नक्‍सलियों के पास अब विकल्‍प ही क्‍या बचा है?

♦ विश्वजीत सेन

44 वर्षों के “जनयुद्ध” के बाद, जिसमें अनगिनत जीवन बेवजह बर्बाद हुए, नक्सलपंथी (आज के माओवादी) अब ममता की ओर टकटकी लगाये बैठे हैं कि कब वह उनकी ओर मुखातिब होंगी, उन पर लादे गये मुकदमे हटाएंगी और उन्‍हें खुले में काम करने का मौका देंगी। “चुनाव के नतीजे” जब साफ होने लगे, तब ममता ने कहा था, वह कोई भी काम “कानून के तहत” ही करेंगी। इससे यह निष्कर्ष निकाला जा सकता है कि आगे नक्सलपंथियों को निःशस्त्र ही काम करना पड़ेगा। बंदूक की नली, जो उनके अनुसार राजसत्ता को जन्म देती है, अब उनके पास नहीं होगी।

चारू मजूमदार से गणपति तक, इस देश में नक्सलवाद की राह भटकाव, गद्दारियों और गुप्त समझौतों से परिपूर्ण रही है। एक पार्टी से दूसरी पार्टी, दूसरी पार्टी से तीसरी पार्टी, तीसरी पार्टी से अनगिनत पार्टियां और हर पार्टी नक्सलवाद की शुद्धतम प्रवक्ता – यह सिलसिला चलता ही रहा है और साथ ही साथ मतभेद रखनेवालों की हत्याएं। ऐसी बात नहीं कि अन्य कम्युनिस्ट दलों में मतभेद नहीं रहे, पर कहां किसी ने डांगे की हत्या करवायी या नृपेन चक्रवर्ती की? उन लोगों को अलग-थलग जरूर कर दिया गया लेकिन यह हक भी दिया गया कि वे चैन की जिंदगी गुजारें। इस दृष्टि से देखे जाने पर संसदीय कम्युनिस्ट दलों में नेताओं की जिंदगी अधिक सुरक्षित है।

नवंबर क्रांति से पहले ही जिनोवियेव और कामेनेव ने अखबारों में खबर “लीक” कर दी थी, लेकिन कहां लेनिन ने उन्‍हें मृत्युदंड दिया? उन दिनों लेनिन सर्वशक्तिमान थे, परंतु उन्होने बोल्‍शेविक पार्टी के नियमों के उल्लंघन की कभी सोची भी नहीं। जरा कल्पना कीजिए कि अगर चारूबाबू उनकी जगह होते, तो क्या करते?

इतिहास में एक मौका पहले भी आया, जब चंद्रबाबू नायडू की हार के बाद आंध्रप्रदेश के माओवादी (पिपुल्स वार ग्रुप) राजशेखर रेड्डी की ओर टकटकी लगाकर देख रहे थे। उनका देखना व्यर्थ गया। इस बार क्या होगा, कहना कठिन है, पर हथियार से चिपके रहने की उनकी जिद अगर बनी रही, तब इस बार भी बात बनना कठिन होगा।

एक बात जो नक्सलपंथियों की समझ से परे है, वह यह है कि हथियार आश्रित राजनीति करने की आजादी उन्हें कोई सरकार नहीं देगी। ऐसी बात नहीं कि देश की राजनीति में हथियारों का इस्तेमाल बिल्कुल नहीं होता, लेकिन इसे संवैधानिक वैधता प्रदान नहीं की जा सकती है। अगर हथियारों के इस्तेमाल को वैधता प्रदान कर दी गयी, तब संसद ही नहीं रहेगा। ऐसा कोई भी कदम, तानाशाही की ओर जाने के रास्ते को सुगम बनाएगा। वह तानाशाही मजदूर वर्ग की तानाशाही नहीं, शोषक वर्ग की तानाशाही होगी, चूंकि आज के दिन शोषक वर्ग के पास संसाधन अधिक है।

सब कुछ से परे, एक सवाल यह भी रह जाता है कि कोई क्रांतिकारी पार्टी अपने आप को इतना कमजोर कैसे बना लेता है कि उसे आखिरकार दया की भीख मांगनी पड़ती है, वह भी शोषक वर्ग प्रतिनिधियों से? खुद को वह इस हालत में कैसे पहुंचा देती है कि जनता उसे छोड़कर भाग खड़ी होती है और उसके पास केवल हथियार रह जाते हैं – आदमी नही। आदमी के बगैर हथियार का कोई अर्थ नहीं होता। वह एक निर्जीव वस्तु के सिवा और कुछ भी नहीं है।

हथियार का संचालन आदमी करता है, आदमी का संचालन संगठन करता है, विचारधारा करती है। अगर आपके पास न संगठन है और न विचारधारा, तब आप हथियार चलाएंगे अवश्य, लेकिन गोली लक्ष्य को न बेधकर इधर-उधर लगेगी। भारत में भी ठीक यही हुआ। उनके 44 वर्षों के इतिहास में ऐसे मौके कई आये, जब उन्‍होंने शोषक वर्ग का पक्षधर बनकर मजदूर कार्यकर्त्ताओं की पिटाई की। यही वजह है कि जब-जब शोषक वर्ग ने उनका दमन किया, तब-तब मजदूर वर्ग के बीच से उनके समर्थन में आवाज नहीं उठी।

एक बहुत ही ऊर्जावान और संभावनाओं से परिपूर्ण आंदोलन कैसे भटकाव की अंधी गली में पहुंच जाता है, नक्सलवाद इसका उदाहरण है। भटकाव की अंधी गली में वे इतनी दूर तक चले गये हैं कि अब ममता की ओर टकटकी लगाकर देखने के सिवा उनके पास कोई विकल्प नहीं है। अगर ममता अपने वादे से मुकर जाती हैं, तब भी वे कर ही क्या सकते हैं? पुनः गुहार लगाएंगे, पुनः पुनः गुहार लगाएंगे। और कोई विकल्प तो है नहीं उनके पास। अगर वे अपनी पुरानी रणनीति की ओर लौटने का प्रयास करेंगे, तब ममता उन्‍हें इस बुरी तरह कुचलवा देंगी, जिसकी कल्पना भी वे नहीं कर सकते।

उनके लिए फिलहाल एक ही विकल्प है – ममता की ओर टकटकी लगाकर देखते रहना।

(विश्‍वजीत सेन। चर्चित बांग्ला कवि। सीपीएम के कट्टर समर्थक। पटना युनिवर्सिटी से इंजीनियरिंग की पढ़ाई। बांग्ला एवं हिंदी में समान रूप से सक्रिय। पहली कविता 1967 में छपी। अब तक छह कविता संकलन। पिता एके सेन आम जन के डॉक्‍टर के रूप में मशहूर थे और पटना पश्‍िचम से सीपीआई के विधायक भी रहे। उनसे vishwajitsen1967@gmail.com पर संपर्क किया जा सकता है।)

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