भोजपुरी सिनेमा में सार्थक हस्‍तक्षेप करेगा “सईयां ड्राइवर…”

♦ रविशंकर

हुत दिनों बाद एक भोजपुरी फिल्म देखने का मौका मिला। आम तौर पर भोजपुरी फिल्में मैं नहीं देखता। उसकी सबसे बड़ी वजह है, भोजपुरी फिल्मों का मेरी उम्मीदों पर खरा न उतर पाना। जब भोजपुरी फिल्मों की फिर से नयी हवा चली थी, तो मुझे लगा था कि भोजपुरी फिल्में दर्शकों की उस भूख को मिटा पाने में सफल होगीं, जिसके कारण दर्शक उनके करीब आये। मेरे अनुसार दर्शकों का भोजपुरी फिल्मों के करीब आने का सबसे बड़ा कारण हिंदी फिल्मों से हिंदुस्तान का गायब होना था। हिंदी फिल्में हमारे देश के रीयल इमोशन से दूर चली गयी थी। वह एक ऐसी दुनिया का निर्माण कर रही थी, जहां हिंदुस्तान का आम आदमी अपने आप को फिट नहीं कर पा रहा था। ठगा सा महसूस कर रहा था। इसलिए उसने अपना रुख भोजपुरी सिनेमा की ओर किया। मगर भोजपुरी फिल्मों ने उन दर्शकों के साथ क्या किया? उम्मीद से देख रहे उन दर्शकों के सामने हिंदी फिल्मों का घटिया संस्करण प्रस्तुत किया गया। जिसकी न मेकिंग अच्छी थी न टेकिंग … न एक्टिंग … और न ही कहानी। यहां आकर भी दर्शक ठगा सा महसूस करने लगा … खैर!

मगर ये फिल्म “सईयां ड्राइवर बीवी खलासी” उन फिल्मों से हट कर है। किसी फिल्म को देखने लायक अगर कोई चीज बनाती है, तो वो है उसकी स्क्रिप्‍ट। इस मामले में इस फिल्म की स्क्रिप्ट न सिर्फ हट के है, बल्कि बहुत बढ़िया है।

फिल्म की वन लाइन कहानी इस तरह है – दुलरिया के पति की हत्या हो जाती है … और उसके पिता उसे मायके वापस ले आते हैं। वहां उसके दो भाई और भाभियां उसे बड़े प्यार से रखती हैं। मगर जैसे ही पिता उसके गुजारे के लिए डेढ़ बीघा जमीन दुलरिया के नाम कर देते हैं, वही भाई-भौजाई उसके दुश्मन हो जाते हैं। तरह तरह के उपाय से उसे घर से दूर कर देना चाहते हैं ताकि उनकी जमीन बची रह जाये। मगर वही बहन हर कदम पर अपने भाई के परिवार के लिए समर्पित रहती है।

पैतृक संपत्ति में बेटी के अधिकार की बात करने वाली शायद ये हिंदुस्तान की पहली फिल्म है। हिंदी में भी इस मुद्दे पर कोई फिल्म मेरी जानकारी में अब तक नहीं बनी है। इतना ही नहीं… आज पैसा कैसे हमारे रिश्तों की गर्माहट को कम कर रहा है, पैसे के पीछे भागता ये समाज कितना संवेदनहीन हो गया है। ये फिल्म इस विषय पर अच्छे से प्रकाश डालती है।

मगर थोड़े से धन के लालच में अपने खून के रिश्ते को ताक पर रख देने वाले इस समाज में दुलरिया भी है, जिसके लिए रिश्ते अभी भी पैसे से बढ़कर हैं … और जो सिर्फ जिंदा रिश्ते ही नहीं, मरे हुए रिश्ते को भी निभा रही है। मृत पति से उसका प्रेम आज भी उतना ही है, जितना उसके जिंदा रहते था … और क्यों न हो? शादी के तीन सालों में ही उसने दुलरिया को प्यार से इतना भर दिया था कि आज भी उसकी स्मृतियां उसे ऊर्जा से भर देती हैं … और यही कारण है कि भाइयों के बार-बार कोशिश करने पर भी वो दूसरी शादी से इनकार कर देती है। बार-बार यही कहती है, अगर कोई मेरे मनपसंद का लड़का दिखेगा … तो मैं उससे ब्याह कर लूंगी, किसी से इजाजत भी मांगने नहीं आऊंगी! ऐसा क्या था दुलरिया के पति में? ऐसा बहुत कुछ था दुलरिया के पति में। दुलरिया के ट्रक ड्राइवर पति ने उसे अपने ट्रक पर बैठाकर पूरे हिंदुस्तान की सैर करायी थी। हर जगह की पसंदीदा साड़ी उसे ला कर दी थी। उनके रिश्ते में कहीं बंधन नहीं था, एक किस्म की उन्मुक्तता थी। उसका पति आम भारतीय पति की तरह उसकी देह पर जबर्दस्ती लदा नहीं रहता था। बल्कि उसकी भावनाओं की कद्र करता था। इससे भी बढ़कर जब वो मरा … तो किसी बीमारी या दुर्घटना का शिकार होकर नहीं … बल्कि एक अबला लड़की का कुछ लोगों के द्वारा उसका अगवा करना … उसकी इज्जत पर हाथ डालना उसे बर्दाश्त नहीं हुआ … और वो उस लडकी को बचाने के क्रम में उन गुंडों की गोलियों का शिकार हुआ। और एक बहादुर की मौत मरा। यही वो चीज है, जो दुलरिया को अपने पति के प्रति गर्व से भर देती है। और यहां पर दुलरिया का प्यार देह से ऊपर उठ जाता है। वो एक विचार बन जाता है। जिसकी तलाश वो दूसरों में भी करती है। मगर वो नही मिलता … और वो लगातार शादी से इनकार करती जाती है।

ये सही भी है। अगर कोई रिश्ता, जो स्मृतियां हैं उससे अच्छी स्मृतियां नहीं दे सकता, फिर उन पवित्र स्मृतियों को … उन दिव्य एहसासों को किसी असहज रिश्ते मे बांधकर खत्म क्यों किया जाए?

प्रेम से भरा हुआ मन कैसे दूसरों को भी प्रेम से भर देता है, उसकी मिसाल है दुलरिया। जिसके मन में हर किसी के लिए अपनापन है। जो हर किसी के दुख से दुखी होती है और उसके दुख को कम करने का हर संभव प्रयास करती है!

फिल्म जाने-माने कहानीकार रामधारी सिंह दिवाकर की कहानी पर आधारित है। मगर उस कहानी में बहुत कुछ जोड़-घटाव कर इसे एक बेहतर पटकथा का रूप दिया है निलय उपाध्याय ने। उन्होंने पूरी फिल्म में वर्तमान और अतीत को बहुत ही खूबसूरती के साथ पेश किया है। अंजनी कुमार का निर्देशन भी अच्छा है। उन्होंने अभिनेताओं से अच्छा काम लिया है। कुल मिलाकर कहें तो ये फिल्म उस शिकायत को दूर करती है … कि भोजपुरी में परिवार के साथ बैठकर देखने लायक अच्छी फिल्म नहीं बनती। ये फिल्‍म नवंबर में प्रदर्शित होने वाली है। उम्मीद है दर्शकों को बहुत पसंद आएगी। अगर ऐसी ही दो–चार फिल्में और बन जाए, तो भोजपुरी सिनेमा अपने संकट से ऊपर उठ सकता है … और अपना हस्तक्षेप दर्ज कर सकता है!

(रविशंकर कुमार। नब्‍बे के दशक में पटना के युवा रंगकर्म का एक प्रतिनिधि चेहरा रहे। इस दशक की शुरुआत में मुंबई आये। कई टेलीविजन धारावाहिकों में अभिनय किया। फिलहाल कुछ धारावाहिकों के लिए पटकथा लेखन कर रहे हैं। उनसे ravishankar1510@gmail.com पर संपर्क किया जा सकता है।)

You may also like...

Leave a Reply

Your email address will not be published. Required fields are marked *