एक ग्राम्य अंचल में एक लोकगायक के जीवन का, उसकी दहशतों, अपमान, अवसाद और संघर्ष का मार्मिक आख्यान है, समकक्ष उदाहरण तलाश पाना मुश्किल होगा, और ऐसी कहानी शायद आगे असंभव होगी।

इस वक्त हिंदी की दुनिया में हर जानी पहचानी चीज के अर्थों में तोड़ फोड़ की जा रही है। जहां अस्‍पष्‍टता को एक गुण मान लिया जाए, वहां अर्थों की स्‍पष्‍टता भी एक अवगुण हो सकती है। इन कहानियों में न अस्‍पष्‍टता है, न चमकदार मुहावरे, न एकांत आत्मा का नाटक, न अनंत दूरी पर स्थित किसी सत्य को पाने की कोशिश या आकांक्षा, न आत्मालाप, न आत्मा पर जमी गर्द को मिटाने की कोशिश। लेकिन इनमें दर्द से भरे चेहरे बेशुमार हैं जिन्हें आप स्पर्श कर सकते हैं।

इस संग्रह के हार्डबौंड की कीमत 200 रुपये है और पेपरबैक की कीमत सौ रुपये है। आप अगर इसे डाक से मंगवाना चाहते हैं, तो कृपया मोहल्‍ला लाइव के नाम से चेक बना कर इस पते पर भेजें…

Mohalla Live
UGF 1, C 56
Shalimar Garden, EXT 2
Sahibabad, Ghaziabad, UP
PIN 201005

या इस संबंध में किसी किस्‍म की जानकारी के लिए avinashonly@gmail.com पर मेल करें। बानगी के लिए संग्रह की एक कहानी आप यहां पढ़ सकते हैं : दंगा भेजियो मौला

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