बुलंद भारत की बुलंद तस्वीर उकेरने की कोशिश है कुरजां


कुरजां का कवर | पत्रिका का मूल्यं 100 रुपये | संपादक : प्रेमचंद गांधी
पता : ई 10 गांधी नगर, जयपुर 302015
ईमेल : kurjaan.sandesh@gmail.com
ishmadhu14@gmail.com
prempoet@gmail.com

♦ सूरज प्रकाश

पनी बात शुरू करने से पहले पत्रिका के संपादकीय से ही कुछ वाक्‍यों को लेना दिलचस्प रहेगा। जयपुर से आयी 300 पृष्ठ की भारी भरकम लेकिन बेहद सुंदर, कलात्मपक, पठनीय और कम से कम मेरे जैसे घनघोर पाठक के लिए संग्रहणीय पत्रिका कुरजां के प्रवेशांक में संपादक प्रेम चंद गांधी लिखते हैं, हिंदी पत्र-पत्रिकाओं की सबसे बड़ी समस्या ये है कि इनमें मूलत: उत्तर भारत ही छाया रहता है और कभी-कभार उनमें श्रद्धांजलि और पुरस्कार के बहाने अन्य भारतीय भाषाओं तथा दुनिया के अन्य देशों के साहित्य और समाज की झलक मिल जाती है। अगर हिंदी की साहित्यिक पत्रिकाओं पर नजर डालें तो एक बात साफ दिखाई देती है कि आप इनसे आप पूरे भारत की कोई तस्वीर नहीं बना सकते और सही कहा जाए तो समूचे हिंदी प्रदेश की भी कोई ठीक-ठाक तस्वीर नहीं बना सकते।

संपादक ने इसके पीछे जो कारण गिनाये हैं, वे मैं यहां नहीं दोहराऊंगा लेकिन ये जरूर कहूंगा कि उनकी बात में दम तो है। हमारे पास हर भाषा का साहित्य पहुंचे, इसके लिए हमें हर बार अनुवाद का ही सहारा लेना होता है। अपना साहित्य उन भाषा-भाषियों तक पहुंचाने के लिए और उनका साहित्य हम तक पहुंचे, इसके लिए भी। एक बार पाकिस्‍तान से आयी लेखिका नीलम बशीर के साथ हुई बात में मैंने अपना यही दुखड़ा रोया था कि दोनों तरफ मेहनत हमें ही करनी होती है। चाहे हम पाकिस्तान में रचा जा रहा उर्दू साहित्य हिंदी में पढ़ना चाहें या पा‍किस्तानी पाठकों तक अपना हिंदी साहित्य पहुंचाना चाहें, दोनों तरफ से अनुवाद हमें ही करके देने होंगे।

संपादक महोदय ने इस दिशा में साहित्य अकादमी की पत्रिका समकालीन भारतीय साहित्य के योगदान को स्वीकार किया है और कुरजां के शता‍ब्‍दी स्मरण अंक के प्रवेशांक की परिकल्पना के बारे में अपने तर्क दिये हैं, जो हमें स्वी‍कार्य हैं।

एक दो बातें पत्रिका के नाम को ले कर। श्री गांधी संपादकीय में आगे बताते हैं कि राजस्थान में प्रतिवर्ष मध्य एशिया से सदियों से आने वाले डेमोजल क्रेन को लोक में कुरजां कहते हैं। कुरजां प्रेम का संदेश ले जाने वाला पक्षी है … कुरजां के पास पंख फैला कर उड़ने के लिए पूरा आकाश होगा। हमें संपादक का ये तर्क भी मान्य है।

अब बात करें पत्रिका के कलेवर की। ये शताब्दी स्मरण अंक है और इसमें हिंदी, उर्दू, अंग्रेजी, गुजराती, तेलुगू साहित्य की विराट परंपरा को आगे बढ़ाने वाले महानायकों को नमन करते हुए न केवल इन भाषाओं के मनीषी साहित्यकारों की रचनाएं जुटायी गयी हैं, बल्कि उन पर दुर्लभ संस्म‍रण और आलेख भी कुरजां के इस अंक में दिये गये हैं। संगीत, फिल्म और कला के क्षेत्र में जिन महानायकों का योगदान रहा है और संयोग से जिनकी शताब्दी‍ इन दिनों मनायी जा रही है, उन्हें भी पत्रिका में पूरा सम्मान दिया गया है। अध्यायों के शीर्षक बहुत सोच-समझ कर रखे गये हैं। हिंदी के हिमालय में आप मिलेंगे बाबा‍ नार्गाजुन, अज्ञेय, केदार नाथ अग्रवाल, अश्क, राधाकृष्ण, शमशेर बहादुर सिंह, भुवनेश्वनर, भगवत शरण उपाध्याय और गोपाल सिंह नेपाली से। उर्दू के उस्‍ताद में फैज, मजाज, नून मीम राशिद हैं तो अंग्रेजी के अग्रज में अहमद अली। मरुधरा का मान बढ़ा रहे हैं कन्हैया लाल सहल, गुजराती के गौरव में हैं उमा शंकर जोशी, कृष्णहलाल श्रीधरणी, भोगीलाल गांधी, तेलुगू के तिलकित भाल में हैं श्रीश्री, बांगला में सौ बरस के गोरे हैं रवींद्र नाथ ठाकुर, परदेसी भूमि से लिये गये हैं जेस्लों मिलोज तो सरगम के सरताज बने हैं विष्णु नारायण भातखंडे, मल्लिकार्जुन मंसूर और अब्दुरल राशिद खान। परदे के परदादा बन कर पत्रिका के अंक तक का सफर तय किया है दादामुनि अशोक कुमार और अकीरा कुरुसोवा ने। कुरजां का अतिरिक्त आर्कषण है मनीषा कुलश्रेष्ठ का महि‍ला दिवस पर आलेख।

अंक में जो भी सामग्री जुटायी गयी है, उसमें आलेख, संस्मरण, मूल रचनाकार की रचनाएं और चित्र और जहां तक बन पड़ा, उनके योगदान और प्रोफाइल को पाठकों तक पहुंचाने की विनम्र कोशिश की गयी है। अधिकांश जानकारी पुराने दस्तावेजों को खंगाल कर, उनके अनुवाद करवा कर जुटायी गयी है और इसके लिए असीम धैर्य, संसाधनों, संपर्कों और पैनी निगाह की जरूरत होती है। मैं पत्रिका के बहाने जितने भी मनीषियों को नजदीक से जान पाया, उनके बारे में पढ़ पाया, मैं स्वीकार करता हूं कि सचमुच ये अद्भुत काम हुआ है और अगर संपादन टीम के बुलंद हौसले देखें, तो वे आगे भी कुछ कर गुजरेंगे। एक और बात मुझे बहुत अच्छी लगी, वह ये कि जिनसे भी लेख आदि लिखवाये गये हैं या जुटाये गये हैं, सभी का फोटो सहित पूरा परिचय दिया गया है और उनके योगदान के प्रति आभार मानने में कोई कंजूसी नहीं की गयी है। पत्रिका का कला पक्ष, खास तौर पर हर पन्ने पर दिये गये चित्रांकन और स्पेस का अद्भुत तालमेल है। आमतौर पर पत्रिकाओं के पन्नों पर खाली स्‍पेस छोड़ा ही नहीं जाता तो उसके महत्व की बात ही कैसे की जाए, लेकिन कुरजां में आप पाएंगे कि खाली स्पेस का भी किस तरह से क्रिएटिव इस्तेमाल किया जा सकता है। अंक का मूल्य मात्र 100 रुपये रखा गया है और जहां तक मेरी जानकारी है, आजकल कूरियर नाम का प्राणी ही इतने पैसे लेने लगा है कि कुछ भी भेजते समय दस बार सोचना पड़ता है।

हमें ऐसे प्रयासों का दिल खोल कर स्वागत करना चाहिए और ऐसे कामों में योगदान भी करना चाहिए, जहां कुरजां पंख फैला कर आकाश नापने की जद्दोजहद कर रहा हो और हमसे सिर्फ इतना चाहे कि हम बेशक उसके सहयात्री न बन सकें, उसके पंखों की ताकत पर भरोसा करें और अपनी नजरों से उसे ओझल न होने दें।

(सूरज प्रकाश। वरिष्‍ठ कथाकार और अनुवादक। प्रमुख कृतियां है : अधूरी तस्वीर, छूटे हुए लोग तथा साचा सर्नामे (कहानी संग्रह), हादसों के बीच, देश बिराना (उपन्यास), जरा संभल के चलो (व्यंग्य संग्रह)। एनिमल फार्म (जॉर्ज आर्वेल), क्रॉनिकल ऑफ ए डैथ फोरटोल्ड (गैब्रियल गार्सिया मार्खेज), ऎन फ्रैंक की डायरी (ऎन फ्रैंक), चार्ल्स चैप्लिन की आत्मकथा (चार्ल्स चैप्लिन) का अनुवाद। mail@surajprakash.com पर संपर्क करें।)

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