आरक्षण फिल्म का विरोध फासीवाद का नया संस्करण है!

♦ प्रकाश के रे

रक्षण फिल्म पर मौजूदा विवाद ने उन बहसों को जिंदा तो कर ही दिया है जो ऐसे मौकों पर होती रहती हैं, लेकिन इससे कुछ नयी चिंताएं भी उभरती हैं। उन बहसों में जाने के साथ-साथ इन नयी चिंताओं पर बात भी होनी चाहिए। इस मसले पर शुरुआती टिप्पणी के रूप में मैं उन्हीं को रेखांकित करने की कोशिश करूंगा।

मेरी पहली चिंता यह है कि इस फिल्म के विरोध की अगुआई कुछ ऐसे लोग कर रहे हैं, जो सामाजिक न्याय के संघर्ष में लगातार लगे हुए हैं और जो न्याय और स्वतंत्रता के उच्चतम आदर्शों के झंडाबरदार हैं। फिल्म अभी आधिकारिक तौर पर प्रदर्शित नहीं हुई है और कुछ नेताओं को छोड़कर फिल्म किसी ने नहीं देखी है। अगर फिल्म के आपत्तिजनक होने की उन्हें भनक थी, तो मेरे विचार से उन्हें फिल्म के रिलीज होने का इंतजार करना चाहिए था। खैर, एक परेशानी यह भी है कि विरोधों के कई केंद्र हैं और उनमें आपस में कोई तालमेल नहीं है। महाराष्ट्र के वरिष्ठ नेता छगन भुजबल ने पहले फिल्म को प्रतिबंधित करने की मांग की थी, लेकिन जब निर्देशक प्रकाश झा ने उन्हें फिल्म दिखायी तो वह संतुष्ट दिखे। कुछ ‘असंवेदनशील’ संवादों में फेरबदल की उनकी सलाह निर्देशक द्वारा मान लिये जाने के बाद उन्होंने अपना विरोध वापस ले लिया। लेकिन महाराष्ट्र के ही एक अन्य वरिष्ठ नेता रामदास आठवले फिल्म को रोकने की मांग पर अड़े हुए हैं। उन्होंने भी फिल्म को देखने की मांग की थी, जिसे शायद निर्देशक ने पूरा नहीं किया। फिल्म का प्रोमो देखकर ही श्री आठवले को इसके दलित-विरोधी होने का अंदाजा हो गया है। शायद कुछ लोगों में खत का मजमून लिफाफा देखकर भांपने की सलाहियत होती है। उत्तर प्रदेश की सरकार ने फिल्म को रोकते हुए ‘आपत्तिजनक’ संवादों को हटाने की मांग की है। सरकार ने यह निर्णय कुछ उच्च पदस्थ अधिकारियों द्वारा फिल्म को देखने के बाद लिया है। ठीक यही मांग राष्ट्रीय अनुसूचित जाति आयोग के अध्यक्ष पी एल पुनिया ने भी की है और इस आशय से सेंसर बोर्ड को अवगत करा दिया है। श्री पुनिया पिछले कुछ हफ्तों से फिल्म पर आपत्ति जता रहे थे। अब उदित राज ने कल फिल्म को रोकने के लिए सांसद के सामने प्रदर्शन की घोषणा कर दी है।

श्री पुनिया के सुझाव को सेंसर बोर्ड ने ठुकराते हुए फिल्म में किसी बदलाव के लिए निर्माता-निर्देशक को आदेश देने से इनकार कर दिया है और उसके प्रदर्शन के लिए हरी झंडी दे दी है। इस वजह से यह आशंका जतायी जा रही है कि आयोग और बोर्ड में ठन सकती है। हालांकि, समाचार-रिपोर्टों के मुताबिक, श्री पुनिया ने यह भी कहा है कि सेंसर बोर्ड अगर उनकी बात नहीं मानता है तो वह बोर्ड से कोई टकराव नहीं करेंगे। वैसे पुनिया साहब की गंभीरता का अनुमान इसी बात से लगाया जा सकता है कि आयोग की वेबसाइट पर इस बाबत कोई सूचना नहीं है। मेरी दूसरी चिंता यह है कि यह मसला सेंसर बोर्ड के अलावा अन्य संस्थाओं को भी फिल्मों को प्रमाणित करने की प्रक्रिया में प्रत्यक्ष या परोक्ष रूप से दखल देने के लिए उकसा सकता है। एक तो सेंसर बोर्ड अपने आप में बेमानी संस्था है और अब कई और तत्व उसकी भूमिका में आने की कोशिश कर फिल्मकारों के लिए और मुसीबत खड़ी कर सकते हैं।

मेरी तीसरी चिंता प्रगतिशीलों और जनवादियों की चुप्पी है। अगर यही हंगामा संघ-गिरोह के पेशेवर दंगाइयों ने किया होता तो यही लोग अब तक उनके खिलाफ गला फाड़ कर चिल्ल-पों मचा रहे होते। यह चुप्पी खतरनाक है। मुझे समझ में नहीं आता कि जिस तरह से आरक्षण फिल्म को रोकने की कोशिशें की जा रही हैं, वे मकबूल फिदा हुसैन, तसलीमा नसरीन, वाटर आदि मुद्दों से अलग कैसे हैं? यह विरोध फासीवाद का नया संस्करण है।

मेरी चौथी चिंता सामाजिक न्याय के कुछ झंडाबरदारों के निरंतर पतन से जुड़ी है। इनका दावा तो आधुनिकता और तार्किकता का है लेकिन वास्तव में अपनी दुकानदारी चमकाने का यह खेल है। आरक्षण फिल्म को लेकर खींचातानी की एक वजह उत्तर प्रदेश विधानसभा के आगामी चुनाव हैं। श्री पुनिया कांग्रेस की तरफ से बल्लेबाजी कर रहे हैं तो उधर बहन जी उन्हें अकेले सारा श्रेय देने को तैयार नहीं। लिहाजा तू डाल डाल, मैं पात पात का खेल चल रहा है। श्री उदित राज कुछ और करें न करें, फोटो खिंचाने का कोई मौका हाथ से नहीं जाने देना चाहते हैं। उनका सारा आंदोलन अखबारबाजी से चलता है। यही हाल महाराष्ट्र का है। भुजबल, आठवले, पाटिल वही कर रहे हैं जो राज ठाकरे और उद्धव ठाकरे करते हैं। सवाल मुशायरा लूटने का है और फिर वोट।

कुछ बातें मैं इन नेताओं और उनके समर्थकों के विचारार्थ रखना चाहता हूं। बात बात में पांच हजार साल का इतिहास खंगालने वाले इस बात पर क्यों चुप हैं कि बाबा साहेब का बड़े बांधों और तीव्र औद्योगिकीकरण पर क्या राय थी। आज विकास की जिन नीतियों के बुरे परिणाम पिछड़ा वर्ग के लोग, दलित और आदिवासी समुदाय को भुगतना पड़ रहा है, उसका कुछ दोष बाबा साहेब को भी दिया जाना चाहिए। पाकिस्तान के सवाल पर उनके विचारों पर बहस क्यों नहीं की जा रही है? मुझे पूरा यकीन है कि आज अगर बाबा साहेब जीवित होते तो वे न सिर्फ अपने उन विचारों पर पुनर्विचार करते, बल्कि इन बहसों का स्वागत भी करते। लेकिन उनके नाम पर मलाई काटने वाले कुछ लोगों को इससे क्या मतलब? कहां होते हैं ये लोग जब उन्हीं में से कोई कहता है कि बच्चों का डीएनए जांचा जाना चाहिए क्योंकि औरत के चरित्र पर भरोसा नहीं किया जा सकता? ऐसे विचार आपको सिर्फ फासीवाद में मिलेंगे जो रक्त-शुद्धता की बात करता है। क्या रवैया है इन नेताओं का महिला आरक्षण पर? इनमें से कौन हैं जो संघियों के साथ सांठ-गांठ में नहीं रहा? इनमें से कौन लड़ रहा है जमीन अधिग्रहण के खिलाफ? नियामगिरी के बारे में इनके बयान भी हों तो मुझे दिखाइए। परमाणु समझौते और परमाणु ऊर्जा पर क्या कहते हैं आरक्षण फिल्म को गलियाने वाले? कश्मीर, उत्तर-पूर्व और ग्रीन हंट को लेकर भुजबल से उदित राज तक की राजनीति क्या है?

(प्रकाश कुमार रे। सामाजिक-राजनीतिक सक्रियता के साथ ही पत्रकारिता और फिल्म निर्माण में सक्रिय। दूरदर्शन, यूएनआई और इंडिया टीवी में काम किया। फिलहाल जेएनयू से फिल्म पर रिसर्च। उनसे pkray11@gmail.com पर संपर्क कर सकते हैं।)

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