फॉरवर्ड प्रेस : आइए, इसके नये कलेवर का स्‍वागत करें


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♦ मुसाफिर बैठा

फारवर्ड प्रेस कई मायनों में अनूठी, तेजोदीप्‍त, बेबाक और क्रांतिकारी पत्रिका है। वैज्ञानिक और तार्किक सोच को बढ़ावा देने के उद्देश्‍य से निकाली गयी यह मासिक द्विभाषिक (हिंदी & अंग्रेजी) पत्रिका खास कर दलित और शूद्र समुदाय, जिन्हें हम बहुजन भी कह सकते हैं, के हितों को संबोधित प्रश्नों, वंचनाओं, अधिकारों, अस्मिताओं, आशा-आकांक्षाओं को लेकर बेहद संवेदनशील है। इस मिजाज की भारत की यह इकलौती वैचारिक पत्रिका है। यह पत्रिका मई 2009 से अस्तित्व मे आयी। पत्रिका के नाम के औचित्य पर बात करते हुए संपादक आइवन कोस्का कहते हैं, “…हम उत्तर भारत की पत्रकारिता की नयी दृष्टि लेकर आये हैं। इसे हम कहते हैं – फारवर्ड थिंकिंग अर्थात अगड़ी सोच। इससे हमारा अर्थ है कि हम भारत के सभी लोगों की प्रगति और विकास के लिए प्रतिबद्ध हैं – केवल आर्थिक नहीं बल्कि सभी पक्षों में।”

अंतर्राष्ट्रीय प्रसार की यह पत्रिका देश-परदेस के हर कोने में मौजूद बहुजन समाज के हक-हुकूक की निगहबानी को प्रस्तुत दिखती है। पत्रिका का फलक काफी व्यापक और विस्तृत है। इतिहास और वर्तमान के तमाम पहलुओं पर समाज की मुख्यधारा के नजरिये को बहुजन दृष्टि से वैज्ञानिक-तार्किक पड़ताल करते हुए बात और विमर्श आपको यहां बिलकुल संजीदा और सजीव तरीके से घटित होते हुए मिलेगा।

पत्रिका पिछले मई 2011 में दो साल की उम्र की हो गयी। हालांकि जो इसका मिजाज है, जो इसके तेवर हैं, उस हिसाब से यह अपने पाठक वर्ग के अभीष्ट हिंदी हिस्से में बहुत असरदार दखल नहीं बना पायी है। वैसे, इधर, हाल के दिनों में पत्रिका की रीति-नीति में कुछ बदलाव आये हैं, जिससे आशा की जा सकती है कि पत्रिका के हिंदी पाठक वर्ग के बीच भी प्रचार-प्रसार निकट भविष्य में बढ़ता दिखाई देगा, जबकि पहले यह अंग्रजी पाठक वर्ग के मध्य ही यह अधिक प्रचलित थी।

पत्रिका का संपादन इधर तेजतर्रार युवा साहित्यकार और विचारक प्रमोद रंजन के हाथों में सौंपा गया है। समृद्ध और नवोन्मेषी दृष्टि रखने वाले प्रमोद पत्रकारिता का व्यापक अनुभव रखते हैं। प्रमोद ने बिहार के मीडिया मिजाज पर पैनी दृष्टि रखते हुए कुछ साल पहले एक सर्वेक्षण प्रस्तुत करते हुए मीडिया के सवर्ण चरित्र और जनसरोकारों से बढती दूरी का खुलासा किया था। उन्होंने बिहार के कोशी क्षेत्र में कुछ साल पहले आयी भयंकर बाढ़ की त्रासदी, उस पर प्रशासन के उदासीन एवं शिथिल रवैये, चूक और लूट की पोल खोली थी। उनकी मेहनत और दृष्टि का असर यहां पत्रिका में भी दिखने लगा है।

जून 2011 अंक को बतौर बानगी देखा जा सकता है। ‘दिल्ली विश्वविद्यालय में सीटों की लूट’ नामक शोधपूर्ण और आंखखोलू रपट ओबीसी कोटे के छात्रों को उनको मिलने वाला कोटा न उपलब्ध करवा कर नामांकन से वंचित करने की अभी की ताजातरीन ‘वारदात’ से रूबरू करवाती है। इस रपट का नोटिस लेकर एक इलेक्ट्रौनिक चैनल ने भी समाचार चलाया। विश्वविद्यालय के इस द्वेष, ज्यादती और कपट-उद्भेदन से निहित स्वार्थी सवर्ण तत्व परेशान दिख रहे हैं। प्रमोद रंजन ने बिहार के समाज में व्याप्त सामाजिक भेदभाव, राजनीतिक प्रदूषण, अनगढ़ रुढ़‍ियों, चलनों आदि को भी पत्रिका का कंसर्न बनाना शुरू किया है। प्रगतिशील एवं विद्रोही तेवर के साहित्यकार एवं राजनीतिज्ञ प्रेमकुमार मणि का नियमित लेखन यहां देखना अतिरिक्त रूप से आह्लादक है। उनमें हमेशा नयी दृष्टि देखने को आपको मिलेगा जो बहुधा बहसतलब होती है।

मैं इस जरूरी पत्रिका के दीर्घ और क्रांतिधर्मी जीवन की कामना करता हूं।

(मुसाफिर बैठा। समालोचक-साहित्‍यकार। फेसबुक पर पाद टिप्‍पणियों के लिए इन दिनों चर्चा के केंद्र में। बिहार विधान परिषद की प्रकाशन शाखा में अधिकारी। अभी अभी एक कविता पुस्‍तक प्रकाशित हुई है, बीमार मानस का गेह। musafirbaitha68@yahoo.com पर संपर्क करें।)

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