हमारा संस्कृति जगत बहुत एहसानफरामोश है!

मारा संस्कृति जगत बहुत एहसानफरामोश है। अगर आप अपने अग्रजों को जिनकी वजह से आप आगे बढ़े, अगर आप उनको याद नहीं कर सकते तो आपको कौन याद करेगा? मशहूर रंग निर्देशक अरविंद गौड़ ने ये बातें बादल सरकार को याद करते हुए कही। उन्‍होंने अपनी बातें कुछ इस तरह रखीं…

एक बात कहना चाहूंगा। हबीब तनवीर गये, तब भी मैंने यही कहा था। उससे पहले शाह जी गये, जे एन कोशल गये, तब भी यही कहा था और आज फिर दोहरा रहा हूं कि हमारा संस्कृति जगत बहुत एहसानफरामोश है। अगर आप अपने अग्रजों को जिनकी वजह से आप आगे बढ़े, अगर आप उनको याद नहीं कर सकते तो आपको कौन याद करेगा? दिल्ली में नेशनल स्कूल आफ ड्रामा (रानावि) है, संगीत नाटक अकादमी है, फिर भी उनकी याद में आज तक कोई सभा नही हुई। ये दुखद व अफसोसजनक है। 13 मई को पश्चिम बंगाल में वामपंथ की 35 साल की सरकार जा रही थी, उसी दिन बादल दा भी चले गये। मेरे साथ उनका पहला रिश्ता रंगमंच का था और दूसरा रिश्ता बहस का था। पहले मैंने एक अभिनेता कि तरह उनको जाना। फिर बहस से जाना और फिर पढ़कर जाना। बादल दा के माध्यम से मेरी पीढ़ी ने जाना कि बिना झंडा लिये भी आप जनता की बात कैसे कर सकते हैं। कैसे जनता के पक्ष में खड़े हो सकते हैं। मैं चाहता हूं कि नयी पीढ़ी उनको पढ़े और जाने। जाने-अनजाने में इस नयी पीढ़ी पर बादल दा के रंगमंच का बहुत प्रभाव है। नुक्कड़ नाटकों में पूरी तरह बादल दा के काम का असर है।

बादल सरकार की याद में दिल्ली के रंगकर्मियों ने श्री राम सेंटर में स्‍मृति सभा का आयोजन किया। इसमें प्रमुख रंग समीक्षक रवींद्र त्रिपाठी, रंग निर्देशक देवेंद्र राज अंकुर, नेशनल स्कूल ऑफ ड्रामा की भूतपूर्व निर्देशक कीर्ति जैन, चित्रकार-लेखक अशोक भौमिक, सामाजिक कार्यकर्ता प्रणय कृष्‍ण व रंगमंच निदेशक अरविंद गौड़ समेत अनेक संस्कृतिकर्मियों ने शिरकत की।

रंग समीक्षक रवींद्र त्रिपाठी ने कहा कि भारतीय रंगमंच जब तक रहेगा, बादल सरकार याद किये जाएंगे। मेरे दिमाग में आधुनिक रंगमंच की जो तस्वीर बनी है, वो बादल सरकार की वजह से बनी है। मेरे दौर के और मेरे दौर से पहले या उसके बाद के काफी लोग बादल सरकार की वजह से रंगमंच की तरफ आकर्षित हुए। दिल्ली में पहला नाटक मैंने बादल जी का ही देखा, जिसका नाम जुलूस था। कर्नाटक का दलित आंदोलन बादल जी के नाटकों से प्रभावित रहा। सबसे बड़ी बात कि 1974-75 से लेकर आज तक एक सक्रिय मौजूदगी बादल सरकार की रही है।

कथा रंगमंच के एक बड़ नाम देवेंद्र राज अंकुर ने कहा कि बादल सरकार एक ऐसी शख्सियत हैं, जो शायद सिर्फ बंगाल के रंगमंच ही नहीं, संपूर्ण भारतीय रंगमंच में हमेशा के लिए याद किये जाएंगे। उन्‍होंने सबसे पहले शुरुआत कॉमेडी से की। फिर तीसरा रंगमंच शुरू किया। उन्होंने हमेशा बनी-बनायी सीमाओं को तोड़ा। सरकार से उन्हें कोई बहुत ज्यादा अहमियत नहीं मिली लकिन उन्होंने इस बात की कभी परवाह नहीं की। बादल दा ने संसाधनहीन होने के बावजूद रंगमंच को सशक्त बनाया। बादल सरकार सबसे बड़े प्रयोगशील रंगकर्मी के रूप में जाने जाएंगे।

चित्रकार और लेखक अशोक भौमिक ने बादल दा के काम के बारे में विस्तार से बताया… बादल दा कहते थे कि लोक रंगमंच और शहरी रंगमंच दोनों को बहुत प्रभावशाली होना चाहिए, तभी तीसरे रंगमंच की कल्पना की जा सकती। 1950 में वामपंथी दल से बाहर आने के बाद उन्होंने कहा कि मैं वामपंथी पार्टी से बाहर आ गया हूं, वामपंथ से नहीं। तमिलनाडु, आंध्र प्रदेश में बादल दा ने दलितों के बीच में काम किया। वो अंदर से टोटल आर्टिस्ट थे।”

सामाजिक कार्यकर्ता व जन संस्कृति मंच के महासचिव प्रणय कृष्‍ण ने कहा कि कलाकारों को समाज के साथ जोड़ना और समाज के बारे में उनका नजरिया और रिश्ता बहुत गहरा था। उनके काम में आसपास हो रही घटनाओं को लेकर गहरा सरोकार था।

नेशनल स्कूल ऑफ ड्रामा की भूतपूर्व निदेशक कीर्ति जैन ने कहा कि वे पिछले एक साल से उन पर किताब एडिट कर रही हैं। उन्‍होंने कहा कि अब मैं उनसे कभी मिल नहीं पाऊंगी। कभी बता नहीं पाऊंगी कि उसमें क्या गलत था। वो कहते थे कि आज की युवा पीढ़ी के पास साधन हैं, वो कर सकते हैं, पर करते नहीं। खुद से भी नाराजगी थी कि जितना करना चाहता हूं, उतना कर नहीं पा रहा हूं। उनकी चिट्ठी के कुछ अंश भी उन्‍होंने पढ़े, “अपने को महत्वपूर्ण मानना आदमी का सौभाग्य है| मेरा भी है। अपने लिए मेरा महत्व कम नहीं है। इसके अलावा नाते-रिश्तेदार हैं, हितैषी हैं। नाना लोग नाना ढंग से देखते हैं, नाना ढंग से बोलते हैं। कोई कहता है, तुम पंडित हो गये हो, कई परीक्षाएं पास की हैं, कोई कहता है तुम अच्छे आदमी हो, अड्डा जमा सकते हो। दूसरों को आनंद दे सकते हो। कोई कहता है, तुममे अंतरनिहित प्रतिभा है।”

♦ प्रदीप अवस्‍थी की रिपोर्ट

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