हर तरह के सिनेमा को जीने का हक है, उसे जीने दें …

♦ विनीत कुमार

हिंदी सिनेमा वाया दिल्‍ली पर मोहल्‍ला लाइव की ओर से आयोजित संवाद के दौरान और बाद में भी युवा मीडिया क्रिटिक विनीत कुमार ने फेसबुक पर कई स्‍टैटस लगाये। उनके कुछ स्‍टैटस हम यहां कॉपी-पेस्‍ट कर रहे हैं : मॉडरेटर

गांड, चोद (अनुराग कश्यप) के बाद अब बहनचोद और बंदूक की तरह खड़ा लौड़ा (मोहल्‍ला लाइव के) सेमिनारों में बड़े इत्मीनान से इस्तेमाल किया जाने लगा है। दर्शक किस दैवी शक्ति से इसे पचा ले रहे हैं, नहीं मालूम। लेकिन मैंने जो बात कही थी कि गालियों का अगर बहुत इस्तेमाल होने लगे तो ये किसी भी विधा के लिए रिवेन्यू जेनरेट करने का जरिया नहीं रह जाएगा।

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मुझे ये बहुत दोहरे चरित्र का मामला लगता है। मीडिया और सिनेमा के लोग पहले तो सारा खेल पैसे, लागत और धंधे का बताते हैं और फिर जब आप एक उपभोक्ता की हैसियत से बात करने लगें, तो वो उसे उत्पाद के बजाय मीडिया और सिनेमा बताने लग जाते हैं। अक्षत वर्मा ने सेमिनार में कुछ ऐसा ही किया। उसका कहना है कि दर्शक ये मांग करने के बजाय कि आप इस पर फिल्म क्यों नहीं बनाते, खुद ही फिल्म बना लें।

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महमूद की ये बात बहुत अच्छी लगी कि पहले जो कस्बाई इंटेलेक्ट के लोग सिनेमा बनाते थे, तो उसमें पूरे देश की चिंता होती थी लेकिन अब मेट्रो इंटेलेक्ट सिर्फ मेट्रो तक जाकर सीमित हो जाते हैं। आज जिन फिल्मों को हम अलग किस्म की फिल्में बता रहे हैं, मुझे नहीं पता कि ये किस तरह की क्लासिकल बनाएंगे?

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मीडिया और सिनेमा आलोचना ने अपनी रीढ़ इतनी मजबूत नहीं की है कि वो फिल्मकारों के आगे, उनकी छवि से प्रभावित हुए बिना बेबाक तरीके से अपनी बात रख सकें। फिल्म की किसी भी स्तर की सफलता आलोचक को ऐसा करने के पहले भय से रोकती है। यही कारण है कि हिंदुस्तान में सिनेमा और मीडिया की लोकप्रियता के बावजूद उसकी आलोचना अपनी स्वतंत्र टाट नहीं जमा पाया।

अक्षत वर्मा ने एक सही बात कही कि क्लासिकल माने क्या? आज आप जिसे बेकार कह रहे हैं, कल वो आपके लिए क्लासिकल हो जाएगी। सिनेमा के साथ ऐसा हुआ भी है। अक्षत की बात को मैं महसूस करता हूं कि डीडीएलजे के वक्त इस फिल्म को लेकर नाक-भौं सिकोड़ी गयी थी, लेकिन अब उसे उदारवादी हिंदुस्तान की प्रेमकथा के तौर पर सिलेब्रेट किया जाता है।

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अक्षत का कहना था कि हर तरह के सिनेमा को जीने का हक है। सही बात है। लेकिन ऐसा कहते हुए अक्षत दर्शकों के प्रतिक्रियावादी होने की संभावना पर शायद गंभीरता से विचार नहीं कर रहे। बिना रिलीज हुए आरक्षण फिल्म को लेकर इतना विवाद और रिलीज न होने देने की कवायद शायद अक्षत जैसे बाकी फिल्मकारों की मांग से ही पैदा होती है।

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रवीश ने जिस दिल्ली की बात की है, दरअसल वो जीने के स्तर पर बहुसंख्यक है लेकिन सिनेमा में या तो पूरी तरह गायब या फिर सैंपल के स्तर पर है। रवीश की दिल्ली पर पूरी की पूरी एक फिल्म बनने की गुंजाइश है। हमने आज रवीश को बोलते हुए ज्यादा बेहतर ढंग से महसूस किया।

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हम जब अपने घर से दूर होते हैं, तो उसके महत्व को ज्यादा बेहतर समझ पाते हैं। मैं अमेरिका मे रहते हुए अपने को ज्यादा दिल्लीवाला मान रहा था। अक्षत का ये एहसास दरअसल हम सब का साझा एहसास है। किसी का कॉपीराइट न हो तो दूर होकर अपने घर को बेहतर समझने का तरीका इक्सक्लूसिव नहीं है।

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पहले तो अक्षत थोड़ा इस तरह से बात कर रहे थे कि जैसे पहले जहां-तहां जो भी डेली-बेली को लेकर आरोप लगे हैं, उनकी सफाई में अपनी बात रख रहे हों लेकिन सवाल-जवाब के सत्र में आते ही उन्होंने ईमानदारी से सिनेमा जैसे पेशे की जटिलताओं और झंझटों पर ईमानदारी से बात की। उनकी बातचीत का वो सबसे प्रभावी हिस्सा था कि देखिए ये इंटेलेक्ट तो अपनी जगह है लेकिन असल मामला धंधे और पैसे का ही है।

(विनीत कुमार। युवा और तीक्ष्‍ण मीडिया विश्‍लेषक। ओजस्‍वी वक्‍ता। दिल्‍ली विश्‍वविद्यालय से शोध। मशहूर ब्‍लॉग राइटर। कई राष्‍ट्रीय सेमिनारों में हिस्‍सेदारी, राष्‍ट्रीय पत्र-पत्रिकाओं में नियमित लेखन। हुंकार और टीवी प्‍लस नाम के दो ब्‍लॉग। उनसे vineetdu@gmail.com पर संपर्क किया जा सकता है।)

विनीत कुमार की बाकी पोस्‍ट पढ़ें : mohallalive.com/tag/vineet-kumar

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