हंस की गोष्ठी में नहीं जमा रंग, नामवर भी साधारण बोले

नामवर सिंह | सभी तस्वीरें मनोज गुप्ता की

अशोक वाजपेयी

ओम थानवी

तसलीमा नसरीन, फ्रैंक हुजूर, पवन, रंजन
♦ विनीत कुमार
हंस जैसी पत्रिका के 25 साल के इतिहास को इतने लिजलिजे और पनछोट तरीके से याद किया जाएगा, ये देख-सुनकर भारी निराशा हुई। हम हंस की रजत जयंती कार्यक्रम से लौटकर सदमे में हैं। हंस की वार्षिक संगोष्ठी, हिंदी साहित्य से जुड़ा अकेला कार्यक्रम होता है, जिसका इंतजार हमें मेले-ठेले की तरह कई दिनों पहले से होता है। इसकी बड़ी वजह तो ये है कि हिंदी और मीडिया के वे तमाम भूले-बिसरे चेहरे एक साथ दिख जाते हैं जिनकी हैसियत, जिंदगी और चैनल बदल चुके होते हैं और दूसरा कि संगोष्ठी में कुछ गंभीर बातें जरूर निकल कर आती हैं, जिस पर कि आगे विचार किया जाना जरूरी होता है। अबकी बार तो और भी 25 साल होने पर कार्यक्रम का आयोजन किये जाने का मामला था, सो लग रहा था कि कुछ अलग, बेहतर और गंभीर बातचीत होगी। निर्धारित समय से करीब एक घंटे बाद यानी छह बजे कार्यक्रम शुरू होने पर ये धारणा और भी मजबूत हो गयी कि अबकी बार तो हंस की यादगार संगोष्ठी होने जा रही है। वक्ता के तौर पर अकेले नामवर सिंह को अपनी बात रखनी थी, तो हम निश्चिंत थे कि हर साल से अलग इस बार एक-दूसरे से नूराकुश्ती होने के बजाय एक रौ में सिर्फ उन्हें ही सुनने को मिलेगा। लेकिन…
कार्यक्रम की शुरुआत की औपचारिक घोषणा के साथ ही हमारी सारी उम्मीदों पर अजय नावरिया ने पानी फेर दिया। घर जाकर ईमानदारी से अगर वो इस पर सोच रहे होंगे कि उन्होंने ज्यादा बोल दिया और पता नहीं क्या-क्या बोल दिया, तो तैयारी के साथ संयमित और संक्षिप्त बोलने के अभ्यास का मन जरूर बना रहे होंगे। उन्हें ऐसा करने में शायद लंबा वक्त लगे। उन्होंने कार्यक्रम की भूमिका ही कुछ इस तरह से रखी कि लगा कि आगे का सारा मामला बहुत ही बोझिल होने जा रहा है। राजेंद्र यादव स्कूल से दीक्षित हुए अजय नावरिया ने इस बात का बार-बार दावा किया कि हंस जैसी पत्रिका ने साहित्यिक लोकतंत्र बहाल किया। लेकिन यादवजी के स्कूल से निकले इस शख्स की भाषा और प्रयोग किये गये शब्द इतने सामंती, मर्दवादी ठसक, बजबजाये हुए, परंपरागत और घिसे-पिटे होंगे, इसे सुनकर मेरी तरह लोगों का भी कलेजा छलनी हो रहा होगा। आज से ठीक दो साल पहले जब नामवर सिंह ने हंस के युवा विशेषांक और अजय नावरिया के संपादन का लगभग माखौल उड़ाते हुए दोहा पढ़ा था – ‘नये युग का नया नजरिया, पेश कर रहे हैं अजय नावरिया’, तो हमें नामवर सिंह पर भारी गुस्सा आया था। गुस्सा तब और बढ़ गया, जब उन्होंने राजेंद्र यादव को लगभग आगाह करने के अंदाज में कहा था – इन लौंडों को ज्यादा सिर पर न चढ़ाओ, ये तुम्हारे किसी काम नहीं आएंगे, काटकर ले जाएंगे और तुम्हें पता तक नहीं चलेगा। लेकिन इस बार जब अजय नावरिया का मंच संचालन देखा और उसमें लगातार आत्मश्लाघा के अंदाज में खुद को प्रोजेक्ट करने की छटपटाहट देखी, तो लगा कि बाबा ने उस वक्त शायद ठीक ही कहा था।
अतिलोकतांत्रिक परिवेश की उपस्थिति कई बार कैसे उच्छृंखलता और उथलेपन में तब्दील हो जाती है, ये साफ तौर पर झलक जा रहा था। दूसरा कि ये सही है कि राजेंद्र यादव स्कूल ने आलोचना की धार के आगे तारीफ करने की कला नहीं सिखायी लेकिन अजय नावरिया ने वाजिब तरीके से तारीफ करने की कला को चमचई और चाटुकारिता के पर्याय के तौर पर कैसे सीख लिया, ये अलग ही गंभीर मसला है। राजेंद्र यादव को लेकर वो जिस तरीके से बात कर रहे थे, उससे हम न केवल बोर हो रहे थे बल्कि खुद राजेंद्र यादव बहुत ही असहज महसूस कर रहे थे और उन्हें बार-बार ऐसा करने से रोक रहे थे। लेकिन अजय नावरिया उनके इस संकेत का विस्तार थेथरई में कर जाते हैं और सुन लीजिए, सुन लीजिए कहकर आगे भी जारी रहते हैं।
मामला तब हद के पार हो जाता है जब वो राजेंद्र यादव की तुलना सुकरात से करने लग जाते हैं। ये पूरे कार्यक्रम का बड़ा ही भद्दा हिस्सा था। राजेंद्र यादव के बारे में वो कुछ इस तरह से बातें कर रहे थे जैसे कि उम्र ढल जाने पर लोग घर के बूढ़े-बुजुर्गों से मजे लेने लग जाते हैं। माफ कीजिएगा, इतने बड़े मंच से राजेंद्र यादव से मजे लेने के अंदाज में अजय नावरिया ने जिस तरह से परिचय कराया, उससे इस संगोष्ठी के स्तर में काफी गिरावट आयी। आपसी बातचीत का मामला अलग होता है लेकिन संगोष्ठी की अपनी एक गरिमा होती है, जो कि उन्होंने पूरी तरह खत्म कर दी।
तीसरी बात कि इस मौके पर हंस से जुड़े लोगों जिनमें कि कार्यालय के लोग भी शामिल थे, उन्हें सम्मानित किया गया। सम्मान के तौर पर किसे क्या दिया गया, ये सार्वजनिक तौर पर बताकर उन्हें भले ही लग रहा होगा कि उन्होंने एक बार फिर लोकतांत्रिक सोच का परिचय दिया है लेकिन ऐसा करते हुए अजय नावरिया भूल गये कि खैरात देने और सम्मानित करने की भाषा अलग होती है।
बहरहाल, संचालन के नाम पर अजय नावरिया ने लंबे-लंबे पकाऊ संस्मरण और चमचई के अंदाज में राजेंद्र यादव को हंस के 25 साल के अनुभवों को साझा करने के लिए आमंत्रित किया।
राजेंद्र यादव को बोलने में अब काफी तकलीफ होने लगी है और जब वो लंबी-लंबी सांस लेते हुए बड़ी मुश्किल से बोल रहे थे, तो हमें ग्लानि और बेचैनी हो रही थी कि हम फिर भी उनसे सुनने के लिए बेचैन हो रहे हैं। राजेंद्र यादव ने जो कुछ भी कहा, वो हंस के संपादक की हैसियत से उसका ईमानदार आत्मकथन था…
हमने इतने सालों में क्या कमाल किया, क्या झंडे गाड़े, मेरा इस पर बोलना उचित नहीं है, बाकी लोग बोलते रहेंगे लेकिन कुल मिलाकर मैं बहुत खुश नहीं हूं। हंस निकालने के पहले मेरी योजना कंस निकालने की थी जो कि अब भी है…
इस तरह से अपनी बातचीत की शुरुआत करते हुए उन्होंने हंस निकालने की योजना कैसे बनी, क्या परेशानियां आयीं और मकान-मालिक से लेकर पाठकों तक ने किस तरह से मदद की, इस संबंध में बातें की। राजेंद्र यादव का उदास मन से निकला वक्तव्य दरअसल जुलाई के हंस के संपादकीय में कही गयी बातों का दोहराव ही था और जो लोग घर से पढ़कर इसे गये थे, उन्हें महसूस हो रहा होगा कि यादवजी ने कुछ नया नहीं कहा।
सम्मान के दौरान अर्चना वर्मा को बोलने के लिए आमंत्रित किया गया।
अर्चना वर्मा ने बहुत ही कम समय में जिस एक संस्मरण का जिक्र किया, उसकी चर्चा जरूरी है। वो हंस के स्त्री विशेषांक का संपादन कर रही थीं और उन्होंने राजेंद्र यादव की ही रचना को लौटा दी। आगे चलकर अर्चना वर्मा का जब भी परिचय कराया जाता, तो कहा जाता कि इन्होंने राजेंद्र यादव की रचना लौटा दी थी। अर्चना वर्मा ने कहा कि इसका श्रेय मेरे निजी साहस से ज्यादा इस बात को जाता है कि हंस में राजेंद्र यादव ने कैसा लोकतांत्रिक माहौल तैयार किया था। इस तरह के प्रसंगों को खोज-खोजकर और हर बात के पीछे हंस के ऊपर लोकतंत्र की वर्क छिड़कने की बचकानी कोशिशें अजय नावरिया लगातार कर भी रहे थे… ऐसा प्रोजेक्शन शायद राजेंद्र यादव के न चाहते हुए भी हंस की परंपरा का हिस्सा बन गया हो।
गौतम नवलखा भी हंस की शुरुआत के दिनों में जुड़े थे और उन्हें भी मंच पर बिठाया गया था। उन्होंने कहा कि राजेंद्र यादव की ये बात अक्सर याद आती है कि हंस में छपने के लिए तुम्हें हिंदी में लिखना होगा, भले ही तुम जैसे-तैसे लिखो, गलतियां होती हैं, होने दो और मेरी हिंदुस्तानी भाषा के प्रति दिलचस्पी बढ़ी… वैसे गौतम नवलखा बहुत ही अच्छी और प्रभावित करनेवाली हिंदी बोल रहे थे।
टीएम ललानी जो हंस से जुड़े लोगों को सम्मानित करने के लिए विशेष तौर पर आमंत्रित किये गये थे, उनके बारे में बताया गया कि अपने रोजगार, राजनीति और दुनियाभर के ताम-झाम के बीच भी हंस और राजेंद्र यादव से उनके रिश्ते जीवंत बने रहे। राजेंद्र यादव ने कहा कि हालांकि ये दूसरे धार्मिक कार्यक्रमों के लिए जितनी उदारता से दान और चंदे देते रहे हैं, उतनी उदारता से हंस के लिए नहीं, लेकिन भावनात्मक स्तर का सहयोग लगातार बना रहता। ललानी साहब ने मंच से एक बात कही और इस बात का व्यक्तिगत तौर पर मुझ पर बहुत ही अलग किस्म का असर हुआ। मैं अभी भी इस संदर्भ से अपने को अलग नहीं कर पा रहा हूं। ललानी ने कहा कि आज मन्नू भंडारी को भी सम्मानित किया जाना चाहिए था, हम अब भी कर सकते हैं। उनके ऐसा कहने पर हमने नजरें घुमायी। सबसे आगे की कतार में बैठीं मन्नू भंडारी ने हाथ जोड़ दिये। हमें मन्नू भंडारी के मंच तक आने का रत्तीभर भी इंतजार और भरोसा नहीं था और ऐसा करके उन्होंने आपका बंटी, त्रिशंकु और महाभोज जैसी रचनाएं पढ़कर जो छवि हमारे मन में उनके प्रति बनी थी, उसे ध्वस्त होने से बचा लिया। इस संदर्भ में सारा आकाश मंच से खिसककर मन्नू भंडारी की झोली में छिटक गया था। हमें भीतर से एक टीस के बावजूद सुकून मिला।
जनसत्ता के अपने कॉलम कभी-कभार में अशोक वाजपेयी ने लिखा कि हंस पत्रिका की बाकी सामग्री जिस तरह से पढ़ी जाती थी, उसी तरह से संपादकीय भी, बाकी की पत्रिकाओं के संपादकीय इस तरह से नहीं पढ़े जाते थे, उस पत्रिका का कार्यक्रम बहुत ही बेतरतीब सा लगा। जहां-तहां से बिखरा हुआ और लोगों के बोलने में कहीं से कोई पूर्व तैयारी नहीं। हमने ऊपर इसलिए पनछोट शब्द का इस्तेमाल किया। एक तो सम्मानित किये जानेवाले कई लोग इस मौके पर नहीं आये, आसपास की खुसुर-पुसुर से निकलकर आ रहा था कि काफी लोग नाराज भी हैं। अब हमारी सारी उम्मीदें नामवर सिंह पर टिकी थीं और लग रहा था कि इन्होंने अगर उम्मीद के मुताबिक बोल दिया तो सारा मामला सहज हो जाएगा।
मेरे दुश्मन राजेंद्र यादव और हंस के प्रिय पाठकों… नामवर सिंह के इस संबोधन के साथ ही सभागार की डूबती नब्ज में अचानक से हरकत आ गयी। उबासी ले रहे श्रोता सतर्क हो गये और गौर से सुनने लगे…
ये आयोजन वैसे तो हंस के 25 साल पूरे होने का है, लेकिन ऐसा लगा रहा है कि ये हंस का नहीं बल्कि 82 साल के राजेंद्र यादव का जन्मदिन मनाया जा रहा है, ये बात शायद आप भी महसूस कर रहे होंगे। हंस और राजेंद्र यादव यहां आकर पर्याय हो गये है। खैर, बिना किसी आर्थिक मजबूती के इस तरह से पत्रिका निकलती रही, इसके लिए मैं सिर झुकाता हूं। राजेंद्र यादव के आगे नहीं, हंस के आगे…
नामवर सिंह ने बताना शुरू किया कि जिस हंस की शुरुआत प्रेमचंद ने 1930 में की, आगे जब पत्रिका बंद हो गयी, तो इसे दोबारा शुरू करने की हिम्मत अमृत राय ने भी नहीं की। बाद में माधुरी, सारिका जैसी दुनियाभर की पत्रिकाएं शुरू हुईं लेकिन हंस की तरफ किसी का ध्यान नहीं गया। कमलेश्वर अपने को तीसमार खां समझते थे, बाद में द टाइम्स ऑफ इंडिया की पत्रिका से जुड़े लेकिन हंस का कोई ध्यान नहीं आया। ये बड़ी ही हैरान करनेवाली बात है कि हंस का कहीं कोई नामलेवा नहीं, ये नाम किसी को ध्यान में नहीं आया कि दोबारा इसे शुरू किया जाए। राजेंद्र ने अक्षर प्रकाशन से किताबें निकालने के साथ, बिना किसी स्थायी साधन के 1986 में हंस निकालने का इरादा किया। कहा कि अब हंस निकालेंगे। इस आदमी की हिम्मत देखिए कि सिर्फ निकाला ही नहीं बल्कि 25 सालों तक चलाया भी। हिंदी में ये बात स्वर्ण अक्षरों में लिखी जाएगी। ये सिर्फ हंस की नहीं, राजेंद्र यादव की भी जयंती है।
नामवर सिंह ने जिस ऐतिहासिक मोड़ से हंस की साहित्यिक पत्रकारिता के बारे में बताना शुरू किया, तो लगा कि मामला बहुत आगे तक और बहुत ही गंभीर तरीके से जाएगा लेकिन नामवर सिंह इसकी लीक छोड़कर दूसरे सिरे की तरफ मुड़ गये।
अशोक वाजपेयी तो कविता के अलावा किसी दूसरी चीज को साहित्य मानते ही नहीं, पढ़ते भी हैं तो अंग्रेजी लेखकों को लेकिन ये राजेंद्र यादव और हंस का ही लोकतंत्र है कि उसने अशोक वाजपेयी से भी हंस पर लिखवाया। अशोक वाजपेयी ने तो कभी पूर्वग्रह में राजेंद्र यादव को नहीं छापा। नया ज्ञानोदय और हंस के बीच सौतिया डाह है और रवींद्र कालिया भी बहुत खुश नहीं रहते हैं लेकिन मौजूदा अंक में उनसे भी लिखवाया। अखिलेश जो कि तद्भव जैसी पत्रिका बड़ी मेहनत से निकालते हैं, राजेंद्र से असहमति रखते हैं, उन्हें भी हंस के इंस अंक के लिए लिखवाया और असहमति में ही सही लिखा। निंदक नीयरे राखिए, आंगन कुटी छवाय वाली जो बात कबीर ने कभी कही थी, उस पर इस पत्रिका और राजेंद्र यादव ने व्यावहारिक तौर पर अमल किया। ये लोकतंत्र है।
नामवर सिंह राजेंद्र यादव को लेकर जो बोल रहे थे, वो भी उनकी तारीफ ही थी लेकिन वो अजय नावरिया की तरह फूहड़ नहीं थी। आलोचना के साथ-साथ तारीफ करने की भी शैली नामवर सिंह से सीखी जानी चाहिए।
शुरू के डेढ़ दशक में पत्रिका ने बहुत ही तेवर के साथ काम किया। लेकिन उसके बाद ढलान आने लग गयी। ऐसा होता है। हर कोई ढलान की तरफ बढ़ता है। आगे हम या राजेंद्र यादव ही पता नहीं ये बात कहने के लिए रह जाएंगे भी या नहीं। जीव-जंतुओं की तरह पत्रिका को भी कई योनियों से होकर गुजरना पड़ता है। हंस भी उसी तरह से गुजरा। उसे कभी कौआ बनना पड़ा, कभी बगुला और कभी कुत्ते की तरह चौकस रहना पड़ा। मुझे लगता है कि हंस में तीन योनि – कौआ, बगुला और कुत्ते के गुण हमेशा मौजूद रहे। मैं आप नये लोगों से एक बार फिर कहूंगा कि इस भीष्म (राजेंद्र यादव) के पास अभी भी मौका निकाल कर जाइए – लेकिन कहानी छपवाने के लिए नहीं, कहानी लिखने की कला सीखने के लिए।
नामवर सिंह पिछले दो-तीन बार से अपने आगे होने न होने की बात करने लगे हैं, एक बहुत ही भावनात्मक अप्रोच के साथ। राजेंद्र यादव के संदर्भ में उन्होंने इसी लहजे में बात कही। चलते-चलते उन्होंने कुछ इस तरह से कहा…
जो हो सकता है इससे वो किसी से हो नहीं सकता
मगर देखो तो जो हो सकता है, वो आदमी से हो नहीं सकता।
नामवर सिंह को सुनना अच्छा लगा लेकिन बहुत फायदेमंद नहीं रहा। खासकर उनलोगों के लिए जो कि साहित्यिक पत्रकारिता और हंस शीर्षक को ध्यान में रखकर सुनने आये थे। अशोक वाजपेयी पर ली गयी चुटकी, रोचक प्रसंग और काक चेष्टा जैसे सहज श्लोक से लोगों का ध्यान जरूर खींचा लेकिन जिस मुद्दे पर हम उनसे गंभीर व्याख्यान की उम्मीद कर रहे थे, ऐसा कुछ भी नहीं कहा। हंस ने किस तरह के विमर्श पैदा किये, उस समय की बाकी पत्रिकाएं क्या कर रही थीं, हिंदी पत्रिका का मुख्य स्वर क्या था, इन सब मसले पर कोई बात नहीं की। इस लिहाज से नामवर सिंह के व्याख्यान से कुछ निकल कर नहीं आया, हां थोड़े समय के लिए स्वस्थ मनोरंजन जरूर हो गया। नामवर सिंह अगर कायदे से साहित्यिक पत्रकारिता पर बोलते तो कुछ नहीं तो विश्वविद्यालय में हर साल 10-20 नंबर के सवाल का जवाब हल करने में मीडिया के छात्रों को मदद मिलती, लेकिन वैसा भी नहीं हो सका।
कुल मिलाकर देखें तो इस संगोष्ठी का निष्कर्ष ऐसा कुछ भी नहीं रहा, जिससे हम भरा-भरा महसूस कर पाते। हम इस उम्मीद में थे कि हंस ने 25 साल में जो बहसें खड़ी की हैं, जो विमर्श पैदा किये हैं, उस दौर में जो संपादकीय आये और उसे लेकर जो हंगामा खड़ा हुआ, उन पर पर संक्षेप में ही सही, बात होती लेकिन ऐसा कुछ भी नहीं हुआ। हंस ने कितने कहानीकार और लेखक पैदा किये, लेकिन एक का भी कहीं कोई जिक्र नहीं। सामयिकता का मोह हंस के इतिहास को इतनी जल्दी बिसार देगा, इसकी कल्पना हमें नहीं थी। वो सारे लोग और उनकी चर्चा सिरे से गायब थी, जिन्हें हमने नब्बे के दशक में पढ़ा। इस मौके पर राजकमल की ओर से तीन किताबों… 1) पचीस वर्ष पचीस कहानियां | शृंखला संपादक : राजेंद्र यादव | संकलन-संपादक : अर्चना वर्मा, 2) हंस की लंबी कहानियां | शृंखला संपादक : राजेंद्र यादव | संकलन-संपादक : अर्चना वर्मा, 3) मुबारक पहला कदम (हंस में प्रकाशित कथाकार की पहली कहानी) | शृंखला संपादक : राजेंद्र यादव | संकलन-संपादक : संजीव का लोकार्पण जरूर हुआ लेकिन इस पर कोई बात नहीं हुई। हम हंस की साहित्यिक पत्रकारिता के सफर को सुनने गये थे लेकिन हमें मौजूदा हंस बहुत ही बेतरतीब नजर आया, इतिहास की तो बात ही छोड़िए।
हंस की संगोष्ठी के लिए ये गर्व और संतोष देनेवाली बात होती है कि बिना कोशिश के जो श्रोताओं का हुजूम चला आता है, मीडिया, संस्कृति और साहित्य से जुड़े जिस तरह से लोग आते हैं, उनके बीच बहुत गंभीरता से कई मसले पर साझा-विमर्श किया जा सकता है लेकिन हंस की गोष्ठी इन श्रोताओं के होने का फायद नहीं उठा पाती। उनके बीच बात रखने से शायद असर भी हो लेकिन वो अक्सर चूक जाते हैं। ऐसे श्रोताओं को जुटाने में अच्छे-अच्छे आयोजकों के पसीने छूट जाते हैं। हंस को इन श्रोताओं का लाभ लेते हुए संगोष्ठी को गंभीर शक्ल देने की जरूरत है।
चलते-चलते हंस को एक सुझाव कि अब उसे प्रेमचंद जयंती के नाम पर संगोष्ठी आयोजन करने का दावा छोड़ देना चाहिए। जब आप ढाई-तीन घंटे की संगोष्ठी में सालों से एक बार भी प्रेमचंद और उनकी परंपरा का नाम तक नहीं लेते, तो उनके नाम पर संगोष्ठी आयोजित करने का क्या लाभ?
(विनीत कुमार। युवा और तीक्ष्ण मीडिया विश्लेषक। ओजस्वी वक्ता। दिल्ली विश्वविद्यालय से शोध। मशहूर ब्लॉग राइटर। कई राष्ट्रीय सेमिनारों में हिस्सेदारी, राष्ट्रीय पत्र-पत्रिकाओं में नियमित लेखन। हुंकार और टीवी प्लस नाम के दो ब्लॉग। उनसे vineetdu@gmail.com पर संपर्क किया जा सकता है।)
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मुझे पूरा विश्वास था कि आपकी रपट सबसे पहले आएगी और आई भी (मजेदार यह कि आपकी इस रपट तक मैं गूगल खोज पर कुछ खोजते हुए पंहुचा हूँ!)
और आपने हंस के उस जलसे पर नामवर के कहे को याद किया तो मुझे हमारी और आपकी बहस की भी याद आ गई
रपट तो पाठकों के सामने है,उम्मीद है पाठक भी टिप्पणी के रूप में इसमें इजाफा करेंगे. मैं खुद भी कर्ता लेकिन पिछले ५ घनते से मैं भी इसी कार्यक्रम कि एक रपट बनाए में लगा हूँ. उसे ही मेरा कमेन्ट समझियेगा
पुनश्च: – आपने जो शेर उद्धृत किया है उसमें त्रुटि है.
भाई रंगनाथ,सही शेर टाइप कर दें कमेंट के तौर पर ताकि दुरुस्त कर सकें
नामवर सिंह पर आप कुछ ज्यादा ही रीझ गये हैं विनीत। क्या आपने सोचा कि नामवर जी इस आयोजन में इतने अगंभीर ढंग से क्यों बोले? यह अनायास तो नहीं ही था। मैं इसे हंस के योगदान का उपहास करने की उनकी गंभीर कोशिश के रूप में देखता हूं।
और, क्या यह बेहतर होता कि हंस के कार्यक्रम में राजेद्र यादव मन्नू जी को सम्मानित करवाते? जरा खुले मन से सोचिए। मन्नू जी कार्यक्रम में आयीं थीं, आगे की पंक्ति में बैठीं थी हंस के शुभचिंतकों से बातचीत कर रही थीं। उनके मंच पर न आने को उनकी शालीनता कहिए लेकिन कृपया इसे कोई और रंग देने की कोशिश न कीजिए। मन्नू जी के कंघे पर बंदूक रखकर हंस और राजेंद्र जी द्वारा खडे किये गये विमर्शों को ध्वस्त करने की कोशिश में कम से कम आप शामिल नहीं होंगे, ऐसी उम्मीद मुझे है।
अजय नावरिया आज की तारीख में सबसे बड़ा साहित्यिक दलाल है। हंस में क्या छपना है क्या नहीं ये अब राजेंद्र यादव नहीं बल्कि नावरिया तय करता है। राजेंद्र यादव की तरफ से उन्हें खुली छूट है क्योंकि इस लिजलिजे बूढ़े को शराब और शबाब की तलब के लिए एक एजेंट तो चाहिए न। मेरी भाषा थोड़ी आपत्तिजनक लग सकती है…लेकिन राजेंद्र यादव का चरित्र घोर पतित है और इतना पतित आदमी साहित्य जैसी पवित्र चीजों का संरक्षक नहीं हो सकता। आप पता लगा लीजिए…विनीत चाहें तो खुद भी…हंस में कहानी छपवानी हो तो नावरिया से सेटिंग करनी पड़ती है। क्योंकि इस धृतराष्ट्र का दुर्योधन यही नावरिया है। राजेंद्र हर जगह इसकी तारीफ करते हैं…पुरस्कार दिलवातें हैं…लेकिन भूल जाते हैं…एक दिन उनके कुकर्मों की भी लिखी जाएगी। आज हम भले ही उन्हें साहित्य का संरक्षक कहकर याद कर लें…लेकिन एक दिन गूगल पर राजेंद्र यादव टाइप करने पर विकिपीडिया पर ये लिखा मिलेगा…कि इसी आदमी को भारत में हिंदी साहित्य के पतन के लिए जिम्मेदार माना जाता है।
sharab or shabab k leye pagal to ye sab ha hi isi karan ye sab sirf theroy hi hankte rehe prectical kisi k bas ka nahi ha sab ek se bad kar ek ha rehi baat kisi k mahan kisi k baimaan kahlane ki to jinka chapa unke leye ‘mahan’ jinka nahi unke leye ——-
इस संगोष्ठी के सञ्चालन के लिए अगर कोई व्यक्ति सबसे अनुपयुक्त हो सकता था तो वे अजय नावरिया थे. मुझे डर है कि उनकी क्लास में बचे-खुचे बच्चे उन पर पीछे से कागज के हवाई जहाज न फेंकते हों.
राजेन्द्र जी ने शुरू में ही जो बातें कहीं उनके खुलासे के लिए किसी ने उनसे अनुरोध नहीं किया, नावरिया तो खैर क्या करते. उन्होंने कहा कि आज वे बहुत प्रसन्न या संतुष्ट नहीं हैं, और यह कि उनमें अपराध का बोध हो रहा है. उन्होंने तोल्स्तोय कि कहानी का जिक्र करते हुए कहा कि आदमी को अपने लिए कितनी जमीन चाहिए, सिर्फ ढाई गज.
खुदा राजेद्र जी को खूब अच्छी सेहत और लंबी उम्र दे. (यह सब सुनकर मैं बहुत डर गया हूँ)
@विनीत, मन्नू जी के बारे आपके लिखने का ढंग अच्छा लगा.
निहायत सलीके और बड़े करीने से आपने उनका मूल्यांकन किया.
आपको धन्यवाद.
ईमानदारी से बता रहा हूँ विनीत जी, मुझे ये रपट बहुत अच्छी लगी. खासकर एक शब्द— पनछोट. लोक के शब्दों को पुनर्जीवित करने पर आपको विशेष बधाई. इस तारीफ को अजय नावारियात्मक कतई न समझा जाये. गोष्ठी में जा नहीं पाया, इसका मलाल काफी हद तक दूर हो गया ये रपट पढ़ कर. आपका शुक्रिया.
कल ‘हंस’ के वार्षिक समारोह में अजयजी नावरिया ने संचालन करते हुए हुए श्रोताओ को बताया कि क्यों साईकिल पर चलने वाले हंस के एक कार्यालय सहायक साथी को शॉल की जगह एक जोड़ा शर्ट और पैंट देकर सम्मानित किया जा रहा है, लेकिन अपने संचालन में वे यह बताने में चूक कर गए कि अर्चना जी वर्मा को शॉल की जगह साड़ी देने के पीछे की वजह क्या रही????
बना रहे बनारस
http://www.banarahebanaras.com/2011/08/blog-post.html
हम्म…विनीत भाई संपादक तक अन्य माध्यम से सही शे’र पहुँच गया है उम्मीद है वो यहाँ भी दुरुस्त कर देंगे. उस वक्त मै किसी और ही धुन में था…पोस्ट पर भी सरसरी नजर ही डाली थी..
आपका ध्यान दिलाना चाहूँगा कि, अर्चना वर्मा के कथन को आपने जिस तरह कोट किया है वह मिसकोट ही है. अर्चना जी कि चुटकी का आशय कुछ यूँ था कि राजेंद्र जी लेख वापस करने कि बात का खूब प्रचार करते रहे लेकिन उद्देश्य ये जाताना था कि देखो मैं कितना जनतांत्रिक हूँ…
एक तस्वीर तो राजेंद्र यादव की भी लगनी चाहिए थी. कल उनका और उनके हंस का दिन था भाई…
hans ki 25vi saalgirah ki rapat ka intjaar tha. lakin jo kuchh aapne likha hai usko padkar nirasha hui. es kathin aur sankrman kal mai ek sanjeeda bahas to hone hi chhiye the, absar chahe koi bhe hota.
प्रमोद रंजन – लगता है आप नामवर से कुछ ज्यादा ही खीझ गए हैं…खीझते रहिये…
और ये मन्नू जी पर आपने जो प्रवचन दिया है उसे स्पष्ट करेंगे ?? जरा हम भी तो जाने कि आपके नजरिये से मन्नू जी के लिए क्या बेहतर होता ??
जिस मंच पर नामवर समेत तमाम लोग सम्मानित हुए उस मंच पर मन्नू जी सम्मानित होती तो क्या अनर्थ होता ??
@Ashish
आपका सवाल वाजिब है अंशु। सम्मान प्रतीकात्मक ही होते हैं, ऐसे में साडी जैसे प्रतीक का चुनना सन्न कर देने वाला है, विशेषकर हंस जैसी पत्रिका के लिए, जो अपने आपमें स्त्री आंदोलनों की अगुवा संस्था है। इसकी आलोचना को किसी भी रूप में टाला नहीं जा सकता। हंस के कुछ अन्य कर्मचारियों को शर्ट-पैंट देने भी भद्दा व्यवहार था।
कोई अनर्थ नहीं होता अमन जी।
कार्यक्रम में बहुत सारे लोग मौजूद थे, जिनका सम्मान अगर किया जाता तो कोई अनर्थ नहीं होता। तस्लीमा नसरीन का भी सम्मान नहीं होना चाहिए था। या निर्मला जी का। या, हर उस लेखक का जो कार्यक्रम मौजूद था, और जिसका हंस के निर्माण में जरा सा भी योगदान था??
क्या राजेंद्र जी की बेटी का भी सम्मान किया जाता तो अनर्थ हो जाता?
वह भी लिखती हैं और एक लेख में तो मुझे याद है उन्होंने राजेंद्र जी और हंस को बहुत बोल्ड तरीके से डिफेंड किया था।
हंस का रजत जयंती समारोह इतना बेस्वाद रहेगा इसकी उम्मीद नहीं थी मुझे…पर अभी भी मुझे इस कार्यक्रम में ना जा पाने का मलाल है. राजेंद्र यादव पर यहां पहले ही काफी कुछ कहा जा चुका है. नामवार भी शायद अपने सधे शब्दों में बहुत कुछ कहने का प्रयास कर रहे थे. इस शानदार रिपोर्ट के लिए आपको बधाई विनीत जी.
@Aman
कुछ गाली गलौच हो तो ‘वचन’, नहीं हो तो ‘प्रवचन’! अच्छा है यार।
@Pramod Ranjan:सम्मान के लिए चयन की गई वस्तु को मैं आयोजकों का विशेषाधिकार मानता हूँ, यह सम्मान पुष्प गुच्छ मात्र देकर भी किया ज सकता है, सवाल तरिके का है प्रमोद भाई… वास्तव में ‘खैरात’ के लहजे में आप सम्मान दें तो अच्छा है आदमी बे ‘सम्मान’ ही रहे. अर्चना वर्मा का जिक्र मात्र इसलिए करना पड़ा क्योंकि एक साथी को शॉल ना दिए जाने की वजह उसकी शर्ट-पैंट की अधिक जरुरत बताई गई थी, अर्चना वर्मा पर यह फार्मूला फीट नहीं बैठता था, सो पूछ लिया कि उन्हें शॉल ना दिए जाने के पीछे क्या मजबूरी थी.???
@ ashish ji aur pramod ji
sabhi ke samman ke liye shawl hi rakha gaya tha..lekin sabhi ne apni awasyktanusar cheejon ko maag liya..aur rajendra ji ne unki echchha ka samman bhi kiya..
शाम ए रंगीनियत अब ना पूछ आई और आ के यूँ निकल गई
समझदारी थी कि फिर बहल गई, होशियारी थी कि फिर संभल गई
जब तुझे देख लिया, सुबह महक महक उठी
जब तेरा ज़िक्र सुन लिया, रात मचल मचल गई
दिल से तो हर मुआमलात करके चले थे साफ वो
आने तक सबके सामने, बात बदल बदल गई
बढ़िया रिपोर्ट, प्रेमचंद के जन्मदिन पर हंस और राजेंद्र यादव के इस अलोकतांत्रिक जलसे में नाम मात्र का सवाल-जवाब का दौर होने और एक ही सवाल के बाद इस दौर का भी खात्मा कर देने का ज़िक्र रह गया.
विनीत जी इतनी शानदार और जीवन्त रिपोर्ट के लिए बधाई। कल कार्यक्रम में मैं भी नही जा पाई थी। पर आपकी रिपोर्ट पढकर लगा जैसे मैने वहां के एक-एक पल को देख लिया।
@Pratibha Ji: इसका अर्थ है कि अर्चना जी ने स्वयं हीं अपने लिए साड़ी की मांग रखी थी???? अगर ऐसा था तो जिस तरह अजय जी ने शर्ट-पैंट की घोषण की वैसे यह बात भी बतानी चाहिए थी!
@Pratibha
फिर भी प्रतिभा जी…
कृपया राजेंद्र जी से पूछे क्या उन्हें अब भी नहीं लग रहा कि इसमें कुछ आपत्तिजनक है? जरूरत का तर्क यहां नहीं चल सकता। ‘सम्मान’ जरूरतमंद को नहीं दिये जाते। न ही इस तरह के समारोह किसी की जरूररत पूरा करने का माध्यम हो सकते हैं। वह दान होगा, सम्मान नहीं।
राजेंद्र यादव जी अपनी गलतियों को स्वीकार करते रहे हैं। वे अगर इसके लिए हिंदी समाज से माफी मांग लेंगे तो यह न सिर्फ उनका बडप्पन होगा, बल्कि हंस पर लगा एक दाग भी मिट जाएगा।
प्रमोद भाई से सहमत, वास्तव में सम्मान भी पाने वाले से पूछ कर नहीं दिया जाता… दान, खैरात और ‘सम्मान’ में कुछ तो फर्क होना ही चाहिए….
हंस के अगले अंक में उत्तराखंड के मुख्यमंत्री रमेश पोखारियल निशंक की कहानी छ्प रही है. निशंक जी सम्प्रदैक सोच के भ्रष्ट मुख्यमंत्री हैं. राजेंद्र जी की धर्म निरपेक्षता जिंदाबाद. जय हो
किसी भी पत्रिका में उसके संपादक के व्यक्तित्व की छाप होती है, लेकिन हंस पर आजकल राजेंद्र यादव जी की छाप नहीं दिखती तो क्या उस पर कार्यकारी संपादक संजीव जी की छाप है. वैसे कोई बता सकता है की क्यों आजकल पढ़े लिखे और सयाने (समझदार) लोग हंस नहीं पढ़ते? ऐसे लोग साहित्य अमृत भी नहीं पढ़ते.
प्रमोद रंजन, आपके स्वस्थ तो हैं ?? रचना,निर्मला जी और तस्लीमा का नाम उछल कर मुद्दे को गोल-मोल क्यूँ बनाना चाहते हैं ??
राजेंद्र जी ने हंस कि परिकल्पना से जुड़े हर शाख को सम्मानित किया..जिनके साथ शाम कि बैठकों में हंस कि रुपरेखा पर ‘डिस्कसन’ हुआ था…..लगता है कि मन्नू जी उस डिस्कसन जैसा भी कोई योगदान नही था !!
आप भूल रहे हैं की इस बात को एक गैर-साहित्यिक व्यक्ति ने मंच पर उठाई,और किसी ने इस पर बात नही की. लालानी जी मन्नू और राजेंद्र के पारिवारिक मित्र थे. उनके हंस के मंच के होने कि यही एकमात्र वजह थी. राजेंद्र यादव ने नही,लालानी ने सबको बतया कि उनका राजेंद्र यादव परिवार कि तरफ झुकाव होने कि एक बड़ी वजह मन्नू जी का राजस्थानी होना भी था.
जिसने राजेंद्र जी को घर चलाने की जिम्मेदारी से मुक्त रखा,जिसका अपना लेखकीय जीवन पारिवारिक तनाव के चलते बुरी तरह प्रभावित हुआ, जो राजेंद्र यादव कि संगिनी उस वक्त से है जब आपका जन्म भी नही हुआ था…उस मन्नू की तुलना तस्लीमा और निर्मला जी से का कर रहे हैं…राजेंद्र जी के सन्दर्भ में कोई दूसरी स्त्री मन्नू जी का स्थान ले सकती है क्या ??
और आपको वचन-प्रवचन पर जो इल्हाम हुआ है उस पर यही कहूँगा कि गाली आपने दी है और बहुत गन्दी दी है. मन्नू जी के प्रसंग पर आपके वचन गली से कम नहीं है.
@ अमन : तुम कहना क्या चाहते हो? क्या वह कोई पारिवारिक आयोजन था, जिसमें मन्नू जी का शामिल होना जरूरी था? राजेंद्र यादव अगर उ्रन्हें सम्मानित करते तो तुम्हारे जैसा ही कोई मूर्ख यह भी कहने लगता कि अपनी पत्नी सम्मानित किया और अलां को नहीं किया, फलां को नहीं किया। हंस में मन्नू अधिक छपी हैं या मैत्रेयी पुष्पा। और क्या मन्नू भंडारी जैसी बडी लेखिका अपने पति द्वारा चलायी जा रही पत्रिका के सम्मान की मुखाक्षेपी होगी?
As an economic historian, I take Hindi literature as a source material, but I am utterly disappointed. It does not reflect the present realities nor does it tell me in an analytical way what has happened in economy, social and cultural life and politics of this country since Independence. Hindi writers and literary journalists are in the age of Premchand.
Our village has changed, agriculture has undergone a sweeping transformation. Peasant is being rapidly pushed out by farmer. Two nations– the rich and the poor–have emerged in one country, India, without old reciprocity. Slum areas have widened along with posh ones,and corruption, regional imbalances along economic inequalities have increased. There is a loot of natural resources. Commons are being converted in private property.The nexus of mafia, business, bureaucracy and politicians is dominating.
Financial sector has come to lord over our economy.Capital market is taken as the indicator of economic health. Neoliberalism is the new ideology of the ruling classes.
One does not find these things comprehended by our ‘great’ writers and literary journals. Look at the writings of Dickens, Balzac, Zola, etc. It was not without reason that Marx asked people to read their works, especially of Balzac rather than the writings of social scientists to grasp what had happened during the fifty years after the French Revolution.
Take the writings of Jose Saramago, they analyse the realities in recent times. His novel “Cave” is excellent for understanding globalization. Nothing of this sort can be found in Hindi. Our writers do not even understand the connotations of market and changes in them over time. They are, therefore, chasing a phantom called “bazaarwad”.
If one wants to understand the character of gosthis and participants in them, one must read Arthur Koestler’s novel “The Call Girls”.
“भारत भूसन अग्रवाल” अवार्ड हेतु निर्मला पुतुल की नाम पर सहमती हेतु झारखण्ड के कुछ नामचीन लोगों से राय ली गयी थी, जिस पर लोगों ने अपने स्वार्थ साधते हुए निर्मला पर कई तरह के गंभीर आरोप लगाएं हैं इस पर फ़ोन में मुझसे निर्मला जी ने कही की “मुझे आवार्ड की भूख नहीं पर लोगों की मानसिकता जान कर बड़ा दुःख होता है”.
अगस्त २०११ की ‘सखी’ (मासिक पत्रिका जागरण ग्रुप की है) देखना पेज १०६,१०७,१०८ पर जो कहानी है उस पर मेरी पेंटिंग्स हैं.
सच है कि हंस की गोष्ठी में जैसी तैयारी की लोगों को उम्मीद थी, वह नहीं दिखी और सबसे अजब बात ये रही कि आगे हंस की उड़ान किस आसमान की ओर होगी इस ओर कोई इशारा तक नहीं किया गया। आज सवाल यह है कि क्या हंस अपनी तरह की अन्तिम पत्रिका होगी?या हंस भी आनेवाले समय में उसी ब्लैकहोल में समा जाएगी जिसमें,’पहल’ जैसी बहुत सी पत्रिकाएं समा गयीं।या फिर आने वाले
समय में वह रहेगी पर उसके होने का कोई अर्थ नहीं रहेगा।
रविन्द्र राम…प्रमोद रंजन को भी बोलने का मौका दो….
तुमने जो बका है उससे तुम्हारा साहित्यिक अज्ञान ही जाहिर हुआ है. मन्नू जी को ‘परिवार’ के कोटे से सम्मानित करने कि बात कितनी ओछी है इसका शायद तुम्हे अंदाजा नही है…
मन्नू जी को सम्मानित करने की बात टीएन लालानी ने उनके भूमिका के आधार पर की थी..ना कि इसलिए कि वो राजेंद्र यादव कि पत्नी हैं !! मन्नू जी ने सार्वजानिक और निजी दोनों स्तर पर राजेंद्र यादव और हंस को खड़े होने में योगदान दिया है. अगर तुम्हे यह बात समझ नही आती तो तुम पहले राजेंद्र यादव और मन्नू भंडारी का लिखा संस्मरण इत्यादि पढ़ो. तब तुम समझ पावोगे की किस सन्दर्भ में बात हो रही है. तुम्हे लोगों के कहने कि काफी चिंता है,जबकि लोगों ने वहीँ पर जब लालानी जी के मन्नू जी को सम्मानित करने की बात रखी तो सभागार में बजी पुरजोर तालियों ने
जनता का मत साफ़ कर दिया था कि वो इसमामले में क्या सोचती है.
रही मैत्रेयी पुष्प एवं अन्य की, तुमसे कब और किसने कहा कि वहाँ मंच पर हंस में छापने वालों का भी सम्मान हुआ था या होना चाहिए था !! बौडम ही हो क्या, या तुम्हारे कान बज रहे हैं ??
हंस में लिखने वालों को हंस ने रजत जयंती पर हंस में छपी रचनाओं कि तीन पुस्तकों के माध्यम से सम्मानित किया है. तुम छठे-छमाहे किताब वगैरह पलटते हो तो देख लेना इन इन किताबों में मत्रेयी जी और अन्य छापने वाले मिल जायेंगे…
वैसे ‘मुखाक्षेपी’जैसा भारी शब्द कहा से कॉपी किये ? खैर, तुमको कॉपी करने से फुरसत मिले तो हिन्दी का इतिहास पलट लेना, मन्नू भंडारी सदैव राजेंद्र जी से ज्यादा सम्मान(आधिकारिक,अनाधिकारिक दोनों) पाती रही हैं.
हाँ,तुम्हारे अंदर प्रमोद रंजन कि आत्मा ना घुस गई हो तो जरा उन्हें भी बोलने का मौका दो…
बहुत अच्छा डॉ लाल रत्नाकर जी। जरूर देखेंगे।
आप भी हमारे यहां चांदनी चौक की गली नं 3 में पधारें। हमारी दुकान में भारत का सबसे अच्छा तारकोल मिलता है। सभी मोहल्ला वालों से अनुरोध है कि तारकोल की खरीददारी हमारे ही भारत की नंबर 1 दुकान से करें।
निर्मला पुतुल को भारत भूषण पुरस्कार जरूर मिलना चाहिए। जिंदाबाद। जिंदाबाद।
अमन जी, मन्नू जी को हंस के मंच से सम्मानित किये जाने में भला मुझे या किसी को क्या आपत्ति हो सकती है? मेरा कहना सिर्फ इतना था कि अगर वे मंच पर नहीं आयीं तो इसे हंस से उनके दुराव के रूप में नहीं देखा जाना चाहिए। वे इस आयोजन में पूरे उत्साह के साथ शरीक थीं।
बहरहाल, इस तरह की बहस शायद अनावश्यक ही है। कुछ जरूरी कामों में उलझे होने के कारण मैं अपनी ओर से इस मुद्दे पर बात यहीं बंद करता हूं।
कृपया इसे पलायन मत कहिएगा।
Tum phrastu lag rahe ho vineet.
शाम ए रंगीनियत अब ना पूछ आई और आ के यूँ निकल गई
समझदारी थी कि फिर बहल गई, होशियारी थी कि फिर संभल गई
जब तुझे देख लिया, सुबह महक महक उठी
जब तेरा ज़िक्र सुन लिया, रात मचल मचल गई
दिल से तो हर मुआमलात करके चले थे साफ वो
आने तक सबके सामने, बात बदल बदल गई
बढ़िया रिपोर्ट, प्रेमचंद के जन्मदिन पर हंस और राजेंद्र यादव के इस अलोकतांत्रिक जलसे में नाम मात्र का सवाल-जवाब का दौर होने और एक ही सवाल के बाद इस दौर का भी खात्मा कर देने का ज़िक्र रह गया.
vah,mja aa gya.yadav ji ajay jaisa hi chela paida kr sakate hai.agr chela aisa hai to guru kaisa hoga.vineet vaise aap bevakuf to nahi lagte phir ganv(village)ki nach parti me ja kr clasical music ki chahat kyo rakhate hai.
प्रमोद रंजन जी, आपका यह जवाब संतुष्ट करने वाला है. मै भी इसे राजेन्द्र जी या हंस का दुराव नहीं मानता…
यार आजकल जाली नाम भी सेफ नही है क्या ?? मैं हिन्दी में अमन ला ही रहा था तो ये अंग्रेजी AMAN कौन महारथी ले आया
उसे सादर प्रणाम
विजय जी, आपको भी प्रणाम
डाक साब के चित्रों पर आपका तारकोल भारी पड़ा
नामवर जी ने अशोक वाजपेयी से तो स्कोर सेट कर लिया, लेकिन उनके ही तर्क से पूछा जाना चाहिए कि उन्होंने आलोचना में अज्ञेय को कितनी बार छापा? या पहल में ज्ञानरंजन ने या वसुधा में … छोडिये, सब अपनी पोलिटिक्स करते हैं, नामवर जी किसी कम नहीं की है. रूस से पैसा मिलता था, बेटा वहां पढ़ाया जा रहा था तब तक कई लेखक हमारे देश के, हमारी हिंदी के पतित थे, अज्ञेय सी.आई.ए. के एजेंट थे. अब वक़्त बदल गया तो अज्ञेय उनके भी लिए महान हो गए! नामवर सिंह हिंदी के सबसे बेईमान आलोचक रहे हैं, इतिहास इसका गवाह है.
डाक्टर नगेन्द्र, प्रणाम…आपकी आत्मा को यहाँ देख कर बहुत प्रसन्नता हुई. काफी चर्चा सुनी है आपकी…सदेह तो आपको हम ना देख सके लेकिन आपके टिप्पणी के माध्यम से आपके दर्शन करके हम कृतार्थ हुए… आप आज मिल ही गएँ हैं तो बरसों से मन में दबाया हुआ एक प्रश्न पूछना चाहूँगा. सुना है कि जब आप दिल्ली विश्वविद्यालय के मठाधीश थे और नामवर सिंह जे एन यू के दबंग उस ज़माने में नामवर सिंह ने आपकी नाक में इतना दम कर दिया था कि आपने उनसे बदला लेने के लिए कसम उठा ली कि “अब से जे एन यू का कोई भी छात्र दिल्ली विश्वविद्यालय हिन्दी विभाग में नौकरी ना पा सकेगा” !!
क्यूंकि आपकी आत्मा आज तक डीयू हिन्दी विभाग में मडराती है और आपके चेले आपकी कसम को आज तक निभा रहे हैं,इसलिए जे एन यू के छात्रों का भविष्य आज भी अधर में ही रहता है…
आपसे मेरा व्यक्तिगत अनुरोध है कि आप इस कसम को तोड़ दें. जे एन यू के मेधावी से मेधावी विद्यार्थी नौकरी के बिना टहल रहे हैं और दिल्ली विश्वविद्यालय,हिन्दी विभाग अपने दोयम दर्जे के छात्रों को नौकरी दिए जा रहा है..
आप ही कहें,इसमें छात्रों का क्या कसूर, दिल्ली विश्वविद्यालय में सैकड़ो कालेज(सैकड़ो नौकरी!) और जे एन यू में एक विभाग(एक नौकरी !)….
वैसे भी नामवर अब रिटायर हो गयें हैं और उनकी वो दबंगई भी अब नही रही..अब तो आपके चेलों के चेले नामवर की बखिया उघाडने लगे हैं !!
अब मैं आपकी यहाँ की गई टिप्पणी पर कुछ कहूँगा. क्षमा कीजियेगा लेकिन,ऐसा लगता है कि हाल में आपकी आत्मा सो रही थी ! नामवर ने कब कहा कि मैंने छापा है !! उन्होंने कहा ही कि सिर्फ और सिर्फ राजेन्द्र ने छापा है…वाजपेयी,कालिया और तद्भव संपादक का जिक्र इसलिए किया कि हंस ने इन तीनों से लिखवाया है.
अगेय और अशोक के लिए आपके सीने में विशेष दर्द मालूम देता है…आपको नरकवासी हुए काफी दिन हुए इसलिए आपको अब बातें शायद ठीक से याद नही रहती..शीत के युद्ध के ज़माने में हर कैंप अपनी-अपनी पत्रिका निकालता था,नही तो पत्रिकाएं कैंप धार लेतीं थीं.. उस राजनितिक दौर से आज की मिली-जुली राजनीति वाले दौर की तुलना आपकी आत्मा को जनता के बीच मूढ़-आत्मा साबित कर देगी. सावधानी बरतें.
एक बार फिर से दंडवत प्रणाम,नौकरी वाली बात याद रखियेगा…
यार कित्ते चूतिये हैं ये मोहल्ले वाले पढ़े-लिखे लोग, किसे साड़ी क्यों दी किसे पैंट-शर्ट क्यों दी इन बातों पर ऐसे छातिएं पीट के रो रए हैं जैसे सड़क किनारे रहने वाले कंजरों की औरतें लड़ती हैं (मुझे उन औरतों से कोई नफरत नईं है भइया, बस थोड़ा गुस्सा थोड़ा तरस आता है और खूब सारा मनोरंजन भी हो जाता है ).. तो भइयों जे मोहल्ले में तो पढ़े-लिखे चूतियों की भी कमी ना है जो सुसर छोटी-छोटी बात पर गधों की तरह लड़ने को फिरते हैं..
एक बार हमारी मौसी के देवर की बुआ के पोते की बहन के पिता ने हमें एक टपका आम दिया.. आम में तोते ने चोंच मार रखी थी, अब क्या मैं इस बात पे छाती पीट-पीट के बवाल काटता तुम चूतियों की तरह?? मुझे आम खा के मज़ा आया और चाचा के प्यार से इत्ता अच्छा लगा कि पूछो मत.. तुम चूतियों से तो हम कतई गंवार जाहिल लाख गुना अच्छे हैं यार..
कुछ भी हो तुम सबका चुतियापा देख के जे तो पता चली कि पढ़-लिख के आदमी बिना पूंछ का गधा बन जाता है..
koi ye batao yaro ajay navariya ko samman swarup kya mila?
अभी-अभी हंस के रजत जयंती समारोह से लोटा हूँ .मेरे साथ दतिया के डॉ. के. बी. एल. पाण्डेय जी भी थे. हम लोग अपनी मुर्खता पर सर धुन रहे हैं. पाण्डेय जी तो काफी अस्वस्थ भी हो गए हैं . जिस युग पुरुष ” नामवर” को हम लोग सुनने गए थे उसे बोलने ही नहीं दिया गया. पूरा कार्यक्रम एक बेहूदा मजाक से ज्यादा कुछ भी नहीं था. मैने अपनी पूरी जिन्दगी में इससे ज्यादा निरर्थक आयोजन नहीं देखा जंहा हर एक मिनिट के बाद संचालक को माफी माँगनी पड़ रही थी. मैं कुछ और झलकियाँ आपको दिखाता हूँ (१) राजेंद्र यादव साम्प्रदायिकता का विरोध करते हैं, लेकिन संचालक ने आते ही ”जय भीम” का नारा लगाया, क्या सिर्फ जय श्री राम ही सांप्रदायिक होता है. और दिखाता हूँ (२) समूचे आयोजन में मुद्दे की, बिषय की, भाषा की , साहित्य की , जनवाद की, विचार की ,कोई बात नहीं हुई . (३)हाँ यह अवश्य बताया गया , की किसकी डाईबिटीज बढ गयी है, किसको प्रोस्टेट है, राजेंद्र की बेटी का नाम क्या है ? (४) अधिकांश लोग नामवर जी को सुनने आये थे , लेकिन पहिले तो सेठ ललानी की चरण पूजा के निहित उद्देश्य के यथार्थ में सम्मानों की कल्पनाएँ रचायीं गयीं , फिर राजेंद्र पुराण के पाठ में पूरा वक्त जाया किया गया. नामवर जी तब भी बोलते लेकिन उन्हें bind up की ताकीद कर दी गयी, (४) सञ्चालन सुन कर लग रहा था क़ि कोई चोराहे पर तम्बाखू खा कर थूक रहा है ताकि वक्त कटे. (५)इस आयोजन में मैंने तसलीमा जी को देखा , अशोक बाजपेई , मन्नू जी, निर्मला जैन और तमाम सारे शिखरों को एक साथ देखना मेरी जिन्दगी का महत्वपूर्ण पल था. पुनश्च :- राजेंद्र यादव अपने dogmatijm के कारण कोई छमा नहीं मांगेंगे ,लेकिन हम ही उन्हें छमा कर दें क़ि उन्होंने २५ सालों से हंस को जिन्दा रखा हुआ है. इस अवसर पर एक बेहद खूबसूरत फाइल सभी श्रोताओं को भेंट की गयी , जिसमे अन्दर केलकुलेटर फिट है राजेंद्र यादव के दिमाग की तरह ……………. भैया, धनपत-नबाब-मुंशी ! इस अवसर पर किसी को भी ये पता नहीं था क़ि आज तुम पैदा हुए थे….हे राम !!!!
@मज़ा आ गया…: क्या ‘मजा आ गया’ मोहल्ला प्रतिनिधि के नाते कमेन्ट कर रहें हैं, चूकि उन्होंने अपने नाम के साथ मोहल्ला का लिंक जोड़ रखा है …
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