लेखक को पैसे नहीं मिलेंगे, तो वो पक्का करप्ट हो जाएगा!
बौद्धिक संपदा कानून पर कल की बहसतलब के बारे में युवा मीडिया क्रिटिक विनीत कुमार ने फेसबुक पर कुछ संदेश वक्त वक्त पर चिपकाये हैं। हम उन्हें वहां से कॉपी कर रहे हैं और मोहल्ला लाइव पर चिपका रहे हैं : मॉडरेटर
बौद्धिक संपदा कानून पर कल बहसतलब में इस उम्मीद से गया था कि लेखकों के हक और लिखकर रोजी-रोटी जुटानेवालों के पक्ष में बातचीत होगी। लेकिन कल बहसतलब का शिल्प बहुत ही शांत और स्थिरचित्त था। पैसे और अधिकार के मामले में हिंदी समाज के दूसरे सेमिनारों की तरह वो भी अध्यात्म के दरवाजे में चला गया।
लेखकों से मुफ्त में लेख लिखवाकर जो संपादक सरोकारी पत्रिकाएं और साहित्यिक उपक्रम कर रहे हैं, वो दरअसल लेखक को ज्यादा करप्ट हो जाने के लिए मजबूर कर रहे हैं। वो खुद तो सरोकार के मुखौटे बनकर समाज की सारी सुविधाएं भोगते हैं और लेखक को लेख के नाम तोड़-जोड़ के लिए खुला छोड़ देते हैं। भरोसा न हो तो तद्भव जैसी पत्रिका के विज्ञापनों को गिनें और उनके लेखकों से पूछें कि क्या मिलता है?
आज तद्भव के संपादक अखिलेश से है कोई पूछनेवाला कि जब आपको एक अंक में 13-14 विज्ञापन मिलते हैं और एक विज्ञापन ऐसा भी कि जिसमें लिखा होता है कि इस अंक के प्रकाशन का सारा खर्च इस संस्था या फर्म ने उठाया है, तो हमें लेख के लिए अठन्नी भी क्यों नहीं देते? कोई लेखक नहीं पूछेगा क्योंकि वो उसी लेख को नत्थी करके अखिलेश के प्रभाव क्षेत्रवाले इलाके में काम लाएगा।
कल बहसतलब में ये बात आयी कि जब हमारा खुद का कुछ है ही नहीं तो किस अधिकार से लिखकर उसके अधिकार और पैसे की मांग करें। जब हम अपने पूर्वजों का ही लिखा-पढ़ा पेश कर रहे हैं, तो ऐसा करना सही नहीं होगा। बेहतर हो कि हम पैसे के लिए दिमाग के बजाय देह भी चलाएं। अनुपम मिश्र जैसे लोग चाहते हैं कि हम समाज के लिए लिखें और अपने को जिंदा रखने के लिए ब्लाउज-पेटीकोट बेचें या चांदनी चौक में मुरमुरे की रेडी लगाएं।
अगर कोई लेखक सिर्फ लिखकर अपना जीवन चलाना चाहता है, तो हिंदी में उसकी कितनी संभावना है और वो इसके लिए प्रयास करता है, तो उसमें गलत क्या है? लिखने के बदले पैसे की मांग हिंदी समाज में अश्लील और पाप कर्म क्यों हैं?
हिंदी का लेखक लेख के बदले पारिश्रमिक की मांग इसलिए भी नहीं करता क्योंकि या तो वो छपकर ही अपने को धन्य मान लेता है या फिर छपने के बाद उससे दूसरे तरह के मतलब साधने में लगा रहता है। अधिकांश मामलों में लिखना सिस्टम के कल-पुर्जे बन जाने की शुरुआती सीढ़ी है। सीधे तौर पर मॉनिटरी प्रॉफिट न भी मिले, तो सभा-संगोष्ठी में बुलाकर उपकृत किये जाने का इंतजार करता है। लेख और संपादक की सांठ-गांठ उसे नौकरी दिलाने में मदद करते हैं।
प्रेरक प्रसंग : हमारा समाज पत्रकारों-साहित्यकारों और सृजन करनेवाले लोगों को पालना नहीं जानता। कल बहसतलब में विस्फोट के मॉडरेटर संजय तिवारी ने बहुत इमोशनल होकर जब ये बात कही, तो मैं ताली बजाये बिना नहीं रह सका, मैं भी इमोशनल हो गया।
(विनीत कुमार। युवा और तीक्ष्ण मीडिया विश्लेषक। ओजस्वी वक्ता। दिल्ली विश्वविद्यालय से शोध। मशहूर ब्लॉग राइटर। कई राष्ट्रीय सेमिनारों में हिस्सेदारी, राष्ट्रीय पत्र-पत्रिकाओं में नियमित लेखन। हुंकार और टीवी प्लस नाम के दो ब्लॉग। उनसे vineetdu@gmail.com पर संपर्क किया जा सकता है।)
विनीत कुमार की बाकी पोस्ट पढ़ें : mohallalive.com/tag/vineet-kumar










bahut badia vinit…anupam mishr jaiso ka sarvodai vagjal sunane padane me hi achha lagata hai…baki sab faltu bat hai…
shashi bhooshan dwivedi
Koi bhi emotional ho jayega vineet aisi sachchaiyon ko sun kar, Anupam Mishra seede seedhe aisa kutark kar rahe jisne likhne walon ko kaudi ka teen bana rakha hai
पैसा सब को खरीद लेता है..करप्शन रहित लेख…
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Ashishji ne BBC ke sambandh mein jo likha hai, vah meri jaankarki mein sahi nahin hai. yah jaroor sahi hai ki BBC aapke dwara bheji gayi samagrim ka apni kisi bhi seva mein upyog kar sakti hai, par yah bhi sahi hai ki jis samay aap vahan koi cheez bhejte hai aur BBC use sweekar kar leti hai to aapko uska bhugtan milta hai is shart ke saath ki BBC uska upyog kahin bhi kabhi bhi kisi bhi roopmein kare. BBC dwara shuru mein jo bhugtan kiya jaata hai uski rashi vahan ke standard ke anuruphoti hai.
mere is kathan ki pushti ke liye kripya dekhen AUTHORS & WRITERS YEARBOOK . yah varshik prakashan hai . ismein kewal BBC hi nahin varan Britain ke poore media ke sambandh mein sabhi prakar ki jaankari rahti hai yaani pata, kaisi aur kis prakar ki samagri chahiye, bhugtaan ki dar, , sampadak yaa adhikari ka naam,tatha isi prakar ki anya suchnayein.
sampadak patrika ka vyavsaayeekaran karke sab sukh suvidhaye jutata hai aur lekhak ko athhanni bhi nhi deta yah ghor nindneey hai. isiliye hamare samaaj me lekhak ko ek faaltu vyavsaay ki tarah samjha jaata hai. aksar log poochhte hai lekhak hai theek hai lekin kaam kya karte hain? lekin zimmedari lekhak ki bhi hai. sampadak ki to hai hee.
इसको को पढकर विनीत के पुराने लेखों की याद ताज हो गयी । लगभग सभी बातों से सहमति ।
नीरज रोहिल्ला
aapne bahut aacha likha hai
मैं भी इमोशनल हो गया
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sahi kaha jiska lekh chhap jaye usse bada dhani to koi ho hi nahi sakta………..
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