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दुर्गा चंडी नहीं थी, उसकी पूजा क्‍यों करें बहुजन?


♦ प्रेमकुमार मणि

दुर्गा कथा के शूद्र पाठ को लेकर मणि जी का यह आलेख काफी उत्तेजक तथ्‍यों को हमारे सामने रखता है। यह आलेख फारवर्ड प्रेस के नये अंक का आमुख आलेख है। हम वहीं से इसे कॉपी-पेस्‍ट कर रहे हैं। शीर्षक में हमने थोड़ी छूट ले ली है : मॉडरेटर

क्ति के विविध रूपों, यथा योग्यता, बल, पराक्रम, सामर्थ्‍य व ऊर्जा की पूजा सभ्यता के आदिकालों से होती रही है। न केवल भारत में बल्कि दुनिया के तमाम इलाकों में। दुनिया की पूरी मिथॉलॉजी के प्रतीक देवी-देवताओं के तानों-बानों से ही बुनी गयी है। आज भी शक्ति का महत्व निर्विवाद है। अमेरिका की दादागीरी पूरी दुनिया में चल रही है, तो इसलिए कि उसके पास सबसे अधिक सामरिक शक्ति और संपदा है। जिसके पास एटम बम नहीं हैं, उसकी बात कोई नहीं सुनता, उसकी आवाज का कोई मूल्य नहीं है। गीता उसकी सुनी जाती है, जिसके हाथ में सुदर्शन हो। उसी की धौंस का मतलब है और उसी की विनम्रता का भी। कवि दिनकर ने लिखा है: ‘क्षमा शोभती उस भुजंग को जिसके पास गरल हो, उसको क्या जो दंतहीन, विषहीन, विनीत, सरल हो।’

दंतहीन और विषहीन सांप सभ्यता का स्वांग भी नहीं कर सकता। उसकी विनम्रता, उसका क्षमाभाव अर्थहीन हैं। बुद्ध ने कहा है – जो कमजोर है, वह ठीक रास्ते पर नहीं चल सकता। उनकी अहिसंक सभ्यता में भी फुफकारने की छूट मिली हुई थी। जातक में एक कथा में एक उत्पाती सांप के बुद्धानुयायी हो जाने की चर्चा है। बुद्ध का अनुयायी हो जाने पर उसने लोगों को काटना-डंसना छोड़ दिया। लोगों को जब यह पता चल गया कि इसने काटना-डंसना छोड़ दिया है, तो उसे ईंट-पत्थरों से मारने लगे। इस पर भी उसने कुछ नहीं किया। ऐसे लहू-लुहान घायल अनुयायी से बुद्ध जब फिर मिले तो द्रवित हो गये और कहा ‘मैंने काटने के लिए मना किया था मित्र, फुफकारने के लिए नहीं। तुम्हारी फुफकार से ही लोग भाग जाते।’

भारत में भी शक्ति की आराधना का पुराना इतिहास रहा है। लेकिन यह इतिहास बहुत सरल नहीं है। अनेक जटिलताएं और उलझाव हैं। सिंधु घाटी की सभ्यता के समय शक्ति का जो प्रतीक था, वही आर्यों के आने के बाद नहीं रहा। पूर्व वैदिक काल, प्राक् वैदिक काल और उत्तर वैदिक काल में शक्ति के केंद्र अथवा प्रतीक बदलते रहे। आर्य सभ्यता का जैसे-जैसे प्रभाव बढ़ा, उसके विविध रूप हमारे सामने आये। इसीलिए आज का हिंदू यदि शक्ति के प्रतीक रूप में दुर्गा या किसी देवी को आदि और अंतिम मानकर चलता है, तब वह बचपना करता है। सिंधु घाटी की जो अनार्य अथवा द्रविड़ सभ्यता थी, उसमें प्रकृति और पुरुष शक्ति के समन्वित प्रतीक माने जाते थे। शांति का जमाना था। मार्क्‍सवादियों की भाषा में आदिम साम्यवादी समाज के ठीक बाद का समय। सभ्यता का इतना विकास तो हो ही गया था कि पकी ईंटों के घरों में लोग रहने लगे थे और स्नानागार से लेकर बाजार तक बन गये थे। तांबई रंग और अपेक्षाकृत छोटी नासिका वाले इन द्रविड़ों का नेता ही शिव रहा होगा। अल्हड़ अलमस्त किस्म का नायक। इन द्रविड़ों की सभ्यता में शक्ति की पूजा का कोई माहौल नहीं था। यों भी उन्नत सभ्यताओं में शक्ति पूजा की चीज नहीं होती।

शक्ति पूजा का माहौल बना आर्यों के आगमन के बाद। सिंधु सभ्यता के शांत-सभ्य गौ-पालक (ध्यान दीजिए शिव की सवारी बैल और बैल की जननी गाय) द्रविड़ों को अपेक्षाकृत बर्बर अश्वारोही आर्यों ने तहस-नहस कर दिया और पीछे धकेल दिया। द्रविड़ आसानी से पीछे नहीं आये होंगे। भारतीय मिथकों मे जो देवासुर संग्राम है, वह इन द्रविड़ और आर्यों का ही संग्राम है। आर्यों का नेता इंद्र था। शक्ति का प्रतीक भी इंद्र ही था। वैदिक ऋषियों ने इस देवता, इंद्र की भरपूर स्तुति की है। तब आर्यों का सबसे बड़ा देवता, सबसे बड़ा नायक इंद्र था। वह वैदिक आर्यों का हरक्युलस था। तब किसी देवी की पूजा का कोई वर्णन नहीं मिलता। आर्यों का समाज पुरुष प्रधान था। पुरुषों का वर्चस्व था। द्रविड़ जमाने में प्रकृति को जो स्थान मिला था, वह लगभग समाप्त हो गया था। आर्य मातृभूमि का नहीं, पितृभूमि का नमन करने वाले थे। आर्य प्रभुत्व वाले समाज में पुरुषों का महत्व लंबे अरसे तक बना रहा। द्रविड़ों की ओर से इंद्र को लगातार चुनौती मिलती रही।

गौ-पालक कृष्ण का इतिहास से यदि कुछ संबंध बनता है, तो लोकोक्तियों के आधार पर उसके सांवलेपन से द्रविड़ नायक ही की तस्वीर बनती है। इस कृष्ण ने भी इंद्र की पूजा का सार्वजनिक विरोध किया। उसकी जगह अपनी सत्ता स्थापित की। शिव को भी आर्य समाज ने प्रमुख तीन देवताओं में शामिल कर लिया। इंद्र की तो छुट्टी हो ही गयी। भारतीय जनसंघ की कट्टरता से भारतीय जनता पार्टी की सीमित उदारता की ओर और अंतत: एनडीए का एक ढांचा, आर्यों का समाज कुछ ऐसे ही बदला। फैलाव के लिए उदारता का वह स्वांग जरूरी होता है। पहले जार्ज और फिर शरद यादव की तरह शिव को संयोजक बनाना जरूरी था, क्योंकि इसके बिना निष्कंटक राज नहीं बनाया जा सकता था। आर्यों ने अपनी पुत्री पार्वती से शिव का विवाह कर सामंजस्य स्थापित करने की कोशिश की। जब दोनों पक्ष मजबूत हो तो सामंजस्य और समन्वय होता है। जब एक पक्ष कमजोर हो जाता है, तो दूसरा पक्ष संहार करता है। आर्य और द्रविड़ दोनों मजबूत स्थिति में थे। दोनों में सामंजस्य ही संभव था। शक्ति की पूजा का सवाल कहां था? शक्ति की पूजा तो संहार के बाद होती है। जो जीत जाता है वह पूज्य बन जाता है, जो हारता है वह पूजक।

हालांकि पूजा का सीमित भाव सभ्य समाजों में भी होता है, लेकिन वह नायकों की होती है, शक्तिमानों की नहीं। शक्तिमानों की पूजा कमजोर, काहिल और पराजित समाज करता है। शिव की पूजा नायक की पूजा है। शक्ति की पूजा वह नहीं है। मिथकों में जो रावण पूजा है, वह शक्ति की पूजा है। ताकत की पूजा, महाबली की वंदना।

लेकिन देवी के रूप में शक्ति की पूजा का क्या अर्थ है? अर्थ गूढ़ भी है और सामान्य भी। पूरबी समाज में मातृसत्तात्मक समाज व्यवस्था थी। पश्चिम के पितृ सत्तात्मक समाज-व्यवस्था के ठीक उलट। पूरब सांस्कृतिक रूप से बंग भूमि है, जिसका फैलाव असम तक है। यही भूमि शक्ति देवी के रूप में उपासक है। शक्ति का एक अर्थ भग अथवा योनि भी है। योनि प्रजनन शक्ति का केंद्र है। प्राचीन समाजों में भूमि की उत्पादकता बढ़ाने के लिए जो यज्ञ होते थे, उसमें स्त्रियों को नग्न करके घुमाया जाता था। पूरब में स्त्री पारंपरिक रूप से शक्ति की प्रतीक मानी जाती रही है। इस परंपरा का इस्तेमाल ब्राह्मणों ने अपने लिए सांस्कृतिक रूप से किया। गैर-ब्राह्मणों को ब्राह्मण अथवा आर्य संस्कृति मे शामिल करने का सोचा-समझा अभियान था। आर्य संस्कृति का इसे पूरब में विस्तार भी कह सकते हैं। विस्तार के लिए यहां की मातृसत्तात्मक संस्कृति से समरस होना जरूरी था। सांस्कृतिक रूप से यह भी समन्वय था। पितृसत्तात्मक संस्कृति से मातृसत्तात्मक संस्कृति का समन्वय। आर्य संस्कृति को स्त्री का महत्त्व स्वीकारना पड़ा, उसकी ताकत रेखांकित करनी पड़ी। देव की जगह देवी महत्वपूर्ण हो गयी। शक्ति का यह पूर्व-रूप (पूरबी रूप) था जो आर्य संस्कृति के लिए अपूर्व (पहले न हुआ) था।

महिषासुर और दुर्गा के मिथक क्या है?

लेकिन महिषासुर और दुर्गा के मिथक हैं, वह क्या है? दुर्भाग्यपूर्ण है कि अब तक हमने अभिजात ब्राह्मण नजरिये से ही इस पूरी कथा को देखा है। मुझे स्मरण है 1971 में भारत-पाक युद्ध और बंग्लादेश के निर्माण के बाद तत्कालीन जनसंघ नेता अटलबिहारी वाजपेयी ने तब की प्रधानमंत्री इंदिरा गांधी को अभिनव चंडी दुर्गा कहा था। तब तक कम्युनिस्ट नेता डांगे सठियाये नहीं थे। उन्होंने इसका तीखा विरोध करते हुए कहा था कि ‘अटल बिहारी नहीं जान रहे हैं कि वह क्या कह रहे हैं और श्रीमती गांधी नहीं जान रही हैं कि वह क्या सुन रही हैं। दोनों को यह जानना चाहिए कि चंडी दुर्गा दलित और पिछड़े तबकों की संहारक थी।’ डांगे के वक्तव्य के बाद इंदिरा गांधी ने संसद में ही कहा था ‘मैं केवल इंदिरा हूं और यही रहना चाहती हूं।’

महिषासुर और दुर्गा की कथा का शूद्र पाठ (और शायद शुद्ध भी) इस तरह है। महिष का मतलब भैंस होता है। महिषासुर यानी महिष का असुर। असुर मतलब सुर से अलग। सुर का मतलब देवता। देवता मतलब ब्राह्मण या सवर्ण। सुर कोई काम नहीं करते। असुर मतलब जो काम करते हों। आज के अर्थ में कर्मी। महिषासुर का अर्थ होगा भैंस पालने वाले लोग अर्थात भैंसपालक। दूध का धंधा करने वाला। ग्वाला। असुर से अहुर फिर अहीर भी बन सकता है। महिषासुर यानी भैंसपालक बंग देश के वर्चस्व प्राप्त जन रहे होंगे। नस्ल होगी द्रविड़। आर्य संस्कृति के विरोधी भी रहे होंगे। आर्यों को इन्हें पराजित करना था। इन लोगों ने दुर्गा का इस्तेमाल किया। बंग देश में वेश्याएं दुर्गा को अपने कुल का बतलाती हैं। दुर्गा की प्रतिमा बनाने में आज भी वेश्या के घर से थोड़ी मिट्टी जरूर मंगायी जाती है। भैंसपालक के नायक महिषासुर को मारने में दुर्गा को नौ रात लग गयी। जिन ब्राह्मणों ने उन्हें भेजा था, वे सांस रोक कर नौ रात तक इंतजार करते रहे। यह कठिन साधना थी। बल नहीं तो छल। छल का बल। नौवीं रात को दुर्गा को सफलता मिल गयी, उसने महिषासुर का वध कर दिया। खबर मिलते ही आर्यों (ब्राह्मणों) में उत्साह की लहर दौड़ गयी। महिषासुर के लोगों पर वह टूट पड़े और उनके मुंड (मस्तक) काटकर उन्होंने एक नयी तरह की माला बनायी। यही माला उन्होंने दुर्गा के गले में डाल दी। दुर्गा ने जो काम किया, वह तो इंद्र ने भी नहीं किया था। पार्वती ने भी शिव को पटाया भर था, संहार नहीं किया था। दुर्गा ने तो अजूबा किया था। वह सबसे महत्त्वपूर्ण थीं। सबसे अधिक धन्या शक्ति का साक्षात अवतार!

(प्रेमकुमार मणि। हिंदी के प्रतिनिधि कथाकार, चिंतक व राजनीति कर्मी। जदयू के संस्‍थापक सदस्‍यों में रहे। इन दिनों बिहार परिवर्तन मोर्चा के बैनर तले मार्क्‍सवादियों, आंबेडकरवादियों और समाजवादियों को एक राजनीति मंच पर लाने में जुटे हैं। उनसे manipk25@gmail.com पर संपर्क किया जा सकता है।)


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135 Responses

  1. बेहद विचारोत्‍तेजक लेख है। सिर्फ मणि जी ही है, जिनमें इस तरह के सच को कहने का साहस है। इस साहस के कारण उन्‍होंने काफी कुछ गंवाया भी है। लेकिन इतिहास ऐसे ही चिंतकों को याद रखता है।

  2. akshay k rastogi says:

    ye lekh ek no ki bakwas aur vikrat itihas adhyyan aur vikrat dimag ki upaj hai….aise logo se savdhan rahana chahiye

  3. धीरेन्द्र says:

    इस लेख के लिये —हा हा हा हा हा हा हा हाहा हा हा हा हा हा हा हा हा हा हा हा हा हा हा हा

    हा हा हा हा हा हा हा हाहा हा हा हा हा हा हा हा हा हा हा हा हा हा हा हा—–ये बाद में पता चला कि इसको एक राजनीतिक व्यक्ति ने लिखा है |

  4. Raj Kamta says:

    आज एक छात्र संगठन ने जेएनयू में इस लेख के कुछ हिस्‍से का पोस्‍टर बनाकर हर जगह साटा है। उस पर हंगामा हो गया है, कुछ लोग मुकदमा करने की बात कर रहे हैं, तो कुछ लोग फारवर्ड प्रेस की कापी जलाने की। यही है मार्क्‍सवादी जेएनयू का असली चेहरा।

  5. ATUL KUMAR says:

    Bilkul bakbas hai yah bichar.hamey dukh hai ki hamarey rajya me yesey yesey rajnitigya bhi paida liye hai!jai maa durgey jai maa bhawani subudhi de en ko.

  6. Vivek Mehta says:

    हम इस लेख को पटना यूनिवर्सिटी और मगध यूनिवर्सिटी के पटना स्थित कॉलेजों में बंटवाना चाहते हैं। फारवर्ड प्रेस नामक पत्रिका के अंक कहां मिलेंगे? क्‍या इसके लिए हमें पत्रिका से हमे अनुमति लेनी पडेगी? है कोई माई का लाल तो इसे पटना में जला कर या विरोध करके देखे।

  7. Rajeev Gupta says:

    पटना में भाजपा का राज है बंधु। पिटना हो तो अपना पूरा पता यहां बता कर देखो। यहां पोस्‍टर पम्‍पलेट साटना तो दूर की बात है। यह कुत्‍तागिरी जेएनयू जाकर ही करो तो बेहतर है।

  8. Ramesh Sinha says:

    Bilkul bakwaas…rajnitikta se prerit lekh hai ye.

  9. राजू सिन्‍हा says:

    ” बंग देश में वेश्याएं दुर्गा को अपने कुल का बतलाती हैं। दुर्गा की प्रतिमा बनाने में आज भी वेश्या के घर से थोड़ी मिट्टी जरूर मंगायी जाती है।” यानी लेखक ने दुर्गा को वेश्‍या कहा है। हद है। अगर कोई इसके खिलाफ कारवाई करने चाह रहा है तो गलत नहीं कर रहा।

    फारवर्ड प्रेस पत्रिका को प्रवीण तोगडिया और जनसंघ के ऑफिस में भेजा जाना चाहिए। वहीं से इन्‍हें ठीक जबाव मिलेूगा।

  10. Dilip Mandal says:

    ब्राह्मणवाद को अपने कंधे पर ढोने के कारण देश की 60% आबादी वाले समूह OBC की आज यह दुर्गति है कि उच्च पदों पर आपको दलित ठीक-ठाक संख्या में मिल जाएंगे, OBC नहीं मिलेगा। 25 केंद्रीय विश्वविद्यालयों में देश भर में मिलाकर सिर्फ 4 (चार यानी Four) प्रोफेसर हैं जबकि दलित प्रोफेसरों की संख्या 25 है (RTI की जानकारी)। आखिर OBC वही लोग हैं जो मंडल कमीशन के खिलाफ चलाए गए मंदिर आंदोलन में भगवा झंडा ढो रहे थे। OBC के समर्थन के बिना OBC हितों के खिलाफ कोई आंदोलन नहीं चल सकता। अण्णा हजारे पर नजर रखें।

  11. Dilip Mandal says:

    ओबीसी जज नहीं मिलेंगे। सरकारी कंपनियों और निगमों में ओबीसी मैनेजिंग डायरेक्टर और चेयरमैन नहीं मिलेंगे। केंद्रीय विश्वविद्यालयों में ओबीसी वाइस चांसलर नहीं मिलेंगे। एक्जिक्यूटिव डायरेक्टर नहीं मिलेंगे। और यह सब न होने की वजह से स्वाभाविक तौर पर होने वाली नाराजगी भी नहीं मिलेगी। परंपराओं की वडह से ओबीसी का एक बड़ा हिस्सा इसे पिछले जन्मों के पाप कर्मों का फल मानता है। सांस्कृतिक दासता से इस समूह को मुक्ति कैसे मिले यह ओबीसी चिंतकों का प्रमुख कार्यभार होना चाहिए।

  12. Ram lal says:

    अंतिम पैरा में जाकर मणि महाराज अपना मणि दिलीप मंडल के घर जाकर खो आए। महिषासुर को यादवो का नेता घोषित कर दिया और यादवों को द्रविड़। इशारों में दुर्गा को वेश्या भी कह दिया। हकीकत यह है कि यादव आर्यों की मुख्य जाति है जो शुरु में क्षत्रिय थी और इसके राजवंश भारत भर में बिखरे हुए थे। हालतक देवगिरी का राजा यादव था जिसकी विरासत पर मराठा लड़ाकाओं ने मुसलमानों से दो-दो हाथ किए। आर्य मुख्य रुप से पशुपालक थे और आज भी आर्यो का वो पेशा कोई जाति अपना कर रखे हुए है तो वो यादव ही है। यादवों की स्थिति तब खराब हुई जब हूण, शक, कुषाणों का भारत पर हमला हुआ और प्राचीन क्षत्रियों को अपने गौरव से च्यूत होना पड़ा। वे नए आक्रान्ता राजपूत बने जिसे ब्राह्मणों ने मान्यता दे दी। उसके बाद ये यादव, कुर्मी, लोध, मराठा जैसी जातियां खेती करने लगी और समाजिक रुप से हीन हो गई। एक वजह ये भी है कि इनमें ब्राह्मण विरोध का भाव इतना प्रवल है।

    इतिहास के अधूरे ज्ञान की वजह से प्रेमकुमार मणि बहक गए हैं। उन्होंने श्याम वर्ण के आधार पर कृष्ण को द्रविड़ मान लिया है और इंद्र से लड़ाई के आधार पर भी। उस हिसाब से राम भी श्याम वर्ण के थे और इंद्रपुत्र ने कौवे का रुप लेकर उनकी पत्नी पर भी हमला किया था। तो क्या वे भी द्रविड़ थे? उस हिसाब से तो सारा मामला ही सिर के बल खड़ा होता दिखता है।

  13. Dilip Mandal says:

    आपने सोचा है कि संसद से 15 किलोमीटर दूर दिल्ली यूनिवर्सिटी में एक भी OBC प्रोफेसर क्यों नहीं है? इसके बावजूद देश का OBC नाराज क्यों नहीं है? अगर यह सांस्कृति और मानसिक दासता नहीं है तो क्या है? इस दासता का स्रोत कहीं ये मिथक शास्त्र तो नहीं, जो भाग्यवाद को स्थापित करते हैँ।

  14. Vishal Yadav says:

    Shambhu Suman
    महिषासुर घाती सुर कन्या दुर्गा की क्षय हो ! महिषासुर की शहादत अमर रहे !

  15. K.D.Sharma says:

    सवर्ण और बहुजन की गन्दी राजनीत्ति के इस खेल में अब देवी-देवताओं का भी वर्गीकरण करके प्रेमकुमार मणि जैसे आधे-अधूरे व्याख्याकारों??? ने अपनी ओछी मानसिकता का ही परिचय दिया है,ऐसे लोगो की वजह से ही तो समाज में नफरत और साम्प्रदायिकता फैलती है.इस लेख!!! की घोर निंदा.

  16. Vishal Yadav says:

    राम लाल जी, आपकी अक्‍ल पर भरोसा करने वाला यहां कौन है। अपनी अक्‍ल अपने पास रखिए। हमें वर्ण व्‍यवस्‍था की स्‍थापना करने वाले कृष्‍ण और हमारे राजा महिषासुर की हत्‍या करवाने वाली दुर्गा की पूजा करने की सीख क्‍यों देना चाहते हैं आप लोग। इसी मानसिक गुलामी से बाहर निकलने की जरूरत हमें हैं।

    और, हां जिस तोगडिया, फोगडिया को खबर करना हो कर दो। यादवों के खिलाफ बोलने के औकात अब न इनकी रही है, न ही ब्रह्मणवादी संघ की।

  17. Vishal Yadav says:

    Anil Kumar के फेसबुक वॉल से यह सूचना कॉपी पेस्‍ट कर रहा हूं। शायद ये सज्‍जन जेएनयू के वासी हैं। अच्‍छा खासा बवाल मचने की संभावना है वहां। —-

    पेरियार, JNU के मनु पुत्रो नें AIBSF को पोस्टर फाड दिया, जिसमें दुर्गा के सच्चाई को उजागर किया गया था. इसे आज शाम को ही लगाया गया था
    Aibsf Jnu Aibsf Bhu Vinay Bhushan Dinesh Maurya Dinesh Kumar Dilip Mandal Dharmendra Sharma Priyadarsini Samantaray Arjak Sangh Arvind Kejriwal — with Jai Kaushal and 6 others.

  18. बाबा रामदेव says:

    तुम लोगों ने यह क्‍या खेल मचा रखा बच्‍चा। दुर्गा अगर वेश्‍या थी तो उसके पास मत जाओ। एडस का खतरा है। और वेश्‍या नहीं थी, तो भी उसके पास मत जाओ। उसके हाथ में भयानक हथियार हैं, वह तुम्‍हारा संहार कर सकती थी।

    आखिर, वह वेश्‍या थी, तब भी यह सच है उसने हमारे देवता को मारा और अगर वेश्‍या नहीं वीरांगना थी, तब भी यह सच है कि उसने हमारे देवता की हत्‍या की। वह हमारी शत्रु है।

    आओ सब मिल बोलें – ” महिषासुर घाती सुर कन्या दुर्गा की क्षय हो ! महिषासुर की शहादत अमर रहे !”

  19. manish says:

    oops, What a great discussion. A nice strategy to gain attention.

  20. Manish Kumar says:

    Some Informations. Its all r cut-paste frome facebook walls –

    Pramod Ranjan
    एफपी का अगस्‍त, 2011 अंक यहां से फ्री डाउनलोड कर सकते हैं।
    http://dnaglobalnews.files.wordpress.com/2011/08/india-publication-vishal.pdf
    http://dnaglobalnews.files.wordpress.com/2011/08/india-publication-vishal.pdf
    dnaglobalnews.files.wordpress.com

    Pramod Ranjan
    सिर्फ कुछ दिन और हैं। फारवर्ड फ्रेस का ताजा अक्‍टूबर अंक नि:शुल्‍क हम उन्‍हीं को भेज पाएंगे, जो 2 अक्‍टूबर के पहले तक इसके लिए आग्रह करेंगे।

    मुफ्त अंक पाने के लिए इस इमेल पते पर अपना डाक का पता और फोन नं दें – pramodrnjn@gmail.com

    इस अंक के लेखक हैं –
    प्रेमकुमार मणि -’दुर्गा : किसकी पूजा कर रहे हैं बहुजन ?’
    दिलीप मंडल – ‘मीडिया कैसे झूठ बोलता है’
    श्रीकांत – ‘बिहार में आरक्षण का इतिहास’
    अरविंद कुमार – ‘शब्‍द औ शुद्र’
    सुभाष गताडे – ‘बिहार के अखबारों को नोटिस’
    गुलाम रब्‍बानी – ‘ सर सैयद अहमद खां : अशराफों के मसीहा, पसमांदों के नहीं’
    विशाल मंगलवादी – ‘मैकाले बनाम मनु’
    टॉम वुल्‍फ – ‘भारत परिवर्तन के चार प्रस्‍ताव’

  21. prof.Jagdish Lohra says:

    झारखण्ड में इसकी कापी (फारवर्ड प्रेस ) बांटी जाएगी और यहाँ के आदिवासियों के आगे सघ ,मनु ,तोगड़िया की औकात नहीं /

  22. Manish Kumar says:

    Some More Informaion about FORWARD PRESS, called FP –

    Dilip Mandal
    लगभग डेढ़ सौ साल बाद कब्र से निकलकर मैकाले अब अपने पुनर्मूल्यांकन की मांग कर रहे हैं। फारवर्ड प्रेस का ताजा अंक पढ़े। अंक स्टॉल पर न मिले तो संपर्क करें – dc.aspireprakashan@gmail.com और फोन नं है – 011-46538664 लिंक क्लिक करके यह लेख पढ़ें।

    Revelation Movement :: Macaulay Vs Manu: The Making of Modern India by Vishal Mangalwadi
    http://www.revelationmovement.com

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    Dilip Mandal अब जो आदमी IPC बनाने के क्रम में यह लिखेगा, वह विलेन नहीं तो क्या देवता कहलाएगा-……the worst of all systems was surely that of having a mild code for the Brahmins, who sprang from the head of the Creator, while there was a severe code for the Sudras, who sprang from his feet. India has suffered enough already from the distinction of castes…..
    Monday at 01:25 · Unlike · 6 people

    Vinay Bhushan मैकाले के योगदान को केंद्र में रखकर जेएनयू में एक सेमिनार कराने का विचार बन रहा है. विदित हो कि उन्होंने भारत में बहुजनों के लिए नई शिक्षा नीति के तहत ज्ञान-विज्ञान के ढेरों अवसर मुहैया कराया I
    Monday at 12:03 · Unlike · 1 person

  23. Amitesh says:

    इतने संवेदनशील विषय पर लिखते हुए लेखक कोई साक्ष्य नहीं प्रस्तुत करे क्या यह चिंतक का काम है. मणि ना तो चिंतक है और ना हिन्दी के प्रतिनिधि कहानीकार..अलबत्ता प्रोपगैंडिस्ट जरूर है. अपने मन के जहर को उन्होम्ने उगला है. और जितने तर्क दिये हैं उनमें कोई संगति नहीं. वैसे उनको मुर्ख मानने के लिये यह लेख पर्याप्त है…लेकिन उम्मीद है कि आगे भी अपनी मुर्खता का प्रमाण देते रहेंगे…

  24. बिना दिलीप मंडल के इस तरह के तमाशे नहीं होते says:

    Dilip Mandal
    मैकाले के बनाए इंडियन पीनल कोड यानी IPC की वजह से भारत के लगभग 2000 साल के इतिहास में पहली बार कानून की नजर में हर इंसान बराबर हो गया। एक अपराध-एक दंड लागू हुआ। क्या इसलिए मैकाले हैं ब्रिटेश राज के सबसे घृणित इतिहास पुरुष?…. जानने के लिए पढ़े फॉरवर्ड प्रेस। अच्छी खबर यह है कि पत्रिका का मेंबरशिप अभियान चल रहा है। एक अंक मुफ्त मंगाएं और पसंद आए, तो ग्राहक बनें। संपर्क करें- Dharmender Chouhan (Administrator)
    Aspire Prakashan Pvt. Ltd.
    803/92, Deepali Bldg. Nehru Place.
    New Delhi-110019
    (M):> 09990848941, 46538687,
    TeleFax – 46538664,
    email: dc.aspireprakashan@gmail.com

  25. प्रदीप कुमार says:

    @ Amitesh

    कहते हैं हाथ कंगन को आरसी क्‍या। लेकिन मूर्खों को अपने हाथ का कंगन देखने के लिए आइने की जरूरत होती हे। कैसे प्रमाण की जरूरत है आपको अमितेश बाबू। क्‍या दुर्गा का असली फोटो चाहिए। या महिषासुर के साथ संभोगरत होने के समय की मोबाइल क्लिपिंग?

    इस लेख में तमाम पौराणिक और भाषा आधारित प्रमाण दिये गये हैं, इतिहास भी बताया गया है तब भी आपको प्रमाण नहीं सूझता तो आपकी आंखों को चश्‍मा नहीं, बल्कि दिमाग को इलाज की जरूरत है।

  26. प्रदीप कुमार says:

    @ prof.Jagdish Lohra – हम आपके साथ हैं।

  27. सुनिल कुमार says:

    बहुत ही बढ़िया लिखा है मणि जी ने। मिथकों की परतों में छिपा इतिहास बहुत ही खूबसूरती से सामने लाए हैं। इस विषय पर और अधिक लिखने-पढ़ने की ज़रूरत है। कई साथियों को यह बातें चौंकाने वाली लगेंगी, लेकिन जब इतिहास का पुनर्मूल्यांकन होगा तो कुछ बनी-बनाई धारणाएँ आहत तो होंगी ही। मोहल्ला लाइव और फारवर्ड प्रेस को इस दिशा में पहल करने पर बधाई।

  28. dheeraj kumar says:

    देखिए आज विजयदशमी पर हमारा विशेष कार्यक्रम एहसास बुराई पर अच्छाई की विजय। आज रात १० बजकर ३० मिनट पर डी.डी. न्यूज पर और दुबारा देखे शनिवार शाम ६ बजकर ३० मिनट पर। आपके प्रतिक्रिया का इंतजार रहेगा।

  29. Vijay Rana says:

    Sorry dear, developing a current socio-political argument by mixing facts with fiction is not a very wise. Secondly, one cannot reform the past but present could be reformed if want to. Thanks to Mandal politics in India today, Dalit politicians have a wasted interest in keeping Dalits as Dalits forever. Otherwise when I was growing in the 60s and 70s there were powerful forces working to eliminate this caste divide. If casteism of upper caste was bad and needed to be eliminated, how could the casteism of Dalits and OBCs could be good and why it should be retained.

    What India needs is a national concensus that everyone is equal before law and all kind of discrimination based on colour, caste, relgion and gender must be striclty ruled out and discriminators severly punished. Wehreas in India the emphasis is on giving some benefits to the leaders of Dalits and OBCs – like jobs and parliamentary reservations – while the vast majority of these people live in miserable existence. The example of Maya, Mulayam and Laloo tells that even the Dalit and OBC leaders are not interested in the welfare of their own people.

  30. Amit Shreyas says:

    SAAVDHAAN , HINDUO ME FOOT DAALNE KI SAAZISH HO RAHI HAI.

    AARYA
    !
    V
    ——————————–
    ! !
    v v
    RAGHU YADU
    ! !
    V V
    RAM KRISHNA

  31. Amit Shreyas says:

    AARYA > RAGHU > RAM

    AARYA > YADU > KRISHNA

  32. Amit Shreyas says:

    DURGAA MAATAA = GAU MAATAA

  33. Amit Shreyas says:

    BHAISAA = BAKRAA = MURGAA

    ______________________________________________________________________________

    (1) BHAISAA , KO HINDU – RAASHTRA – NEPAL ME KHOOB KHAAYAA JAATAA HAI

    (2) BAKRAA AUR MURGAA , INDIA ME KHAAYAA JAATAA HAI.

  34. Amit Shreyas says:

    प्रेमकुमार मणि = MAADHAR – CHO_

  35. Dilip Mandal says:

    अगर आपको यह रहस्य समझना हो कि ओबीसी आरक्षण लागू होने के बावजूद केंद्र सरकार की नौकरियों में 7% से भी कम ओबीसी क्यों हैं (स्रोत: लोकसभा प्रश्नोत्तर), और देश की 60% आबादी होने के बावजूद ओबीसी इससे नाखुश क्यों नहीं है, तो इन मिथकीय ग्रंथों का पुनर्पाठ जरूरी है। मानसिक गुलामी शून्य से पैदा नहीं हुई है। और फिर, देश का 60% हिस्सा यानी ओबीसी तरक्की नहीं करेगा,तो क्या देश के नक्शे की तरक्की होगी? अवसरों और संसाधनों के बंटवारे में सामाजिक विविधता देश के विकास का प्रमुख एजेंडा होना चाहिए और हर जाति के देशभक्त लोगों को इसका समर्थन करना चाहिए।

  36. अविनाश says:

    dalits don’t celebrate durga puja, but celebrate martyrdom day of mahishasur. a parallel festival is required. i m with this Parallel fest!

  37. NEERAJ DAYAL says:

    The above article on Devi Durga is interesting but faraway from the truth.The some facts seem true and researched . I think that we should not look for history in the mythological stories. We may learn good moral stories from these Puranas but incidents explained here are usualy beyond reasoning.Rajtarangni,the story of Kashmir kings is considered the first authentic writing of history in India . You are against brahmanism but believe in other gods and godess of sanatan hindu dharm which you consider as asur or anarya.You should not look this issue by spectacled eyes. As per my knowledge of history as a former student, the yadavas or any other farmer caste never had been considered asur.Indra ,god of rain aiso fought to capture animals from his enemies. The only untouchabies comprises of Anarya or Asur.At last I want to remind you that Yamraj who according to hindu mythology decides the death of a person also rides buffalo or mahis.

  38. नरेंद्र जोमर says:

    एक ऐसे जमाने में जब ‘मुख्‍यधारा’ का ल्रगभग पूरा मीडिया दिन रात तरह से तरह से पुराने अंधविश्‍वासों को वापस लाने और नए नए गढने में लगा हैं, इस प्रकार के शोधपूण्र आलेखों का महत्‍व बहुत अधिक हो जाता है। ध्‍यान दीजिए कि नए अंधविश्‍वासों को गढने और आरक्षण विरोध का काम साथ साथ और उन्‍हीं प्रतिगामी ताकतो द्वारा चलाया जा रहा हैं आधुनिक विज्ञान एव प्रोद्योगिकी का तमाम उपल्ब्धियों का उपभोग करते हुए देश को हजारों साल पुरानी वर्णाश्रम की अमानुषिक व्‍यवस्‍था में धकेल कर धर्म और परंपरा के नाम पर अपने विशेषाधिकारो को उसी रूप में वापस लाना चाहते है। ऐसे में न केवल इन निहित स्‍वार्थों के कुप्रयासों को विफल करने बल्कि देश मे जनतंत्र को बनाए रखने के लिए पौराणिक किस्‍से कहानियों की उस तरह की व्‍याख्‍याएं सामने लानी जरूरी हैं जैसी कि समय समय पर राहुल सांक्त्‍यायन, भगवतशरण उपाध्‍याय या बाद में डीपी चटटोपाध्‍याय और वेद प्रकाश वर्मा आदि जैसे प्रगतिशील विद्वानों ने की है।
    बहरहाल एक अच्‍छे सामयिक आलेख के लिए लेखक को बधाई।

  39. कुमार तद्भव says:

    अबतक हिंदू धर्मग्रंथों के आधार पर तैयार सवर्णवादी-ब्राह्मणवादी पाठ के आधार पर दुर्गा का बुराई विनाशक चरित्र गढा जाता रहा है और उसको उत्सवी रूप भी दिया जाता रहा है. बहुजन चिन्तक मणि जी का यह आलेख दुर्गा के सवर्ण चरित्र और दलित-बहुजन विरोधी होने को बडे ही तार्किक और सुचिंतित व्याख्या के साथ रखता है.

    ब्राह्मणवाद के कीचड़ में मुंह घुसेड़े कुछ बहुजन समुदाय के पढ़े-लिखे लोगों को भी अपने समाज के मान-मर्दक देवी-देवता के विरुद्ध कुछ कहा जाना नहीं पचता,चूँकि उनके मस्तिष्क की इतनी ब्राह्मणी-कंडीशनिंग बचपन से हो चुकी होती है कि प्रभु जातियों की भेदपरक व्यवस्था का घोर शिकार होकर भी वह उस अन्यायी व्यवस्था के प्रति कोई शिकायत या विरोध नहीं पालता.

    जहाँ तक हिंदू धर्म में ईश्वर की स्थिति प्राप्त राजपूत बिरादरी के सवर्ण राम के श्याम वर्ण होने की बात है तो यह सिद्ध है कि वह अपने पिता के वीर्य से उत्पन्न नहीं था.दशरथ नपुंसक था. फैलाया यह गया कि नियोग पद्धति से उसकी चारों संतानें हुईं, यानी राम और उसके सौतेले भाई, लक्ष्मण, भरत और शत्रुघ्न किसी और पुरुष कि कृपा से मानुष जन्म को प्राप्त हुए. राम के श्याम वर्ण होने का संकेत यह है कि उसका गर्भाधान किसी अवर्ण या द्रविड़ मूल के पुरुष के वीर्य से हुआ था.

    हालांकि यह सब महज कहानियां हैं,पर ये तत्कालीन समाज के राजन्यवर्ग में व्याप्त सेक्स उच्छृंखलता और अशुचिता के चलन को दर्शाता है.हिंदू धर्मग्रंथों में तो अनेक सेक्स प्रकरण ऐसे हैं जिन्हें पढकर कमाल की लैंगिक उत्तेजना उफान मरती है. कही वितृष्णा भी होती है, जैसे, बेटी सरस्वती के साथ बाप ब्रह्मा का सम्भोगरत होने का कथा-प्रसंग पढ़-जानकर.

    इन अनर्गल-अतार्किक धार्मिक संस्कारों एवं बाह्याचारों से दूर जाने से ही सभ्य समाज बनाने की गति अधिक तीव्रतर और प्रशस्त होगी. विज्ञान पुस्तकों को हम गले लगाएं और सोच को संकीर्ण और अविवेकी बनाने वाले ग्रंथों को हम त्याज्य बनाएँ.

  40. Dharam says:

    abhi aur bhee bahut sare dharm-granthon aur mithakon ka punarpath hona baki hai.sara itihas ek pakshiy hai. hangama se dar kaisa?

  41. प्रदीप कुमार says:

    बिल्‍कुल सही अविनाश जी। हम सब आपके साथ हैं। अभी फेसबुक पर एक कमेंट देखा, आपसे साझा कर रहा हूं –

    ” Shambhu Suman
    सांस्कृतिक लड़ाई में खेत हो गए तमाम नायको मसलन बलि राजा,महिषासुर और लंकेश रावण की स्मृति को शत -शत नमन .जैसे जैसे इतिहास का उत्खनन बहुजन नजरिये से आगे बढेगा ,सांस्कृतिक परिदृश्य साफ होता जायेगा.”

    शहीद महिषासुर की शहादत को नमन।

  42. ashish says:

    आज आपने दुर्गा को वेश्या कहने का साहस कर दिया। हो सकता है कल अपनी मां को भी ऐसा ही कुछ कहेंगे।

  43. Pradeep Singh says:

    मजे की बात ये भी है कि तमाम नास्तिक लोग हिंदू धार्मिक ग्रंथों के घनघोर परायण में लगे हुए हैं। एक तरफ वे इसे काल्पनिक बताते हैं दूसरी तरफ मानों इसे पढ़कर परलोक सिधार रहे हों!

  44. ZEIY Àff±fÊIY, ªføYSXe AüSX ¶fZWX°fSX ªff³fIYfSXe. ¶fWXÀf IYe ´fcSXe ¦fbaªffBVf IZY Àff±f. ªffdWXSX W`X dIY ¹fZ ¶fWXÀf CX³f d½fVff»f AüSX kVfd¢°f½ff³fl Àf½f¯fÊ ¶fif¸WX¯f °f¶fIZY IYû ´fÀfaQ ³fWXeÔ AfE¦fe ªfû A·fe ·fe JbQ IYû VffÀfIY WXe ¸ff³f°ff W`X. EIY °fSXWX ÀfZ ½fZ WX¸ffSZX dQ¸ff¦f ´fSX °fû VffÀf³f IYSX WXe SXWZX W`ÔX.

  45. सुनिल कुमार says:

    @ashish: लेखक ने वही ‘लिखा’ है जो वेश्याएं खुद ‘कहती’हैं। लिखने के बाद अगर वही बातें आपको बुरी लग रही हैं तो आप पढ़ना-लिखना छोड़ सकते हैं। और वेश्याओं के घरों से मिट्टी लाने का रिवाज़ भी लेखक ने शुरू नहीं किया। http://www.outlookindia.com/article.aspx?262075

  46. ashish says:

    @sunil.. fir zara is heading ka matlab batayein…..दुर्गा चंडी नहीं, “…” थी, उसकी पूजा क्‍यों करें बहुजन?

  47. rakesh says:

    @avinash..kyun be tu pehle ye to bata ki aurton ke kaaran kitni baar or kitni jagahopn se tujhe laat maar kar nikaala gaya

  48. rakesh says:

    @dilip mandal..kutte tu saale dalit-dalit karta hi mar jaayega haraami..

  49. shree prakash says:

    Can we get this article in English?..One of my friend has asked for that.

  50. Manish kumar says:

    Why soil from sex workers’ doorstep is necessary for making Durga idols:

    http://www.outlookindia.com/article.aspx?262075

    To make otherwise ostracised members of society feel included
    Clients visiting ‘houses of vice’ leave their virtues outside the door, making the soil here virtuous
    To purge prostitutes of their “sins”
    As a fertility ritual
    To honour ‘courtesans’, traditionally famed for their proficiency in the arts
    ***

    Long before it became politically incorrect to call sex workers by any other name, it was considered inauspicious to worship the goddess Durga without seeking out the
    blessing of courtesans, even if they were otherwise stigmatised and ostracised by society. Thus originated the little-known, age-old custom of collecting a handful of soil (punya mati) from the nishiddho pallis of Calcutta, literally ‘forbidden territories’, where sex workers live, and adding it to the clay mixture which goes into the making of the Durga idol.

    “It is an integral ingredient of the holy mix, which also includes mud from the banks of the Ganga, cow dung and cow urine,” says veteran potter and idol-maker, Ramesh Chandra Pal of Kumartuli, home to Calcutta’s biggest clay idol manufacturing community for over 300 years. “It is a vital part of the ritual of Durga Puja,” agrees pujari Haru Bhattacharya. The 30-year-old, fourth-generation pujari goes personally to Sonagachi, Calcutta’s biggest red light area, “on an auspicious day” about a month before the onset of the festive season, around the time when potters begin to start work on idols, to collect what he calls the “virtuous dust from the doorstep of beshhas (prostitutes)”.

    This process is so sacred, explains Bhattacharya, that on the morning of the visit he takes a holy dip in the Ganga and chants mantras from the scriptures all through the soil-collection process. He says, “The most auspicious method of collection is to beg it from a prostitute and have her hand it to you as a gift or blessing. If it is taken from the ground, the pujari must know the correct way of doing it, including knowing which mantras to chant and how to position the fingers in a yogic mudra while scooping up the soil.”

    But this year, all that pious knowledge went for a toss when pujaris and potters met with stiff resistance from sex workers while trying to collect soil from different brothels across Calcutta. “Many potters faced angry women who refused to allow them to take even a pinch of soil,” says Pal. “I had to practically steal the soil,” says a priest who does not want to be named, adding, “We cannot do without it.” One potter even shamefacedly admits to having “impersonated a client to be able to enter the premises and collect soil”. Not everyone was as enterprising, so in the end, many of the Durga idols immersed last week lacked the “essential” ingredient.

    I used to feel honoured. But they can’t make goddesses out of us once a year and call us whores for the rest of the year.”Sheela Bose, Former Sex Worker

    The intriguing question is, why did sex workers suddenly turn against an age-old tradition? As Outlook discovered during a visit to Sonagachi, sex workers have an answer, and an eloquent one: “We’ve gradually come to understand this so-called sacred custom is a load of bull,” thunders Sheela Bose, a 55-year-old former sex worker who now runs a brothel inside the squalid red-light area. “Once, I used to feel honoured when priests asked me for dirt from my doorstep. They told us Ma Durga would be displeased if those who worship her do not take our blessings. But over the years, I’ve begun to ask, what are we getting out of it? They can’t make goddesses out of us once a year and then call us whores for the rest of the year.”
    Our conversation with Bose takes place at the entrance of her tiny two-room ‘business area’ on the mosquito-infested ground floor of a crumbling multi-storey cement building. “Look at the way we live,” she hisses, pointing to the surrounding filth. The open drains running alongside the narrow congested galis are swarming with flies. “We’re treated like these flies, dirty and unwanted. So why should we only give and not receive anything in return?”

    Chimes in a thirtysomething sex worker who goes by the name Anamika. “We have some demands—don’t treat us like criminals, we’re not here out of choice. Poverty has forced us to be here. Let society do something for us and then we’ll willingly give the soil.”

    A Durga idol being made at Kumartuli

    The sex workers are touchingly anxious to explain they are as pious as any middle-class Durga worshipper. Says 28-year-old Seva, “We pray all the time to our gods to deliver us from this sinful life.” She grabs me by the arm and takes me into her room and points to a wall that is plastered with framed pictures, photos, posters and paintings of spiritual leaders and gods and goddesses representing a range of religions. “Here Hindus, Muslims, Christians, Buddhists all live harmoniously,” she says, with pride.

    The most auspicious method of soil collection is to beg it from a prostitute and have her hand it to you as a gift or blessing.”Haru Bhattacharya, Priest

    Her point is not an irrelevant one: One of the theories explaining the soil collection is that all religions are represented in the sex worker community, making their involvement in the ritual a fitting tribute to the all-encompassing Durga.
    The ‘non-cooperation’, as one priest calls it, was not confined to Sonagachi but spread, word-of-mouth, to other red-light areas across Calcutta. Admits Nepal Bhattacharjee, the local priest in Kalighat, which houses several of Calcutta’s brothels, “It’s getting tough to just walk in and walk out with their soil, and this year has been especially tough.”

    Neither priests nor potters are inclined to challenge the sex workers. “We could of course take the soil by force but that would defeat the purpose,” said one priest. Shopkeepers, however, have smelt a commercial opportunity. Since the protests, establishments selling items of religious worship have begun to stock ‘pros-quarter soil’ as one store owner calls it, ranging from Rs 1 for a pinch to Rs 20 for a bagful.

    Taking the complaints of the sex workers on board, and addressing them is, sadly, not an option.

  51. shree prakash जी फारवर्ड प्रेस द्विभाषिक पत्रिका है। हिंदी और अंग्रेजी में। लेख का अंग्रेजी अनुवाद यहां दे रहा हूं –

    Shakti Worship
    Rereading of a Myth

    PREM KUMAR MANI

    Since the beginning of civilization Shakti (cosmic power, often described as the feminine creative force) has been worshipped in its various forms such as capability, power, influence, strength and energy. Not just in India but in all the regions of the world. The entire mythology of the world has been woven with gods and goddesses who symbolize Shakti. Even today the importance of Shakti is indisputable. America can bully the whole world only because it has the maximum military power and wealth. Nobody listens to those who don’t have nuclear bombs; their voice carries no value. Only he succeeds in having his Gita heard who carries a Sudarshna Chakra in his hand. It is his forcefulness alone that carries any weight; and so does his politeness. Poet Dinkar has said, “Forgiveness is becoming of that serpent who also carries the poison/ Not of him, who has neither teeth nor poison, who is polite and a simpleton.”

    A toothless and poison-less snake cannot even pretend to be civilized. His politeness, his forgiving attitude are all meaningless. The Buddha has said, “The weak cannot tread the right path.” Even in his non-violent civilization, it is permitted to hiss. In one of the Jataka tales, there’s an incident where a dangerous snake becomes a follower of the Buddha. Being a Buddha follower, he gave up biting people. When people came to know that he no longer bit they started stoning it. Even then it did not retaliate. When the Buddha met his blood-soaked follower, he was overwhelmed and said, “I forbade you to bite, not to hiss. People would have fled if you had just hissed.”

    In India too there has been a long history of worshipping Shakti. But this history is not so simple. Complexities and confusions are aplenty. The symbol of Shakti evident in the Indus Valley Civilization is not the same one we see after the arrival and settling of the Aryans. The centres or symbols of Shakti kept changing with the pre-Vedic, early-Vedic, Vedic and post-Vedic periods. As the influence of Aryan civilization increased, its various forms also came to light. So if any contemporary Hindu considers Durga or any other goddess to be the first and the final symbol of Shakti, he or she is being childish. In the non-Aryan or Dravid civilization of the Indus Valley Prakriti (feminine) and Purusha (masculine) were combined symbols of Shakti. That was an era of peace. In Marxist terms, the era just succeeding the primitive communist society. That civilization had developed enough for people to live in houses made of baked bricks and there were great baths and market places. Shiva must have been the leader of these copper-complexioned and flat-nosed people; a carefree, happy-go-lucky kind of hero. There was no Shakti worship in the civilization of these Dravids.. In any case, power in advanced civilizations is not an object of worship.

    It was the arrival of the Aryans that set the stage for Shakti Puja. The peaceful, civilized Dravidian cow-rearers of the Indus civilization (note that Shiva rides a bull, which is born of a cow) were destroyed and pushed back by comparatively crueler horse-riding Aryans. Dravidians would not have given up easily. The battle between “gods” and “demons” is the same Aryan–Dravidian battle. Indra was the leader of the Aryans. Indra was also the symbol of Shakti. Vedic sages have praised this god, Indra, to the high heavens. At that time, Indra was the greatest god, the greatest hero of the Aryans. He was the Hercules of the Aryans. There is no mention of worship of any goddess during that period. Aryan society was patriarchal. Men had the upper hand. The position Prakriti (feminine) had in the Dravidian times had almost vanished. In the Aryan-dominated society, male supremacy carried on for a long time.

    However, Indra continued to receive challenges from the Dravidians. If the cow-rearing Krishna has anything to do with history then his proverbial dark skin complexion likens him to a Dravidian hero. This Krishna also publicly opposed Indra worship. He established his own power instead. Shiva too was co-opted within the three main gods by Aryan society. Indra was totally discarded. From the orthodoxy of Bhartiya Jana Sangh to the limited liberalism of the Bhartiya Janata Party (BJP) and finally the National Democratic Alliance (NDA structure), the Aryan society too changed along these lines. This pretension of liberality is necessary to spread out. Like a George Fernandes or a Sharad Yadav, it was important to make Shiva the convener, because without that it was not possible to create a hassle-free kingdom.

    The Aryans tried to bring harmony by marrying their daughter to Shiva. When both the parties are strong there is harmony and coordination. When one is weaker, the other slaughters. Aryans and Dravidians were both in positions of strength. It was possible to attain harmony and coordination between the two. Where was the question of Shakti Puja? Shakti Puja happens after the slaughter. The victor becomes worship-worthy; the loser worships. Though a limited sense of worship exists in civilized societies as well, it is worship of the hero, not worship of the mighty. Only a weak, indolent, defeated society worships the mighty. Shiva worship is worship of a hero. Shakti Puja is not that. The worship of Raavan in the myths is Shakti Puja. It is adoring the powerful; singing, hosannas to the mighty!

    But what does it mean to worship Shakti as a goddess? The meaning is deep as well as simple. Matriarchal societies existed in eastern India, diametrically opposite to patriarchal societies in the western parts. Culturally, East is Banga (Bengali) land, which stretches to Assam. This region worships the goddess form of Shakti. One of the meanings of Shakti is vulva or vagina. Vagina is the centre of reproductive power. In ancient societies, during the yajnas (sacrificial fires) carried out to enhance productivity of the land, women were made to parade naked. In the East woman is traditionally considered to be a symbol of Shakti. This tradition was culturally used by Brahmins for their own ends. This was a well-thought-out campaign of the Brahmins to co-opt non-Brahmins into Aryan society. This can also be called the expansion of Aryan culture into East. For expansion it was necessary to harmonize with the existing matriarchal society. The intermingling of patriarchal and matriarchal societies. Aryan society had to accept the importance of the feminine, had to underline its power. Goddesses, instead of gods, became important. This Eastern form of Shakti was unprecedented for Aryan culture.

    What Is the Mahishasur and Durga Myth?
    So what is this myth of Mahishasur and Durga? Unfortunately, we have only looked at it from an elitist brahmanical perspective. I remember that after the 1971 Indo-Pak war and the creation of Bangladesh, the then Jana Sangh leader Atal Bihari Vajpayee referred to the then prime minister Indira Gandhi as Abhinav Chandi Durga (The New Chandi Durga). At that time, Communist leader Dange was still in control of his senses. He fiercely opposed it and said, “Atal Bihari fails to understand what he is saying and Mrs Gandhi fails to understand what she is hearing. Both must understand that Chandi Durga was a slaughterer of the Dalits and backward sections.” After this statement by Dange, Indira Gandhi said in Parliament, “I am only Indira and that’s what I want to remain.”

    The Shudra (and perhaps the unadulterated) reading of Mahishasur–Durga story goes like this. Mahish means buffalo. Mahishasur means the Buffalo Demon. Demon (asur) is different from god (sur). Sur means god. God means Brahmin or Swarna (upper caste). Surs do no work. Asur means those who work – in today’s parlance, workers. Mahishasur means people who rear buffalo, the buffalo-rearers. Those who trade in milk, the dairy people. Asur may have changed to Ahur and then to Ahir (the present-day milkman caste). Mahishasur or the buffalo-rearers must have been the people dominating the Banga region. Racially they must have been Dravidians. They must have also been opponents of the Aryan culture. Aryans had to defeat them. These people used Durga. In the Banga region, prostitutes mention Durga to be of their clan. Even today when one makes the Durga idol, some soil must be brought from the house of a prostitute. It took Durga nine nights to kill Mahishasur. The Brahmins who sent her waited nine nights with bated breath. This was a difficult task. If not force, deception. Force of deception. On the ninth night Durga tasted success, she killed Mahishasur. As they heard the news, the Aryans (Brahmins) were all agog. They swooped at Mahishasur’s people and cutting their heads (munda) off made a new kind of garland. They put this garland around Durga’s neck. Even Indra couldn’t do what Durga had done. Parvati too only seduced Shiva, she did not slaughter him. What Durga achieved was miraculous. She was most important. Most blessed of all! The very incarnation of Shakti!

  52. joosef says:

    mene devdas movie dekha tha,zisne bhi dekha hoga unhe bhi pata he paru durga ki murthi banane ke liye chandra mukhi namak besya ke gahar mitti lane jati he to is se sabit hota he ki jiski murtha besya ke ghar ki mitti ke bina ban nahi sakti woh bhi besya hi rahi hogi ye me nahi keheta hindu khud sabit karte he

  53. siddhartha singh says:

    मणि जी को साहशी लेख लिखने के लिए साधुवाद ……….

    मगर अफ्शोश की जब इतने अच्छे विचारों को भी हम संकीर्द्ता की नजरो से जातिवाद के अखाड़े में घसीट लाते है तो पूरा प्रयास बेईमानी हो जाता है (कम से कम मेरे विचारों में) बाकी आप लोग सोचने के लिए स्वतंत्र है. क्योंकि मै भी एक सवर्ण (राजपूत)हू और सच में पौरानिक सच समझने के बाद अपने कुटिल पूर्वजो पर चिढता हू मगर आप लोगो की जमात के कुछ दुष्ट मुझे ही अभी coment करेंगे की तुममे राजनीतिक बू आती है …और फिर मेरी हालत …घर की न घाट की……मगर मणि जी आप अपना काम करते रहिये ,,,मगर इतना सच भी जान लीजिए की न भूत में और न ही वर्तमान में कोई पूरी की पूरी जाति भृष्ट हुई इसलिए कृपा करके उन पवित्र आत्माओ को कष्ट मत होने दीजिए जो राम कबीर दादू रैदास के संत शरीरों में अवतरित हुई …….बस A word to the wise in enough.
    .
    .
    …………………..सदैव आप सबका (अपना या पराया पता नहीं)
    सिद्धार्थ प्रताप सिंह बघेल

  54. Asahmat says:

    Bhai saheb agar aap itne padhe likhe hain to internet ka upyog karke ye bhi dekh lete ki Marxist itihaskaroon ne bhi ye swikar kiya hai ki Sindhu Ghati sabhyata ke patan ki wajah arya nahi the.

  55. Indrapal Singh says:

    Mani ji ithihas ko tod maror k janata k samaksh prastut kar rahey hain inhey is baat bhi gyan nahi hai k itihas ek bar banta hai. mughe to lagta hai ki mani ji rajniti ki chah me ye bhi bhul gaye hain ki wo hindustani hai jahan shakti ki aradhana hoti hai jisme unke maa bhi aati hain.

  56. Dharmender says:

    ए मेरे दोस्तों आपको मेरा सलाम,
    मैं देना चाहता हूँ एक छोटा सा पैगाम,

    प्यार आसान नहीं इस दुसमन जमाने मैं

    ए मेरे दोस्तों आपको मेरा सलाम ,
    मैं देना चाहता हूँ एक छोटा सा पैगाम,

    एक बार प्रेम, आनंद, शांति , धीरज, छमा , घमंड, ने कहा आओ हम कही घुमने चले, सब ने कहा ठीक है. बो एक सुंदर टापू पर गए, वहा पर उन्होने खूब खेल खेला , खाया पिया, अचानक से क्या देखा की समुद्र मैं तूफान आने वाला है, आनंद ने कहा चलो नाव मैं बेटो, आनंद, शांति , धीरज, छमा जल्दी से वेट गए, परन्तु घमंड ने कहा मुझे तुम लोगों के साथ नहीं आना है, और वो नहीं आया, प्रेम भी बोला मैं घमंड का साथ नहीं छोड़ सकता, तूफान आया और घमंड मर गया और उसके साथ प्रेम भी.

    कही आज घमंड के कारन प्रेम तो नहीं मर रहा.

    For God so loved the world, that he gave his only begotten Son, that whosoever believeth on him should not perish, but have eternal life.

  57. suresh says:

    मणि जी,

    शायद आपको पता नहीं की “माता वैश्या भी हो तो भी वो पुत्र के लिए पूजनीय है”. दुर्गा सम्पूर्ण हिन्दू समाज की माता है. आपकी भी..

  58. मैं सोच ही रहा था कि बहुत दिन हुए “मोहल्ला” पर कोई घटिया, कुतर्कवादी और हिन्दुओं का विरोधी लेख कैसे नहीं आया?… लीजिए आ गया

    हिन्दुओं, हिन्दू संस्कृति, हिन्दू परम्पराओं, हिन्दू मन्दिरों, हिन्दू संतों इत्यादि को गरियाने वाली कौमें बहुत फ़ल-फ़ूल रही हैं आजकल…। अच्छा-खासा पैसा, नेतागिरी और लोकप्रियता है इस फ़ील्ड में… :) :)

  59. khagraj singh chauhan says:

    Adhajal gagri chhalkat jay, bhare gagriya chuppe jaye. is chutiye ki bheje ko to sambhal ke rakhna chahiye aisa bheja manav jati ke itihas me dubara nahi hoga,sala genetics se ye proof ho gaya hai ki yadav’s aur sabhi OBC aarya jati k hai, aur ye sala apne aapko dravid aur shudra ki jamat ka batata hai.

  60. rajan says:

    सुरेश जी से सहमत.’रामायण को जब्त कर लो’ जैसे लेख के बाद बडे दिनों बाद ऐसा लेख आया है.मोहल्ला वालों की ही तरह नफरत से भरा,एकतरफा और घटिया.

  61. सही है भाई जी, हिंदू-हिंदुत्व को गरियाने का धंधा काफी लाभकारी है, लगे रहिए और मिशनरियों-तबलीगियों की ओर से बहती गंगा में हाथ धोइए…

  62. Anand Mishra says:

    इन्ही साइटस पर इसी प्रकार का दलित चिंतन होता है. यानि चिंतन भी दलित. ये भड़ास निकालने का मंच अवश्य है, पर है भड़ास ही. चाहे जितना लिखें जैसा लिखें, आम दलित हिंदू ही है. ये जो तथाकथित शिक्षित दलित हैं, असल में सदियों के दासता के अपमान की परिणिति घोषित करते हैं इस लेखन को तो ये तो तय है कि व्यक्तिगत तौर पर उन्होंने तो अपमान नहीं भोगा है.विश्व के हर समाज में शोषित वर्ग रहा है तो क्या यह सब पीढियां भी निभाएं. यदि यही सोच है तो क्यूँ उम्मीद करते है कि वर्ग संघर्ष रुके ?

  63. Saroj Tiwari says:

    दैनिक जागरण ने आज, 7 अक्‍टूबर को इस खबर को प्रमुखता से छापा है। इस बवाल के अभी और बढने की उम्‍मीद है। अगर इन्‍हें दूर्गा पूजा का विरोध ही करना था तो दुर्गा पूजा के पहले या उसके बाद करते। ठीक दुर्गा पूला के दिन विरोध करके इन्‍होंने सवर्णों की भावना को ठेस पहुंचाई हैं।

    दैनिक जागरण, पेज -5

    जेएनयू में देवी-देवताओं के आपत्तिजनक पोस्टर

    नई दिल्ली, जागरण संवाददाता : जवाहरलाल नेहरू विश्वविद्यालय (जेएनयू) में बृहस्पतिवार को एक बार फिर अभिव्यक्ति की स्वतंत्रता के नाम पर धार्मिक भावनाओं को भड़काने की कोशिश की गई। ऐन दशहरे के दिन विवि परिसर में पोस्टर चिपकाकर दुर्गा, पार्वती सहित अन्य हिंदू-देवी देवताओं पर भद्दी टिप्पणियां की गई। इन टिप्पणियों के कारण छात्र समुदाय में काफी रोष है। अखिल भारतीय विद्यार्थी परिषद ने शुक्रवार को इस बाबत सभी संगठनों की एक बैठक बुलाई है, जिसके बाद पोस्टर के खिलाफ संयुक्त रूप से बयान जारी किया जाएगा और मामले की शिकायत की जाएगी। बृहस्पतिवार को जेएनयू में एक तरफ जहां धूमधाम से विजयदशमी का पर्व मनाया जा रहा था, वहीं एक संगठन द्वारा आपत्तिजनक पोस्टर जारी कर सद्भाव बिगाड़ने की कोशिश की गई। पोस्टर में देवी दुर्गा द्वारा राक्षस महिषासुर मर्दन को जातिसूचक घटना से जोड़ते हुए अवांछनीय टिप्पणी की गई थी। इसके अतिरिक्त देवी पार्वती और भगवान शिव के रिश्तों सहित अन्य देवी देवताओं पर भी आपत्तिजनक टिप्पणियां की गई थीं। पोस्टर की बात पता चलते ही विवि परिसर में माहौल गर्म हो गया। हालांकि मूर्ति विसर्जन कार्यक्रम व विवि में अवकाश के कारण किसी भी छात्र संगठन ने इसकी शिकायत प्रशासन से नहीं की। वरिष्ठ छात्रों द्वारा हस्तक्षेप कर मामले को तत्काल संभाला गया। बाद में परिसर में चिपके सभी पोस्टरों को फाड़ दिया गया। इस बाबत एबीवीपी के साकेत बहुगुणा ने बताया कि पोस्टर जारी करने वाले संगठन द्वारा जान-बूझकर सस्ती लोकप्रियता हासिल करने के उद्देश्य से विवि के माहौल को खराब करने की कोशिश की गई है। उन्होंने बताया कि शुक्रवार को इस बाबत सभी संगठनों की एक बैठक बुलाई जाएगी, जिसके बाद इस संदर्भ में संयुक्त बयान जारी किया जाएगा। साकेत के मुताबिक परिषद द्वारा इस बाबत कुलपति, रजिस्ट्रार, छात्र कल्याण विभाग सहित अन्य प्रशासनिक अधिकारियों से शिकायत की जाएगी। उन्होंने कहा कि जरूरत पड़ने पर पुलिस में भी मामला दर्ज कराया जाएगा। उधर, विवि के मुख्य सुरक्षा अधिकारी मेजर पीके सांगवान के अवकाश पर होने के कारण उनसे बात नहीं हो सकी।

  64. सुनिल कुमार says:

    @LAST SIX COMMENTS: त्रासदी यही है कि आजतक जो चिंतन होता रहा वह था तो ब्राह्मण चिंतन लेकिन उसे ब्राह्मण न कह कर यों पेश किया गया मानो वह यूनीवर्सल चिंतन है, परमसत्य है, ब्रह्मवाणी है। आप मिथकों में ही जीवन खपाते रहे और अब ऐतिहासिक चिंतन आपको भड़ास नजर आता है। और सिर्फ़ इसलिए कि आपने शायद कभी आलोचनात्मक रीति से सोचना सीखा ही नहीं। आपसे विनम्र निवेदन है कि मिथकों के पुनर्पाठ की ओर ध्यान दें और सच्चे, सार्थक एवं व्यापक चिंतन में हिस्सेदारी करें। हिंदू-हिंदुत्व के प्रति अगर कोई द्वेष है तो वह तर्क आधारित है। गाली गलौज की बजाय तर्कसंगत सोच को बढ़ावा दें।

  65. manish says:

    ab kya kare………….

    Free Fund main inko Naukri mil jaati hai……kisi nalayak main bhi maha nayalak ko nahi milti to Sarkari yojna hai na!…… paisa to aa hi jaata hai…..ab jab kuch kaam hi nahi rahega ….koi chinta hi nahi rahegi ….to aise hi baith ke timepass karenge ye ……inko maanne na maanne se kya hoga…….kya ukhad lenge ye do chaar lekh likh kar……aur kis mahapurush ne IS MANI KO lekhak kaha hai…….mujhe unki samaj pe taras aata hai………..

  66. @ सुनील कुमार जी – तर्कसंगत सोच यानी हिन्दू धर्म का विरोध… ऐतिहासिक चिन्तन यानी हिन्दुत्व द्वेष… सार्थक और व्यापक चिन्तन यानी मिशनरियों-तबलीगियों और जिहादियों को अपरोक्ष मदद करना… Very good… keep it up.

    मंडला में संघ द्वारा आयोजित नर्मदा कुंभ से घबराए और तिलमिलाए हुए मिशनरियों ने एक सम्मेलन में खु्लेआम कहा कि “आदिवासी तो हिन्दू हैं ही नहीं, इसलिए उनका धर्म परिवर्तन जायज़ है”। अब देखिये क्या गजब का साम्य है इस प्रेमजी के इस लेख और मिशनरियों की सोच(?) में… :)

    चण्डी को “………” कहने वाले प्रेमकुमार मणि जी जैसे महान विचारक, चिंतक, लेखक (और भी न जाने क्या-क्या) से मेरा तुच्छ अनुरोध है कि वे सिर्फ़ एक बार मोहम्मद साहब, पैगम्बर, आयशा और कुरान की हदीसों का ऐसा ही कुछ “विवेचनात्मक अध्ययन” पेश करें तो हम भी लाभान्वित हों… :) :)

  67. ASHISH says:

    कोई तो शक्ति है जो इस ब्रम्हांड को चला रही है अगर मणि जी की सारी बात को सच मान भी लिया जाये तो वो सिर्फ इतना तो बता दे की इस संसार को चलाने वाली शक्ति क्या है ? सब शंका का समाधान हो जायगा . आज उन्होंने जगत्जननी माता दुर्गा को अपशब्द कहे मुझे जरा भी गुस्सा नहीं आया उनकी विकृत मानसिकता पर तरस आया कयोंकि हो सकता है की कल वो भगवन शिव को भी गाली दे दे वैसे मैंने उनकी फोटो देखी है बिलकुल महिषासुर से मिलती है और पता चला है की वो दुर्गा के बहुत बड़े उपासक भी हैं …उम्मीद है आप सभी समझ गए होंगे …..माता दुर्गा ऐसे चिरकुट को सद्बुद्धि दे और यहाँ दम की बात करने वाले लोग अगर अपनी माँ का दूध पिए हो तो अपना पता बता दे फिर उनको उनकी औकात बता दी जायगी ….

  68. satyapal says:

    नौ दिनों तक दुर्गा की उपासना करने वालों से पूछना चाहूँगा , आप दसवे दिन राम की पूजा क्यों करते है ?
    दुर्गा की आराधना का ढोंग करने वाले दसवे दिन उस राम को पूजना नहीं भूलते जिसने सीता को बदनाम किया ,घर निकला दिया .दुर्गा के उपासक क्यों नहीं राम का विरोध करते है .दुर्गा को आप माँ कहते है ,उसे आप हिंदूवादी स्त्री शक्ति के रूप में पूजते है .
    तो बताओ हिंदुवादियों ऐसा ढोंग क्यों ? राम का विजयोत्सव क्यों ?
    या तो राम की पूजा करो या दुर्गा की
    फैसला तुम्हारे पाले है . ढोंग बंद करो .

  69. akhilesh prasad says:

    yah mani nam ka chirkut bihar ke bhalai ke lie kuchh nahi karta.bihar me etani garibi hai usko hatane ka prayash karna chahie.dharm ke nam par bakvas karane se kuchh nahi milega.janta ke lie kuchh achcha kam kijie.mani ji aap publicity pane ka yah ganda tarika chhodie.manav hai ek manav ke roop me sochie…yah sari hibdu lokkatha hai..jo sach hai ya nahi esaka koi pata nahi…..aapko aam aadami par chhod dena chahie ki vah esako mane ya na mane………plz har chiz ko rajnitik rang dena band kijie

  70. satyapal says:

    @akhilesh aur tamam sust mansikta walo ke liye :- aap kis chirkutayi ka parichay de rahe hai .itihas ek din me nahi bana na hi ek din me likha gaya . soch ,wichar aur kai bahaso ka natiza hota hai itihas . aur kyu mane hum us itihas ko jo iktarfa hai .
    aap kam nahi kar sakte to dusro ko nakara na samjhe . kam karne de sab aapke jaise swarthi nahi hote . aam admi ki ad lena band karo .kaun hai aam aadmi ? kya aap ya mani ji is darje se bahar hai ?
    sab apni soch nahi bana sakte to kisi likhi likhai bat ko bramhan ki chitiya mat sajho bhai .
    apni urja kya parlok me istmal karoge . yahi karo .apni mand buddhi ko jagane me .

  71. siddhartha singh says:

    मणि जी कहते है न की सत्य को भी अगर गलत शब्दों में पेश किया जाये तो ओ भी कडुआहट घोल जाता है,मेरे हिसाब से आपने “……” जैसे सब्दो से समस्त हिंदू मात्र -भावना को ठेस पहुचाई है जिसके लिए अगर आप महानता का परिचय देते हुए सामूहिक रूप से क्षमा मांग ले तो समस्त कुटिल चाल वालो के गाल पे करारा तमाचा होगा ,,,,,वैसे मेरे जैसे लोग तो आप की कलम के कायल हो ही चुके है.

    “हमें संघर्ष नहीं समाधान चाहिए ” सायद वक्त की यही आवाज है….

  72. satyapal says:

    HINDUTWA ke thekedaro ko dekho zara apne ghar me ,aas pados me izzat nahi karte striyon ki .aur yaha bhakti ki pinge padh rahe hai .

  73. satyapal says:

    @ SIDDHARTH mafi kis bat ki . itihas ko ek naya nazariya dene ki ya hindu pando ke samne ghutne tekne ki .
    soch swatantra hoti hai . pahle ye swatantrata ek agde dhade ko milti rahi ab nahi ho sakta ye sab . dono paksho ko dekhne ki zarurat hai .
    INSAF KA TARAZU …………..

  74. सुनिल कुमार says:

    @ सुरेश चिपलुंकर जी: भारतवर्ष के परिप्रेक्ष्य में जिस सांस्कृतिक रूप से हावी विचारधारा की आलोचना की जाएगी वह हिंदुत्व है तो हुआ करे। मिशनरी और अन्य उसका इस्तेमाल अपने उद्देश्यों के लिए करना चाहें तो किया करें। लेकिन सत्यान्वेषण केवल इसीलिए तो रुक नहीं सकता। गौर करने वाली बात है कि मणि जी ने यह लेख किसी व्यक्तिगत द्वेष से नहीं लिखा, उन्होंने ऐसी भाषा का इस्तेमाल कतई नहीं किया जैसा यहां टिप्पणियां करने वालों ने की है। उन्होंने वही लिखा जो सब जानते हैं, बस उसे ऐतिहासिक घटनाओं के संदर्भ में प्रतिपादित किया है। वैसे मणि जी का लेखन आधुनिक भारतीय चिंतन की एक सशक्त परंपरा का हिस्सा है जो फुले से शुरू होती है … और मज़े की बात है कि ऐसी ही बातें (हम हिंदुओं में एका नहीं रहा तो बाहरी ताकतें इसका फायदा उठाएंगी)फुले के जमाने से होती आ रही हैं ..

  75. Manish Kumar says:

    अखिल भारतीय विद्यार्थी परिषद और एक संगठन ‘स्‍टूडेंटस फॉर सोशल जस्टिस’ के पोस्‍टरों के जबाव में ऑल इंडिया बैकवर्ड स्‍टूडेंटस फोरम (एआईबीएसएफ) का पोस्‍टर। यह पोस्‍टर जेएनयू में 7- 8 अक्‍टूबर की रात को लगाया गया है।

    AIBSF

    अब अभिव्यक्ति के सारे खतरे उठाने ही होंगे!

    अब अभिव्यकित के सारे खतरे / उठाने ही होंगे / तोडने ही होंगे मठ और गढ सब!-मुकितबोध,’अंधेरे में’

    एआइबीएसएफ के एक छोटे से पोस्टर के जबाव में जेएनयू में दो पोस्टर लगा है. एआइबीएसएफ इसका इस रूप में स्वागत करता है कि बहस होनी चाहिए. अच्छी बात यह है कि इनमें से एक पोस्टर ‘स्टूडेंटस फार सोशल जस्टिस’ नामक संगठन ने जारी किया है. इस संगठन का नाम कैंपस में पहली बार जाना गया है. हम जानना चाहते हैं कि यह संगठन तब क्या कर रहा था जब इसी कैंपस में शरद यादव और अन्य दलित पिछडे नेताओं को अपमानित किया गया था. शैक्षणिक संस्थाओं में पिछड़े वर्गों के आरक्षण को लेकर एआइबीएसएफ संघर्ष कर रहा था, तब यह संगठन कहां था? क्या यह संगठन यूथ फार इकिवूलिटी की अगली कड़ी है? दूसरे पोस्टर का रचयिता अखिल भारतीय विदयार्थी परिषद है, जिसे हिंदू धर्म में फूट की चिंता सता रही है. जाहिर है, किसी भी गंभीर विमर्श में इनकी बातों का नोटिस लेना समय की बरबादी ही है. अस्तु.

    स्टूडेंट फार सोशल जस्टिस के पोस्टर के पीछे कौन सी ताकते हैं, यह साफ दिखता है. उन्होंने सामाजिक न्याय के आंदोलन और एकता को तोड़ने की चाल तो चली है, लेकिन उनका दुर्भाग्य कि दलित-बहुजन अब सब समझने लगे हैं.

    बात प्रेमकुमार मणि के एक लेख के एक अंश को हमारे पोस्टर में शामिल करने को लेकर उठी है. प्रति पोस्टर (काउंटर पोस्टर) एक जाति विषेष को भड़काने की विफल कोशिश करता है. हम उन्हें बतलाना चाहते हैं कि श्री मणि का लेख वर्ष 2003 में दैनिक हिंदुस्तान के पटना संस्करण में प्रकाशित हुआ था. फिर उसे ‘मंडल विचार’ पत्रिका ने साभार प्रकाशित किया, जो यादव समाज की प्रबुद्ध पत्रिका के रूप में बिहार में चर्चित है. 2007 में यह जनविकल्प में भी छपा. अक्टूबर, 2011 में फारवर्ड (एफपी) ने इसे हू-ब-हू प्रकाशित किया है. एआइबीएसएफ के पोस्टर में उसी लेख का अंश फारवर्ड प्रेस के ताजा अंक लिया गया है.

    हमारे पोस्टर का उददेश्‍य नफरत फैलाना नहीं, स्वस्थ बहस उठाना है. अपने इतिहास और पौराणिकता को लेकर हमें नये तरीके से सोचना होगा. हम दलित-बहुजन इस इतिहास और मिथक में कहां हैं? हम जब इसकी तलाश करते हैं तब आपको परेशानी होती है. हम अपने शंबूक और एकलव्य की पीड़ा समझना चाहते हैं. सीता और द्रौपदी से संवाद करना चाहते हैं. हम देवासुर संग्राम के अबूझ रहस्यों में दिलचस्पी लेते हैं. हम उन तमाम असुरों की व्यथा-कथा जानना चाहते हैं, जो सप्तसिंधु से आर्य दवाब के कारण लगातार पीछे हटते गये. और आज दस हजार से भी कम की संख्या में झारखंड में रहकर जददोजहद कर रहे हैं (देखें, युवा उपन्यासकार रणेंद्र का चर्चित उपन्यास ‘ग्लोबल गांव का देवता).

    मित्रों, हम महाभारत कथा की देवयानी और शर्मिष्‍ठा; जो असुर कन्याएं थीं, के हृदय की धड़कन भी हम सुनना चाहते हैं.कश्‍मीर से कन्याकुमारी और गुजरात से असम नागालैंड तक का भारत असंख्य संस्कृतियों और नस्लों का देश है. यह बहुरंगापन ही इसकी विशिष्‍टता है (और जेएनयू की भी!). हम सब की भावनाओं को समझना चाहते हैं. जनतंत्र और सामाजिक न्याय का यही तकाजा है. आपने हमारे पोस्टरों को फाड़कर किस संस्कृति का परिचय दिया है, यह आप जानते हैं. इस समय हम सिर्फ चेतावनी दे रहे हैं!

    साथियों, आप लोगों ने बड़ी-बड़ी बातें की हैं. जरा यह भी बताते जाइए कि किन लोगों ने बुद्धानुयायियों को भारत भूमि से धकेला? वे कौन थे जिन्होंने हमारे जोतिबा फूले, डा. आंबेडकर, पंडिता रामबार्इ, पेरियार, र्इ.वी. रामास्वामी नाइकर जैसे नायकों को इतिहास के पन्नों में आने से लंबे समय तक रोके रखा? स्वामी दयानंद सरस्वती को जहर देने वाले और गांधी को गोली मारने वाले कौन थे?

    जब हम इन्हें पकड़ कर सामने लाते हैं तो आपको परेशानी होती है.हमारे संत महात्माओं को केवल दुख दिखा था.हम लोगों को दुख देने वाला भी दिख रहा है. उनकी सारी चालाकियां दिख रही हैं. कभी वे ‘यूथ फार इकिवलिटी’ की रामनामी ओढ़ कर निकलते हैं, कभी ‘स्टूडेंटस फार सोशल जसिटस’ की — लेकिन हम उन्हें पहचान ही लेते हैं.

    आप पहचाने जा चुके हैं!

  76. akhilesh prasad says:

    satpal ji,mujhe dharm ke nam par bakvas nahi karana hai…….mujhe easame vishwas nahi hai……..lekin aap to andho ke virodh karane vale aandhe ho

  77. akhilesh prasad says:

    satpal ji aaplog bahujan and dalit ke nam ka aad lena band karo.aapka asali roop kya hai mujhe pata hai…

  78. akhilesh prasad says:

    AIBSF ko maine aajtak jnu ke kisi bhi political activities me part lete nahi dekha hai.bus sal me do char post chipka kar shant ho jate hai…..kam kam se har logo ke pas jakar apnai bat kahna cahie.mess compeng karana chahie…..kam se kam har koi enaki bat ko samjhe…..socho…

  79. मैं एक अधार्मिक और अनीश्वरवादी व्यक्ति हूँ तथा किसी भी प्रकार से देवी-देवता या उनकी पूजा से मेरा कोई विश्वास या ताल्लुक नही है फिर भी यह लेख पढ़कर लेखकीय कर्म के प्रति एक वितृष्णा सी पैदा हुई. ऐसे लेख, लेख नही बल्कि ” कहीं की ईंट, कहीं का रोड़ा ..” मार्का जुगाड़ हैं. घृणा का जवाब घृणा से देने का अभियान कुछ लेखकों ने चला रखा है, यह भी उसी कड़ी में है. ऐसे लेख पढ़कर उतनी ही घृणा हो रही है, जितनी घृणा संघियों और हाफ पैंट वालों से होती है ! यह ”अपने लोगों” को सचेत करना नही बल्कि ” टट्टी के बदले उन्हें टट्टी पकड़ा देना” है.

  80. man singh says:

    neech lekhk ki neech bhavna or neechh vichaar

  81. satyapal says:

    @akhilesh
    dharm ke nam par aap jaise log kya karte hai ye hume bhi pata hai . kis dharm ki bat karte ho kya hai dharm ?
    dharm to ye nahi kahta ki muh band kar baitho niththalo ki tarah .
    aap jaiso ne kitna dharm ko samjha hai . rahi bat asli rup ki to dekha hai humne hazaro salo se tum logo ne dharm ki aad lekar jo pakhand racha .kya sirf tumhe hak hai apne dewtao ke bare me bolne ka , tum sab ne ek pakshiya wyakhya kar rakhi hai ab tak .

  82. satyapal says:

    @ man singh
    tum kyu apni neechta pe utaru ho gaye .
    kaun sa neech kam deekh gaya tumhe . aata jata kuchh nahi aur lag gaye apni gandi zuban chalane ……
    kuchh to tamiz sikho ..

  83. karan says:

    Kyon Satypal,
    kisi ko neech kahne se koi badtameez ho gaya

    to phir lekh ka lekhak??

  84. Manish Kumar says:

    महाषासुर और दुर्गा का विवाद एकडमिक डिस्‍कोर्स का हिंस्‍सा है। अपढ लोग इसे शायद नहीं समझ पाएंगे।

  85. काल्पनिक कथा पात्रों की पूजा कोई भी क्यों करे ?

  86. Prem says:

    Bakwaas ye koi daliton ki site nahi hai ,balki kisi aatankwaadi sangathan dwara chalai gai site hai ise ban hona chahiye, mein iski FIR likhwaaunga.

  87. rupesh devangan says:

    mondal sahab, agar desh bhar me kewal 4 proffesor obc se hain to isme savarno ki galti hai kya. ap log kya arkaskshan ke bina age nahi badna chahte hain. Mehnat kijiye. general kote se bharti hone se kisne roka hai. kitni ghatiya soch hai ki 60% obc abadi hai to 60% obc prooffeccor ho bana diye jaye chahe padane aye ya na aye. Ladkar Kota to hasil kar lenge par apna mansik star nahi sudhuar payenge is trarh

  88. rupesh devangan says:

    @sunilkumar………….salaam karta hoon apki mansikata ki…hajaro saal purani baato ko lekar ham ladte rahe aur bahari takte iska fayada uthati hain to uthati rahein. kitne swarthi hain hum log. na desh ki sochate hain na vartaman . apas ki yahi ladai rahi to hum ladne ki liye ek din bachenge hi nahi.

  89. सुनिल कुमार says:

    @रूपेश देवनगण जीः देश बना बनाया नहीं आता। लोगों की भागीदारी और खासतौर पर हजारों सालों से हाशिये पर धकेल दिये गये लोगों की भागीदारी से बनता है। हमारे मिथकों ने लोगों को बांटा, इसी मिट्टी से जन्मे लोगों को असुर और राक्षस कह कर उन्हें गुलाम बनाया। और आज जब हम लोग आपके धर्मग्रंथों की वास्तविकता उजागर कर रहे हैं तो आप देश तोड़ने की दुहाई दे रहे हैं। देशप्रेम का पाठ हमें क्या कौन पढ़ाएगा। और जहां तक सवाल रहा तथाकथित बाहरी ताकतों का तो आपको मालूम होना चाहिए कि मुसलमानों और अंग्रेजों ने इस देश और राष्ट्र के सर्वपक्षीय विकास में बहुत बड़ी भूमिका निभाई है। वे केवल आक्रमणकारी थे और हमें लूटने आए थे यह भी एक ब्राह्मणवादी मिथक है जिसका पुनर्पाठ होना अभी बाकी है। रही बात सलाम करने की तो, बेहतर होगा आप राष्ट्रपिता महात्मा जोतिबा फुले, पेरियार, अंबेडकर, शाहू जी महाराज को सलाम करें। मेरा आपसे नम्र निवेदन है इन महापुरुषों को पढ़ें।

  90. Rajeev says:

    mani k ghar may durga gi nivas karti hai. enki patni her sal pooja karti hai. ab enki patni ko kya kahege .mani ji v dar may apni patni ko nahi mana kar pate hai ki tum durga devi ki aradhna kyu karte hai.himmat hai unko ki jo unhone likha hai apni bibi ko suna day. pata chalega ki wo rodra roop dharan kar mani ko jinda chaba jayegi. mauga mani krantikari kab ka ho gaya .

  91. Ajay says:

    Why you are singling only the ABVP ? The track record of the Communists has been worse. For the last two days, the Pragatishila Lekhaka Sangha is holding its Convention at Lucknow. Namavar Singh , a “noted Hindi critic” said that due to reservation given to the Dalits , the Brahmins and Thakurs will have to beg in future for livelihood. This has been published prominently in newspapers. He has not taken back his words till now. Who is more casteist : Sanghis or the Communists?

  92. vaibhav says:

    इस लेख का शीर्षक होना चाहिए था .. ” मैं आदमी नहीं .. चुतीया हूँ .. “

  93. Man singh Ajmer says:

    जेसा खून होता हे वेसे विचार बनते हे वेसा चरित्र बनता हे ,भारत में विदेशी लूटेरे और विधर्मी आकरंतावो की मानस संताने अभी भी विभिन्न छद्दम हिन्दू नामो से निवास कर रही हे @जिसने भी ये घटिया और नीच विचार इस लेख के माध्यम से प्रस्तुत किये हे वो इस केटेगिरी का बहुत होई बढ़िया उदाहरन हे |जो हिन्दूद्रोही और देशद्रोही लोग येन केन इसे सपोर्ट कर रहे हे वो दलित हिंदुवो की आड़ ले कर अपना असली रूप छूपा रहे हे |जेसे की जे .एन.एल में इस तरह की घटिया खरपतवार के लिए उपयुक्त पोषक भूमि मिल जाती हे वंहा ये हवा के संग बाते करते हे |लेकिन वो भूल जाते हे की जिस हिन्दू विरोधी वामपंथ को अपना खेवनहार मान रहे हे ,उसकी एक मात्र भुवाजी वेस्ट बंगाल में थी वो भी विधवा हो चुकी हे |हिन्दू धर्म दिन दोगुनी रात चोगुनी व्रद्धी करेगा विश्वास नहीं होता हे तो विभिन्न पर्वो पर धार्मिक अनुष्ठानो ,आख्यानो पर उमड़ने वाली भीड़ को telly कर लो |वामपंथ अपनी मोट मर चूका हे और सेकुलर ,जिसका अर्थ होता हे या तो अपने बाप का पता नहीं या सभी को अपना बाप समझता हो ,को लोग दोडा दोडा के मारेंगे @

  94. मधुकर says:

    यह पत्रिका आवयन कोस्का चलाते हैं। उनके बारे में पढ़ा भी है और मिला भी हूं। सुलझे हुए हैं और सदैव विमर्श करते रहते हैं। उनकी बातें विमर्श केंद्रित होती हैं। हर बार इस पत्रिका को पढ़ता हूं। इसके गिरते प्रिंट ऑर्डर को भी देखता आया हूं। सबसे पहले इस बार मुलाकात होते ही कोस्का साहब को बधाई दूंगा। उम्मीद है कि इनका प्रिंट ऑर्डर जल्दी बढ़ेगा।
    मैं किसी ‘वाद’ के साथ नहीं हूं। एक ही बात जानता हूं सबका हित होना चाहिए। सो ‘हितवाद’के रास्ते पर चलता हूं। पूजन-पाठ में यकीन नहीं है, लेकिन पत्नी की ‘आस्था’ की खातिर कभी-कभी उसमें शामिल हो जाता हूं। यदा-कदा जब उसको वक्त नहीं होता तो पूजन के दौरान की जाने वाली रस्में मैं खुद ही टास्क मानकर निपटा देता हूं। सोचता हूं कि पत्नी का हाथ बंटाने से ही गृहस्थी सुचारू रूप से चलेगी। लेख पढ़कर अच्छा लगा, लेकिन इस मंच पर क्या सदैव दलित विमर्श ही होता आया है। स्त्री विमर्श भी इस मंच का हिस्सा रहा है। फिर इस बात पर विमर्श क्यों नहीं किया गया कि एक आक्रांता नारी को गढ़ने में आर्य समाज ने किस प्रकार की नीति पर काम किया होगा? ऐसे कौनसे तर्क रहे होंगे जिन्होंने कोमल हृदया मानी जाने वाली नारी को आक्रांता और निर्दयी बनाया? या फिर दूसरे वर्ग की तरफ से ऐसे हालात पैदा किए गए कि संघर्ष छिड़ गया? दूसरी बात, नारी विमर्श के कायदे के हिसाब से किसी भी सेक्स वर्कर को हेय दृष्टि से नहीं देखा जाता। फिर यदि दुर्गा थी तो उसको क्यों? बेहतर हो कि दुर्गा को निर्दयी के तौर पर देखा जाए। लेखक के अनुसार उसका वेश्या होना क्या उसकी दयनीय स्थिती नहीं दर्शाता? इस मामले को बतौर हेडिंग क्यों दिखाया जा रहा है? यहां स्त्री को वर्गीकृत क्यों किया जा रहा है? यहां वेश्या को बतौर वेश्या सहानुभूति दी जानी चाहिए दी। क्या यह माना जाए कि परिस्थितियों के हाथों मजबूर एक सवर्ण स्त्री के वेश्या बन जाने पर नारीवादियों के लिए यह चिंतन का विषय नहीं होगा? यहां पर लेख मुझे ख़ाकों के खिंचा नज़र आता है और जाति संघर्ष को रोकने के बजाय जाति संघर्ष को बढ़ावा देता लगता है।
    प्रैक्टिकल पहलू से देखता हूं तो मुझे लगता है दुर्गा चाहे जो रही हो। नवरात्रों में बाजार में पैसा जरूर भेजती है। जागरण कलाकारों, केले, ठेले और मेले वालों सबको रोज़गार देती है। मेरी पत्नी और घर में नव ऊर्जा का संचार करती है। इन दिनों में बढ़िया में लीक हटकर खाना खाने को मिलता है। मेरे लिए तो इस त्यौहार के यही मायने हैं। बाकी आप सुधिजन जानें। हो सके तो अविनाश नारी मानदंडों पर कही गई मेरा बातों का जवाब देने की कोशिश करें। सधन्यवाद।

  95. Ashish says:

    केले ठेले ,और मेले और टास्क वाले मधुकर भाई ,पेट तो इस धरती पर आने वाला हर जीव जन्तु अपनी सुविधा के हिसाब से भरता ही हे |अब तुम क्या हो ,तुम्हारी पत्नी क्या करती हे क्या नहीं करती हे ,यंहा ज्ञानी बन के ज्ञान झाड़ने से क्या मतलब ?आपकी पत्नी ऐसा करती हे और आप ऐसा नहीं करते हे तो आप को यंहा बुद्धिजीवी मानना ही पड़ेगा ?यंहा नारी विमर्श नहीं हो रहा हे यंहा सीधे सीधे आस्था पर हमला हो रहा हे ?

  96. ASKajal says:

    Bilkul sahi lekh likha hai Bahujan Samaj ke samajik Sanskritik Virasat ko Apmanit karne walon aur bahujan samaj ke dev devion ko nakarkar samtamulak samaj banana hai.
    jai bheem jai bharat

  97. ASKajal says:

    Bilkul sahi lekh likha hai Bahujan Samaj ke samajik Sanskritik Virasat ko Apmanit karne wale nakli aur hatyare dev devion ko nakarkar samtamulak samaj banana hai.sridha achhe pratikon se honi chahiye.
    jai bheem jai bharat.

  98. Globewatcher says:

    All my life I have disliked the caste-system (for its discriminatory fallout) and how higher-caste Hindus systematically prevented lower castes from “learning” but reading this kind of balderdash makes me believe that perhaps those Brahmins somehow really had the DNA of such “lower-castes” analyzed in-depth and knew education was not going to help. Or alternatively, it could be a self-fulfilling prophecy.

    Whatever be the case, such write-ups are not helping “Dalits”.

  99. Aheer says:

    “महिषासुर और दुर्गा की कथा का शूद्र पाठ (और शायद शुद्ध भी) इस तरह है। महिष का मतलब भैंस होता है। महिषासुर यानी महिष का असुर। असुर मतलब सुर से अलग। सुर का मतलब देवता। देवता मतलब ब्राह्मण या सवर्ण। सुर कोई काम नहीं करते। असुर मतलब जो काम करते हों। आज के अर्थ में कर्मी। महिषासुर का अर्थ होगा भैंस पालने वाले लोग अर्थात भैंसपालक। दूध का धंधा करने वाला। ग्वाला। असुर से अहुर फिर अहीर भी बन सकता है। ”

    ठीक उसी तरह जैसे प्रेम शंकर मणि से परम मूढ़ शूकर, हैं ना?

  100. Sumit says:

    ये लेखक तो शिक्षित कूड़ा – ज्ञान जमाकर्ता है…पता नहीं कहाँ कहाँ से जो कूड़ा – कचरा मिला छाप दिया …जात जात करते रह जाओगे महाशय , तेजी से तरक्की की और भागते युवा Bharat में तुम भोंकते श्वानो पर सिर्फ हँसी आती है.. ओबिसी -ब्रह्मण- पिछड़ा- सवर्ण हा हा हा हा हा बिहार परिवर्तन करने चले हो अपनी ओछी सोच से…फिर से हमे वर्ण व्यवस्था पे thagoge ?. सभी दलित-yadav- सवर्ण-पिछड़ा युवा तुम्हारे उलट परिवर्तित होंगे….और तुम्हारे जैसे लोग बहुत आये गए , न उन्हें आदर मिला न समर्थन . यदि महान कार्य करना चाहते हो तो इतिहास के भोथाराए कुज्ञान माला जपना छोड़ दो. मार्क्सवादियों की क्या दुर्गती हुई है desh में इससे सबक सीखो.. जनता अब्ब शिक्षित है….
    क्या कुतर्क है… महिषासुर ka सामास vigrah , shiv – कृष्ण के ऊपर कुतर्क हा हा हा हा. ….bewkoof mahoday

  101. faltu says:

    wampanthiyon ki aadat hai itihas ko apne hisab se kahna. mani ki kya aukat hai ki durga par likhen.behtar hota apni maa par sodh karte.

  102. Dharmender says:

    Nilakshi Singh
    क्या आपने इन बातोँ पर गौर किया है :

    1. आदिशक्ति दुर्गा किसी समय दुर्गा के रूप आती है या नहीं ?

    2. यहाँ रूप से क्या तात्पर्य है ? एक ही जन्म में ये विभिन्न रूप हैँ या ये विभिन्न जन्मों का रूप है ?

    3. यदि ये विभिन्न जन्म हैँ तो दूसरे जन्म में ब्रह्मचारिणी जो शंकर को पति रूप मेँ प्राप्त करने के लिए घोप तपस्या करती है (शादी हुई या नहीं पता नहीं) और अष्टम रूप महागौरी है जो पार्वती या गौरी है जो भगवान शंकर की पत्नी है. दूसरे जन्म से आठवे जन्म के बीच शंकर वैसे के वैसे रहे और गौरी इतनी बार जन्म ले चुकी. यदि रूप का मतलब जन्म नहीं है तो कहीँ दुर्गा ने शंकर को ही पाने के लिए विभिन्न रूप तो नहीँ बदला और अंत में गौरी के रूप में पाई ?
    कहीँ ऐसा तो नहीं कि शंकर ही महिषासुर है ?

    4. स्कंद (कुमार कार्तिकेय) की माता होने के कारण इन्हें स्कंदमाता कहा जाता है. स्कंद (कुमार कार्तिकेय) के पिता कौन थे ?

    5. महर्षि कात्यायन की तपस्या से प्रसन्न होकर आदिशक्ति ने उनके यहां पुत्री के रूप में जन्म लिया था. इसलिए वह कात्यायनी कहलाती है. कात्यायनी की माता का क्या नाम था या महर्षि ने स्वयं बच्चा जना ?

    6. आदिशक्ति दुर्गा का चतुर्थ रूप कूष्मांडा है. अपने उदर से अंड अर्थात् ब्रह्मांड को उत्पन्न करने के कारण इन्हें कूष्मांडा देवी के नाम से पुकारा जाता है. यदि अंड से ब्रह्मांड को उत्पन्न कर दिया तो शंकर के चक्कर में क्यों पड़ी रहीं ?

  103. Sumit says:

    Go to “Geeta-Press Gorakhpur publications” books, purchase them and learn. You will get all the answers….aur fir bakwaas nahi karoge..

    Aur ek paapi, neech Mahishasur agar itnaa hi bhaa gayaa hai to apne ghar me foto lagaao aur maalaa japo..

    bewkoof ardh gyani humare hi dalit log….saare devon ko aaryon aur saare rakchhson ko humse jod dete hain….jabki itihaas kahta hai dalit bhi aryon ki warn vyawastha ke hi char me se ek hisse the..aur jab varn-vyawastha rakhi gayii thi tabb janma aadhaar nahi tha….karma tha….

    aaj samay badal rahaa hai…..koi dalit maila na uthaaye…koi mare hue jaanwaron ki khaal na utaare…sabb saaf-suthre rahen..apne bacchon ko sikhchha de….Educate them Please….nahi to aise adhkachre gyaniyon ke changul se nikalnaa mushkil ho jaayega..

  104. bhola bhagat says:

    Aapas me phoot thik nahi. Jo mata ka virodh kare uski hatya ki jawe

  105. babloo pachisia says:

    asal me ye madharchod logo ka lekh hai,jisne bhi yeh likha hai woh duniya ka sabse bara madharchod hai. jagadishwar sir to bahut bare dogle insaan hain, woh bahut bare randibaaz bhi hain, apni beti ki umra ki aurto par buri dristi rakhte hain. aur rahi baat is lekhak ki, isne bachpan me apni maa ko apne chacha ke saath sambhograt dekha thha., isliye iska dimag kharab ho gays. ,main kahta hoon ki agar khood ke pichwaare me dum hai to saamne aakar ye baat bole. jo bhi hindu devi devtaon ka apmaan kare use kanoonan saja to mile hi,use jooto se pitna chahiye. bloody mother fuckers

  106. एक तो पहले ही बहुत सारी कल्‍पनाएं ढो रहे हैं, अब एक और नई ढोएं… !!

  107. Bahujan Films says:

    “दुर्गा का मिथक और बहुजन संघर्ष की यात्रा” नामक डाकूमेंटरी (अवधि : १४ मिनट). इन कथित भगवानों के प्रति हमारा रुख खुल कर सामने आना ही चाहिए. कृपया इसे देखिये और अपने विचार रखिये. लिंक नीचे दिया गया है – बहुजन फिल्म्स

    http://www.youtube.com/watch?v=PK38kjn7vPU

    • Arun patel says:

      Bahut achha,maine abhi dekha jis din OBC Brahmnikal ko chhod dega (,iske liye jhagde ki jarurat bhi nahi hai aur koyi obc se lad bhi nahi sakta,) us din se uska samajik aur rajnitik uttthan shuru ho jayega

  108. Sumit says:

    साम्यवादियों के तलवे चाटने वाले..उन्हें अपना नाजायज़ पिता घोषित करने वाले ये भूल गए की कुतर्कों से अपना ही बंटाधार कर रहे हैं…आगे बढ़ने के लिए पूज्यों को गाली देने से मुर्खता ही साबित होगी..देवी-देवताओं को नहीं मानना है मत मानो….उन्हें गाली क्यों देते हो ? अपने आदर्श दत्यों और दानवों में खोजते हो .. ?…मुर्ख फिल्म्स

  109. Dharmender Chouhan says:

    Dear All, Congratulation to all Forward Press family member’s,We have purchased a Mobile Phone with Reliance number.Phone no is – 782 742 7311
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  110. Dipak 'Mashal' says:

    aaj ke samay me kya matlab hai in sab baaton ka.. lagta hai mohalla live bhi logon ki nazar me aane ke liye anavashyak baaton ko chhapne laga hai. had hai. wo kaisa kathakaar jo samaaj ko vikaas ki disha dikhane ki bajay gade murdon ko ukhaad ke soonghta fire.. I hate this kind of ideologies..

  111. shiv kumar sharma says:

    ye sab likhkar kya batlana chahate ho,aaj aisi banto ki koi jagah nahi hai,yadi vakai me samaj me kuch badlav lana chahate hai to financial uch neech ko khatm karane ke liye lekh likhiye.

  112. vishal says:

    मणि बाबू , एक बात तो साफ है के आपके इस लेख ने ब्रह्मणवादियों को ऊपर से नीचे तक हिला कर रख दिया है , बदले में आपको वही सब मिल रहा है जो एक तेज जल प्रवाह के अगले हिस्से को नसीब होता है -टकराव ही टकराव .ये बात तो सर्व विदित है के द्विज्वादियों का समूह इतिहास की परिचर्चा से हमेशा भागता आया है. क्यों की उसे भी पता है की जिस इतिहास को वे मानते है उसका आधार क्या है? कोई वीडियो रिकार्डिंग तो है नहीं की पूरी फिल्म देख कर इतिहास लिखा गया हो. साक्ष्य और तार्किकता के आधार पर ही ये रचनाये हुई है,इसमें कोई दो राय नहीं है,फिर इनका परिचर्चा से भागना दो ही अर्थ देता है-१.इनके बनाये इतिहास का कोई ठोस आधार नहीं है ,जो की (वर्तमान इतिहास) मतभेदों से भरा है. २. आज के समय में उस समय हुए तर्कों का कोई जानकर इनके बीच नहीं है.,जिसके कारण इनसे तर्क करना सर फोड़ने और समय बर्बाद करने के अलावा कुछ नहीं है.मेरी इन पंक्तियों को पद कर ये फिर बोलेंगे की मै हिन्दू समाज में फूट डालने का काम कर रहा हूँ.लेकिन ये भी जानते है की पेड़ की शाखाएं अगर फैली हुई है तो बीज कब का ही रोपा गया होगा.शुशील अमर ने लिखा है की मै अनीश्वरवादी हूँ ,लेकिन लेख पढ़ कर लेखकीय कर्म के प्रति उन्हें घृणा हुई,साफ दिखता है की उनका ध्यान लेख पढ़ने से ज्यादा टिपण्णी करने पर अपनी विद्वता सिद्ध की है क्यूंकि इनकी टिपण्णी में लेख का एक वाक्यांश भी नहीं है.ये शायद अभी कली हैं ,फूल बनाने में समय लगेगा.इनका खुद ही कहना है की मेरा देवी देवता और उनकी पूजा से कोई ताल्लुकात नहीं है.हसी आती है की ऐसे लोग इस परिचर्चा में क्यूँ आते है.अमित श्रेयस ने गणितीय संकेतों के साथ आप राम और कृष्ण दोनों को मानाने वाले समुदाय को आर्य सिद्ध कर रहे हो ,आप दो समुदाय को एक ही समुदाय का बोल कर मिला रहे हो ये बात इन्हें नागवार गुजरी है और आप से बचने की इन्होने गुजारिश कर डाली.भैसा नेपाल में और बकरी/खस्सी ,मुर्गा भारत में खाया जाता है इन्होने ही बताया,जहाँ तक मै जनता हूँ गाय का मांस भी भारत जैसे देश में खाया जाता है.ये परंपरा मणि जी के पैदा होने से पहले की है,अमित जी भैसा,बकरी/खस्सी और मुर्गे खाते लोग को देख कर आप अट्टहास कर रहे होंगे लेकिन गाय सुनकर अट्टहास जरुर बंद हो जायेगा,उसके लिए कुछ कीजिये ,आपका चहेता इतिहास आपके साथ है क्यों?किसी बन्धु का कहना था की आपने दुर्गा को वेश्या कहा कल अपनी माँ को भी “……..” कहेंगे.इन्हें कौन समझाए अपने बच्चे के लिए वेश्या एक “माँ” हो सकती है लेकिन समाज के लिए वो “वेश्या “ही रहेगी.हमारे सिद्धार्थ भाई ने एक बड़ी अच्छी बात कही दिल को छू गयी ये बात की “हमें संघर्ष नहीं समाधान चाहिए ” शायद वक्त की यही आवाज है…भाई जान समाधान के लिए ही तो हम शंघर्ष कर रहे है.परिणाम से पहले एक लड़ाई हमेशा हुई है.यहाँ तो जीत सुनिश्चित है ढोंगियों के कारण थोडा बिलम्ब हो रहा है.आपका साथ अपेक्षित है ,
    क्योंकि मै भी एक सवर्ण (राजपूत)हू और सच में पौरानिक सच समझने के बाद अपने कुटिल पूर्वजो पर चिढता हू, मगर इतना सच भी जान लीजिए की न भूत में और न ही वर्तमान में कोई पूरी की पूरी जाति भृष्ट हुई इसलिए कृपा करके उन पवित्र आत्माओ को कष्ट मत होने दीजिए जो राम कबीर दादू रैदास के संत शरीरों में अवतरित हुई ……अगर आप महानता का परिचय देते हुए सामूहिक रूप से क्षमा मांग ले तो समस्त कुटिल चाल वालो के गाल पे करारा तमाचा होगा ,,,,” ये पंक्तियाँ भी सिद्धार्थ भाई की है जो यह सिद्द करती है की ये कितने कपटी है, पहले तो पिछडो के साथ खड़े दिखते है,फिर छल से झुकाने के लिए भी मणि बाबू को मनाया जा रहा है.शायद यही कारण है के शहीद जगदेव प्रसाद भी पिछडो की अगुआई एक सवर्ण करे,के पूरी तरह खिलाफ थे.उनका कहना था “शेर कभी बकरी की रक्षा नहीं कर सकता”……………………………………………………………………………………. .हा रे भारत का इतिहास और हा रे भारत की संस्कृति………………………………………..

  113. dr.vimala misra says:

    माफ़ कीजियेगा —दोष मणिजी का ही नहीं है —सब ओर से धिक्कार तो moderator को भेजनी चाहिए जिन्होंने ऐसे स्तरहीन ,झूठ पर आधारित,विद्वेषपूर्ण ‘मसाले ‘ पर चटखारा लेते हुए, अश्लील शीर्षक की छौंक लगा कर परोसने की ओछी हरकत की !

  114. this is a fucking article,fuck you prem kumar mani

  115. RCPathak says:

    चंडी या दुर्गा प र लिखा ये लेख विक्रत मष्तिष्क की अपरिपक्व उपज के सिवाय कुछ नहीं है ,आरक्षण की सुविधा प्राप्त को चिंधी क्या मिल गई वो अपने आपको बजाज समझने लगा |

  116. विशाल गोयल says:

    यकीन नही होता लोग अपनी विद्वता सिद्ध करने के लिए इतना नीचे भी गिर सकते हैं…….ये पूरा लेख सिर्फ अनुमानों और तथ्यों को तरोड़ मरोड़ कर लिखा गया है…..इसको पढ़ने के बाद एक पल के लिए भी नही लगा कि में किसी समझदार आदमी का लेख पढ़ रहा हूँ….इस लेख को पढकर वाही लोग उत्तेजित हो सकते हैं जो नासमझ हैं……..

  117. ahmed says:

    bhai muje to lagta hai kisi bi dharm yaa firke ki touhin buri chij hai kisi ko bi haq nahi ki dharm ki bhavna o ko bhadkaa kar khud ki khyaatyi haasil kare.Achhai yaa nahi likh saqte?kiya salmaan rashdi yaa taslimaa nashrin bannaa hai koi faaydaa nahi hogaa,logo ke dilo mai Aapke liye nafrat ke sihva koi jagah na banaa paavoge.

  118. Aarti Singh says:

    बदलाव के लिए OBC+SC+ST+ व दूसरे इंसाफपसंद लोगों को सामंती व ब्राह्मणवादी सोच से बाहर निकल कर प्रगतिशील मूल्यों को अपनाना होगा. गाँवों में ओबीसी और एससी के बीच सीधी लड़ाई क्यों होती है, इसे भी समझना होगा. घर,जमीन,सम्पत्ति और बाहुबल में अधिक होने के बावजूद ओबीसी ब्राह्मणवाद के सबसे मज़बूत सिपाही के तौर पर नज़र आता है.

  119. एक नेक सलाह, दुर्गा के बारे में जैसा अनर्गल प्रलाप किया, वैसा किसी अन्य धर्म के देवी-देवताओं के बारे में मत कहना…अन्य धर्मावलंबी हिन्दुओं की तरह सहनशील नहीं होते…

  120. Vikalp Singh says:

    जिस प्रकार मेंढक अपने कुंए के भीतर समुद्र की कल्पना करता है वैसे ही हिन्दू दर्शन विरोधियो के लिए उसे पढ़े बिना उसकी प्रासंगिकता को समझना असंभव है , जिस प्रकार हिन्दू देवीदेवताओ को गाली देना बहुजन मिशन का अंग बन गया है उसी कार्यकलाप से वे हिन्दू प्रगतिशील विचारको से दूर जा रहे है कबीर और रविदास जी ने भी पाखण्ड का विरोध किया किन्तु कभी अशोभनीय बाते कर अपना मान कम नहीं किया , रही बात आर्यों के भारत आने की तो यह सिद्ध है की भारत में मनुष्य का जन्म ही नहीं हुआ सारे लोग यहाँ अफ्रीका से आये थे ( कोई पहले कोई बाद में ) , मै बहुजन मिशन का सम्मान करता हु लेकिन फुले जी से ये जो गाली गलौच की परम्परा चली है उसका चिर विरोधी हु , आम्बेडकर जी ने भी पाखण्ड का विरोध किया किन्तु कही अशोभनीय बाते नहीं की यही फर्क होता है एक राष्ट्रिय व्यक्तित्व और कुत्सित मानसिकता में, बाकी अगर आपके धार्मिक नेताओ और आराध्यो की भी अशोभनीय भाषा में बात की जाए तो आपको भी वैसी ही पीड़ा होगी जैसी एक हिन्दू होने के नाते मुझे है , आज बहुजन के नाम पर एक “एकल जन” की फ़ौज कड़ी हो रही है जो शेष समाज से खुद को काट रही है और कहती है अंगूर खट्टे है
    कृपया खुले विचारो और सवस्थ मानसिकता का परिचय दे ,
    पाखण्ड और जातिवाद और शोषण के खिलाफ लड़ाई में मै आपके साथ हु .
    भवदीय -
    विकल्प सिंह

  121. S.MAHADEVA SARMA says:

    It is really sad that Hinduism is so open that nobody takes up issuing a “Fatwa” to put an end whatever nonsense is doled out. History is not a science. Anything can be passed off as History for like religion, history is also a matter of interpretation. It all depends on which side of the bread is being buttered. The “goodness” of Hinduism is that, anything and everything is tolerated. I wish this author had the “guts” to enagage in mudslinging against any of the “virulent” religions. This way India won’t get any far. It is just a matter of luck that today nobody wants to colonize or enslave anyone or here is a country that is always available on a platter as it had always been!”

  122. Shiva says:

    isse likhane wala ssala chutiya hai…. ise itihaas ka kch pata nahi… ise to apne baap tak ka b pata nahi…. isaki baat hi bakwaas hai paagal hai saala…apni maa ko b nahi chodega ye…

  123. PREM KUMAR SHANI says:

    IF U HAVE REALL GUTS MR PREM KUMAR MANI JI,THEN KINDLY SPEAK YOUR WORDS IN FRONT OF ASSEMBLED HINDUS. AND WHO COINED THIS IDIOTIC THEORY THAT DALITS ARE DESCENDANTS OF ASURAS. KINDLY CHECK YOUR IQ AND BRUSH UP YOUR MENTALITY. YOU ARE NOTHING BUT A COWARD JOKER

  124. Sujeet says:

    Itni fucking bakwas ke thanx
    yar, tum logo ke pas aur koi sahi kam nahi hai kya…. Jhaant bhar ki budhi nahi aur lekhak ban gaye… Lekhak ka matlab pata hai tumhe…? Tum jaise neech aur jaahil lekhako se aur ummeed hi kya ki ja sakti hai…? Nirala aur dinkar bhi lekhak aur budhijivi the, lekin tumhari tarah kamine nahi the… Jo man me aaya likh diya, kuchh logo ko khush karne ke liye, unki najar me aane ke liye puri janta ko apna dushman bana baithe, sabki najar me idiot ban gaye…. Kahe ka lekhak ho…? Isi buddhi ko lekar parivartan karne chale ho..? Hindu sahanshil hai, yadi himmat hai to muhammad aur fatima ka samas jodo, tab lekhak ka bhav pata chalega…
    U idiot…

  125. naveen says:

    मुझे एक बात समझ मे नही आया कि

    यह पुरा का पुरा लेख अजम्पसन पे क्यो लिखा है ?

    वो होगा तो वे होंगी तो वैसे होंगे तो वैसी होंगी !

    एजम्पसन कभी भी किसी तरह का प्रमाण या परिणाम नही होता है !

    घटिहा स्तर का , आधारहीन, साहित्य से परे, पुर्णतया भ्रामक है ये लेख ! लेखक की जातिगत स्तर की हीन भावना को दिखाता यह लेख वाकई मे लेखक के घटिहा सोच को दर्शा रहा है !

    ऐसे लेख फारवर्ड ब्लाक को पुरी तरह बैकवर्ड ले के जायेंगे !

  126. Nripendra says:

    The writer of this blog is Highly frustrated, Demorlized and failure person of his life. It seems he likes to achieve the cheapest publicity. THe author of this blog is depressed, mental, and highly in secured in his life. The all blog is related to not only foolishness but idiocy and paralysed. I don’t know were he studied to how to impose the imagined stories over night by night. I am very much hopeful that he can do his best in c grade hindi pictures with rape and vulgar imagined stories.
    Even Mayawati will slap him with her chappal after reading his bastered story over blog.

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