ध्रुपद : आइए, मणि कौल की ये फिल्‍म ऑनलाइन देखें

1983 में मणि कौल ने एक फिल्‍म बनायी थी, ध्रुपद। 15वीं शताब्‍दी से चले आ रहे एक संगीत घराने के वर्तमान को उन्‍होंने इस फिल्‍म में जिस संवेदना के साथ रचा, उसने हिंदुस्‍तानी सिनेमा को एक कलात्‍मक ऊंचाई दी। आइए, यहां हम पूरी फिल्‍म देखते हैं। साथ ही दैनिक हिंदुस्‍तान के एसोसिएट एडिटर राजेंद्र धोड़पकर ने आज अपने अखबार में उन पर एक स्‍मृति लेख लिखा है। उसे भी कॉपी-पेस्‍ट करके आप तक पहुंचा रहे हैं : मॉडरेटर

सिनेमा की भाषा को विस्तार देने वाले मणि कौल

♦ राजेंद्र धोड़पकर

फिल्मकार मणि कौल की लंबी बीमारी के बाद गुड़गांव में मृत्यु हो गयी। मणि का नाम समानांतर फिल्म आंदोलन के दौरान चर्चा में आया था, तब वह कला फिल्मों के एक सशक्त रचनाकार व पैरोकार की तरह सामने आये थे। इस आंदोलन के पहले व्यावसायिक और कला फिल्मों का कोई स्पष्ट विभाजन नहीं था, लेकिन साठ के दशक में ऐसी परिस्थितियां पैदा हो गयीं, जिनसे यह आंदोलन खड़ा हुआ। पहली बात यह थी कि व्यावसायिक सिनेमा फार्मूलाबद्ध होता जा रहा था, जिसमें रचनाशीलता व प्रयोगों के लिए ज्यादा जगह नहीं बची थी। उस दौरान विश्वव्यापी आंदोलनों ने भी मुख्यधारा से इतर विचार प्रवाहों को प्रोत्साहित किया। भारत में तभी पुणे में फिल्म इंस्टीट्यूट की शुरुआत हुई, जिसमें नौजवानों ने विश्व सिनेमा से परिचय प्राप्त किया। ऋत्विक घटक जैसे फिल्मकारों ने इन नौजवानों को प्रोत्साहित किया। तभी फिल्म फाइनेंस कॉरपोरेशन (बाद में फिल्म विकास निगम) बना, जिसने कलात्मक फिल्मों को आर्थिक मदद दी। मणि फिल्म इंस्टीट्यूट के शुरुआती छात्रों में से थे और कला सिनेमा में भी शुद्ध कलात्मकता के छोर का प्रतिनिधित्व करते थे। इस तरह का सिनेमा लोकप्रिय तो नहीं हो सकता था, पर उसने सिनेमा की भाषा को विकसित करने में और सिनेमा पर विचार को विस्तार देने में बड़ी भूमिका निभायी।

मणि का सिनेमा लोकप्रिय तत्वों से कितनी ही दूर हो, मणि खुद बहुत दिलचस्प और यारबाश आदमी थे, इसलिए लोकप्रिय भी थे, खासतौर पर फिल्म इंस्टीट्यूट के बाद के छात्रों में उनका अच्छा-खासा सम्मान था। मणि के चाचा महेश कौल मुंबई फिल्म उद्योग के नामी निर्देशक थे। महेश कौल बहुत पढ़े-लिखे विद्वान व्यक्ति थे। मणि पुणे से निकलकर महेश कौल के यहां ही पहुंचे थे। मणि बताते थे कि महेश कौल ने उनसे कहा कि वह के आसिफ की फिल्म ‘लव एंड गॉड’ के लिए हीरो तलाश रहे हैं, तुम चाहो तो उनसे बात करूं (मणि काफी सुदर्शन व्यक्ति थे और उनके मुताबिक ‘उस वक्त उनके सिर पर बाल भी थे’)। फिल्म अभिनेता राजकुमार भी उनके रिश्ते में (शायद मामा) थे। मणि बड़े मजे से बताते थे कि जब उन्होंने ‘उसकी रोटी’ बनायी, तो राजकुमार ने उनसे कहा : जानी, तुम क्या ‘उसकी रोटी’ बनाते हो। हमारे साथ आओ, हम अपना हलवा पकाएंगे।

समानांतर फिल्म आंदोलन खत्म हो गया, क्योंकि उसका कोई ठोस अर्थशास्त्र नहीं था। सरकार ने पैसा लगाना बंद कर दिया और बनी हुई फिल्मों को दर्शकों तक पहुंचाने की कोई कोशिश नहीं की। कला फिल्मों के अनेक रचनाकारों ने नयी परिस्थिति से समझौता कर लिया, लेकिन मणि ने कभी ‘हलवा पकाना’ स्वीकार नहीं किया। पूरी दुनिया में कम ही सही, लेकिन उनकी फिल्मों के गंभीर दर्शक और प्रशंसक थे और सिनेमा के कथ्य और भाषा को विस्तार देने में उनकी भूमिका को हमेशा याद किया जाएगा।

(राजेंद्र धोड़पकर। हमारे समय के बड़े र्का‍टूनिस्‍ट। उनकी रेखाओं में समय और राजनीति की सबसे सटीक अनुगूंजें हमें मिलती हैं। जनसत्ता में लंबे समय तक रहे। फिलहाल दैनिक हिंदुस्‍तान में एसोसिएट एडिटर।)

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