सरकारी और जन नहीं, आमजन लोकपाल की बात की जाए

♦ गोपाल कृष्‍ण

ज के दिन आम आदमी लोकपाल के अलावा संसद और राज्य की विधानसभाओं से यह मांग कर रहा है कि देश को गैर सरकारी संस्थानों के जन्मदाता 1860 के और 1882 के ब्रिटिश संसद द्वारा पारित कानून से आजाद किया जाए। अधिकतर गैर सरकारी संस्थानों की ऐतिहासिक और राजनीतिक समझ का अंदाजा इस बात से ही लगाया जा सकता है कि उन्होंने यूनिक आइडेंटिटी नंबर / आधार संख्या / नेशनल पॉपुलेशन रजिस्टर जैसी गुलामी की बेड़ी को देश के हुक्मरानों और कंपनियों के आश्वासन पर ईमानदारी की जादुई ताबीज मान लिया है। अभी-अभी विकिलीक्स से पता चला है कि मिस्र के पूर्व तानाशाह होस्नी मुबारक ने अपने देशवासियों का यूनिक आइडेंटिटी (पहचान) पत्र का संग्रह (डेटाबेस), संयुक्त राष्ट्र अमेरिका की गुप्तचर संस्था फेडेरल ब्यूरो ऑफ इनवेस्टीगेशन को सौंप दिया था। जून 29, 2011 को मनमोहन सिंह ने छह संपादकों से बातचीत में ‘लोकपाल’ के बजाय यूनिक आइडेंटिटी नंबर / आधार संख्या से भ्रष्टाचार मिटाने की बात की है। हैरानी की बात है कि गैर सरकारी संस्थानों को यह नजर क्यों नहीं आया!

सत्ता परिवर्तन के बजाय अगर व्यवस्था परिवर्तन लक्ष्य है, तो केवल लोकपाल से तो ये होने से रहा। आपातकाल के दौरान हुए आंदोलन से जुड़े अधिकतर लोग अपनी-अपनी गैर सरकारी संस्थान की दुकान खोल कर क्यों बैठ गये? इससे पहले कि वे संन्‍यास लें या विस्मृति के गर्त में चले जाएं, हमें जवाब चाहिए। उन्होंने अपने आंदोलन को विश्व इतिहास के संदर्भ में क्यों नहीं खंगाला और ‘संपूर्ण क्रांति’ शब्द को क्यों अर्थहीन किया? अब वे और उनसे जुड़े लोग बताएं कि क्या लोकपाल से ‘संपूर्ण क्रांति’ होगी?

इसमें भी एक बात तो सरकारी लोकपाल की है। दूसरी अन्ना जी की सदारत में जन लोकपाल की है। तीसरी बात है आम जन लोकपाल की।

इन तीनों में शायद एक बात की सहमति है कि देश की राजनीतिक और प्रशासनिक व्यवस्था में जहर घोल दिया है, कंपनी के मालिकान ने। और अब बड़ी चालाकी से इन तीनों को आमने-सामने कर दिया है। इन तीनों में मेरी सहमति आम जन लोकपाल से है। अभी पिछले दिनों संसद के पुस्तकालय में मेरी नजर 9 मई 1968 के ‘लोकपाल और लोकायुक्त विधेयक’ पर पड़ी, जिसे तत्कालीन गृह मंत्री यशवंतराव बलवंतराव चव्हाण ने लोकसभा में पेश किया था। उसी के पास लोकपाल विधेयक, 1977 भी रखा हुआ था, जिसे राजनीतिक बदलाव के बाद तत्कालीन गृह मंत्री चरण सिंह ने पेश किया था, जब शांति भूषण कानून मंत्री हुआ करते थे। सन 1971 में भी ‘लोकपाल और लोकायुक्त विधेयक’ तत्कालीन गृह राज्य मंत्री राम निवास मिर्धा ने लोकसभा में पेश किया था। लोकपाल विधेयक को 1985 में कानून मंत्री अशोक कुमार सेन ने, 1989 में कानून मंत्री दिनेश गोस्वामी ने, 1996 में कार्मिक, लोक शिकायत तथा पेंशन राज्य मंत्री एसआर बाला सुब्रमण्यम, 1998 में कार्मिक, लोक शिकायत तथा पेंशन राज्य मंत्री कदांबुर ने और 2001 में कार्मिक, लोक शिकायत तथा पेंशन राज्य मंत्री वसुंधरा राजे ने लोकसभा में पेश किया था। इस संबंध में संसदीय समिति गृह मंत्रालय ने 1996, 1998 और 2001 में अपनी रिपोर्ट भी संसद में रखी थी। एक बार फिर चालीस पन्नों वाला लोकपाल विधेयक, 4 अगस्त, 2011 को लोकसभा में कार्मिक, लोक शिकायत तथा पेंशन राज्य मंत्री वी नारायणस्‍वामी ने पेश कर दिया गया है।

अगस्त 8 को पीटीआई की एक खबर से पता चला कि राज्‍यसभा के सभापति और उपराष्ट्रपति हामिद अंसारी ने इस विधेयक को कांग्रेस प्रवक्ता और राज्‍यसभा सांसद अभिषेक मनु सिंघवी की अध्यक्षता वाली संसदीय समिति कार्मिक, लोक शिकायत तथा पेंशन को सौंप दिया है। जिस सरकार ने इसे पेश किया है, उसमें और जो संसदीय समिति इसकी पड़ताल करेगी, उसमें ‘संपूर्ण क्रांति’ की बात करने वाले लोग भी शामिल हैं। इस संसदीय समिति में 6 और सांसदों की भर्ती होना बाकी है। आनेवाले दिनों में इसमें किस-किस की भर्ती होती है, वह देखना राजनीतिक रूप से दिलचस्प होगा।

संसद में और संसद के बाहर क्या कोई है, जो बताएगा कि ऐसा क्यों हुआ कि 1968 से 1977 तक लोकपाल का मामला गृह मंत्रालय के तहत आता था, वह 1985 में कानून मंत्रालय में चला गया और फिर कार्मिक, लोक शिकायत तथा पेंशन मंत्रालय के पास? समय के साथ सरकार की लोकपाल के संबंध में तत्परता में प्राथमिकता कम होती जा रही है। ऐसा क्यों है कि जब यह स्पष्ट हो गया है कि लोकसभा इस विधेयक को पारित करने में 1968 से 2001 तक नाकामयाब रही है, फिर भी विधेयक को लोकसभा में ही क्यों पेश किया गया। ऐसे ऐतिहासिक और भारी-भरकम विधेयक का बोझ लोकसभा के कंधे पे डाल कर यही साबित होता है कि आम जन लोकपाल, जन लोकपाल की तो छोड़िये, सरकार अपने विधेयक को लेकर भी जरा भी गंभीर नहीं है, अन्यथा इसे राज्‍यसभा में पेश किया जाता जैसे कि महिला आरक्षण विधेयक के संबंध में किया गया। सरकार चाहती है कि इस विधेयक का अंजाम भी वही हो, जो अतीत में पेश किये गये विधेयकों का हुआ। सभी दल सरकार में रहे हैं और उन्होंने बहुत कड़ी मेहनत की है। मगर उनमें इच्छाशक्ति इतनी नहीं थी कि वह ‘सरकारी लोकपाल’ विधेयक संसद से पारित करा पाते।

राजनीतिक दलों में इच्छाशक्ति राष्ट्रीय पहचान प्राधिकरण विधेयक, 2010 को खंगालने की भी नहीं है, जो कि सरकार का आम नागरिक समाज के खिलाफ असली हथियार है, जबकि बिना विधेयक के पारित हुए बिना ही एक करोड़ नब्‍बे लाख यूनिक आइडेंटिटी नंबर / आधार संख्या बना लिये गये हैं, जो नेशनल पॉपुलेशन रजिस्टर (राष्ट्रीय जनसंख्या रजिस्टर) से जुड़ा हुआ है, जिसे देशवासियों की आंखों की पुतलियों, उंगलियों के निशान और तस्वीर के आधार पर बनाया जा रही है, जो कि अमानवीय है।

राजनीतिक दलों में इच्छाशक्ति का अभाव कंपनी विधेयक, 2009 के संबंध में भी दिख रहा है, जिसे जेजे ईरानी समिति की सिफारिशों के आधार पर बनाया गया है। इसके तहत केवल एक व्यक्ति भी कंपनी बना सकता है। भारत की आर्थिक गणना 2005 के अनुसार देश में 4 करोड़ 20 लाख लोग उद्योग धंधे में हैं, जबकि कंपनियों की संख्या तीन लाख से भी कम है। इस कानून के जरिये चार करोड़ बीस लाख उद्योग धंधों का कंपनीकरण किया जा रहा है, मगर गैर सरकारी संस्थानों को इसे खंगालने की फुर्सत या नीयत नहीं है। जबकि नये कॉर्पोरेट मामलों के मंत्री वीरप्पा मोइली इसे पारित करवाने को अपनी प्राथमिकता बता रहे हैं। कंपनी कानून को नजरअंदाज ऐसे देश में किया जा रहा है, जो 23 जून को ब्रिटिश ईस्ट इंडिया कंपनी से अपने पराजित होने और शोषित होने का अपनी 254वीं वर्षगांठ मनाने से कतरा रहा है। इसी दिन की हार के कारण ब्रिटिश संसद को भारत के संबंध में कानून बनाने का अधिकार मिला। उसमें ब्रिटिश कंपनी कानून भी शामिल है, जिसे भारत ने बड़ी मासूमियत से अपना लिया। देश और सरकार का भी कंपनीकरण किया जा रहा है। गैर सरकारी संस्थानों और कंपनी आधारित अखबारों और चैनलों से यह उम्मीद करना कि वे देश और सरकार के कंपनीकरण को रोकेंगे, इसकी कल्पना करना भी मुश्किल है।

अन्ना जी की सदारत वाला जन लोकपाल ‘सरकारी लोकपाल’ को आईना दिखा रहा है। आईना दिखाना तो ठीक है। मगर अन्ना जी गैर सरकारी संस्थानों के बड़े तबके और उन जनों की तरफ से बोल रहे हैं, जो काले धन से तो पीड़ित हैं, मगर काले धन पर आधारित राजनीतिक और आर्थिक व्यवस्था को बदलने की पहल अब तक नहीं कर पाये हैं। गैर सरकारी संस्थानों का जन्म 1860 के और 1882 के ब्रिटिश संसद द्वारा पारित कानून से हुआ है। यह संस्थान, कानूनी तो हैं पर असल में सामाजिक, लोकतांत्रिक और शायद संवैधानिक भी नहीं हैं। उन्हें यह भी याद नहीं कि महात्मा गांधी ने एशियाटिक रजिस्ट्रेशन एक्ट, 1907 का विरोध इसलिए किया था क्योंकि वह उंगलियों की निशानदेही पर आधारित था, ठीक वैसे ही, जैसा कि यूनिक आइडेंटिटी नंबर / आधार संख्या और नेशनल पॉपुलेशन रजिस्टर (राष्ट्रीय जनसंख्या रजिस्टर) में हो रहा है। ब्रिटिश सरकार के इस कानून, जिसके तहत एशिया और भारत के लोगों को पहचान पत्र दिये जा रहे थे, उसे काला कानून कहा था और उसे सरे-आम जला दिया था। उन्होंने शोध कर यह कहा कि उंगलियों की निशानदेही से संबंधित वो किताब जिसे एक पुलिस अफसर ने लिखा था, उससे ये पता चलता है कि “उंगलियों की निशानदेही की जरूरत केवल अपराधियों के लिए होती है।” अन्ना जी की सदारत वाली जन लोकपाल टीम को भी अपने विचार और अभियान को महात्मा गांधी के आईने में देखना होगा।

सच यह है कि कुछेक को छोड़ कर गैर सरकारी संस्थानों में सब गमले में उगे हुए बरगद हैं। उनके होने मात्र से ब्रिटिश संसद की 1857 की पहली आजादी की लड़ाई के बाद की कारस्तानियों की याद ताजा हो जाती है। गैर सरकारी संस्थान आम जन का प्रतिनिधित्व नहीं करते हैं। कंपनियों की तानाशाही, उनके अपराधों और राजनीतिक दल की फंडिंग के बारे में अगर वो खुल कर बोलते हैं, तो हम उनका सम्मान तो कर सकते हैं, मगर ऐसा नहीं कह सकते कि वे आम जन का प्रतिनिधित्व करते हैं। भारत में 2009 के एक अनुमान के मुताबिक 33 लाख गैर सरकारी संस्थान हैं। इतने तो अपने देश में स्कूल और अस्पताल भी नहीं हैं। यदि यह सारे अन्ना जी के साथ आ भी जाएं, तो भी ऐसा नहीं कह सकते कि वे सारे आम जनों की तरफ से बोल रहे हैं।

अविभाजित भारत (पाकिस्तान और बंगलादेश सहित) पर जो असर 1860 के और 1882 के ब्रिटिश संसद द्वारा पारित गैर सरकारी संस्थानों के निर्माण के कानून का पड़ा है, उसी का ये नतीजा है कि इस इलाके में आम जन त्राहि-त्राहि कर रहे हैं, मगर कोई पुख्ता और सचमुच का आंदोलन खड़ा नहीं हो पा रहा है। आम जन लोकपाल की मांग है कि गैर सरकारी संस्थानों से जुड़े कानूनों को निरस्त किया जाए। और 1860 से लेकर अब तक जितने गैर सरकारी संस्थान बने हैं, उन पर एक श्वेत पत्र लाया जाए। गैर सरकारी संस्थानों से अनेक भले लोग विकल्पहीनता के कारण भी जुड़े हैं।

जहां तक जन लोकपाल और आम जन लोकपाल की बात है, उसमें संवाद की गुंजाइश है, अगर 1860 के और 1882 के ब्रिटिश संसद द्वारा पारित गैर सरकारी संस्थानों के निर्माण के कानून, कंपनी कानून और अनूठी पहचान / आधार संख्या के नागरिक विरोधी होने की बात पर सहमति बने और टुकड़े-टुकड़े में बात करने के बजाय सचमुच का साझा, लोकतांत्रिक मंच बनाये, जिसमें नागरिक होना प्राथमिक हो न कि व्यवसायी होना या व्यवसायियों से जुड़े होना।

(गोपाल कृष्‍ण। पानी और पर्यावरण पर काम करनेवाले गोपाल कृष्ण शिपब्रेकिंग उद्योग, एसबेस्ट्स और कचरा प्रबंधन में घातक तकनीकी से उत्पन्न खतरों पर लगातार सक्रिय लेखन और आंदोलन कर रहे हैं। बैन एसबेस्टस नेटवर्क के संयोजक। जेएनयू में पब्लिक हेल्थ पर शोधरत। उनसे krishna2777@gmail.com पर संपर्क किया जा सकता है।)

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