खराब आलोचना के लिए सिर्फ आलोचक जिम्‍मेदार नहीं

♦ गौरव सोलंकी

गौरव की इस प्रतिक्रिया से जुड़ी हुई पोस्‍ट है : इतनी बड़ी हिंदी में सिनेमाई आलोचना इतनी दरिद्र क्‍यों है?

ह हो सकता है कि हिंदी में सिनेमा पर जो लिखा जाता है, उसकी औसत गुणवत्ता अंग्रेजी या कई दूसरी भाषाओं में लिखे गये से कम हो, लेकिन इसके लिए सिर्फ आलोचक ही जिम्मेदार नहीं हैं। मेरे खयाल से बहुत हद तक अखबार और पत्रिकाएं भी इसके लिए जिम्मेदार हैं, जो अपने पाठक को बुद्धू से एक इंच भी ज्यादा नहीं समझना चाहतीं। अखबारों में सिनेमा पर लिखने वाले मेरे कुछ दोस्तों का कहना है कि वहां फिल्म की समीक्षा में उसकी कहानी बताना उनकी मजबूरी है। जब तक यह हाल रहेगा, तब तक आप कैसे उस सिनेमा को नयी नजर से देख सकते हैं? समीक्षा को छोड़िए, अखबार तो थोड़ी जटिल लगने वाली कहानी तक को छापना पाप समझते हैं। उन्हें सूचनाएं देना ही जरूरी लगता है और जहां आपने कोई सुंदर बात कही, संपादक की कलम उस पर चल जाती है।

व्यक्तिगत तौर पर मेरा यह सौभाग्य रहा है कि मैं एक पत्रिका में अपने मन की समीक्षाएं लिख पाता हूं। मेरे बहुत से प्रतिभाशाली साथियों के पास वह सुविधा नहीं है। इंटरनेट ही हम सब लोगों का माई-बाप है, जिस पर इतना तरह-तरह का पढ़ने-लिखने को मिलता है, जिसके लिए प्रिंट में कहीं जगह नहीं है।

वैसे समझ को देखा जाए तो अंग्रेजी के भी कई लोकप्रिय अखबारों की समीक्षाएं कैसी होती हैं, हम सब जानते हैं। हां, अंग्रेजी में फिल्म पर अच्छा लिखने वाले कई लोग हैं। लेकिन उसी तरह हिंदी में भी हैं। यह बात और है कि वे अशोक जी की आंखों के आगे से गुजरते नहीं। ‘दबंग’ जैसी लोकप्रिय मसाला फिल्म पर बहुत दिलचस्प और उसकी लोकप्रियता के सामाजिक कारण तलाशने वाली बहसें करते-करते हमारी आंखें दुखने लगती हैं, जबकि देश के सबसे बड़े फिल्म पुरस्कारों की ज्यूरी के अध्यक्ष को उसकी खबर ही नहीं।

वाजपेयी जी ने सलाह दी है – ज्‍यादातर छिछोरा, हिंसक और भड़काऊ सिनेमा इस कदर लोकप्रिय क्‍यों है, आलोचना की बुनियादी चिंताओं में इसे भी शामिल होना चाहिए। जैसे अब तक तो इसकी चिंता किसी ने की ही नहीं। मोहल्ला पर ही हम सब लोगों ने पचासों बार कितना कुछ लिखा है। यह तो है कि हिंदी सिनेमा मुख्यत: घोर कमर्शियल सिनेमा है और आलोचक की मजबूरी है कि उसे इसी के बारे में बात करनी है। लेकिन फिर भी हमारी कोशिश रही है कि उस पर गंभीर बात हो सके। और सबसे जरूरी, दिलचस्प ढंग से बात हो सके। हम उसे कुछ लोगों के बीच की बौद्धिक एक्सरसाइज बनाकर न रख दें। हम ‘तेरे बिन लादेन’ की बात करें, तो उसमें जबरन यूरोपियन सिनेमा के हवाले यह दिखाने के लिए न ठूंसें कि हमने कितना कुछ देखा है। हम उसी की बात करें, जो है। जो नहीं है, वह बहुत कुछ है लेकिन उसकी चिंता करते हुए हम ‘उड़ान’ या ‘एलएसडी’ का जश्न मनाना बंद तो नहीं कर सकते।

मेरे खयाल से यह अशोक जी की जिम्मेदारी थी/है कि ऐसा कुछ जनरलाइज कहने से पहले वे हिंदी के समकालीन सब समीक्षकों/आलोचकों को तो पढ़ लेते। खासकर तब, जब वे आलोचकों को पुरस्कार देने वाली ज्यूरी के अध्यक्ष हैं। मेरी सहमति अब्राहम हिंदीवाला की इस बात से भी है कि वे एक कवि हैं, तब फिल्म आलोचना पर फैसला देने वाली ज्यूरी के अध्यक्ष क्यों बने? वह भी तब, जब उनके लिखे इस लेख को पढ़कर लगता है कि न तो उनकी समकालीन हिंदी सिनेमा में ज्यादा दिलचस्पी है और न उसको लेकर हो रही गंभीर आलोचना को पढ़ने में। हां, वह हिंदी की साहित्यिक पत्रिकाओं में नहीं मिलेगी, जो ज्यादातर इतनी अकादमिक होती है और उसमें रेफरेंस और विकिपीडिया जैसी जानकारी ज्यादा होती है, विचार और रस कम।

यह कहना हमेशा आसान होता है कि कुछ भी नहीं हो रहा। लेकिन किसी की दिलचस्पी वाकई ‘कुछ’ में होगी तो आज नहीं तो कल, वो वह जगह ढूंढ़ ही निकालेगा, जहां वह सब हो रहा होगा। मेरा अशोक जी से भी यही विनम्र अनुरोध है कि हम सब बुरा लिखते हों तो सौ बुरी बातें कहें लेकिन बिना पढ़े ‘सतही, विचारहीन और अप्रासंगिक’ न कहें। यह मुमकिन है कि वे कहें कि हमें पढ़ने के बाद ही उन्होंने यह राय बनायी है। तब मुझे चुप हो जाना चाहिए।

(गौरव सोलंकी। आईआईटी रूड़की से इंजीनियरिंग की पढ़ाई के बाद पूर्णकालिक लेखक। हिंदी की प‍त्र-‍पत्रिकाओं में कहानियां लिखते हैं और तहलका में सिनेमा पर स्‍तंभ।
रोटी कपड़ा और सिनेमा नाम के ब्‍लॉग पर इनकी लेखनी की विविध छटाएं देखी जा सकती हैं।
उनसे aaawarapan@gmail.com पर संपर्क करें।)

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