नोएडा एक्सटेंशन : जिन्होंने पैसे लगाये, उनका कौन?

♦ सुशांत झा

ये वही इलाके हैं, जिन्हें उत्तर-भारत के सबसे खुशहाल इलाकों में गिना जाता है और जहां के किसान कई बार अपने बच्चों की शादी में हेलिकॉप्टर से फूलों की वर्षा करवाते हैं। दिल्ली का विस्तार क्या हुआ, उससे सटे इलाकों के लोग आसमान छूती जमीन की कीमतों की वजह से मालामाल हो गये। लेकिन समृद्धि के कांटे जब चुभने लगे, तो लोग सड़कों पर उतर आये और मामला अदालत में चला गया।

जी हां, नोएडा एक्सटेंशन की यही कहानी है। वैसे तो कहानी बहुत सामान्य लगती है, लेकिन इसमें कई पेंच हैं। ग्रेटर नोएडा ऑथरिटी ने किसानों से जमीन ली, उसे बिल्डरों को बेचा, जिस पर बिल्डरों ने अपने हाउसिंग प्रोजेक्ट शुरू किये। करीब 3.5 लाख मकान उस इलाके में बनने थे, जिसमें एक लाख के करीब तो बुक भी हो चुके थे। लेकिन बीच में इलाहाबाद हाईकोर्ट के फैसले ने सारा उलट-पुलट कर दिया। अदालत ने निर्माण कार्य पर रोक लगा दी और ऑथरिटी को कहा कि वो किसानों की जमीन वापस करे। करीब एक लाख परिवार यानी पांच लाख लोगों की जिंदगी और एक लाख करोड़ के निवेश हवा में लटक गये। ऊपरी तौर पर यह मामला अदालत का किसानों के हित में दिया गया एक फैसला लगता है लेकिन इस सारे खेल में अगर कोई सबसे कमजोर कड़ी है, तो वो है मकान का आम खरीददार। उनकी परेशानी कोई सुननेवाला नहीं है। वे एक झटके में सड़क पर आ खड़े हुए हैं। मामले की अगली सुनवाई 26 तारीख को होनी है।

जाहिर है, नोएडा एक्सटेंशन का मामले को अगर सही तरीके से सुलझाया नहीं गया, तो ये पूरे देश के लिए खतरनाक नजीर बन सकता है। मामला सिर्फ किसानों को उनकी जमीन के उचित मुआवजे का ही नहीं है, बल्कि समग्र राष्ट्रीय शहरीकरण और भूमि अधिग्रहण नीति से जुड़ा हुआ है।

सवाल यह है कि आम मकान खरीददारों का क्या होगा? उन बिल्डरों का क्या होगा, जिन्होंने सरकारी नियम के तहत ऑथरिटी से जमीन तो ली लेकिन अब उनके सारे निवेश को ध्वस्त कर दिया गया है। बिल्डर तो फिर भी समझ में आता है कि आर्थिक रूप से सक्षम हैं, लेकिन उन आम आदमियों का क्या, जिसने अपनी जिंदगी की गाढ़ी कमाई, अपने पिता का पीएफ और अपने गांव की पुश्तैनी जमीन तक बेच कर एक अदद घर हासिल करने का सपना देखा था? क्या कोई नेता उनके पक्ष में बोलने आएगा? ऐसा शायद ही हो, क्योंकि एक तो ये वेतनभोगी लोग संगठित नहीं हैं और दूसरा कोई बड़ा वोटबैंक नहीं हैं। भला राहुल गांधी क्योंकर उन ’आम आदमियों’ के पक्ष में बोलने आएंगे जबकि सामने किसान जैसा मजबूत और आक्रामक वोटबैंक खड़ा है!

लेकिन जब मामला अदालत में था, तो फिर मकान की बुकिंग कैसे हो रही थी? लोगों का कहना है कि उन्हें तो पता ही नहीं चला कि मामला अदालत में है और न ही किसानों ने कभी विरोध-प्रदर्शन किया। जबकि किसानों का कहना है कि वे विरोध कर रहे थे और कुछ लोगों ने गिरफ्तारियां भी दी थीं। बिल्डरों का कहना है कि जमीन चूंकि उन्हें नोएडा ऑथरिटी ने दी थी, तो फिर उस जमीन पर शक करने का कोई आधार ही नहीं था। भला इस देश में सरकार या सरकारी ऑथरिटी से भी बड़ा कोई गैरंटर हुआ है?

किसानों का ये आरोप है कि उनको बहुत कम मुआवजा दिया गया और फिर लैंड यूज का क्लाउज बदल दिया गया। यानी जमीन ली किसी और इरादे से गयी थी और उसे आवंटित बिल्डरों को कर दिया। ऐसे में शक की पूरी सुई ग्रेटर नोएडा ऑथरिटी की तरफ ही जाती है, जिसने बड़े करीने से इस काम को अंजाम दिया और इसका आरोप बिल्डरों पर लगता है कि उनके इशारे पर ऐसा हुआ। लेकिन क्या इसे साबित किया जा सकता है? जाहिर सी बात है कि गर्दन तो ऑथरिटी की फंसी है या फिर यूपी सरकार की, जिसे अदालत में इस बात का जवाब देना है।

लेकिन, याद कीजिए भट्टा परसौल या फिर देश के दूसरे हिस्से में चल रहे आंदोलनों की, तो ये बात शीशे की तरफ साफ हो जाती है कि किसान भी एक हद से ज्यादा विरोध नहीं कर रहे थे। वे चाहते हैं कि उनके मुआवजे की राशि बढ़े। अगर वे उग्र आंदोलन पर उतारू हो जाते तो फिर मकानों के सारे खरीददार उस इलाके से भाग जाते और तमाम प्रोजेक्ट्स गायब हो जाते। फिर किसानों के जमीन की वो पूछ नहीं रहती। वो महज कृषि भूमि के नाम पर ही आपस में बिकती और उनको उतना मूल्य नहीं मिलता। अभी भी किसान जमीन नहीं बल्कि बढ़ा हुआ मुआवजा चाह रहे हैं।

दूसरी बात ये कि अगर किसानों को जमीन वापस देने की बात होती है, तो ज्यादातर किसान इस स्थिति में नहीं हैं कि वे मुआवजे की रकम लौटा सकें। बहुतों ने पैसे खर्च कर दिये, कुछ ने गाड़ी खरीद ली, तो कुछ ने कोठियां बनवा ली। उनकी जमीन में पिछले एक दो सालों में निर्माण कार्य होने की वजह से लोहे के सरिये बिछे हैं और उपजाऊ जमीन कंक्रीट बन गये। ऐसे में उस जमीन को तो कृषि योग्य बनाने में ही उनकी हालत खराब हो जाएगी।

लेकिन मामला फिर आम आदमी पर फंसा है। बैंक उसकी ईएमआई बना चुके हैं। वे फिर से अगले महीने की एक तारीख को उसे ब्याज समेत उस मकान के लिए जारी कर देंगे, जो मकान अब मकान खरीददारों को नहीं मिलने जा रहा है। अदालत ने बैंक के ईएमआई के संबंध में कोई दिशा-निर्देश जारी नहीं किया है। कहा जा रहा है कि बिल्डर, लोगों का पैसा ब्याज के साथ वापस करें या फिर कहीं दूसरी जगह मकान दें। लेकिन क्या उन पैसों से बैंक के ब्याज दर की भरपाई हो पाएगी? क्या 9 से 20 लाख तक का छोटा निवेश करनेवाला मकान खरीददार अब 30-50 लाख का मकान ले पाएगा, जो उसे बिल्डर्स दूसरी जगह मुहैया करवाएंगे या जिसकी बात हो रही है?

सवाल अदालती फैसले पर भी उठ रहे हैं। अदालत ने फैसला देते वक्त सिर्फ किसानों के पक्ष से विचार किया और मकान के खरीददारों को बिल्कुल नजरअंदाज कर दिया। जबकि इस पूरे मामले में कम से कम चार पक्ष थे – किसान, बिल्डर, बैंक और आम खरीददार। इसका सबसे बड़ा भुक्तभोगी आम खरीददार बना, जिसकी गाढ़ी कमाई अनिश्चतता के भंवर में लटक गयी। लेकिन अदालत ने उससे उसकी राय तक जानने की जहमत नहीं उठायी। यह प्राकृतिक न्याय के सिद्धांतों के बिल्कुल उलट है। दूसरी बात ये कि जब अदालत ने साल भर पहले ही स्थगन आदेश दिया था, तो फिर ग्रेटर नोएडा ऑथरिटी किस हैसियत से जमीन का एग्रीमेंट बिल्डरों के साथ कर रही थी? अदालत उस समय क्या कर रही थी, जब लाखों लोगों की कमाई के साथ खेला जा रहा था?

ऐसे में अदालत का यह फैसला तुगलकी फैसला हो गया, जिसमें एक पक्ष को बिल्कुल ही नकार दिया गया। जबकि यह बिल्कुल अदालत के अधिकार क्षेत्र में था कि वह एक कमेटी बनाती और इस पर मुआवजे से लेकर बैंक लोन और तमाम पहलू पर निर्देश जारी करती। कायदे से अदालत को पैसा ऑथरिटी या यूपी सरकार से वसूल करना चाहिए और फिर से किसानों में बांटने का निर्देश देना चाहिए था। किसानों से जमीन ऑथरिटी ने ली थी, वो अब उसकी भरपाई जहां से करे। शायद किसान भी इस पर विरोध नहीं करते। लेकिन ऐसा नहीं हुआ है।

जाहिर है, अदालत के इस फैसले ने भानुमती का एक पिटारा खोल दिया है, जिससे इस देश में आनेवाले दिनों में कई इस तरह के विवाद देखने को मिलेंगे। जरूरत इस बात की है कि बीच का कोई रास्ता निकाला जाए, जिससे किसानों को भी उचित मुआवजा मिले और लोगों को भी सस्ता घर नसीब हो। आखिर किसान भी यही चाहते हैं और आम मकान का खरीददार भी। उससे भी बड़ी जरूरत इस बात की है कि भविष्य को मद्देनजर रखते हुए सरकार जल्द से जल्द भूमि अधिग्रहण पर अपनी नीति साफ करे और कानून में सुधार करे।

sushant thumbnail(सुशांत झा। जुझारू युवा पत्रकार। आंदोलनी विरासत। मिथिला में जन्‍म। आईआईएमसी से पत्रकारिता की पढ़ाई। कुछ टीवी संस्‍थानों से जुड़े रहे। उनसे jhasushant@gmail.com पर संपर्क किया जा सकता है।)

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