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देश पर थोड़े का कब्‍जा क्‍यों? आरक्षण से आएगी बराबरी…

9 August 2011 13 Comments

आरक्षण की दोतरफा विषमरसता को मिटाने के लिए उच्च शिक्षा में आरक्षण जरूरी है

♦ शशि कुमार झा

राष्ट्रवाद का ढोल पीटने वालों को एक पल ठहर कर सोचना चाहिए कि यह राष्ट्र यदि वास्तव में एक राष्ट्र है, तो यह राष्ट्र आखिर है किसका। इस ‘राष्ट्र’ को बनाये और बचाये रखने के लिए एक विषमतापूर्ण समाज में राष्ट्र के आर्थिक और सांस्कृतिक संसाधनों में सबकी हिस्सेदारी क्यों आवश्यक है? प्रतिभावादियों को खुले दिमाग से यह सोचना होगा कि आखिर उनकी प्रतिभा का स्रोत, मानक और उसे हासिल करने की परिस्थितियां क्या हैं। उन्हें अवसरों की समानता का वास्तविक अर्थ भी समझना होगा। जिन लोगों को एम्स, आईआईटी और डीयू-जेएनयू में दाखिले में आरक्षण से पेट में मरोड़ पैदा होता है, उनका इलाज यही है कि वे समझें कि कुछ सीमित मात्रा में एलीट संस्थाएं बनाने का उपक्रम भी ब्राह्मणवादी और अभिजनवादी सोच का परिणाम थीं, जिन्हें आज न कल चुनौती मिलनी ही थी। अब आप नवजागृतों के हक को स्वीकार कर न सिर्फ मौजूदा संस्थाओं में उन्हें ‘एकोमोडेट’ कीजिए, बल्कि यह सबक भी लीजिए कि शिक्षा में निवेश को बढ़ा कर आगे से सभी संस्थाओं की गुणवत्ता पर भी उतना ही बल दिया जाए।

राज्य की न्यायप्रियता की कसौटी और वैधता का आधार भी यही है कि समाज में मूल्यों का आवंटन करने वाली एकमात्र सत्ता के रूप में वह वितरणात्मक न्याय को किस हद तक आत्मसात कर पाता है। राज्य के समानांतर या उसके साथ गठजोड़ में अपनी अप्रत्यक्ष सत्ता-संरचना खड़ी करने वाले कॉर्पोरेट समूहों को भी समझना होगा कि मानव संसाधन की उनकी धारणा तब तक अधूरी है, जब तक वह समाज के सबसे बड़े तबके के लिए उत्पादन प्रक्रिया में हर स्तर पर समुचित भागीदारी का रास्ता नहीं खोलते हैं। इसके साथ ही आरक्षण को ही एकमात्र और सार्वकालिक अंतिम समाधान के रूप में देखने वालों को भी समझना होगा कि व्यापक राजनीतिक चेतना और संघर्ष से हासिल किये गये आरक्षण की इस व्यवस्था को इतिहास के इस मोड़ पर वो इसे सामाजिक और राजनीतिक गतिशीलता के एक अस्थायी माध्यम के रूप में ही देखें और दिखाने की चेष्टा करें। (तर्क के स्तर पर) सदियों के शोषण का जवाब सदियों के आरक्षण से देने वाले उत्साही लोगों को भी समझना होगा कि पीड़ित होने की मानसिकता से उबर कर एक सकारात्मक दृष्टिकोण से इसे समझने और समझाने का प्रयास ज्यादा उपयोगी और कारगर होगा। हम सबको समझना होगा कि आरक्षण और जातिवाद को समाप्त करने का एक तरीका आरक्षण भी हो सकता है। एक युग के एवज में आपसे एक दौर या कुछ पीढ़ियों तक की उदारता और न्यायपूर्ण सहयोग और हक की ही मांग की जा रही है।

आइए हम मिलकर उच्च शिक्षा के संस्थानों में आरक्षण की व्यवस्था का दिल खोल कर समर्थन करें। एक-दूसरे को और अधिक जानने और एक-दूसरे से और अधिक रचनात्मक सहयोग हासिल करने का विश्वास और धैर्य पालें। गैर-बराबरी समाप्त करने के एक तात्कालिक, मानवीय और व्यावहारिक उपकरण को मान्यता दें। इस अपेक्षा के साथ कि ज्ञान और राजनीतिक सत्ता के लोकतांत्रीकरण में भी यह सहायक हो। ज्ञान और सत्ता को हासिल कर उसके चरित्र में लोकतांत्रिक संस्कार भरने का भी यह माध्यम साबित हो, न कि केवल उसकी बुराइयों को अपनाने का।

अंत में, कुछ ऐसे संकलित विचार जो वास्तव में उच्च शिक्षा में आरक्षण दिये जाने का औचित्य समझने में सहायक हैं -

1) सरकारी नौकरियों में अथवा सार्वजनिक क्षेत्र में योगदान देने हेतु आरक्षण का फायदा पिछड़े तबकों को सही रूप में तभी मिल पाएगा, जब उन्हें उच्च शिक्षा में आरक्षण दिया जाएगा।

2) आरक्षण अभी केवल सरकारी सेवाओं में ही मिल रही है, जबकि सेवा के ज्यादातर अवसर प्राइवेट सेक्टर में उपलब्ध हैं। अब इस नयी अर्थव्यवस्था में इन अवसरों को भुनाने के लिए वास्तव में उच्च शिक्षा में आरक्षण जरूरी है। निजी क्षेत्र की अर्थव्यवस्था में रचनात्मक और विविधतापूर्ण मानव संसाधन की कमी को पाटने के लिए भी यह जरूरी है।

3) आज का युग वास्तव में ज्ञान का युग अथवा नॉलेज सोसायटी वाला युग है। इसमें वास्तविक सत्ता और आजादी उन्हीं लोगों के पास है, जिनकी पहुंच ज्ञान तक है। इसलिए वंचितों को सत्ता में असली भागीदारी और आजादी तभी मिल पाएगी, जब उच्च शिक्षा में उनके लिए आरक्षण हो।

4) समाज में बराबरी की जगह पाने के लिए वास्तव में शिक्षा को ही सांस्कृतिक पूंजी (कल्चरल कैपिटल) माना गया है। ब्राह्मणों या अन्य अगड़ी जातियों के वर्चस्व का कारण शिक्षा के इस सांस्कृतिक पूंजी पर एकाधिकार ही रहा है। इस एकाधिकार को तोड़ने के लिए इस सांस्कृतिक पूंजी का भी न्यायपूर्ण बंटवारा जरूरी है। इसका रास्ता उच्च शिक्षा में आरक्षण होकर ही जाता है।

5) ज्ञान का सृजन और उसे समृद्ध बनाने की जो प्रक्रिया है, उसमें सामाजिक विविधता की अहम भूमिका होती है। भारत में ज्ञान के क्षेत्र में एक ही प्रकार की जातियों और अनुभवों के ही हावी होने की वजह से यह अभी तक अधूरा रहा है। इस ज्ञान को समृद्ध करने के लिए जरूरी है कि अधिक से अधिक वंचित लोग उच्च शिक्षा के माध्यम से उसमें योगदान करें ताकि यह और भी समृद्ध और जनोपयोगी हो सके।

6) उच्च शिक्षा के अभाव की वजह से ही पिछड़े तबकों के लोग अभी तक मानसिक गुलामी के शिकार रहे हैं। उनमें आलोचनात्मक क्षमता का विकास उस रूप में नहीं हो पाया है कि वे सामाजिक न्याय के संघर्ष को बौद्धिक रूप से भी अगले स्तर पर ले जाएं। उच्च शिक्षा में उनकी न्यायपूर्ण हिस्सेदारी उनके लिए प्रबोधन काल (एनलाइटेनमेंट) के एक नये युग में प्रवेश करने जैसा होगा।

7) हमारे यहां आज तक कोई भी ऐसा वैज्ञानिक आविष्कार नहीं हुआ जो दलितों और पिछड़े तबके के लोगों के दैहिक श्रम संबंधी समस्याओं को आसान बना सके। रचनात्मकता और खोजपरकता का संबंध वास्तव आवश्यकता से ही होता है। ज्ञान-विज्ञान के क्षेत्र में भारत के पिछड़ने का एक बड़ा कारण पिछड़े तबके के लोगों को कभी भी उच्च स्तर के ज्ञान-विज्ञान के क्षेत्र में आने का अवसर ही नहीं मिल पाना भी है।

8) साहित्य, कला, खेल, फिल्म और संगीत के क्षेत्र में भी इन तबकों का प्रतिनिधित्व बहुत कम है। यदि है भी, तो इनकी सामाजिक दृष्टि और सौंदर्यशास्त्र को समुचित एक्सपोजर, महत्‍व और ख्याति नहीं मिल पाता है। इसका कारण है उच्च शिक्षा हासिल करने वाले अन्य समुदाय के लोगों के बीच एक अदृश्य नेटवर्क और सहमति का विभिन्न रूपों में मौजूद होना। इस वजह से साहित्य, संगीत और कला इत्यादि क्षेत्रों में पिछड़े तबकों के यथार्थ और वस्तुस्थिति का चित्रण जहां न के बराबर है, वहीं इसका मूल्यांकन भी निष्पक्ष नहीं है। उच्च शिक्षा में बड़े पैमाने पर इनके प्रवेश से इससे निपटने में मदद मिल सकती है।

9) इन तबकों के इतिहासपुरुषों को भी वह स्थान नहीं दिया गया, जिसके वे हकदार थे और हैं। इसका एक बहुत बड़ा कारण है यह है कि उच्च शिक्षा में इन तबकों की गैर-मौजूदगी से इन इतिहासपुरुषों के विषय में समुचित शोध और अध्ययन नहीं हो पाया है।

10) उच्च शिक्षा के पक्ष में आरक्षण का एक तर्क वास्तव में इसके एक विरोध के बिंदु से निकलता है। ऐसा प्रायः कहा जाता है कि आरक्षण से टैलेंट, प्रतिभा या मैरिट इत्यादि की अनदेखी होती है या उसके साथ अन्याय होता है। यह वास्तव में बहुत ही लचर दलील है। टैलेंट कोई पेट से लेकर नहीं आता या यह कोई जातिगत विशेषता नहीं है। पिछले 12 वर्षों से अधिक समय से मैंने दिल्ली के दो प्रमुख विश्वविद्यालयों में तथाकथित जन्म से ही प्रतिभावान जाति समूहों के एक-से-एक जड़मति डपोरशंखों को देखा है। प्रतिभा का संबंध सीधे तौर पर सामाजिक परिस्थितियों और अवसरों की उपलब्धता से है। प्रतिभा भी कई प्रकार की हो सकती है, जो इस बात पर निर्भर करता है कि उसके मापने का पैमाना क्या है। अगर उसे मुख्यधारा के और प्रचलित मानकों के आधार पर मापा जा रहा है, तो ऐसे मानकों पर भी सवाल सहज ही उठाये जा सकते हैं। पिछड़े अपने विशेष सामाजिक अनुभवों के आधार पर एक अलग प्रकार की विलक्षण प्रतिभा के धनी हो सकते हैं। उच्च शिक्षा में उनका समावेश कोई भीख नहीं बल्कि उनकी इन प्रतिभाओं को मान्यता का विषय है।

11) हम जानते हैं कि इस देश के शासक वर्ग और नीति नियंताओं की भाषा अंग्रेजी है। ज्ञान-विज्ञान, रोजगार और व्यवसाय के तमाम क्षेत्रों में इस भाषा का ही बोलबाला है। अपनी परिस्थितियों में परिवर्तन लाने के लिए पिछड़े तबकों को इस भाषा पर विजय प्राप्त करना ही होगा। मौजूदा परिस्थितियों में उच्च-शिक्षा में आरक्षण के बगैर यह संभव नहीं दिखता। इसके अलावा दलित और पिछड़े तबकों से ही यह उम्मीद बंधती है कि वे अंग्रेजी भाषा को भी भारतीय समाज की आवश्यकता के अनुरूप ढाल कर उसका स्वरूप बदल देंगे। हाशिये पर धकेल दी गयी भाषाओं के साथ अंग्रेजी की अंतर्क्रिया से अपनी भाषा के साथ-साथ औपनिवेशकि अंग्रेजी सोच का भी परिष्कार और संवर्द्धन करेंगे। दूसरे समुदायों ने इस मामले में अब तक अपने कॉम्प्राडोर वर्ग-चरित्र का ही परिचय दिया है।

(शशि कुमार झाडेमोक्रेसी कनेक्ट में विश्‍लेषक। बीबीसी जैसी संस्‍थाओं से जुड़े रहे। इंटरनेट पर हिंदी को जमाने में भी बड़ा हाथ रहा। डीयू से आईआईएमसी तक राजनीति और पत्रकारिता की पढ़ाई की।
वक्‍त मिले तो शशि के ब्‍लॉग अष्‍टावक्र पर भी जाएं। उनसे avyaktashashi@gmail.com पर संपर्क किया जा सकता है।)

13 Comments »

  • ननकू said:

    उत्तम और ठंढ़े दिमाग से लिखा गया लेख। लेकिन ‘झा’जी ने लिखा है जरुर कुछ षडयंत्र होगा। माफ कीजिएगा ये मेरी सोच नहीं है, दिलीप साहब जरुर सोचते होंगे। या नहीं तो मुस्करा रहे होंगे कि ससुरा मेरी पिटाई से मिमिया रहा है-वह दिन दूर नहीं जब तमाम ऐसे लोगों को बोरी में भरकर थार रेगिस्तान या उससे भी पार भेज दिया जाए।

    हां मैं इस बात से सहमत हूं कि मुट्ठीभर एलीट स्कूलों की स्थापना से ऐसा तो होना ही था। जब शिक्षा को कोई महत्व नहीं देंगे तो उसके लिए मारामारी तो होगी ही। जरुरत है कि उच्चशिक्षा समेत सभी स्तरों पर सीटों की संख्या बढ़ाई जाए और ज्यादा से ज्यादा स्कूल-कॉलेज खोलें जाए। सबको उसकी इच्छानुसार सीटें मिले। जो भी पढ़ना लिखना चाहे उसे ये सुविधा दी जाए।

  • गिरिजेश्वर said:

    एक अच्छा आलेख.संतुलित.विषय के साथ न्याय करता.आरक्षण विरोधियों और समर्थकों के लिए सकारात्मक संदेश.
    झा जी ने लिखा है,इस पर कोई सवाल नहीं.समाज में हमेशा ऐसे लोग रहे हैं जो डी-क्लास और डी-कास्ट होकर विश्लेषण करने की क्षमता रखते हैं.

  • Saurabh said:

    ब्राह्मणों या अन्य अगड़ी जातियों के वर्चस्व का कारण शिक्षा के इस सांस्कृतिक पूंजी पर एकाधिकार ही रहा है।
    could you be able to explain a bit where you see the वर्चस्व in current time of so called अगड़ी n bhrahmin casts?
    Arakshan itself describes in equality.

    simple eg:
    One of my schoolmate gave some entrance exam he scores 96 percentile but not selected , one of his friend came n ask ‘Kya hua tera nahi hua? achaa general category main hai na’.

    Kya aap kabhi us ke man se AARAKSHAN ki nafrat nikaal paaenge?

    If i born in Brahmin family it dosent mean that i have a lot of opportunities an have a lot of money on which i can spend my whole life..
    why dont you explain what a Gen cast boy do if he dosent got selected in a bank job just because he is GENERAL even he is more capable !

    Why arakshan in JOBS?? if anyone really want to decrease the gap between GEN and sc st then we have to do something seriously otherwise the gap will become huge…

  • Anand said:

    “only the crying child gets milk” is in opertaion in our democracy. You cry a lot even if you are not hungry, you will get milk. But if you don’t cry thinking that a just ‘mother’ will give you milk,..ऐसे आदत पड़ गयी है लोगों की आरक्षण तो है ही दाखिला और नौकरी तो मिलनी है ही योग्यता जाये तेल लेने .. राजस्थान में अरबों की सम्पति आरक्षण के नाम पर राख हो जाती है तब कहाँ होते हैं वकालत करने वाले .. शिक्षण संस्थानों में आरक्षण हो लेकिन गरीब तबके के लिए बस उनकी पढाई लिखी का खर्चा .जो मेधावी छात्र आरक्षण के वजह से चूक जाते हैं उनकी मनःस्थिति का तो जरा सोचिये .. आरक्षण होगा तो कौन योग्य बनना चाहेगा जनाब … आपका लेख बहुत अच्छा है क्योंकी आप बुद्धिजीवी प्रकांड पढ़े लिखे प्रतिभा के धनी हैं .. हाँ दलील में में कोई दम नहीं है(मेरी व्यक्तिगत राय )

  • jagdish panwar said:

    varnavyavstha mein sab se uper wale varna ko sadiyon se AGHOSHIT aaraksan mila hua hai.

  • नवीन said:

    आरक्षण उनको चाहिये जिनको जरुरत है जिनको सहारे की वाकई जरुरत है उनको नही जो कुत्तो के माफिक काटने के लिये दौडते है जो खा खा के अघा गये है मोटा गये है गउदा गये है और फोंफ काट के सो रहे है चद्दर तान के !

    हमने ऐसे कई आरक्षण वालो को देखा है जो सबसे ज्यादा नफरत उन लोगो से करते है जिनको आरक्षण की दरकार है लेकिन वो खुद पुश्त दर पुस्त आरक्षण खा के लाम चाक हुए बैठे है और कहते है ये दिल मांगे मोर !

    और शशि कांत जी

    आरक्षण निम्न शिक्षा मे प्राथमिक , जुनियर , हाईस्कुल , इंटरमिडियेट के लिये ज्यादा जरुरी है जिससे वो लोग जो यहा लाभ उठाये , उच्च तक जाते जाते उच्च हो जाय !

    कृपया जमीन पे आये आप लोग , हवाई फायर कर के कब त बारुद का गँध लोगो को सुंघायेंगे ! दिलीप मंडल तो सबसे बडे कमंडल है जिनको अपने तन पे जमे चमडे की मोटाई से ही केवल मतलब है जिनके चाम छिल रहे है उनसे इन जैसे लोगो को कोई मतलब नही है !

    कृपया आप लोग जमीन पे भी आये देखे निहारे परखे और जाने !

    धन्यवाद

  • nagmani pandey said:

    नमस्कार
    मै तो कोई लेखक नही हु ना ही विशेषज्ञ हु लेकिन मै अपना राय रखना चाहूँगा,,,
    मै शशि जी के कुछ बातो सहमत नही हु …..

    नविन जी ने जो लिखा है उस से मै सहमत हु….और मै भी आरक्षण को समर्थन देता हु,,,,आप लोग जो बात कर रहे है ओ सिर्फ उच्च और माध्यम लोगो के बारे में बात कर रहे है..लेकिन उन से निचे रहने वालो के बारे में कोई बात नही करता जब कि .इन से बहुत ही निचे के लोग भी है जो गरीब है और पढाई तो दूर उन्हें खाने के लिए एक समय का खाना खाने के लिए दूर दूर रोजगार कि तलास में भटकना पड़ता और ओ भी एक दिन का काम कर के एक दिन खायेंगे उस एक बाद फिर दुसरे दिन भटकना पड़ता है जिस दिन नही मिले काम उस दिन भूका सोना पड़ता है उन्हें इस आरक्षण का क्या फायदा जिसे खाने को नही मिले वह शिक्षा कहा ग्रहण कर पाएंगे और ये लोग जरुरी नही कि ओबिसी कास्ट के ही है उस में से अधिकतर ओपन कास्ट के है तो क्या उन्हें आरक्षण का फायदा नही मिलना चाहिए या फिर वे लोग ओपन जैसे ब्राहमण , ठाकुर आदि जो जात में पैदा होकर ही वे आपराध किए है क्या ? कि उन्हें ऊपर आने के लिए मदत नही मिल पता है …..हमारे संविधान को लिखने वाले डॉ. भीमराव आम्बेडकर भी ऊँची जात के थे लेकिन जो उन्होंने अपना धर्म परिवर्तन कर आरक्षण इस लिए लागु किया कि जो गरीब पिछड़े (मेरे अनुसार पिछड़ी जात के साथ ही जो गरीब जरूरत मंद है सिर्फ पिछड़ी जात नही ) जिसे सहायता कि जरूरत है उन के लिए संविधान में विशेष तरतूद (आरक्षण )बनाया था लेकिन आज उस का गलत उपयोग किया जा रह है ….कई सरे नेता ऐसे है जो ओबिसी है उन्होंने आरक्षण के नाम पर बहुत से फायदे लिए है उन्होंने आरक्षण के नाम पर बड़े बड़े भूखंड लेकर उस पर स्कुल और कोलेज बनाये है लेकिन उन कॉलेजों में कितना आरक्षण रखे है इस कि जाँच भी करे उस के बाद ही इन नेताओ को आरक्षण पर चर्चा करे या राजनीती करने को बोले …….और शशि जी को मै पूछना चाहूँगा कि क्या आज के समाया में सही लोगो को आरक्षण का फायदा मिलता है क्या ? क्या जो ओपन कास्ट में जन्म लिए है ओ कोई अपराध किए है क्या ? क्या आरक्षण के लिए जिस जात को चुना गया है सिर्फ उन्हें ही आरक्षण मिलाना चाहिए ? क्या जो दुसरे जात के है और आरक्षण के नियमो में नही बैठते और उन्हें अपनी शिक्षा के लिए मदत कि जरुरत है तो क्या उन्हें इस का फायदा नही देना चाहिए ?

    nagmani4@gmail.com

  • dr.anurag said:

    …आरक्षण की परिकल्पना जिस मूल उद्देश्य ओर भावना के साथ की गयी थी ..वो भी वक़्त के साथ धुंधली हो गयी है …ऐसे सामज में जहाँ विषमताए बहुत है …आरक्षण वास्तव में पिछड़े ओर दुर्बल वर्ग के उन लोगो तक नहीं पहुँच रहा है जो इसके हक़दार है …यानी उसी जाति के ताकतवर ओर धनी लोग ही इसका फायदा उठा रहे है .
    २. आरक्षण को सिर्फ जाति ही नहीं क्षेत्र के हिसाब से भी मोडिफाई किये जाने की आवश्यकता है ..यानी ..इन जातियों में जो परिवार अगर समर्थ है तो उस इस अधिकार से वंचित कर सकते है ….
    ३.शहरी ओर विकसित क्षेत्रो की उन जातियों के छात्रों को शिक्षा -किताब मुफ्त दिलवा सकते है ….ओर कोचिग में भी ५०-७० प्रतिशत फीस मुआफ का प्रावधान हो ऐसा कर सकते है …..ये सुविधा अगड़ी जाति कहे जाने वाले निर्धन छात्रों के लिए भी लागू होनी चाहिए …
    ४. इन सबके लिए सबसे पहले ज़रूरी है एक सामान शिक्षा .यानी किसी दूर दराज के गाँव में पढता बच्चा भी वही पढ़े जो किसी कोंवेंट स्कूल में पढता बच्चा …यानी हमें अपने स्कूल ओर सरकारी स्तर के आध्यापको का न केवल स्टेंडर्ड उठाना होगा अपितु उन्हें इस क्षेत्र में अग्रसर करने के लिए अधिक वेतन ओर सुविधा भी देनी होगी
    ५. शिक्षा के निजीकरण को तुरंत समाप्त किया जाना चाहिए …खास तौर से प्रोफेशनल कोर्सेस में …जिससे ये केवल समर्थ ओर धनवान लोगो के भीतर न रह जाए इससे कम्पीटीशन की मूल भावना नष्ट होती है

    ६.आरक्षण केवल उन जातियों के लिए नौकरियों या कम्पीटीशन में रखा जाए जो बेहद पिछड़े ओर दूर दराज के क्षेत्रो से आते है …
    ओर हाँ गुजरात में बोहरा समाज के लोग अपनी जाति के निर्धन ओर होनहार छात्रों के लिए सारी सुविधा का वहन करता है यानि समाज को भी अपनी भागीदारी निभानी होगी

  • mishra devesh said:

    aisa hai ambedkar har desh ke har ek chourahe par khade hai traffic police bankar ..samvidhan banaye …arakshan logo ko mila ..kya arakshan lekar kya tarakki kar gaye ….arakshan sse kuch nahi hone wala hai …dimag rahega to tabhi survive karoge ….arakshan dimag nahi dega ..

  • FAIYAJ said:

    PICHADE VARG KO VYAVSTHAKI DHARA ME LANE HETU ARAKSHAN JARURI HAI

  • आरती said:

    SaurabhBhai (1) there is 100% reservation for brahmins in temples do he oppose it or support it. (2) during various kinds of pujas conducted in bolloywood especially pujas conducted by right wing people like praka…sh jha, singer bhattacharya, anupam kher, and AMITABH BACHCHAN they all invite ONLY brahmins for conducting their pujas. (3) all bolleywood stars, producers, writers etc consult astrologers before release or production launch of every movie barring few progrressive and gentlemen people like sudhir mishra Mahesh Bhatt . in all these functions only brahmins conduct these stupid aryan rituals.

  • आरती said:

    1. देश के संसाधनों और अवसरों में पिछड़े-वंचितों को भी उनका हिस्सा मिलना चाहिये जो न्यायपूर्ण है.

    2. सामाजिक विविधता व न्याय के लिये जिसकी जितनी संख्या भारी – उसकी उतनी भागीदारी का सिद्धांत सही है. अमेरिका जैसे देश में डायवर्सिटी लागू है. वहां के निजी क्षेत्र में अश्वेतों को उनकी आबादी के हिसाब से भागीदारी दी गई है. भारत में भी पिछड़े-वंचितों को उनका हिस्सा मिलना चाहिए.

    3. जब रिजर्व सीटों के लिये क्रीमी लेयर लगाई गई है तो जनरल Seats me भी क्रीमी लेयर लगाई जानी चाहिये.

  • आरती said:

    देश की सबसे बड़ी यूनिवर्सिटी DU में 84 में 83 प्रिंसिपल सवर्ण हैं।

    facts about kayasth..kayasth community is the-2nd in india-5th in asia-11th in world by 2018 kayasth will b world’s la…rgest comm…unity 15 % of india’s & 70% of gujarat’s business is handled by kayasth. kayasth are d 4th most community in world.kayasth have 260 different surnames.35% of NRis r kayasth.Feel proud to be a kayasth. Help all kayasth you come across in all possible ways. send it 2 all kayasths u know….
    +
    Brahmins – Born to rule!

    Our community has given the country four presidents and six prime ministers.

    Presidents of India
    Varaha Venkata Giri – Fourth President of India
    Sarvepalli Radhakrishnan – Philosopher, Second President of India, First Vice President of India
    Shankar Dayal Sharma – Ninth President of India
    Ramaswamy Venkataraman – Eighth President of India, Seventh Vice President of India

    Prime Ministers of India
    Morarji Ranchhodji Desai – Sixth Prime Minister of India
    Indira Priyadarshini Gandhi – Fifth Prime Minister of India
    Rajiv Gandhi – Ninth Prime Minister of India
    Jawaharlal Nehru – Freedom fighter, First Prime Minister of India
    Pamulaparthi Venkata Narasimha Rao – 12th Prime Minister of India
    Atal Bihari Vajpayee- 13th and 16th Prime Minister of India

    Other prominent Brahmins in politics include: Mamata Banerjee, Arun Jaitley, Ananth Kumar, Pranab Kumar Mukherjee, Jayalalitha, Jairam Ramesh and Sitaram Yechury. In fact, every party has one: a Brahmin drafting canny political strategy.

    Here is a list of notable Brahmins, historical as well as contemporary, in various fields. This list is by no means exhaustive.

    Sports
    Sachin Tendulkar
    Saurav Ganguly
    Rahul Dravid
    Sunil Gavaskar
    Krishnamachari Srikanth
    Ravi Shasthri
    V.V.S.Lakshman
    Ajit Agarkar
    Javagal Srinath
    Anil Kumble

    Politics, Social and Freedom Fighters
    Raja Ram Mohan Roy
    Rabindranath Tagore (Pirali Brahmin)
    Jawaharlal Nehru
    Lal Bahadhur Shastri
    Chandrashekar Azad
    Sarvepalli Radhakrishnan
    VV.Giri
    Rajagopalachari(1st and only Governor General)
    T N Seshan
    Krishna Murthy
    Ram Jethmalani
    PV.NarasimhaRao
    AB.Vajpayee
    Mahakavi Subramanya Bharathiyar
    Potti SreeRamulu
    Veereshlingam Panthulu
    Tanguturi Prakasam Panthulu
    Pingali Venkiah
    Gurajada Apparao
    Mahakavi Sri Sri
    Tenali Ramakrishna
    Chanakya

    Arts & Entertainment
    Kamal Hasan, Madhavan, Mani Ratnam (Gopal Ratnam Subramaniyam Iyer), K.Balachander, K.Vishwanath, Kota Srinivas Rao, SP.Balasubramaniyam, PB.Srinivas, P.Sushila, S.Janaki, Karunya, Sunitha Upadhrushta, Anuradha Sriram, Ghantasala, S.RajeshwarRao, Mani Sharma, Vidhya Sagar, Athreya, Veturi Sundara Rama Murthi, Sirivennala Seetharama Shasthri, Suryakantham, Sowcar Janaki, Bhanumathi, Krishnakumari, Girija, RamaPrabha, Kanchana, Lakshmi, Sridevi, Vidhya Balan, Trisha Krishnan, Ramya Krishnan, Jayasudha, Vijay Nirmala, Gauthami, Suhasini, Bhanupriya, Naresh, Singeetham Srinivas Rao, Trivikram Srinivas Rao, Arudhra, Vennalakanti, RajaBabu, Padmanabham, Chittor Nagaiah, Nagabhooshanam, Dhoolipala Setharama Shastry, Mukkamala Krishna murthy, Chandra Mohan, Somayajulu, LB.Sriram, Rallapalli, Gollapudi Maruthi Rao, Dharma Varapu subramaniyam, Tanikella Bharani, NutanPrasad, Raghuvaran, Ajith Kumar, Madhuri Dixit, Sonali Bendre, Sushmita sen

    Academics, Science & Technology and Business
    Jiddu KrishnaMurthy
    C.V.Raman(Nobel prize winner for Raman Effect)
    Subramanyam Chandrashekar Iyer (Nobel prize winner for Chandrashekar Limit)
    Venkatraman Ramakrishnan (Nobel prize winner for Molecular Biology)
    Ramanujam (Math genius)
    Bhaskaracharya (Great mathematician)
    Amartya Sen (Noble Prize winner)
    Narayana Murthy (Infosys)
    IIT Ramaiah
    IIT Krishna Murthy
    TIME (MBA coaching)

    The Great Bhakthi Saints, Carnatic Artists and Devotees
    Thyagaraja
    Annamacharya
    Narayana Theertha (Govinda Shastry)
    MS.Subbulakshmi (born to Subramanyian Iyer and Veenai Shanmuka Vadivi)
    Shyama Shasthri
    Muthuswamy Dikshithar
    Bhaktha Ramdass (Kancherla Gopanna)
    Ramana Maharishi (VenkatRaman Iyer)
    Ramakrishna ParamaHamsa (Gadhadhar Chattopadhyay)
    Swamy Vivekanandha(Kayastha Brahmin)
    Balamuralikrishna
    Semmankudi Srinivas Iyer
    Sudha Raghunathan
    Hariharan
    Unnikrishnan
    Karthik

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