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हुसैन को एक खांचे में फिट करके देखना फिजूल है!

11 June 2011 5 Comments
rajesh priyadarshi small
राजेश प्रियदर्शी

समें कुछ रंग खालिस थे, कुछ मिलावटी। पेंटर यूं भी कई रंगों को मिलाकर नया रंग तैयार करते रहते हैं। वे अनूठे रंगसाज थे और गजब के रंगबाज भी थे।

भारत में कामयाब आदमी को पूजने या उन पर थूकने की रीत नयी नहीं है, जो गैर-परंपरागत तरीके से कामयाब होते हैं, उनके साथ ऐसा अधिक होता है।

हुसैन बेहतरीन कलाकार, पीआर मैनेजर और सेल्समैन तीनों एक साथ थे, और खूब थे। ऐसा अदभुत संयोग कम ही देखने को मिलता है, और इन तीनों में किस में उन्नीस और किस में बीस थे, कहना मुश्किल है।

ये तीन अलग-अलग रंग हैं, हुसैन ने इन तीनों को इस तरह मिला दिया कि कहना मुश्किल हो गया कि कौन कहां शुरू होता है और कहां खत्म होता है। यही है हुसैन का जीनियस, बाजीगरी, कलात्मकता या चालबाजी, आप जो चाहे कहें।

हुसैन को समझने के लिए इन तीनों रंगों को मिलाकर, और कई बार अलग करके देखना होगा, फिर भी जरूरी नहीं है कि हम इस तिरंगे व्यक्तित्व को समझ लें।

हुसैन किस्सागो थे

इंदिरा गांधी को दुर्गा बनाना, राह चलते दीवार रंग देना, खाली पांव घूमना, हाथ में डंडे के आकार की कूची लेकर इंटरव्यू देना, फकीरनुमा दाढ़ी रखना, लंदन के सबसे महंगे इलाके में रहना, पोतियों से भी कम उम्र की हीरोइनों के हुस्न की दीवानगी का तमाशा बनवाना, देवियों के न्यूड्स, रामायण-महाभारत पर पेंटिग सीरीज, समंदर किनारे शास्त्रीय संगीत की धुन पर कूची चलाना, क्रेन पर खड़े होकर पेंटिंग, गजगामिनी, मीनाक्षी ए टेल ऑफ थ्री सिटीज…

…और इन सबके ऊपर असली काम, सात दशकों में बनी हजारों बेहतरीन पेंटिंग्स, नीलामी में करोड़ों कमाना, मर्जी आ जाए तो किसी जूते वाले, पान वाले, कबाब वाले को मुफ्त में पेंटिंग दे देना, अपनी सारी कला को हमेशा के लिए कॉपीराइट-फ्री घोषित करना…

इस सूची में शायद आपको तीनों रंग दिख रहे होंगे। इसमें कुछ बनावटी था और कुछ सहज अनूठापन, और इन दोनों को भी अलग-अलग करके देखना कई बार संभव नहीं होता था।

हुसैन किस्सागो थे, मौके के हिसाब से कहानी बना लेते थे।

बीबीसी को दिये गये इंटरव्यू में खाली पैर चलने के बारे में उन्होंने चार किस्से सुनाये। मई की तपती दोपहरी में मुक्तिबोध की शवयात्रा में चप्पल छोड़ देना और फिर कभी न पहनना, अपनी दिवगंत मां के पैरों जैसा होने की वजह से उन्हें खुला रखना, पैर में शरीर के सारे नर्व होने की वजह से जूते न पहनना और फिर करबला में जलते रेत की तपिश को महसूस करने की जिद…

मुक्तिबोध का निधन मई में नहीं, सितंबर में हुआ था, तथ्यों का हिसाब रखे बिना गप्प हांकने की वजह से कलाकार के तौर पर हुसैन की इज्जत कम नही हो जाती, मगर पता चलता है कि हर वक्त वे कुछ न कुछ गढ़ते रहते थे।

जटिल तिरंगा रूप…

भारत में उनके इस जटिल तिरंगे रूप को न समझ पाने की वजह से कुछ लोगों ने उनका जीना हराम किया लेकिन इसे भी उन्होंने अपने तरीके से इस्तेमाल किया।

बीबीसी के ही इंटरव्यू में उन्होंने कहा कि वे आत्म-निर्वासन में नहीं हैं, वे तो प्रोजेक्ट पूरा करने के लिए कतर में हैं क्योंकि स्पॉन्सरशिप मिली है। उन्होंने भारत की नागरिकता छोड़ी नहीं है बल्कि ओवरसीज इंडियन सिटीजनशिप ले ली है। वे जब चाहें भारत जा सकते हैं बल्कि जाएंगे भी वगैरह-वगैरह… मगर साथ ही उन्होंने अपने खिलाफ मुकदमों और राजनीतिक साजिशों की बात भी की।

इस मामले में भी उन्होंने एक ऐसी तस्वीर पेश की जिसमें देखने वाला जो चाहे देख सकता है। उन्होंने न तो भारत छोड़ने वाले व्यक्ति के तौर पर खुद को पेश किया, न ही बुढ़ापे में देश से निकाले गये एक कलाकार को मिलने वाली सहानुभूति को बटोरने में कमी रखी।

लंदन में हुसैन से दो लंबी मुलाकातों, औपचारिक इंटरव्यू और गपशप (जिसमें वे बड़ा-छोटा, ऊंचा-नीचा नहीं देखते थे) के दौरान ऐसा महसूस हुआ कि वे मामूली आदमी कतई नहीं थे। अपने 95वें जन्मदिन पर उन्होंने जिस तरह हाथ मिलाया था, उसकी गर्मजोशी किसी 25 साल के फौजी अफसर जैसी थी।

सुबह के दस बजे उनके मेफेयर वाले अपार्टमेंट में पहुंचा तो वे घुटने के बल बैठकर कैनवस पर भगवान कृष्ण में नीला रंग भर रहे थे। मुझे देखकर कहा, “आप आ गये, सुबह की नमाज खत्म हुई, पांच बजे से पेंट कर रहा था।”

उन्होंने चाय मंगवायी, जब दो कपों में चाय हाजिर हुई तो उन्होंने त्यौरियां चढ़ाकर कहा, “मेरे लिए कप में क्यों?” उनका कारिंदा भागकर आया और चाय उस गिलास में उंडेली गयी, जिसमें दो रुपये वाली चाय भारत में नुक्कड़ पर छोटू लाता है। बोले, “चाय पीने का मजा तो तभी आता है, जब चाय दिखाई दे, ऊंगलियों को उसकी गर्मी महसूस हो।”

कोई एक खांचा नहीं…

मेरे सामने ही उन्होंने विद्या बालन से फोन पर बात की, एक कॉमेडी फिल्म की योजना बना रहे थे। अगर फिल्म बनती, 96 वर्ष की उम्र में वे शायद दुनिया के सबसे उम्रदराज निर्माता-निर्देशक होते।

हिंदू देवियों को न्यूड पेंट करने के बारे में विस्तार से बात हुई, उन्होंने कहा, “मैं पहला आदमी नहीं हूं। सारे हिंदू शास्त्र, मूर्तिकला, चित्रकला को देखने के बाद मेरे दिमाग में जो छवि बनती है, वही तो बनाऊंगा और वह छवि बहुत सुंदर है। वह कई बार नग्न है, पर अश्लील नहीं है। अजंता, एलोरा, खजुराहो, कोणार्क देखिए… मेरे लिए वही आदर्श है”।

हुसैन न तो हिंदू विरोधी थे, न हिंदू भावनाओं को ठेस पहुंचाना उनका उद्देश्य था, मगर उन्हें लोगों को चिढ़ाने और उससे मिलने वाले प्रचार से परहेज नहीं था। वे जानते थे कि उन्होंने हिंदुओं को नहीं, हिंदूवादी संगठनों को नाराज किया है। उन्होंने हंसकर दाढ़ी पर हाथ फेरते हुए कहा था, “यह कलाकार की दाढ़ी है, इसे जो मुसलमान की दाढ़ी समझते हैं उनकी अक्ल का मैं क्या कर सकता हूं।”

1915 में महाराष्ट्र के पंढरपुर में निम्न मध्यवर्गीय परिवार में पैदा होकर लंदन में 96 वर्ष की उम्र में दुनिया को विदा कहने वाले हुसैन ने इतना तो जरूर सिखाया है कि किसी व्यक्ति को, खास तौर पर एक कलाकार को, एक खांचे में फिट करने की कोशिश करना कितना फिजूल है।

बीबीसी हिंदी से कॉपी-पेस्‍ट

5 Comments »

  • श्‍याम‍ बिहारी श्‍यामल said:

    मुक्तिबोध की शवयात्रा के दौरान तपती रेत का जिक्र करने से जहां तक हुसैन साहब के गप्‍पी स्‍वभाव का होने के संकेत मिलने की बात है… राजेश्‍ा प्रियदर्शी जी, आपने सही लिखा है वे मौके के अनुसार बेशक कहानियां गढ़ लेते होंगे। यह वस्‍तुत: कल्‍पनाशीलता की एक त्‍वरित और भावपूर्ण निष्‍पति है। कलाकार-रचनाकार जो कुछ भी देख रहा होता है उसे स्‍वभावत: तत्‍काल भिन्‍न-भिन्‍न रूपों में कल्पित करने लगता है। अब यदि इसी को वह तत्‍काल बोलने लग जाये तो आसपास उपस्थित लोग खीझ और बौखला भी सकते हैं, जबकि अपनी कला-पीठिका पर उकेर दे तो चौतरफा वाहवाही बरसनी शुरू हो जाये। हिन्‍दी के सिरमौर कथाकार फणीश्‍वरनाथ रेणु ने खुद ही स्‍वयं के बारे में ऐसा ही कुछ बताया है। रेणु कहते हैं कि पहले वह बातचीत में बातों से बातें गढ़ लिया करते थे। इस पर मित्रगण बहुत खीझते और उन्‍हें उलाहना देने लगते कि वह बहुत झूठ बोलते हैं… रेणु ने आगे कहा है कि वह ‘ आज भी वही काम कर रहे हैं, फर्क महज यह है कि वैसा बोल नहीं रहे बल्कि लिखते चले जा रहे हैं और दुनिया है कि इसी पर वाह-वाह किये जा रही है’। आपकी टिप्‍पणी पढ़कर आनंद आया, जैसे शब्‍दों से बनी हुसैन साहब की कलाकृति देखने को मिल गयी हो…

  • अविनाश (author) said:

    मैं राजेश जी की भाषा से भी सहमत नहीं हूं… गप्‍प हांकने का साफ मतलब होता है झूठ बोलना। हुसैन झूठ नहीं बोल रहे थे। मुक्तिबोध की शवयात्रा से लौटने के बाद से वे जीवन पर्यंत नंगे पांव रहे। उनके सहपाठी रहे विष्‍णु चिंचालकर इसके गवाह रहे हैं, जिनकी मृत्‍यु बहुत पहले हो गयी थी और जिन्‍होंने नई दुनिया का पहला ले-आउट बनाया था। बाकी की कथाओं में अपने नंगे पांव रहने को हुसैन भावनात्‍मक गली से अलग हट कर जस्‍टीफाई करने की कोशिश करते से लगते हैं। बहरहाल तथ्‍यों की गड़बड़ी बुढ़ापे का एक महत्‍वपूर्ण लक्षण होता है।

  • Satya Mitra Dubey( Satya Dubey) said:

    Satya Mitra Dubey( Satya Dubey)

    journalistic shailee mein likha gaya, padhane mein yah blog ruchkar to lagata hai, lekin husain ke prati pooree taur par nyaya naheen karata hain. husain kee zindaghee ke kaee kal-kand hain. gat sadee ke sath ke dashak ke ant tak husain zindaghee ke sangharshon se joojhate yek sangharsh sheel kalakar hain. lohia jaise chintak rajneta ke sampark mein ve bharat, isake akhyano kee kavyamayata, isake mithakon, prateekon ko samajhane aur unhen apanee kala ke sath jodane ke liye sankalp badh hain. asurakchh grast adamee kee tarah husain kee kala ke sath kamaee, dhan,pooree surakchha, prachar, jan sampark ka bhaw 70 ke dashak mein prabal hota hai. usake baad, apar shoharat ke beech aur kuchh naya karane kee dhun mein 90 ke dashak kee asahishnu rajneeti ke beech, 80 ke dashak ke atyant vyawaharik-nipun husain thode asamvedansheel ho jate hain aur rajneetik vivadon se ghir jate hain. sangharsh, nipudata-jan sampark, vivad ke in vibhinn kalon kee nijee samasyaon ke baad bhee, husain bhartiya kala ko visnwa patal par le jane wale yek mahantam kalakar hain,aur unhen duniya yekmat se is roop mein yad kar rahee hai.bharat adi se ant tak unake man, pran, atma mein racha-basa raha hai.

  • bharats said:

    हा हा हा, एक आदमी के अन्दर होते हैं कई-कई आदमी. जब भी देखो, संभल कर देखा करो!

  • man singh said:

    एक सांस्क्रतिक आतंकवादी अल्लाह को प्यारा हो गया …बधाई भाइयो

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