हिंदी सिनेमा के‍ लिए कितनी दूर, कितनी पास है दिल्‍ली?

हिंदी सिनेमा के भीतर दिल्‍ली के कितने इमेजेज हैं या हिंदी सिनेमा में दिल्‍ली किस तरह आयी है। कितनी बार यह सिर्फ शहर की तरह आयी है और कितनी बार विचार की तरह – यह देखने, समझने, सुनने, कहने के लिए आप कल आ रहे हैं इंडिया हैबिटैट सेंटर। मोहल्‍ला लाइव इस मसले पर जिस संवाद का आयोजन कर रहा है, उसकी स्‍पीकर लिस्‍ट में डेल्‍ही बेली के कथा-पटकथाकार अक्षत वर्मा हैं, इतिहासकार-रंगकर्मी महमूद फारूकी हैं, इतिहासकार और सीएसडीएस के फेलो रविकांत हैं और एनडीटीवी इंडिया के कार्यकारी संपादक रवीश कुमार हैं। तो कल हम बेसब्री से आपका इंतजार कर रहे हैं…

Time : 09 August, 6:30
Location : Stein Auditorium, India Habitat Center
[ near gate no. 3 ]
Lodhi Road, New Delhi

सत्ता का शहर। रोज़मर्रा का शहर। सिनेमा में बनता शहर।

वो कौन सा धागा है, जो उम्मीद भरी सत्ता की तलाश में सुदूर देहात से राजधानी की ओर निकले ‘अब दिल्ली दूर नहीं’ के छोटे से रतन को चांदनी चौक की गलियों में ‘भाग डी के बोस’ की लय पर भागते ‘डेल्ही बेली’ के ताशी और दोस्तों से जोड़ता है? क्या नये बनते संभावनाओं के शहर में जुड़वां दिखते मकानों की नींव पर नेहरूवियन आधुनिकता का, अपने प्यार का महल खड़ा करते ‘तेरे घर के सामने’ के देवानंद और नूतन से कोई तार निकल कर नागरिक समाज से बहिष्कृत ‘ओये लक्की लक्की ओये’ के लक्की तक आता है? ध्वस्त सभ्यताओं के बोझ तले पनपती जिंदगियां। एक शहर जो अपने इतिहास में जीता है। एक शहर जिसके इतिहास से नाते तमाम अब नष्ट हैं। आईने में टकराती सच्चाइयां। गालिब की दिल्ली। अठ्ठारह सौ सत्तावन की दिल्ली। शरणार्थियों की दिल्ली। आपातकाल की दिल्ली। विस्थापितों की दिल्ली। ‘रवीश की रिपोर्ट’ की दिल्ली। ‘डेल्ही बेली’ की दिल्ली।

Speakers

Akshat Verma | writer : Delhi Belly
Mahmood Farooqui | Historian & co director : Peepli Live
Ravikant | Historian & CSDS Fellow
Ravish Kumar | Excutive Editor : NDTV INDIA

in conversation with
Mihir Pandya | Research Fellow, DU

Organiser : Mohalla Live
any query, plz call on 9811908884

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