चरण छूने का मौसम नहीं ‘है’, लात मारने का मौसम ‘है’!
लोकतंत्र को गंभीरता से लेने का सबक और सबब
♦ शशि कुमार झा
अब मुद्दा केवल यह नहीं रहा कि हमें एक मजबूत लोकपाल बिल चाहिए या नहीं चाहिए। इस आंदोलन के बहाने हमें जो हासिल करना था, वह लगभग हमने कर लिया है। हमने वह हासिल कर लिया है, जो इस गणतंत्रात्मक राज्य में पिछले 61 सालों में हम नहीं कर पाये थे। इन छह दशकों में न तो राजनीतिज्ञों ने, और न ही जनता ने लोकतंत्र को गंभीरता से लिया। जितनी राजनीतिक और लोकतांत्रिक शिक्षा का सबब यह आंदोलन बना है, उतना अब तक कोई दल, कोई शासन या नागरिक समाज के कोई भी संगठन इस स्तर पर नहीं बन पाया। हालांकि इस वक्तव्य का उद्देश्य अन्य आंदोलनों की उपलब्धियों और प्रासंगिकता को कम करके आंकना नहीं है। संसद, जन-प्रतिनिधि, कानून निर्माण, जनमत, मीडिया, राज्य-सत्ता का चरित्र, राजनीतिक दल, नागरिक जमात और व्यवस्थाजन्य भ्रष्टाचार, इन सबके बारे में जन-जागरूकता और आत्म-चेतना ने जिस चरम को छुआ है, वह हमारे पेशेवर बुद्धिजीवियों और राजनीतिक कार्यकर्त्ताओं को आईना तो दिखाता ही है।
न्याय व्यवस्था के संदर्भ में एक उद्धरण खासा प्रचलित है कि न्याय केवल होना ही नहीं चाहिए, होता हुआ दिखना भी चाहिए (“Not only must Justice be done; it must also be seen to be done.”)। सवाल यह है कि क्या न्याय की स्थिति कायम करना केवल न्यायाधीशों और कोर्ट, कचहरियों और झगड़ों मुकद्दमों तक सीमित है। इसका जवाब हम नहीं में ही देंगे। ठीक इसी तरह क्यों न हम लोकतांत्रिक व्यवस्था के संदर्भ में भी इस सवाल को उठाएं कि – लोकतंत्र केवल होना ही नहीं चाहिए यह हमारे दैनिक कार्यकलापों में साकार होता हुआ दिखना भी चाहिए। और जिस प्रकार न्याय कोर्ट-कचहरियों और मुकद्दमों तथा न्यायाधीशों तक सीमित रहने की स्थिति नहीं है, उसी प्रकार लोकतांत्रिक राजनीति और सहभागिता केवल चुनाव और स्थापित राजनीतिक संस्थाओं तक सीमित रहने का नाम नहीं है। संसदीय लोकतंत्र में नागरिकों की भूमिका महज चुनाव के माध्यम से संसद को सर्वाधिकार समर्पित करके निश्चिंत हो जाने की नहीं है। वह भी उस स्थिति में जबकि ‘प्रतिनिधित्व’ और ‘चुनाव’ की वर्त्तमान प्रणाली अपनी प्रासंगिकता खोती जा रही हों।
संसदीय लोकतंत्र की मूल अवधारणा
माना जाता है कि 1648 में द्वितीय अर्ल ऑफ पैम्ब्रोक ने ब्रिटिश संसद के बारे में कहा था कि ‘संसद सब कुछ कर सकती है सिवाय पुरुष को स्त्री और स्त्री को पुरुष बनाने के’। (Parliament can do anything but make a man a woman and a woman a man. Earl of Pembroke, 1648) भारतीय संदर्भ में भी आम तौर पर सर्वोच्चता का प्रश्न हालांकि जनता जनार्दन और संविधान पर आकर खत्म होता है। लेकिन हम जानते हैं कि संसदीय व्यवस्था के अनुरूप ही संस्थागत रूप से यहां संसद के ही सर्वोच्च होने की भावना को इन छह दशकों में आत्मसात और प्रचारित किया गया है।
नागरिक शास्त्र के आम विद्यार्थी की हैसियत से और अब तो अपने प्रयास से भी कोई यह सब तो जान ही सकता है कि संविधान ने संसद को ही कानून बनाने की शक्ति दी है। संसद को संविधान में संशोधन का अधिकार भी दिया है। लेकिन यह अधिकार निरंकुश नहीं है क्योंकि सर्वोच्च न्यायालय को न्यायिक पुनरीक्षण का अधिकार प्राप्त है और संविधान की अंतिम व्याख्या का भी। इसलिए वह बेसिक सट्रक्चर अथवा संविधान के मूल ढांचे पर हमला न होने की कसौटी पर किसी भी कानून को कस सकता है और उसे असंवैधानिक करार दे सकता है। कानून के निर्माण पर हस्ताक्षर की औपचारिकता और पुनर्विचार के लिए लौटाने जैसी कुछ शक्तियां केंद्र में राष्ट्रपति और राज्यों में राज्यपालों को भी है जो टकराव की स्थिति में सरकारों के पक्ष में ही जाकर झुकती हैं। कानून निर्माण की पहल आम तौर पर सरकार और इसके मंत्रिगण की ओर से ही होता है, जो कार्यपालिका की अहम भूमिका को दर्शाता है। लेकिन शक्ति का पृथक्करण और चेक एंड बैलेंस का स्वरूप प्रचलित और गतिशील राजनीतिक घटनाक्रमों के आईने में इतना गड्ड-मड्ड हो चुका है कि राजनीति विज्ञानी और संविधानविद् भी इसकी प्रवृत्तियां पहचानने के क्रम में अपनी राय बदलते रहे हैं और जनता की असल भूमिका कहीं गुम सी हो गयी लगती थी।
कानून का निर्माण और इसका कार्यान्वयन किसी भी व्यवस्था के संचालन का सबसे अहम पहलू है। विडंबना यह है कि लोकतंत्र जैसी व्यवस्था में भी जब उपरोक्त संस्थाओं की इसमें भूमिका का जिक्र होता है तो वह ‘शक्तियों’ और ‘अधिकारों’ के परिप्रेक्ष्य में ज्यादा होता है, न कि जनता की सक्रिय भागीदारी, एजेंडों की वैधता हेतु निरंतर जन-जुड़ाव की अनौपचारिक बाध्यताओं, या जनता से इनपुट और फीडबैक लेने के संदर्भ में। इसकी पृष्ठभूमि में जो भावना काम करती है, वह होता है लोकतंत्र का प्रतिनिधिक स्वरूप। यानि नियमित चुनाव के माध्यम से चुने गये प्रतिनिधियों के रूप में संसदीय संस्थाएं वह समस्त अधिकार प्राप्त कर लेती हैं, जो विधायिका और कार्यपालिका के लिए तकनीकी रूप से संवैधानिकतः संभव है। यानि प्रतिनिधि का चयन हमें या हमारी भागीदारी को मजबूत करने के बजाय हमें इस रूप में इस हद तक कमजोर कर देता है, जैसे कि हमारा प्रतिनिधि जनता की शक्तियों का न्यासी या ट्रस्टी न होकर उसका मालिक बन बैठता है। हम इन प्रक्षेपित उम्मीदवारों में से किसी एक को चुनने और उसमें अपनी समस्त लोकतांत्रिक और राजनीतिक शक्ति का अप्रत्यक्ष समावेश कर देने को बाध्य हैं। हालांकि न्यायपालिका को इस निर्वाचन और प्रतिनिधित्व इत्यादि के आग्रह से मुक्त रखा गया है। ‘न्यायिक सक्रियता’ (Judicial Activism) या ‘न्यायिक निरंकुशता’ (Judicial Tyranny) जैसी परिस्थितियों का विश्लेषण करते हुए न्यायपालिका को प्रायः यही याद दिलाने की कोशिश होती है कि वह जनता के प्रति सीधे जवाबदेह नहीं है।
प्रतिनिधित्व एवं राजनीतिक दल
उपरोक्त स्थिति से कुल मिलाकर यह समझ में आता है कि इस लोकतांत्रिक कहलाने वाली मौजूदा व्यवस्था में सार्वजनिक वयस्क मताधिकार के माध्यम से प्रतिनिधि के रूप में चुना जाना ही वैधता का सबसे महत्त्वपूर्ण स्रोत है। राज्य जैसी एजेंसी के लिए यह वैधता, सत्ता पर एकाधिकार के रूप में भी सामने आती है। हालांकि चुनाव में आपके पास विकल्प उपलब्ध होने और एक निश्चित अवधि के बाद सरकारों को बदल डालने का अधिकार होने की बात भी की जाती है। लेकिन प्रतिनिधित्व अथवा रिप्रेजेंटेशन ही वैधता और सत्ता हासिल करने का एकमात्र संवैधानिक तरीका माना जाता है।
अब यह रिप्रेजेंटेशन या प्रतिनिधित्व सीधा या प्रत्यक्ष होता भी है और नहीं भी। इसका कारण है बीच में ‘राजनीतिक दल’ जैसे संस्था की मौजूदगी। संसदीय लोकतंत्र में इसकी अनिवार्यता को भी स्थापित और प्रचारित किया गया है। इन दलों की बहुलता को भी स्वस्थ लोकतंत्र का संकेत माना गया है। राजनीतिक दल जैसी एक संरचना उन उम्मीदवारों को नामांकित करती है, जो चुनाव के माध्यम से यदि चुन लिये गये तो जनता की भावनाओं का प्रतिनिधित्व करते हुए मान लिये जाएंगे। अब चूंकि हमें राजनीतिक दलों द्वारा नामांकित उम्मीदवारों में से ही अपना प्रतिनिधि चुनना है, इसलिए राजनीतिक दलों के लिए कुछ लोकतांत्रिक बाध्यताएं अनिवार्य होनी चाहिए।
वे जिन उम्मीदवारों को नामांकित कर रहे हैं, उनके नामांकन की कसौटी, प्रक्रिया और औचित्य के बारे में भी पारदर्शी हों।
वे अपनी विचारधारा और नीतियों के बारे में स्पष्ट हों और उनके लिए यह अनिवार्य हो कि जिन घोषणाओं और मुद्दों के ऊपर उन्होंने जनता का प्रतिनिधि चुने जाने का उपक्रम किया है, वे उनका अनिवार्यतः पालन करें और उसमें भी संबंधित क्षेत्र और समुदाय की भावना को ध्यान में रखते हुए नियमित लोकतांत्रिक प्रक्रिया अपनाएं।
चूंकि उनकी अवस्थिति या उनका लोकेशन ऐसा है कि प्रतिनिधित्व की गुणवत्ता तय करने में उनकी अहम भूमिका हो जाती है। इसलिए राजनीतिक दल की वैधता तभी है, जब वह स्वयं जनता के सरोकारों से सीधे-सीधे जुड़ा हो; जनता से उनका नियमित संपर्क और संचार हो; उन्होंने जनता की समस्याओं का नियमित अध्ययन और उन पर द्विपक्षीय विचार-विमर्श किया हो।
यदि वे ऐसा नहीं करते हैं, तो उनकी वैधता पर तो प्रश्नचिह्न लगता ही है। इसके परिणामस्वरूप उनके द्वारा ‘नामांकित उम्मीदवार की वैधता’ और उस उम्मीदवार के चुने जाने के बावजूद उसके ‘प्रतिनिधित्व की वैधता’ का कोई मतलब नहीं रह जाता।
प्रतिनिधित्व का सिद्धांत आबादी की संख्यात्मक विशालता के मद्देनजर एक व्यावहारिक और दैनंदिन कार्यकलापों के लिए कामचलाऊ व्यवस्था की बाध्यता के रूप में ही नहीं आया है। यह इससे ज्यादा कुछ है। इसलिए राजनीतिक दलों को अपना प्रतिनिधि नामांकित करने की आजादी देने से पहले उन्हें गंभीर लोकतांत्रिक कसौटियों पर कसा जाना जरूरी है। राजनीतिक दल जैसी किसी बीच की संस्था की अनिवार्यता हमारे लिए मजबूरी, बोझ या विकल्पहीनता की तरह से नहीं होनी चाहिए।
प्रतिनिधित्व की अवधारणा की व्यापकता को यदि राजनीतिक क्षेत्र तक भी सीमित कर दें तो भी समाज के सभी वर्गों और उनकी भावनाओं को उचित, नियमित, और प्रत्यक्ष प्रतिनिधित्व मिलने को, उनकी भागीदारी के साकार होने के रूप में लिया जाता है। प्रतिनिधि केवल विधायिका के सदस्य के रूप में सरकार बनाने के लिए जरूरी संख्या की इकाई नहीं हैं। प्रतिनिधि केवल चुनावी प्रक्रिया में बहुमत (जो मत प्रतिशत के हिसाब से वास्तव में अल्पमत होता है) से विजयी घोषित कर दिया जाने वाला वह व्यक्ति नहीं है, जो सत्ता में भागीदारी की ललक या विपक्ष में ही रह जाने की कसक से ही ग्रसित हो और दिन-रात इसी गुणा-गणित में व्यस्त हो। संवैधानिक प्रक्रिया से और चुनाव के माध्यम से प्रतिनिधि के रूप में स्थापित होने से पहले क्या उसने अपनी पार्टी और अन्य मंचों के माध्यम से उसने जनता से संवाद किया है और अपनी स्वीकृति के लिए संघर्ष किया है?
संसदीय व्यवस्था में चूंकि हर प्रतिनिधि जनता के अतिरिक्त अपनी पार्टी का भी नुमाइंदा होता है, और विधायिका में किसी भी मुद्दे पर उसकी राय उसकी पार्टी की राय के मुताबिक ही होना होता है; इसलिए वास्तव में प्रतिनिधि की भूमिका और उसका व्यक्तित्व गौण हो गया है। प्रतिनिधि वास्तव में पार्टियों द्वारा बिना किसी लोकतांत्रिक प्रक्रिया के हम पर थोपे गये उम्मीदवार हैं जो जनता की बजाए अपनी पार्टी के प्रति ज्यादा जवाबदेह होते हैं। नीतिगत और विधायन संबंधी मामलों में पार्टी सदस्यों की आजादी का छिन जाना एक बहुलतावादी और विविधतापूर्ण समाज के लिए खतरनाक संकेत हैं। यदि हमें इतना भी भरोसा हो कि कम से कम पार्टी के भीतर प्रत्येक विधायी मुद्दे को लेकर सदस्यों की बैठक होती है और एक भयमुक्त वातावरण में आपस में विचारों का पारदर्शी तरीके से आदान-प्रदान होता है तो हम इसे पार्टी व्हिप या पार्टी लाइन के लोकतांत्रीकरण के रूप में देख सकते हैं। लेकिन इसकी कभी कोई मिसाल हमें देखने को नहीं मिलती। यदि ऐसा वास्तव में हुआ होता तो आज इन दलों के भीतर अनुसूचित जातियों और जन-जातियों को मिले आरक्षण का फायदा सहज ही दिखाई देता। राजनीतिक दलों के भीतर के अलोकतांत्रिक वातावरण ने ही दलितों और महिलाओं की स्वायत्ततापूर्ण वास्तविक भागीदारी को हतोत्साहित किया है।
राजनीतक दलों के बारे में एक और चिंताजनक स्थिति यह भी है कि स्थापित पार्टियां धीरे-धीरे अपने आर्थिक संसाधनों के लिए आम जनता पर निर्भर होने से मुक्त होते जा रहे हैं। एक हालिया अध्ययन ने दिखाया है कि किस प्रकार ये दल सैकड़ों करोड़ के मालिक बन चुके हैं। चुनाव प्रक्रिया की वर्तमान खामियों को देखते हुए यह एक खतरनाक स्थिति है। जन-भावनाओं की कद्र करने की मजबूरी से भी यह स्वायत्त होते जा रहे हैं क्योंकि चुनाव जीतने के लिए जिन कुछ प्रतिशत मतों की आवश्यकता होती है, उन्हें किसी भी तरह प्राप्त किया जा सकता है।
सैद्धांतिक तौर पर एक बहुलतावादी संसदीय राजनीति में राजनीतिक दलों से अपेक्षा की जाती है है कि वह राजनीतिक समाजीकरण को गंभीरता से लेते हुए हित-सामूहीकरण और हित-अभिव्यक्तिकरण का सशक्त माध्यम बनेंगे। लेकिन भारतीय राजनीतिक संस्कृति में जिस प्रकार के दलों का उभार हुआ है उनमें सभी प्रकार की सकारात्मक विविधताओं के बावजूद जो नकारात्मक समरूपता रही है, वह है नेतृत्व के स्तर पर व्यक्तिपरकता और चुनावेत्तर अवधि में जनता से पूरी तरह से बिलगाव। इन दलों के भीतर आंतरिक लोकतंत्र या किसी पारदर्शी प्रक्रिया के अभाव के चलते किसी अर्थपूर्ण विधायन की संभावना और भी क्षीण हुई है। चूंकि पार्टियां ही विधायन को गंभीरता से नहीं ले रही हैं, इसलिए इनके उम्मीदवारों पर कोई दबाव नहीं होता कि वे इसे गंभीरता से लें। संसदीय कार्यवाही के दौरान जब बहस-चर्चा और सवाल-जवाब होते भी हैं तो उसकी वैधता और अर्थपूर्णता इसलिए संदेहास्पद होती है कि उन मुद्दों पर इन प्रतिनिधियों ने अपनी जनता से कोई मशविरा नहीं किया है। चुनाव इत्यादि के दौरान विधायन संबंधी मुद्दे या मौजूदा कानूनों की स्थिति पर कभी चर्चा नहीं हो पाती। न तो किसी राजनीतिक दल के घोषणापत्र में इस पर विस्तार और स्पष्ट रूप से कुछ कहा जाता है, और न ही कभी इसपर जनता के साथ किसी प्रकार का द्विपक्षीय संचार या विचारों का आदान-प्रदान होता है।
हमने अपने प्रयासों में देखा है कि राजनीतिक दलों में स्वयं को भीतर से सुधारने के प्रति न तो कोई दबाव है और न ही कोई दिलचस्पी। कुछ पार्टियां जो ऐसा प्रयास करने का दिखावा भी करती हैं, वह महज एक कॉस्मेटिक परिवर्तन को बहुप्रचारित कर ध्यान आकर्षित करने की रणनीति ही होती है। राजनीतिक कार्यकुशलता को उन्होंने सेफॉलोजिकल स्टडी करने हेतु शोध और सूचना तकनीक के इस्तेमाल से जोड़ दिया है। जबकि मूलभूत राजनीतिक प्रश्नों पर वे आपस में ही एक दूसरे के कृत्यों के आधार पर, प्रतिक्रिया में अपने कृत्यों को जायज ठहराने का दैनिक स्तर पर लफ्फाजी करते रहते हैं। उनकी बातों में संविधान, लोकतंत्र, कानून, लोकतांत्रिक परंपरा, संसद की महिमा और सर्वोच्चता इत्यादि का ऐसा बखान होता है कि उनकी व्यक्तिगत या संस्थागत आलोचना करने वालों को वे सीधे-सीधे संविधान की आलोचना से जोड़ देते हैं जिसमें अप्रत्यक्ष रूप से एक धमकी छिपी होती है कि वे अपने आलोचकों को राष्ट्रदोही, अराजकतावादी, व्यवस्थाविरोधी, लोकतंत्र के लिए खतरा इत्यादि साबित कर सकते हैं और ‘कानूनी प्रक्रियाओं’ के माध्यम से उनसे निपट सकते हैं।
जन-भागीदारी
कोई भी लोकतांत्रिक व्यवस्था जनता की भागीदारी के बगैर अकल्पनीय है। लेकिन भारत की मौजूदा प्रतिनिधिमूलक संसदीय व्यवस्था में जनता की भागीदारी को केवल पांच सालों में एक बार मतदान के रूप में सीमित कर दिया गया है। जनता की भागीदारी को प्रायः सरकार को सहयोग देने के रूप में भी प्रचारित किया जाता है जैसे कि स्थानीय पुलिस के आंख और कान बनने, सार्वजनिक संपत्ति के रख-रखाव, कानूनों का पालन और कर की अदायगी इत्यादि। मतदाता, करदाता और कानूनों का पालनकर्त्ता इत्यादि के अलावा जनता की रचनात्मक और सक्रिय भागीदारी राजनीतिक और प्रशासनिक मामलों में नगण्य है। उनसे हमेशा ही याचक, प्रशासित, आज्ञाकारी, और अबोध और कमदिमाग बने रहने की अपेक्षा की जाती है।
यहां भागीदारी को बढाने के नाम पर हुए कुछ सरकारी प्रयासों की पड़ताल आवश्यक है। विकेंद्रीकरण अथवा स्थानीय स्वशासन, आरटीआई अथवा सूचना का अधिकार, सोशल ऑडिट और भिन्न-भिन्न स्वरूपों वाले एनजीओ अथवा गैर-सरकारी संगठनों के माध्यम से कुछ सरकारी कार्यक्रमों का कार्यान्वयन एवं जागरूकता कार्यक्रमों को सरकारें जनता की भागीदारी के रूप में परोसती है। लेकिन यदि इन सब को लोकतांत्रिक भागीदारी की कसौटी पर कसा जाय तो इन सभी भागीदारियों के कायदे सत्तासीन सरकारें तय करती हैं। जनता के स्तर पर किसी पहलकदमी की न तो गुंजाइश है और न ही उसकी कोई सुनवाई। आरटीआई जैसे कानूनों में भी राज्य नागरिकों को किसी प्रकार की सुरक्षा की गारंटी नहीं देता और चूंकि इसमें शासन का नुमाइंदा ही एक पक्ष होता है, इसलिए यह कई बार कमजोर नागरिकों के लिए एक शहीद होने जैसी स्थिति पैदा कर देता है। पिछले कुछ समय से एक के बाद एक आरटीआई कार्यकर्ताओं की हो रही हत्याओं से हमें क्या सबक मिलता है, इसकी भी पड़ताल जरूरी है।
विकेंद्रीकरण अपने मौजूदा स्वरूप में एक बहुत बड़ा ढकोसला साबित हुआ है। इसमें वो तमाम बीमारियां घुस गयी हैं, जो प्रतिनिधिक लोकतंत्र के ऊपर के दोनों स्तरों में पहले से गंभीर रूप में आ चुकी हैं। राजनीतिक दलों के अप्रत्यक्ष हस्तक्षेप और संरक्षण तथा को-आप्शन ने पंचायतों को पार्टियों और सरकारों की ग्रामीण इकाई में तब्दील कर दिया है। नौकरशाह भी पंचायतों पर इस हद तक हावी होते हैं कि उनपर साम-दाम-दंड-भेद सभी प्रकार के हथकंडे आजमा कर उसे भी व्यवस्था के प्रचलित सांठ-गांठ में शामिल कर लेते हैं। पंचायत प्रतिनिधियों में जन-प्रतिनिधि होने की भावना या आत्मविश्वास होने की बजाए अफसरों की चाटुकारिता और उनकी दया पर निर्भर रहने की भावना स्वतः ही पनप जाती है। एमएलए और सांसद भी उनसे समकक्षता का सम्मान देने की बजाए या उनसे पूरक या सहयोगी संबंध कायम करने की बजाए प्रतियोगी और प्रतिकूल संबंध कायम कर लेते हैं। या फिर उनके साथ एक संरक्षक-अधीनस्थ संबंध (Patron-client relationship) विकसित कर लेते हैं।
ग्राम सभा को अप्रासंगिक बनाकर उसे व्यापक लोकतांत्रिक भागीदारी से वंचित रखा गया है। जिन नीतियों और कार्यक्रमों के क्रियान्वयन के लिए पंचायतों की मदद ली जा रही है उन नीतियों और कार्यक्रमों के निर्माण या बदलाव में उनकी किसी भी प्रकार की भागीदारी नहीं हैं। उन्हें किसी प्रकार की वित्तीय स्वायत्तता और आत्मनिर्भरता नहीं प्रदान की गयी है। योजना निर्माण का स्वरूप इतना केंद्रीकृत है कि उसमें स्थानीय सामाजिक, भौगोलिक और सांस्कृतिक विविधताओं और गत्यात्मकताओं का बिल्कुल भी ध्यान नहीं रखा जाता है। जनसांख्यिकी के अध्ययन और आर्थिक विकास का मॉडल ही इन गत्यात्मकताओं के प्रति संवेदनशील नहीं है। योजना आयोग और राष्ट्रीय सलाहकार परिषद अथवा एनएसी जैसी संस्थाएं कानूनों, योजनाओं, नीतियों और कार्यक्रमों के ऊपर व्यापक विचार-विमर्श तथा जनता से जमीनी इनपुट और फीडबैक ग्रहण करने का संविधानेत्तर और अलोकतांत्रिक विकल्प बन चुके हैं।
सिविल सोसायटी अथवा नागरिक समाज
सिविल सोसायटी शब्द पर अकादमिक दृष्टि से लाखों पन्ने लिखे जा चुके होंगे लेकिन इस शब्द और संकल्पना को लेकर जितनी जन जागरूकता पिछले कुछ दिनों में बनी, वह अप्रत्याशित थी। वास्तव में, यह राज्य की सत्ता और राजनीति की वैधता में क्षरण की वजह से भी हुआ है। सिविल सोसायटी की सैद्धांतिक बारीकियों में जाने के बजाय यदि हम इसके सामान्य अर्थ को ही इस रूप में समझें कि सत्ता और शासन से परे भी सार्वजनिक हित के ऊपर संगठित प्रयास संभव है, तो वही सिविल सोसायटी का मूर्त्त रूप हो जाता है। ऐसे प्रयास असंगठित और स्फुरित भी हो सकते हैं। जनहित के मोर्चों पर राज्य की विफलता जहां नागरिक समाज को भिन्न-भिन्न रूपों में संगठित होने का कारण बनती है, वहीं राज्य के अलोकतांत्रिक रवैये पर एक अंकुश के रूप में कार्य करने के लिए भी इस प्रकार के संगठन आवश्यक हो जाते हैं। राज्य और राजनीति के सर्वव्यापी होने की महत्वाकांक्षा ने राज्य को बाध्य किया कि वे नागरिक समाज को भी अपने में समाहित करके इसे कमजोर करें। इसलिए एक लंबी अवधि में अब नागरिक समाज के भीतर ही इसके कई रूप स्थापित हो चुके हैं, जिनमें से ज्यादातर को राज्य ने को-ऑप्ट कर लिया है। और जो राज्य के सीधे हस्तक्षेप से बाहर हैं, उन्हें राज्य-सत्ता की संरचना से गहरे जुड़े हुए प्रभावशाली कॉर्पोरेट संस्थाओं ने गोद ले लिया है। इससे इनके और भी कुछ विकृत संस्करण अस्तित्व में आये हैं। इसलिए एक विशाल और विविधतापूर्ण समाज में ‘नागरिक समाज’ की संस्थाओं को लेकर एक भ्रम की स्थिति बन चुकी है, जिससे न केवल सिविल सोसायटी की एक समेकित चेतना में ही दरार पैदा हुआ है, बल्कि अलग-अलग राजनीतिक और हित समूहों की भी छद्म सक्रियता भी इनके बीच फूट पड़ने का कारण बनी है।
एक और बात यह है कि नागरिक समाज ने राजनीति के एक सीमित अर्थ को ही अपना कर स्वयं के अवराजनीतिक होने का भ्रम पाल लिया। लोकतंत्र में सत्ता अथवा शासन के अतिचार पर लोकतांत्रिक अंकुश लगाने या उनकी विफलता पर स्वयं सक्रिय हो जाने की कवायद भी एक राजनीतिक प्रक्रिया ही हो सकती है, इस तथ्य की अनदेखी की गयी। दूसरे, सिविल सोसायटी के जिस हिस्से ने अपने लोकतांत्रिक मांगों और सक्रियताओं के माध्यम से राजनीतिक प्रक्रिया में हस्तक्षेप करने और उसे अनुशासित करने की कोशिश की, उसे बड़ी आसानी से सत्ता पक्ष ने दलगत राजनीति से जोड़ कर उसकी महत्ता और उनके अस्तित्व को कमजोर करने की कोशिश की। इसके अतिरिक्त दलगत राजनीति में सक्रिय, सत्ता से बाहर के भी दलों ने राजनीति पर केवल उन्हीं के एकाधिकार की भावना और समझ से ग्रसित होकर नागरिक समाज के राजनीतिक मांगों और क्रियकलापों की वैधता को ही चुनौती दे दी। जनांदलनों के राजनीतिक चरित्र को वे इसलिए समझ पाने में असफल रहे हैं कि उनका स्वयं का संबंध ही वास्तविक और मौलिक राजनीतिक समस्याओं से टूट चुका है। राजनीति का अर्थ उनके लिए केवल खोखले नारों, अस्पष्ट विचारधाराओं, जातीय भावनाओं पर सवार लहरों, अपारदर्शी और अलोकतांत्रिक तरीकों से हासिल की गयी उम्मीदवारी के माध्यम से, धनबल और बाहूबल का इस्तेमाल कर चुनाव जीतना और सत्ता पर काबिज होना हो गया है।
नागरिक समाज बनाम राज्य-सत्ता का मौजूदा द्वंद्व राजनीति की संकुचित परिभाषा और लोकतंत्र के दायरे की संकीर्ण समझ की वजह से ही है। लोकतांत्रिक राजनीति और संस्कृति के विस्तार को स्वीकारने से ही ये संकीर्णताएं समाप्त हो सकती हैं। जिस प्रकार के सवाल राजनीतिक दल और राजनीतिक सत्ता ने नागरिक समाज की वैधता और प्रतिनिधित्व के संदर्भ में उठाये हैं, इससे यही सवाल वापस उनकी वैधता और प्रतिनिधित्व के बारे में भी उठने शुरू होंगे। क्योंकि दोनों ही संस्थाएं ऐसी कठोर परिभाषात्मक शर्तों पर संविधानेत्तर हैं, और लोकतांत्रिक परंपराओं और आवश्यकताओं की कसौटी पर ही अस्तित्व में आयी हैं।
अंत में, मशहूर व्यंग्यकार हरिशंकर परसाई के शब्दों में कहूं तो ये पूरा दौर ‘चरण छूने का मौसम नहीं था, लात मारने का मौसम था’। लातमारन की इस अस्थायी मुहिम ने लोगों की दमित लोकतांत्रिक इच्छाओं को जगा दिया है। एक मजबूत और स्वस्थ लोकतंत्र के लिए और लोकतांत्रिक संस्थाओं की वास्तविक उपादेयता और कार्यकुशलता को बचाए रखने के लिए इस मुहिम को थोड़ा संस्कारित कर एक अनवरत और स्थायी रूप देना भी जरूरी है। राज्य सत्ता यदि अपनी अन्य गलतफहमियों की तरह इसे भी अपने ईगो या अहम् का प्रश्न मान कर लोगों के धैर्य की परीक्षा लेने का कोई अनर्गल हथकंडा अपनाती है, तो वह और भी गहरे और अस्थिरकारी लोकतांत्रिक सबक लेने की तरफ बढ़ चलेगी। इसे समय रहते समझ लेना सुबह के भूले का शाम को लौट आने जैसा होगा। भले ही एक राजनीतिक समाज और राष्ट्र की दृष्टि से वह शाम 61 सालों बाद आयी हो।
(शशि कुमार झा। डेमोक्रेसी कनेक्ट में विश्लेषक। बीबीसी जैसी संस्थाओं से जुड़े रहे। इंटरनेट पर हिंदी को जमाने में भी बड़ा हाथ रहा। डीयू से आईआईएमसी तक राजनीति और पत्रकारिता की पढ़ाई की।
वक्त मिले तो शशि के ब्लॉग अष्टावक्र पर भी जाएं। उनसे avyaktashashi@gmail.com पर संपर्क किया जा सकता है।)











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