2011 का भारत भूषण अग्रवाल पुरस्‍कार अनुज लुगुन को

मकालीन युवा कविता का सर्वाधिक प्रतिष्ठित सम्मान, भारत भूषण अग्रवाल कविता पुरस्कार अनुज लुगुन को उनकी कविता ‘अघोषित उलगुलान’ के लिए दिया जाएगा। इस वर्ष के निर्णायक उदय प्रकाश ने इसका चयन किया है। यह कविता ‘प्रगतिशील वसुधा’ के अप्रैल-जून 2010 के अंक में प्रकाशित हुई थी।

भारत भूषण अग्रवाल पुरस्कार हर वर्ष किसी युवा कवि की श्रेष्ठ कविता को दिया जाता है। निर्णायक मंडल में अशोक वाजपेयी, अरुण कमल, उदय प्रकाश, अनामिका और पुरषोत्तम अग्रवाल हैं। बारी-बारी से हर वर्ष एक निर्णायक पुरस्कार के लिए कविता का चुनाव करता है। इस बार के निर्णायक उदय प्रकाश के शब्दों में “अनुज लुगुन की कविता “अघोषित उलगुलान” को वर्ष 2011 का प्रतिष्ठित भारत भूषण अग्रवाल पुरस्कार देते हुए मुझे गर्व और सार्थकता दोनों की अनुभूति हो रही है।”

कल सुबह मोहल्‍ला लाइव पर इस पुरस्‍कार के सिलसिल में कई पोस्‍ट प्रकाशित की जाएगी, जिसमें निर्णायक का वक्‍तव्‍य, अपनी कविता की रचना प्रक्रिया के बारे में अनुज लुगुन की टिप्‍पणी, कवि आशीष त्रिपाठी का वक्‍तव्‍य, अनुज लुगुन की कविता के विशेष संदर्भ में भारतीय कविता में आदिवासी स्‍वर पर अश्विनी कुमार पंकज की टिप्‍पणी और झारखंड आंदोलन के नायक रहे दिवंगत विलियम लुगुन का एक पुराना साक्षात्‍कार प्रकाशित किया जाएगा। कृपया प्रतीक्षा करें।

फिलहाल अनुज लुगुन की पुरस्‍कृत कविता पढ़ें …

अघोषित उलगुलान

अलसुबह दांडू का काफिला
रुख करता है शहर की ओर
और सांझ ढले वापस आता है
परिंदों के झुण्ड-सा

अजनबीयत लिये शुरू होता है दिन
और कटती है रात
अधूरे सनसनीखेज किस्सों के साथ
कंक्रीट से दबी पगडंडी की तरह

दबी रह जाती है
जीवन की पदचाप
बिल्कुल मौन!

वे जो शिकार खेला करते थे निश्चिंत
जहर बुझे तीर से
या खेलते थे
रक्त-रंजित होली
अपने स्वत्व की आंच से
खेलते हैं शहर के
कंक्रीटीय जंगल में
जीवन बचाने का खेल

शिकारी शिकार बने फिर रहे हैं
शहर में
अघोषित उलगुलान में
लड़ रहे हैं जंगल
लड़ रहे हैं ये
नक्शे में घटते अपने घनत्व के खिलाफ
जनगणना में घटती संख्या के खिलाफ
गुफाओं की तरह टूटती
अपनी ही जिजीविषा के खिलाफ

इनमें भी वही आक्रोशित हैं
जो या तो अभावग्रस्त हैं
या तनावग्रस्त हैं
बाकी तटस्थ हैं
या लूट में शामिल हैं
मंत्री जी की तरह
जो आदिवासीयत का राग भूल गये
रेमंड का सूट पहनने के बाद।

कोई नहीं बोलता इनके हालात पर
कोई नहीं बोलता जंगलों के कटने पर
पहाड़ों के टूटने पर
नदियों के सूखने पर
ट्रेन की पटरी पर पड़ी
तुरिया की लवारिस लाश पर

कोई कुछ नहीं बोलता

बोलते हैं बोलने वाले
केवल सियासत की गलियों में
आरक्षण के नाम पर

बोलते हैं लोग केवल
उनके धर्मांतरण पर

चिंता है उन्हें
उनके ‘हिंदू’ या ‘इसाई’ हो जाने की

यह चिंता नहीं कि
रोज कंक्रीट के ओखल में
पिसते हैं उनके तलबे
और लोहे की ढेंकी में
कूटती है उनकी आत्मा

बोलते हैं लोग केवल बोलने के लिए।

लड़ रहे हैं आदिवासी
अघोषित उलगुलान में

कट रहे हैं वृक्ष
माफियाओं की कुल्हाड़ी से और
बढ़ रहे हैं कंक्रीटों के जंगल।

दांडू जाए तो कहां जाए
कटते जंगल में
या बढ़ते जंगल में।

मोहल्‍ला लाइव पर अनुज लुगुन : http://mohallalive.com/tag/anuj-lugun/

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