बादल सरकार के साथ राजनीतिक नाटकों का पटाक्षेप
♦ आलेख : सदानंद मेनन ♦ प्रस्तुति : विभा रानी
बादल सरकार पर लिखे सदानंद मेनन के इस लेख का हिंदी भाव दो भागों में है। पूरे लेख को अंग्रेजी में 28 मई-3 जून के इकॉनॉमिक & पॉलिटिकल वीकली [epw.org.in] में पढा जा सकता है : मॉडरेटर
बादल सरकार न तो मास्टर थे, न राजनीतिज्ञ। फिर भी उन्होंने अपने थर्ड थिएटर के माध्यम से ये दोनों रूप बखूबी निभाये। उनके दर्शक एक खास तरह के शहरी मध्यवर्गीय नागरिक या कामगार थे, लेकिन इसके साथ ही उन्होंने सुंदरबन और संथालियों के साथ अपने संवाद कायम किये। दर्शकों के बीच थिएटर को ‘बेचने’ की धारणा से अलग उन्होंने ‘फ्री थिएटर’ की अवधारणा पर काम किया। कर्जन पार्क ओपन थिएटर उनके इस विचार का पोषक और प्रचारक बना।
बादल दा के 50 से भी अधिक नाटकों के हजारों शो उनके ग्रुप ने तो किये ही, अनेकानेक नाटक अलग-अलग भाषाओं, जगहों के ग्रुप्स ने किये। 1970 से 1990 तक यह कारवां लगभग अबाध गति से चलता रहा। अधिकांश नाटक स्वतंत्र राष्ट्र में पनप रहे औपनिवेशक रूप पर कटाक्ष और प्रहार करते हुए थे। रुस्तम भरुचा ने अपनी किताब “रिहर्सल्स ऑफ रिवोल्यूशन” मे बादल सरकार के नाटकों पर लिखा है – “उनके नाटक उग्रवादी होने का बाना नहीं धरते। वे दर्शकों के चेतन में जाकर उन्हें बेचैन करते हैं। बादल दा लोगों की पीड़ाओं को तटस्थ हो कर देखनेवाले मध्यवर्ग की हृदयहीनता को फोकस करते हुए अपने नाटक ‘भोमा’ में कहते हैं – “एखॉन मानुषेर रॉक्तो ठांडा/ ठांडा/ ठांडा…” (आज के लोगों का खून ठंढा/ ठंढा/ ठंढा हो गया है।)
बादल दा की खोज किसी अमूर्त की ओर नहीं थी। वे कहते थे कि मैं एक ऐसे अस्त-व्यस्त समय में रह रहा हूं, जो विरोधाभासों का ढेर है। जगत के एब्सर्ड रूप में से भी वे अपने लिए थीम निकाल लेते थे। कई बार तो अपनी नोटबुक में से ही वे विषय निकाल लेते। कट एंड पेस्ट वाले रूप को वे अपनाते थे। छोटे और कसे शब्दों से वे अपने नाटक की बेलबूटागिरी करते थे। एक विचार से दूसरे विचार तक वे बेखटके आया-जाया करते। थिएटर के प्रमुख कारकों – लाइट, सेट कॉस्ट्यूम की तो उन्होंने ऐसी की तैसी कर दी। वे कभी-कभी तो ये भी कहते थे कि क्या सही में एक्टिंग सीखने की जरूरत है भी? थिएटर के स्वाभाविक रूप पर उनका खासा जोर था। अंग्रेजी के प्रभुत्व को उन्होंने उखाड़ फेंका। पैसे को वे थिएटर के लिए कतई जरूरी नहीं समझते थे। जीवन के अंतिम पल तक वे इसे कलाकारों व दर्शकों के साझा रूप की खोज करते रहे।
बावजूद इसके बादल दा ने अपने प्रशिक्षण से कभी किनारा नहीं किया। स्पेस, डायमेंशन, एंट्री-एक्जिट के बारे में सतत जागरूक बने रहे। अपने नाटकों – ‘सगीना महतो’ (1971) और “स्पार्टाकस’ (1972) में वे स्पेस का गैर पारंपरिक रूप प्रयोग करते दिखे। वे इस बात के सख्त खिलाफ थे कि दर्शक तो अंधेरे में बैठे रहें और कलाकार उजाले में प्रस्तुति देते रहें। उनके हिसाब से ऐसी प्रोसीनियम व्यवस्था में दर्शक कलाकारों से एकदम कट जाते हैं। बादल दा ने कई नाटक बांग्ला की लोक विधा ‘तारजा’ में किये, जिसमें दो कवि अपने अपने विचारों के साथ बहस करते हैं। प्रस्ताब, गोंडी, बासी खबर, पगला घोड़ा, सॉल्यूशन एक्स, हात्तमालेर ऊपरे, एकटी हत्यार नाट्यकथा, खटमट क्रिंग, चूर्ण पृथ्वी, सुखपथ्य भारतेर इतिहास, भांगा मानुष आदि में उन्होंने आंतरिक प्रतिरोध को नाटक की शकल में सामने लाने की कोशिश की।
थिएटर को ही अपना ओढना-बिछौना माननेवाले बादल दा ने देश –विदेश की प्रमुख थिएटर हस्तियों के साथ काम किया। इसमें मणिपुर के हस्नाम कन्हैयालाल से लेकर कर्नाटक के प्रसन्ना, बंगाल के प्रोबीर गुहा और पाकिस्तान की मदीहा गौहर तक शामिल हैं। वर्कशॉप के माध्यम से वे सहभागियों के भीतर के मनोविज्ञान को पकडते थे और उनके भीतर की झिझक को दूर करते थे। वे सहभागियों को खुद ही अपनी स्क्रिप्ट लिखने के लिए उकसाते थे। 10 मिनट के ये स्क्रिप्ट्स नाटक के विविध अभ्यासों में काम आते। 30 सालों में उन्होंने लगभग 300 छोटे-बड़े थिएटर वर्कशॉप लिये होंगे।
और जीवन के 86 बरस तक जिस प्रतिरोध के स्वर को नाटकों में वे मुखरित करते रहे, उसका पटाक्षेप अंतत: 13 मई 2011 को हुआ, जिस दिन तमिलनाडु और बंगाल दोनों ही राज्य एक नयी राजनीतिक करवट ले रहे थे। 35 साल तक राज करनेवाली मार्क्सवादी कम्युनिस्ट पार्टी का वर्चस्व बंगाल से खत्म हो गया था। एक नवीन ‘पोरिवर्तन’ की आंधी में राज्य उस दिन बह रहा था। क्या पता, बादल दा अपने जीते जी इस एब्सर्डिटी को न देख सके हों। कार्डधारी मेंबर होने के बावजूद, जब पार्टी में ही ‘बहुत’ मतलब ‘बहुत’ सारे समझौते के साथ रहना उन्हें कबूल नहीं हुआ था। पार्टी से वे भले हट गये, मगर मन से पूरी विचारधारा के साथ रहे।
आज के नाटकों से राजनीतिक परिदृश्य जिस तरह से साफ होता जा रहा है, लोग सेफ नाटक खेलने लगे हैं, जनता के दुख-दर्द को भूलकर फूहड़ कॉमेडी और कमर्शियल थिएटर में जाने लगे हैं, निस्संदेह बादल दा की ऐसे नाटकों में जरूरत नहीं थी। 13 मई को राज्य नये युग (?) के सूत्रपात का जश्न मना रहा था, बादल दा उसे देख न सके। शायद यह भी रहा हो कि वे उनके जितने भी नाटक रहे हैं, मुख्यत: उनका स्वर रहा है – उनलोगों के खिलाफ अपने गुस्से को जाहिर करना, जो गरीब को गरीब, मजबूर को मजबूर बनाये रखते हैं। ‘थर्ड थिएटर’ का फर्स्ट थिएटर में विलय का सपना देखना आज की स्थिति में शायद संभव नहीं – बादल दा इसे समझ रहे थे, देख रहे थे। और, यह कहना अतिशयोक्ति न होगी कि बादल दा की अंतिम सांस के साथ ही राजनीतिक थिएटर पर भी पर्दा पड़ गया है।
(सदानंद मेनन। लेखक, फोटोग्राफर और स्टेज लाइट डिजाइनर। फिलहाल एशियन कॉलेज ऑफ चेन्नै में असोसिएट फैकल्टी। उनसे sadanandmenon@yahoo.com पर संपर्क किया जा सकता है।)










लेख की अहमियत को समझते हुए भी मुझे ये जल्दीबाजी में लिखा कथन मालूम होता है कि राजनीतिक थियेटर पे पर्दा पड़ गया है…क्या रंगमंच को राजनीति से अलग करके देखा जा सकता है. कई बार घोषित राजनीतिक ना होते हुए भी उसमें राजनीति का समावेश हओ जाता है..खैर पूरा लेख पढने के बाद पूरी बात..
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