तब भी वामपंथ के मरने की घोषणा की गयी थी!

♦ विश्वजीत सेन

मता बनर्जी ने सत्ता की बागडोर संभालने से पहले ही अपने कार्यकर्त्ताओं को आगाह किया था, “संयम रखें”। ऐसा प्रतीत होता है कि उनकी हिदायत व्यर्थ गयी। तृणमूल कार्यकर्त्ता एक के बाद दूसरे इलाके में बेलगाम होते जा रहे हैं। सबसे हाल की घटना घाटाल की है, जहां सीपीएम राज्य कमेटी के सदस्य शेख इजराइल को मारा-पीटा गया। शेख इजराइल जिला प्रशासन के बुलावे पर शांति बैठक में हिस्सा लेने जा रहे थे। वह बुजुर्ग हैं, कैंसर और हृदय रोग के मरीज भी हैं। आधे रास्ते से लौटा कर तृणमूल सदस्य उन्‍हें उनके घर ले गये, जहां तथाकथित “हथियारों की खोज” की गयी। हथियार नहीं मिले। घटना का विवरण देते हुए शेख इजराइल रो पड़े। उन्‍होंने कहा, “कोई मुझे इस तरह मारे पीटेगा, इसकी कल्पना मैंने नहीं की थी।”

पहले मजीद अली, फिर श्यामली दलुई और अब शेख इजराइल। ग्रामीण तथा मुफस्सिल वाले बंगाल में तृणमूल सदस्य-समर्थकों का नंगा नृत्य जारी है। ममता बनर्जी मुख्यमंत्री के रूप में शपथ ले रही हैं और शपथ ग्रहण समारोह को कितने रंगारंग तरीके से पेश किया जाए, इसकी प्रतियोगिता मीडिया में चल रही है। अपने विरोधियों के सामने, सिंगूर नंदीग्राम के शहीदों के परिवारों के सामने ममता शपथ ले रही हैं। बंगाल अबाक देख रहा है -बंकिमचंद्र चट्टोपाध्याय, शरतचंद्र चट्टोपाध्याय, रवींद्रनाथ टैगोर, काजी नजरूल का बंगाल अबाक होकर देख रहा है – आखिर यह कौन सी वस्तु महाशून्य से उतर रही है, जो बात तो मानवीयता की करती है, पर जिसमें खुद रत्ती भर भी मानवीयता नहीं है।

क्या ममता को इन हमलों का संज्ञान नहीं है? रेल राज्यमंत्री मुकुल राय स्वयं तृणमूल कार्यकर्त्ताओं को चेतावनी दे चुके हैं कि मजिद अली सरीखी घटनाओं की पुनरावृत्ति नहीं होनी चाहिए। इस चेतावनी का अर्थ यही है कि तृणमूल के शीर्षस्थ नेताओं को भी इन घटनाओं की जानकारी है। तब फिर ऐसी घटनाओं का घटित होना जारी कैसे है? या फिर मुकुल राय का बयान भी दिखावा ही है। उनकी भी मंशा यही है कि ऐसी घटनाएं अधिक से अधिक घटित हों ताकि बंगाल के मानचित्र से वामपक्ष को धो-पोंछ दिया जा सके।

शोषक वर्ग का चरित्र दोमुंहा होता है। एक ओर तो जनता के दुख से उसका हृदय पिघलता रहता है। दूसरी ओर उसके भीतर एक शैतान भी हमेशा जागृत रहता है। पाब्‍लो नेरूदा ने अपनी आत्मकथा में चिली के एक शासक के बारे में लिखा है, जो उनकी कविता का प्रशंसक था और उनकी तारीफ करते नहीं अघाता था। बाद में इन्‍हीं के खौफ से चिली के वामपंथियों को भूमिगत होना पड़ा। यह शासक जब पाब्‍लो की गिरफ्तारी के वारंट पर दस्तखत कर रहा था, तब उसकी आंखं आंसुओं से भर आयी थीं।

यह संभव है कि ममता बनर्जी को श्यामली दलुई के साथ जो कुछ भी हुआ, उसकी जानकारी है। यह खूब संभव है कि शेख इजराइल प्रकरण की जानकारी भी उन्‍हें हो। तब फिर वह चुप क्‍यों हैं? मुकुल राय से बयान क्यों दिलवा रही हैं? वह खुद कुछ बोलती क्यों नही? कहीं बात ऐसी तो नहीं है कि बयान देने से वह कतरा रही हैं और मझोले नेता से बयान दिलवाकर जवाबदेही से मुक्त हो रही हैं।

जहां नारियां अपमानित हो रही हैं, वहां ममता की चुप्पी एक भयानक भविष्य की ओर संकेत करती है। वह खुद नारी अस्मिता की प्रवक्ता रही हैं और नारी अस्मिता से जुड़ी भावनाओं पर सवार होकर ही उन्‍होंने इतनी लंबी दूरी तय की है। श्यामली दलुई कांड पर उनको कुछ बोलना चाहिए था। श्यामली दलुई अकेली औरत नहीं है, जिसके साथ कुकृत्य किये गये। और कई इलाकों से ऐसी घटनाओं की जानकारी मिली है। या फिर शेख इजराइल अकेले बुजुर्ग नहीं हैं, जिनको इस गंदे तरीके से अपमानित किया गया। ऐसी घटनाएं अब आम होती जा रही हैं।

ममता बनर्जी चुनाव जीत कर आयी हैं, यह अच्छी बात है। अब तो वह सत्ता भी संभाल चुकी हैं। मैं उनकी जीत को इस तरह देखता हूं कि वामपंथियों की कार्यशैली को जनता ठुकरा चुकी है। अच्छी बात है। उनकी हार से कम से कम इतनी बात होगी कि वामपंथी बेहतर कार्यशैली की खोज में लगेंगे। लेकिन उन पर दिशाहीन हमले करके तो आप उनकी पुरानी कार्यशैली को ही मजबूत कर रहे हैं। इसका नतीजा यही होगा कि खून का बदला खून से वसूला जाएगा। तृणमूल कार्यकर्त्ता अपनी नेत्री की बात अनसुनी कर रहे हैं, लेकिन वामपंथी अभी तक संयम बनाये हुए हैं। ममता बनर्जी को देखना चाहिए कि उनके धीरज का बांध नहीं टूटे। ऐसा होने पर और कुछ नहीं तो कम से कम बंगाल तो एक लंबी अशांति के दौर से अवश्‍य गुजरेगा। ममता बंगाल को विकसित करने का सपना देख रही हैं। उस सपने का सच बनना दुरूह होगा।

संसदीय लोकतंत्र में हार और जीत कभी भी अनहोनी नहीं मानी जाती। बंगाल में ही सिद्धार्थ शंकर राय के दौर में वामपंथी विधानसभा का बहिष्कार करने को बाध्य हो गये थे। रिगिंग के जरिये हाशिये पर धकेल दिये गये थे वे। उन दिनों ज्योति बसु वामपंथ का नेतृत्व कर रहे थे। ममता बनर्जी उन दिनों को स्मरण करें, तो बेहतर होगा। तब भी वामपंथ के मरने की घोषणा की गयी थी, जो गलत साबित हुई।

(विश्‍वजीत सेन। पटना में रहने वाले चर्चित बांग्ला कवि। पटना युनिवर्सिटी से इंजीनियरिंग की पढ़ाई। बांग्ला एवं हिंदी में समान रूप से सक्रिय। पहली कविता 1967 में छपी। अब तक छह कविता संकलन। पिता एके सेन आम जन के डॉक्‍टर के रूप में मशहूर थे और पटना पश्‍िचम से सीपीआई के विधायक भी रहे। उनसे vishwajitsen1967@gmail.com पर संपर्क किया जा सकता है।)

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