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कोई अन्‍ना नहीं है! न इंडिया अन्‍ना है, न मैं अन्‍ना हूं!!


♦ अरुंधती रॉय

असह्य हो चुके भ्रष्‍टाचार के खिलाफ जन लोकपाल बिल के लिए चल रहे अनशन-आंदोलन को लेकर कल द हिंदू में अरुधंती राय ने एक लेख लिखा। मनोज पटेल ने उसका हिंदी अनुवाद किया है और पढ़ते-पढ़ते पर उसे उपलब्‍ध कराया है। हम इसे वहीं से कॉपी-पेस्‍ट कर रहे हैं : मॉडरेटर

जो ..कुछ भी हम टीवी पर देख रहे हैं अगर वह सचमुच क्रांति है, तो हाल फिलहाल यह सबसे शर्मनाक और समझ में न आने वाली क्रांति होगी। इस समय जन लोकपाल बिल के बारे में आपके जो भी सवाल हों उम्मीद है कि आपको ये जवाब मिलेंगे : किसी एक पर निशान लगा लीजिए – (अ) वंदे मातरम, (ब) भारत माता की जय, (स) इंडिया इज अन्ना, अन्ना इज इंडिया, (द) जय हिंद।

आप यह कह सकते हैं कि, बिलकुल अलग वजहों से और बिलकुल अलग तरीके से, माओवादियों और जन लोकपाल बिल में एक बात सामान्य है। वे दोनों ही भारतीय राज्य को उखाड़ फेंकना चाहते हैं। एक नीचे से ऊपर की ओर काम करते हुए, मुख्यतया सबसे गरीब लोगों से गठित आदिवासी सेना द्वारा छेड़े गये सशस्त्र संघर्ष के जरिये, तो दूसरा ऊपर से नीचे की तरफ काम करते हुए ताजा-ताजा गढ़े गये एक संत के नेतृत्व में, अहिंसक गांधीवादी तरीके से जिसकी सेना में मुख्यतया शहरी और निश्चित रूप से बेहतर जिंदगी जी रहे लोग शामिल हैं। (इस दूसरे वाले में सरकार भी खुद को उखाड़ फेंके जाने के लिए हर संभव सहयोग करती है।)

अप्रैल 2011 में, अन्ना हजारे के पहले “आमरण अनशन” के कुछ दिनों बाद भ्रष्टाचार के बड़े-बड़े घोटालों से, जिसने सरकार की साख को चूर-चूर कर दिया था, जनता का ध्यान हटाने के लिए सरकार ने टीम अन्ना को (“सिविल सोसायटी” ग्रुप ने यही ब्रांड नाम चुना है) नये भ्रष्टाचार विरोधी कानून की ड्राफ्टिंग कमेटी में शामिल होने का न्योता दिया। कुछ महीनों बाद ही इस कोशिश को धता बताते हुए उसने अपना खुद का विधेयक संसद में पेश कर दिया, जिसमें इतनी कमियां थीं कि उसे गंभीरता से लिया ही नहीं जा सकता था।

फिर अपने दूसरे “आमरण अनशन” के लिए तय तारीख 16 अगस्त की सुबह, अनशन शुरू करने या किसी भी तरह का अपराध करने के पहले ही अन्ना हजारे को गिरफ्तार कर जेल में डाल दिया गया। जन लोकपाल बिल के लिए किया जाने वाला संघर्ष अब विरोध करने के अधिकार के लिए संघर्ष और खुद लोकतंत्र के लिए संघर्ष से जुड़ गया। इस ‘आजादी की दूसरी लड़ाई’ के कुछ ही घंटों के भीतर अन्ना को रिहा कर दिया गया। उन्होंने होशियारी से जेल छोड़ने से इनकार कर दिया, बतौर एक सम्मानित मेहमान तिहाड़ जेल में बने रहे और किसी सार्वजनिक स्थान पर अनशन करने के अधिकार की मांग करते हुए वहीं पर अपना अनशन शुरू कर दिया। तीन दिनों तक जबकि तमाम लोग और टीवी चैनलों की वैन बाहर जमी हुई थीं, टीम अन्ना के सदस्य उच्च सुरक्षा वाली इस जेल में अंदर-बाहर डोलते रहे और देश भर के टीवी चैनलों पर दिखाये जाने के लिए उनके वीडियो संदेश लेकर आते रहे। (यह सुविधा क्या किसी और को मिल सकती है?) इस बीच दिल्ली नगर निगम के 250 कर्मचारी, 15 ट्रक और 6 जेसीबी मशीनें कीचड़ युक्त रामलीला मैदान को सप्ताहांत के बड़े तमाशे के लिए तैयार करने में दिन रात लगे रहे। अब कीर्तन करती भीड़ और क्रेन पर लगे कैमरों के सामने, भारत के सबसे महंगे डाक्टरों की देखरेख में, बहुप्रतीक्षित अन्ना के आमरण अनशन का तीसरा दौर शुरू हो चुका है। टीवी उद्घोषकों ने हमें बताया कि “कश्मीर से कन्याकुमारी तक भारत एक है।”

उनके तौर-तरीके गांधीवादी हो सकते हैं, मगर अन्ना हजारे की मांगें कतई गांधीवादी नहीं हैं। सत्ता के विकेंद्रीकरण के गांधी जी के विचारों के विपरीत जन लोकपाल बिल एक कठोर भ्रष्टाचार निरोधी कानून है, जिसमें सावधानीपूर्वक चुने गये लोगों का एक दल हजारों कर्मचारियों वाली एक बहुत बड़ी नौकरशाही के माध्यम से प्रधानमंत्री, न्यायपालिका, संसद सदस्य और सबसे निचले सरकारी अधिकारी तक यानी पूरी नौकरशाही पर नियंत्रण रखेगा। लोकपाल को जांच करने, निगरानी करने और अभियोजन की शक्तियां प्राप्त होंगी। इस तथ्य के अतिरिक्त कि उसके पास खुद की जेलें नहीं होंगी। यह एक स्वतंत्र निजाम की तरह कार्य करेगा, उस मुटाये, गैरजिम्मेदार और भ्रष्ट निजाम के जवाब में जो हमारे पास पहले से ही है। एक की बजाय, बहुत थोड़े से लोगों द्वारा शासित दो व्यवस्थाएं।

यह काम करेगी या नहीं, यह इस बात पर निर्भर करता है कि भ्रष्टाचार के प्रति हमारा दृष्टिकोण क्या है? क्या भ्रष्टाचार सिर्फ एक कानूनी सवाल, वित्तीय अनियमितता या घूसखोरी का मामला है या एक बेहद असमान समाज में सामाजिक लेन-देन की व्यापकता है, जिसमें सत्ता थोड़े से लोगों के हाथों में संकेंद्रित रहती है? मसलन शापिंग मालों के एक शहर की कल्पना करिए, जिसकी सड़कों पर फेरी लगाकर सामान बेचना प्रतिबंधित हो। एक फेरी वाली, हल्के के गश्ती सिपाही और नगर पालिका वाले को एक छोटी सी रकम घूस में देती है ताकि वह कानून के खिलाफ उन लोगों को अपने सामान बेच सके, जिनकी हैसियत शापिंग मालों में खरीददारी करने की नहीं है। क्या यह बहुत बड़ी बात होगी? क्या भविष्य में उसे लोकपाल के प्रतिनिधियों को भी कुछ देना पड़ेगा? आम लोगों की समस्याओं के समाधान का रास्ता ढांचागत असमानता को दूर करने में है या एक और सत्ता केंद्र खड़ा कर देने में, जिसके सामने लोगों को झुकना पड़े।

अन्ना की क्रांति का मंच और नाच, आक्रामक राष्ट्रवाद और झंडे लहराना सब कुछ आरक्षण विरोधी प्रदर्शनों, विश्व कप जीत के जुलूसों और परमाणु परीक्षण के जश्नों से उधार लिया हुआ है। वे हमें इशारा करते हैं कि अगर हमने अनशन का समर्थन नहीं किया तो हम ‘सच्चे भारतीय’ नहीं हैं। चौबीसों घंटे चलने वाले चैनलों ने तय कर लिया है कि देश भर में और कोई खबर दिखाये जाने लायक नहीं है।

यहां अनशन का मतलब मणिपुर की सेना को केवल शक की बिना पर हत्या करने का अधिकार देने वाले कानून AFSPA के खिलाफ इरोम शर्मिला के अनशन से नहीं है, जो दस साल तक चलता रहा (उन्हें अब जबरन भोजन दिया जा रहा है)। अनशन का मतलब कोडनकुलम के दस हजार ग्रामीणों द्वारा परमाणु बिजली घर के खिलाफ किये जा रहे क्रमिक अनशन से भी नहीं है जो इस समय भी जारी है। ‘जनता’ का मतलब मणिपुर की जनता से नहीं है, जो इरोम के अनशन का समर्थन करती है। वे हजारों लोग भी इसमें शामिल नहीं हैं जो जगतसिंहपुर या कलिंगनगर या नियमगिरि या बस्तर या जैतपुर में हथियारबंद पुलिसवालों और खनन माफियाओं से मुकाबला कर रहे हैं। ‘जनता’ से हमारा मतलब भोपाल गैस त्रासदी के पीड़ितों और नर्मदा घाटी के बांधों के विस्थापितों से भी नहीं होता। अपनी जमीन के अधिग्रहण का प्रतिरोध कर रहे नोएडा या पुणे या हरियाणा या देश में कहीं के भी किसान ‘जनता’ नहीं हैं।

‘जनता’ का मतलब सिर्फ उन दर्शकों से है, जो 74 साल के उस बुजुर्गवार का तमाशा देखने जुटी हुई है, जो धमकी दे रहे हैं कि वे भूखे मर जाएंगे यदि उनका जन लोकपाल बिल संसद में पेश करके पास नहीं किया जाता। वे दसियों हजार लोग ‘जनता’ हैं, जिन्हें हमारे टीवी चैनलों ने करिश्माई ढंग से लाखों में गुणित कर दिया है, ठीक वैसे ही जैसे ईसा मसीह ने भूखों को भोजन कराने के लिए मछलियों और रोटी को कई गुना कर दिया था। “एक अरब लोगों की आवाज” हमें बताया गया। “इंडिया इज अन्ना।”

वह सचमुच कौन हैं, यह नये संत, जनता की यह आवाज? आश्चर्यजनक रूप से हमने उन्हें जरूरी मुद्दों पर कुछ भी बोलते हुए नहीं सुना है। अपने पड़ोस में किसानों की आत्महत्याओं के मामले पर या थोड़ा दूर आपरेशन ग्रीन हंट पर, सिंगूर, नंदीग्राम, लालगढ़ पर, पास्को, किसानों के आंदोलन या सेज के अभिशाप पर, इनमें से किसी भी मुद्दे पर उन्होंने कुछ भी नहीं कहा है। शायद मध्य भारत के वनों में सेना उतारने की सरकार की योजना पर भी वे कोई राय नहीं रखते।

हालांकि वे राज ठाकरे के मराठी माणूस गैर-प्रांतवासी द्वेष का समर्थन करते हैं और वे गुजरात के मुख्यमंत्री के विकास माडल की तारीफ भी कर चुके हैं, जिन्‍होंने 2002 में मुस्लिमों की सामूहिक हत्याओं का इंतजाम किया था। (अन्ना ने लोगों के कड़े विरोध के बाद अपना वह बयान वापस ले लिया था, मगर संभवतः अपनी वह सराहना नहीं।)

इतने हंगामे के बावजूद गंभीर पत्रकारों ने वह काम किया है, जो पत्रकार किया करते हैं। राष्ट्रीय स्वयंसेवक संघ के साथ अन्ना के पुराने रिश्तों की स्याह कहानी के बारे में अब हम जानते हैं। अन्ना के ग्राम समाज रालेगान सिद्धि का अध्ययन करने वाले मुकुल शर्मा से हमने सुना है कि पिछले 25 सालों से वहां ग्राम पंचायत या सहकारी समिति के चुनाव नहीं हुए हैं। ‘हरिजनों’ के प्रति अन्ना के रुख को हम जानते हैं : “महात्मा गांधी का विचार था कि हर गांव में एक चमार, एक सुनार, एक लुहार होने चाहिए और इसी तरह से और लोग भी। उन सभी को अपना काम अपनी भूमिका और अपने पेशे के हिसाब से करना चाहिए, इस तरह से हर गांव आत्म-निर्भर हो जाएगा। रालेगान सिद्धि में हम यही तरीका आजमा रहे हैं।” क्या यह आश्चर्यजनक है कि टीम अन्ना के सदस्य आरक्षण विरोधी (और योग्यता समर्थक) आंदोलन यूथ फार इक्वेलिटी से भी जुड़े रहे हैं? इस अभियान की बागडोर उन लोगों के हाथ में है, जो ऐसे भारी आर्थिक अनुदान पाने वाले गैर सरकारी संगठनों को चलाते हैं, जिनके दानदाताओं में कोका कोला और लेहमन ब्रदर्स भी शामिल हैं। टीम अन्ना के मुख्य सदस्यों में से अरविंद केजरीवाल और मनीष सिसोदिया द्वारा चलाये जाने वाले कबीर को पिछले तीन सालों में फोर्ड फाउंडेशन से चार लाख डालर मिल चुके हैं। इंडिया अगेंस्ट करप्शन अभियान के अंशदाताओं में ऎसी भारतीय कंपनियां और संस्थान शामिल हैं, जिनके पास अल्युमिनियम कारखाने हैं, जो बंदरगाह और सेज बनाते हैं, जिनके पास भू-संपदा के कारोबार हैं और जो करोड़ों करोड़ रुपये के वित्तीय साम्राज्य वाले राजनीतिकों से घनिष्ठ रूप से संबद्ध हैं। उनमें से कुछ के खिलाफ भ्रष्टाचार एवं अन्य अपराधों की जांच भी चल रही है। आखिर वे इतने उत्साह में क्यों हैं?

याद रखिए कि विकीलीक्स द्वारा किये गये शर्मनाक खुलासों और एक के बाद दूसरे घोटालों के उजागर होने के समय ही जन लोकपाल बिल के अभियान ने भी जोर पकड़ा। इन घोटालों में 2 जी स्पेक्ट्रम घोटाला भी था, जिसमें बड़े कारपोरेशनों, वरिष्ठ पत्रकारों, सरकार के मंत्रियों और कांग्रेस तथा भाजपा के नेताओं ने तमाम तरीके से साठ-गांठ करके सरकारी खजाने का हजारों करोड़ रुपया चूस लिया। सालों में पहली बार पत्रकार और लाबीइंग करने वाले कलंकित हुए और ऐसा लगा कि कारपोरेट इंडिया के कुछ प्रमुख नायक जेल की सींखचों के पीछे होंगे। जनता के भ्रष्टाचार-विरोधी आंदोलन के लिए बिल्कुल सटीक समय। मगर क्या सचमुच?

ऐसे समय में जब राज्य अपने परंपरागत कर्तव्यों से पीछे हटता जा रहा है और निगम और गैर सरकारी संगठन सरकार के क्रियाकलापों को अपने हाथ में ले रहे हैं (जल एवं विद्युत् आपूर्ति, परिवहन, दूरसंचार, खनन, स्वास्थ्य, शिक्षा); ऐसे समय में जब कारपोरेट के स्वामित्व वाली मीडिया की डरावनी ताकत और पहुंच लोगों की कल्पना शक्ति को नियंत्रित करने की कोशिश में लगी है; किसी को सोचना चाहिए कि ये संस्थान भी – निगम, मीडिया और गैर सरकारी संगठन – लोकपाल के अधिकार-क्षेत्र में शामिल किये जाने चाहिए। इसकी बजाय प्रस्तावित विधेयक उन्हें पूरी तरह से छोड़ देता है।

अब औरों से ज्यादा तेज चिल्लाने से, ऐसे अभियान को चलाने से जिसके निशाने पर सिर्फ दुष्ट नेता और सरकारी भ्रष्टाचार ही हो, बड़ी चालाकी से उन्होंने खुद को फंदे से निकाल लिया है। इससे भी बदतर यह कि केवल सरकार को राक्षस बताकर उन्होंने अपने लिए एक सिंहासन का निर्माण कर लिया है, जिस पर बैठकर वे सार्वजनिक क्षेत्र से राज्य के और पीछे हटने और दूसरे दौर के सुधारों को लागू करने की मांग कर सकते हैं – और अधिक निजीकरण, आधारभूत संरचना और भारत के प्राकृतिक संसाधनों तक और अधिक पहुंच। ज्यादा समय नहीं लगेगा, जब कारपोरेट भ्रष्टाचार को कानूनी दर्जा देकर उसका नाम लाबीइंग शुल्क कर दिया जाएगा।

क्या ऎसी नीतियों को मजबूत करने से, जो उन्हें गरीब बनाती जा रही है और इस देश को गृह युद्ध की तरफ धकेल रही है, 20 रुपये प्रतिदिन पर गुजर कर रहे तिरासी करोड़ लोगों का वाकई कोई भला होगा?

यह डरावना संकट भारत के प्रतिनिधिक लोकतंत्र के पूरी तरह से असफल होने की वजह से पैदा हुआ है। इसमें विधायिका का गठन अपराधियों और धनाढ्य राजनीतिज्ञों से हो रहा है, जो जनता की नुमाइंदगी करना बंद कर चुके हैं। इसमें एक भी ऐसा लोकतांत्रिक संस्थान नहीं है, जो आम जनता के लिए सुगम हो। झंडे लहराये जाने से बेवकूफ मत बनिए। हम भारत को आधिपत्य के लिए एक ऐसे युद्ध में बंटते देख रहे हैं, जो उतना ही घातक है जितना अफगानिस्तान के युद्ध नेताओं में छिड़ने वाली कोई जंग। बस यहां दांव पर बहुत कुछ है, बहुत कुछ।

(अरुंधती रॉय। विचारक। उपन्‍यासकार। मानवाधिकार कार्यकर्ता। गॉड ऑफ स्‍मॉल थिंग्‍स के लिए बुकर पुरस्‍कार मिला। उनसे perhaps@vsnl.net पर संपर्क किया जा सकता है।)


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12 Responses

  1. इन्द्रजीत झा says:

    आलोचना का हक़ सबको है और कर सकते हैं…लेकिन अरुंधती से इस तरह के घिसे पिटे दलील की उम्मीद नहीं थी, जिसपर की ४ महीने पहले चर्चा हो चुकी है… इन्होने अन्ना की टीम में अरविन्द केजरीवाल की चर्चा की, लेकिन उन्हें प्रशांत भूषण, शांति भूषण, अग्निवेश नहीं दिखा जिसके साथ सेमिनारों में एक साथ बैठकर लेक्चर देती हैं. उनको छत्तीसगढ़ में वनवासी चेतना आश्रम चलने वाले हिमांशु जी, मध्य प्रदेश में जमीनी स्तर पर सक्रिय समाजवादी जनपरिषद और नर्मदा बचाओ आन्दोलन की मेधा पाटकर के द्वारा आन्दोलन को दिए गए समर्थन में कोई वजह नहीं दिखाई दी. उनके द्वारा आन्दोलन को दलित विरोधी बताना भी हास्यास्पद है जबकि छत्तीसगढ़, उड़ीसा, झारखण्ड, आंध्र प्रदेश आदि राज्य में कोरपोरेट लूट के द्वारा सबसे ज्यादा दलितों का ही शोषण हुआ है, और इसलिए यहाँ माओवाद भी बढ़ा है. योजना आयोग की रिपोर्ट भी यही कहती है…फिर ये भ्रष्टाचार के मुद्दे से कैसे जुडा नहीं है…उन्हें आन्दोलन की आलोचना की बजाय इसके अन्दर के जटिलताओ पर गौर करना चाहिए था… आखिर क्या वजह है की लोग इतनी संख्या में बाहर निकल कर आये हैं? लेकिन अरुंधती का लेख केवल आलोचनाओ पर केन्द्रित है… और तो और लेख “मैं” से शुरू होकर “मैं” पर ही ख़त्म हो जाता है.
    वैसे इनके लेख में ऐसे किसी आश्चर्य की बात नहीं है, जेपी के आन्दोलन के समय भी वो कोई दक्षिणपंथी गुट नहीं था जो जेपी का विरोध और इंदिरा गाँधी का समर्थन कर रहे थे, बल्कि वो वामपंथ का ही एक गुट था…!!
    अंत में,
    अन्ना के आन्दोलन को देखकर होंब्स की प्राकृत अवस्था की तरफ ध्यान जाता है जहाँ सबके अन्दर शांति स्थापना की चाहत है लेकिन नियम बनाने वाली संस्था के अभाव में सभी जगह अराजकता की स्थिति व्याप्त है… आज आन्दोलन में उतरे अधिकांश लोग स्वयं भ्रष्टाचार की गर्त में डूबे हुवे हैं, लेकिन सभी लोग एक भ्रष्टाचार मुक्त समाज चाहते हैं… ऐसे में संप्रभु से यह अपेक्षा की जाती है की वो ऐसे नियम बनाये ताकि कोई भी भ्रष्टाचार का आचरण नहीं कर सके और सब जगह शांति स्थापित हो सके…!!

  2. suZanne says:

    Arundhati herself is a controversial character. I do not think she an authority to on these matter. Unhe to bas novel likte rahna chahiye jisme imagination ka element jada hota hai. Ideology aur Arundhati. I can not digest. She is one of the character who is hundgry for cheap publicity.

  3. dr.anurag says:

    कई बार बुद्धिजीवियों का इस्तेमाल किसी आन्दोलन को मुद्दे से भटकाने के लिए किया जाता है ताकि जन समर्थन हासिल ना हो…पूर्व में ऐसे बुद्धिजीवियों को ‘यूजफुल इडियट्स ” कहा गया है ……वैसे इस देश में भी ऐसे लोगो की कमी नहीं है …..
    बुद्धिजीवी की वास्तविक परिभाषा क्या है ? एक बुद्धिमान देशभक्त किसी बड़े आन्दोलन को फ़िल्टर करके उससे केवल अच्छी चीजों को निकाल कर उन्हें मजबूत करता है …बाकी चीजों को वो बड़ी समझदारी से इग्नोर कर देता है !सवाल ये है के क्या ज्यादा महत्वपूर्ण है ? हजारे या भ्रष्टाचार को खतम करने के लिए बना कानून ? क्या ज्यादा महत्वपूर्ण है एक व्यक्ति या सामाजिक हित ? एक बुद्धिजीवी अपने ज्ञान का उपयोग समाज को ओर बेहतर बनाने के लिए करता है ..व्यवस्था को व्यावहारिक रूप में सही अर्थो में चलता न देख उसके सामाजिक पक्षों में संतुलन बनाये रखकर उसका बेहतर विकल्प तैयार करता है ..ओर .संवाद की गुंजाइश लगातार बनाये रखता है ..इन बुद्धिजीवियों को एतराज किस से है हजारे से या मुद्दे से ? क्या आने वाले समय में इस देश में किसी भी सुधार की गुंजाइश तभी बनेगी बनाये जब हम कुछ तय मानको को पूरा करेगे ? ..फलां फलां लोगो के विरोध में खड़े होगे ?…..
    क्या गाँधी मानवीय गुण दोषों से परे व्यक्ति थे ?क्या उनकी सभी नीतिया -विचार ,उनका निजी जीवन में आचरण,राजनैतिक निर्णयों में असहमति की कोई गुंजाईश नहीं थी ?
    पिछले चालीस साल से किसी को भी इस बात का अंदाजा था इस देश में कोई भकानून कैसे बनाया जाता है …. इस देश में अगर एक स्वस्थ बहस की शुरुआत हो रही है तो मुझे कोई एतराज नहीं है उसे कौन उठा रहा है…बिहार के किसी गाँव में रहने वाला असलम या बंगलौर का ऑस्टिन…..मै जानता हूँ कोई कानून कोई अनशन लालच को ख़तम नहीं कर सकता …पर कोई कानून कोर्पोरेट -.सत्ता -ओर प्रशासनिक अधिकारियों के गठजोड़ में सेंध लगाता है .दंद का भय उत्पन्न करता है तो मै उसका स्वागत करता हूँ……
    ये सामाजिक समस्या है ? कोई कानून किसी व्यक्ति को ईमानदार नहीं बना सकता ..ठीक उसी तरह जिस तरह कानून से कोई पुरुष स्त्रियों के प्रति अपनी सोच नहीं बदल सकता पर फिर भी कठोर कानून बनाये गए है ताकि सामाजिक जीवन में एक व्यवस्था बने रहे….हम सब जानते है .मनुष्य का जीवन जब तक रहेगा तब तक उसके भीतर लालच रहेगा जाहिर है भय ओर दंड अनुशासन के आवश्यक अंग है …….बस इतनी सी बात है ….ओर हाँ ये तथ्य समझना भी बेहद जरूरी है के समाज के हित से से जुड़े गंभीर मसले निर्णय तक पहुँचने के लिए भावनाओं ओर जोश के बाद सही दिशा में संवाद की ओर बढ़ते है .

  4. shashi says:

    log andh bhakti me bakwas kar rahe hain…tarko ka javab nahi de hare…koi ise J.p movement se bada aandolan bata raha hai…to koi aazadi ki dusari ladai…kya bakvas hai…ye mahaz ek NGO aandolan hai…ab is desh NGO aur corporate hi kanun banayenge…sarkar chaleyenge…aur yah sab gandhiji ke nam par hoga…han… aise me jo aapser sahamat nahi hoga vo deshdrohi hoga…jai ho..
    shashi bhooshan dwivedi

  5. अरुंधती के इस लेख की बिन्दुवार और तार्किक तरीके से चीर-फ़ाड़ इस लेख में कर दी गई है… इसे अवश्य पढ़ें… इस “मानसिक बीमार” महिला को सटीक जवाब दिए गए हैं उधर…

    http://clearvisor.wordpress.com/2011/08/23/why-i%E2%80%99d-rather-be-anna-than-arundhati/

  6. prashant gorkhapur says:

    agar aapko delhi jana hai aur aap Mumbai ki tren pr baith jaye to aap sahi jagah nahi pahuchenge.anna aur anna mandali bahut hi chalak aur shatir log hai.media ke sath milkar ye logo ko bhramit kar rahe hai.(bharma rahe hai).bhrashtachar ke mudde pr en logo ne galat rasta bata ke,
    janata ko gumarah kar rahe hai taki janata eski asali vajah aur sahi nidan ke bare me n jan sake.arundhati rai ne sahi smy pr sahi bat kahi hai.unke tarko ka jabab dijiye n ki pol khulane ke dar se badahavash hoeye.

  7. satyendra says:

    Yeh mansik rogi hai. iska proper ilaaj avashyak hai.yeh contempt of court mein convicted bhi ho chuki hain. inhone maovaad ka aur naxalite andolan ka bhi samarthan kiya hai . kull milakar bharat ke against bolne me inko maja bhi aata hai aur praveenta bhi hasil hai. inko bhule bhatke ek thor prize mil gaya to yeh us safalta ko pacha nahin payi. ab chukin ye hasiye par ho gayi hain inko koi patrakar poochta bhi nahin hai na ye bhartiya jan manas ka pratinihitva karti hain na bhavishya me kabhi kar payengi to kewal media attention ke liye inki bakar bakar chalu hai.
    http://clearvisor.wordpress.com/2011/08/23/why-i%E2%80%99d-rather-be-anna-than-arundhati/

  8. Yogesh says:

    Krishan Kishore, a scholarly editor of Anyatha and Otherwise magazines talks about Demagogues who distract us from real issues.
    That is what Arundhati is, serving her own purpose rather than the state’s purpose.
    But , why did Hindu publish this kind of article?

  9. Manish says:

    इस महिला को तो भारत राष्ट्र ही स्वीकार नहीं है . एक अंग्रेजी का पुरस्कार मिल गया और बस कूदते रहती है. अगर एक भी विकास का काम आगे बढ़ने कि बात होती है तो ये अपना टांग जरुर अड़ाती है. she is mentally sick .

  10. प्रवीण पटेल says:

    अरुधति की बौद्धिकता पर वैसे भी बहुतों को शक था। अब शक की गुंजाईस नहीं रह गई। दरअसल अंग्रेजी जगत में इसको कोई घास नहीं डालता। तो यह हिंदी में ही इज्जत पाती है।

  11. hemant malviya says:

    सारे काम PUCH कर करो भाई …… तु mastarni बाई है? …तों पे नही खाना hajam नही होता Bola?…….. भाई ‘यूजफुल इडियट्स sahi hai eske liye….mari mui delhi belee hui jarahi thi…. aa total shit hepensssss cheeee……

  1. August 23, 2011

    [...] में रहे। एक तो द हिंदू में प्रकाशित अरुंधती राय का आलेख और दूसरे बिहार के चर्चित नेता [...]

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