Home » स्‍मृति

धुंधले प्रतीकों के इस दौर में एक अभिशप्त मिथक थे हुसैन!

11 June 2011 20 Comments

♦ प्रभात रंजन

मएफ हुसैन की मृत्य की खबर जबसे सुनी, यही सोचता रहा कि आखिर क्या थे हुसैन! कई अर्थों में वे बहुत बड़े प्रतीक थे। राजनीतिक अर्थों में वे सांप्रदायिकता-विरोध के जितने बड़े प्रतीक थे, बाद में भगवाधारियों ने उनको उतने ही बड़े सांप्रदायिक प्रतीक में बदल दिया। उनका कहना था कि हुसैन ने एक मुसलमान होते हुए हिंदू देवियों को नग्न चित्रित किया, भारत माता को नंगा कर दिया – हुसैन धार्मिक द्वेष फैलाता है, हुसैन भारतद्रोही है। हुसैन पर हमले हुए, हुसैन पर मुकदमे हुए। आधुनिक भारत के उस पेंटर पर जो अपने प्रगतिशील विचारों के लिए जाना जाता रहा, जिसे भारत की सामासिक संस्कृति का एक बड़ा कला-प्रतीक माना जाता रहा, जिसे हिंदू मिथकों को बारीकी से पेंट करने वाले पेंटर के रूप में जाना जाता रहा – वह देखते-देखते घृणा के एक बहुत बड़े प्रतीक में बदल गया। वह घृणा के प्रतीकों को गढ़े जाने का दौर था, सांप्रदायिक ताकतों को हुसैन की अमूर्त कला में मूर्त प्रतीक के दर्शन होने लगे। उनकी वह कला पीछे रह गयी, जिसके कारण उनको भारत का पिकासो कहा जाता था। हुसैन को अकसर इन दो विपरीत राजनीतिक ध्रुवांतों से देखा जाता रहा।

निस्संदेह हुसैन की उपस्थिति चित्रकला के जगत में विराट के रूप में देखी जाती है। एक ऐसा कलाकार, जिसकी ख्याति उस आम जनता तक में थी, जिसकी पहुंच से उसकी कला लगातार दूर होती चली गयी। हुसैन देश में पेंटिंग के ग्लैमर के प्रतीक बन गये। कहा जाता है कि अपने जीवन-काल में उन्होंने लगभग साठ हजार कैनवास चित्रित किये, लेकिन धीरे-धीरे वे अपनी कला के लिए नहीं अपने व्यक्तित्व के लिए अधिक जाने गये।

हुसैन को इस रूप में देखना भी दिलचस्प होगा कि जब तक देश में सेक्युलर राजनीति का दौर प्रबल रहा, उन्होंने अनेक बार समकालीन राजनीति से अपनी कला को जोड़कर प्रासंगिक बनाया। इसका एक उदाहरण साठ के दशक में राम मनोहर लोहिया के साथ उनके जुडाव के रूप में देखा जा सकता है, उनके द्वारा आयोजित रामायण मेले से उनके जुडाव के रूप में, तो सत्तर के दशक में इंदिरा गांधी को बांगलादेश युद्ध के बाद दुर्गा के रूप में चित्रित करने के रूप में देखा जा सकता है।

राम मंदिर आंदोलन के बाद के दौर में राजनीतिक का सांप्रदायिक ध्रुवीकरण बढ़ने लगा, तो उस दौर में हुसैन ने राजनीति नहीं मनोरंजन के प्रतीकों के माध्यम से अपनी कला को लोकप्रिय बनाया। उन्होंने उस दौर कि सबसे लोकप्रिय अभिनेत्री माधुरी दीक्षित को पेंट किया, चालीस के दशक में सिनेमा के पोस्टर बनानेवाले इस चित्रकार ने उसको लेकर बेहद महंगी फिल्म बनायी। उनकी लोकप्रियता बढ़ती गयी, बाजार में उनकी कला की कीमत बढ़ती गयी। यह दुर्भाग्य ही कहा जाएगा कि जिस दौर में हुसैन ने ‘पोलिटिकली करेक्ट’ होने का ढब छोड़ दिया, उसी दौर में उनके पुराने चित्रों के आधार पर इस सबसे बड़े जीवित कला-प्रतीक को एक ऐसे मुसलमान में बदला जाता रहा, जिसने हिंदू देवियों को गलत तरीके से चित्रित किया।

हुसैन को बाद के दौर में उनकी कला के लिए नहीं, विवादों, घृणा के लिए जाना गया। एक तरफ उन्होंने बाजार को अपनाया या बाजार ने उनको बेहतर तरीके से अपना बनाया, लेकिन वे चित्रकला जगत के सबसे बड़े शोमैन बन गये। उनका अपना व्यक्तित्व इतना बड़ा प्रतीक बन गया कि 15 सेकेंड की प्रसिद्धि के इस दौर में भी उनकी ख्याति बढ़ती ही गयी। लेकिन इसी दौर में उनको देश-बदर होना पड़ा। जिस देश की सामासिक संस्कृति और कला को वे विश्वस्तर पर लेकर गये, उसी देश से। हुसैन का देश छोड़ना एक तरह से देश से उस सेक्युलर राजनीति के सिमटने जाने का भी प्रतीक कहा जा सकता है, जिसकी दृष्टि ने हुसैन जैसे कलाकार को संपूर्णता में अभिव्यक्त करने का अवसर दिया। बनते-बिगड़ते प्रतीकों के इस दौर में हुसैन एक अभिशप्त मिथक की तरह जिये और मरे।

(प्रभात रंजन। युवा कथाकार और समालोचक। पेशे से प्राध्‍यापक। जानकी पुल नाम की कहानी बहुत मशहूर हुई। इसी नाम से ब्‍लॉग भी। उनसे prabhatranja@gmail.com पर संपर्क करें।)

20 Comments »

  • ravindra vyas said:

    is dukh ko sahan kerne k liye main takat laga raha hoon, yah asahneey hai!

  • leena said:

    धीरे-धीरे वे अपनी कला के लिए नहीं अपने व्यक्तित्व के लिए अधिक जाने गये। bahut achhi jaankari aur badhiya vishleshan.sundar alekh. abhaar.

  • भारत दोसी said:

    मकबूल ओर मस्तराम दोनो का स्तर एक जैसा है ।

  • Tribhuwan said:

    हुसैन एक चालाक पेंटर थे. लोगों को टोपी कैसे पहनाई जाय, दंगा कैसे भड्कवाए जाय इसमें महारत हस्सिल थी. बाकी कुछ ऐसे लोग जिनकी मंजिल पेज ३ पर छपनाइ है, वोह हुसैन को अपना आदर्श मानते हैं. दोयम दर्जें की सोच थी हुसैन की. हिन्दुस्तान में पैदा होने का खूब फायदा उठाया.

  • Tribhuwan said:

    प्रशांत बाबू, कला की स्वतंत्रता और पर भी आयत होने के बारे में लिखिएँ. ३-४ साल पहले एक कलाकार की स्वतंत्रता ने पूरी दुनिया को हिला दिया.फस बुक पर सैकड़ों पेज बन गए उस मुद्दे के समर्थ या विरोध में, पर तब आप लोगो ने बौद्धिक वक्तव्य न दिए क्योंकि दर था की कहीं अभूतपूर्व बाहादुरी के चक्कर में भूतपूर्व न हो जायें.

  • vineet kumar said:

    भारतजी,आप मस्तराम के आगे कपूर लगाना भूल गए या फिर उस मस्तराम की बात कर रहे हैं जिसे कि यंग हिन्दी इंडिया किसी कालजयी रचना से ज्यादा रस लेकर पढ़ता है। प्लीज स्पष्ट करें ताकि आगे बात की जा सके।

  • त्रिपुरारि कुमार शर्मा said:

    हुसैन की मौजूदगी हमारे ज़माने को एक अलग दर्ज़ा अदा करती है… जिसने भी हुसैन को समझा, खुद को समझा | अपने वक़्त को समझा | हां, चंद संकुचित मानसिकता के लोग ज़रूर उनका नाम उछाल कर अपनी रोटी सकने के फ़िराक में लगे रहे… मगर ऐसे लोगों के साथ ऐसा अक्सर होता रहा है… हुसैन को किसी सम्प्रदाय में बांधना उनके साथ अन्याय करने जैसा होगा | उम्र उम्र आख़िरी दौर में क़तर जाना, उनके साथ हुई गुस्ताखी ये हमें ज़िंदगी भर शर्मिन्दा केती रहेगी… फिर भी लोगों के दिलों में बसा उनके लिए प्यार कभी कम नही होगा..

  • shahroz said:

    bhai ye daur hi aisa hai…..
    jo na samjhe to kya kare koi…..
    prbhat bhai achcha laga aapko padhkar.

  • dr harish arora said:

    प्रभात तुम्हारा लेख पढ़ा, कुछ बातें अच्छी लगी और कुछ के प्रति मैं पूरी तरह से असहमत हूँ. प्रश्न किसी कलाकार की कला की वैश्विक प्रसिद्धि का नहीं है. इसमें कोई दोराय नहीं कि हुसैन जी ने विश्व में चित्रकला को एक नया आयाम देकर भारतीय कला को वैश्विक पहचान दी. लेकिन प्रसिद्धि तो हिटलर और मुसोलिनी ने भी पाई. बड़े से बड़े कलाकार या राजनीतिज्ञ को उसकी नकारात्मकता ने जितनी प्रसिद्धि दी होगी उतनी सकारात्मकता ने नहीं. ऐंसे में प्रश्न यह उठता है कि आखिर भारतीय विधि ने अनेक लोगों की (ऐसे हिंदू जिन्हें तुम भगवाधारी कह रहे हो) धार्मिक भावनाओं को ठेस पहुँचाने की अपील को स्वीकार क्यों किया? यानी ये तो तय की हमारे संविधान में सभी को अभिव्यक्ति के अधिकार के साथ साथ दूसरे धर्मों (सम्प्रदायों) की भावनाओँ को ठेस पहुँचाने पर पाबंदी भी है. लोहिया और इंदिरा गाँधी के प्रति उनकी भावनाएं किसी हिंदू देवी देवता के नग्न स्वरुप में चित्रित करने के भाव से अलग थीं. राम मंदिर आंदोलन के दौरान उनके व्यक्तित्व से किसी हिंदू को भी कोई आपत्ति नहीं थी क्योंकि उनका व्यक्तित्व और उनकी कला उस दौरान किसी की भावनाओँ को ठेस नहीं पहुंचा रही थी.
    मित्र, यहाँ यह विवाद हिंदुओं की भावनाओं का था, लेकिन यही विवाद यदि मुस्लिम सम्प्रदाय की भावनाओं का होता तो कोर्ट कचहरी के स्थान पर फतवों का सिलसिला जारी होता. यदि उन्हें अपनी कला और भारतीय कानून पर इतना ही विश्वास था तो उन्हें लौट कर भारत आना चाहिए था लेकिन वे जानते थे कि उनकी कला ने जिनकी भावनाओँ को ठेस पहुंचाई है वे इसे नयायालय में प्रमाणित कर चुके हैं. इसलिए हुसैन जी के प्रति तुम्हारी निजी राय जो भी हो लेकिन उनके कृत्य के प्रति में तुम्हारे विचारों का विरोध करता हूँ.

  • मिसिर said:

    प्रभात रंजन जी , बहुत अच्छा लिखा आपने हुसैन के बारे में ! जिस साम्प्रदायिकता का वे शिकार हुए वह आज फिर से पूरा जोर लगा रही है ! ऐसे कठिन समय में सेक्युलर पार्टियों ,संगठनों,और व्यक्तियों को एकजुटता और आवश्यकता पड़े तो कठोरता दिखानी होगी !

  • sharidharam said:

    accha likha hai aapne. mandiron men devdasi rakhane wale husain ko nahi samajh sakte

  • pravin said:

    मित्रो , बात है कला को parakhne की , अगर धार्मिक भावना जादा जोर मार राही है तो हिंदी सहित्य का पहला गौरवपूर्ण महाकाव्य प्रेथ्वीराज रासो पढे,,,चंद वर्दाई ने सरस्वती का जो नख शीख वर्णन किया है उस आधार पर उस कृती को जला देना चाहिये ,,, हा अगर नाम कामाने के लिये ये सब हो रहा है तो मुबारक हो…आप सफल हुये …..वैसे प्रभात जी को धन्यवाद कि उनकी वजह से छुपी हुई फासिस्त शक्तीयान बहार आ गई

  • Tribhuwan said:

    दोस्तों मध्यकाल पीछे छूट गया, आज के तारीख में किसी भी पुराने साहित्यकार/ प्रथा को अधार बना कर लोगों के भावनाओं से खिलवाड़ करना बंद करो.

  • pravin said:

    मैने तो एक बात कही थी ,,,धार्मिक भावना को चोट पाहुंचाने कि बात नही …कला किसी की गुलाम नही होती …बस .

  • सतीश चन्द्र सत्यार्थी said:

    जो लोग आज हुसैन जी के की कला की अभिव्यक्ति की स्वतन्त्रता का झंडा उठाये खड़े हैं वही लोग डेन्मार्क के एक कलाकार द्वारा मुहम्मद साहब का कार्टून बनाने पर तलवारें निकाल के खड़े हो गए थे. ये दोमुंहापन (अभिव्यक्ति की स्वतन्त्रता वाले शब्द का इस्तेमाल करें तो ‘दोगलापन’) मेरी समझ में नहीं आता.. और सिर्फ इसलिए कि हिन्दू धर्म में काफी बुराइयां हैं या पहले के साहित्य में भी देवी-देवताओं के बारे में ‘नख-शिख’ वर्णन मिलते हैं, किसी को भी हिंदुओं की भावनाओं का बलात्कार करने की इजाजत दे दी जाए? देवी-देवताओं को नंगा और जानवरों से सेक्स करता दिखा कर ‘लोकप्रिय’ बनने दिया जाये? आज कोई कलाकार किसी और धर्म से जुडी कोई अश्लील पेंटिंग बनाकर दिल्ली में बेचे तो ‘कला’ की सारी परिभाषाएँ बदल जायेंगी आपके लिए… और हुसैन साहब को किसी ने देशनिकाला नहीं दिया था वो इसलिए भारत की नागरिकता छोड़ कर क़तर भागे थे क्योंकि वहाँ उन्हें अपने कुछ बड़े प्रोजेक्ट्स के लिए तगड़े स्पोंसर मिल गए थे और टैक्स में भी भारी छूट मिल गयी थी.. ये मैं नहीं बोल रहा हुसैन जी ने खुद एनडीटीवी से इंटरव्यू में बोला हैं.. नेट पर सर्च कर लीजिए.. न मिले तो लिंक मैं दे दूंगा.. दूसरा कारण हरीश अरोरा जी दे चुके हैं.. उन्हें पता था कि जो उन्होंने किया है उसके लिए उनपर कानूनी मुश्किलें आ सकती हैं इसलिए यहाँ से निकालना बेहतर है.. देश से प्यार होता और यहाँ के लोगों पर भरोसा होता तो वे कभी नहीं भागते बल्कि यहीं रहकर मुकदमा लड़कर विरोधियों को हराते… हुसैन जी के महान कलाकार होने पर कोई शक नहीं और न ही अंतर्राष्ट्रीय स्तर पर भारतीय चित्रकला को स्थान दिलाने में उनके योगदान को नकारा जा सकता है पर सिर्फ इसलिए उनके हर काम को सही ठहरा देना ठीक नहीं है…

  • shyam bihari shyamal said:

    प्रभात रंजन जी, एमएफ हुसैन के सारे विरोधाभासों को आपने संतुलित ढंग से पेश किया है। अच्‍छी टिप्‍पणी… बधाई…

  • मनोज तिवारी said:

    एक कलाकर के लिए हमेशा आदरणीय स्थान एम् एफ हुसेन जी का रहेगा ,लेकिन अपने कुछ वषों में अपनी इंसानी फितरत बदल दी थी .चर्चा में रहने के लिए थोड़े भटक गए .नहीं तो जो विरोध अंतिम वर्षों में हुआ वह नहीं हुआ होता .अपने जीवन के मध्य में सामाजिक समरसता के प्रतीक थे .खैर यही तो मानव चरित्र है .कब बदल जाय पता नहीं चलता …………
    प्रभातजी! यह निबंध पढ़कर जाबिर हुसैन का सालिम अली पर लिखा ‘सांवले सपने की याद’निबद्ध याद आगया .बहुत अच्छा निबंध है. पढ़कर मजा आ गया .धन्यावाद

  • Anu Rahul said:

    Hussain sahab hamesha freedom of expression ki baat kerte the , main bhi ek chitrakaar hun aurbas itna hi kahna chahti hun ki kisi bhi kalakaar ko kisi ko aahat kerna freedom of expression mana jana chahiye????? Kya aisa kerna kisi bhi kalakaar ke liye uske dwara apni kala la apmaan kerna nahi hai?

  • pravin said:

    दो मुहापन पर दोस्तो की टिप्पणी का स्वागत है … लेकीन मामला हिंदू मुसलमान का नही …बल्की कला की स्वतंत्रता का है ..धर्म से मुतभेड कोई नया नही है …..मिथक और प्रतिक मनुष्य की रचना है ईश्वर की नही..हुसैन की कला धार्मिक भावना की किमत पर नही फली फुली ..वे उससे आगे की चीज है …धर्म द्रोही कहने से पहले सारे पुराण और उपनिषद देखणे की जरुरत है …मै बस इतना काहुंगा कि कि धर्म को सपाट बनाकर देखना एक तऱ्ह की तानाशाही ही है … हुसैन की फिसलन पर हम इतना निर्मम होने की जगह उनकी अन्य उप्लाब्धियोन पर चर्चा करे

  • "जाट देवता" संदीप पवाँर said:

    अरे! ये तो वही है ना जिसने हिन्दुओं के देवियों की व भारत माता की नंगी तस्वीर बनायी थी, अच्छा हुआ भाग गया व मर भी गया, कटा क्लेश,
    क्या उसकी इतनी हिम्मत थी कि वो अपनी माँ की नंगी तस्वीर बनाता, क्या वो इस्लाम को नंगा करता, इसका जवाब मिलेगा नहीं। क्यो?

Leave your response!

Add your comment below, or trackback from your own site. You can also subscribe to these comments via RSS.

Be nice. Keep it clean. Stay on topic. No spam.

You can use these tags:
<a href="" title=""> <abbr title=""> <acronym title=""> <b> <blockquote cite=""> <cite> <code> <del datetime=""> <em> <i> <q cite=""> <strike> <strong>

This is a Gravatar-enabled weblog. To get your own globally-recognized-avatar, please register at Gravatar.