संघर्ष करना है, कल्पनाशील रहना है, खुद रास्‍ता बनाना है!

शटलकॉक बॉयज के डाइरेक्‍टर हेमंत गाबा से मिहिर पंड्या की बातचीत

हेमंत की फिल्म का चर्चा तो कई दिनों से थी। देर रात तक चलने वाली फोन कॉल्स पर बातें भी बहुत हुईं। हां, मुलाकात पहली बार मोहल्ला लाइव की ताजा बहसतलब में हुई। अगले दिन उसकी फिल्म भी देखी। दिल्ली मेरा भी विषय है और उसका भी। रिश्ता बनाना नहीं पड़ा। पेश हैं कुछ बातें नये बने दोस्तों की, जिससे हिंदुस्तान में स्वायत्त सिनेमा बनाने के उलझन भरे रास्तों से जुड़े कुछ और पेंच खुलेंगे। आइए, ‘शटलकॉक बॉयज’ की पहली आहट सुनिए और धमक का इंतजार कीजिए : मिहिर पंड्या

तुम तो अमरीका में अच्छी खासी बंधी-बंधायी नौकरी करते थे। फिर यह फिल्म का कीड़ा कब-कहां काटा? कब-कैसे तय किया कि फिल्म बनानी है?

मैं सॉफ्टवेयर क्षेत्र की एक बड़ी MNC में काम तो करने लगा था, लेकिन शुरू से ही मुझे मालूम था कि यह मेरी मंजिल नहीं है। लेकिन मुझे यह समझ भी नहीं थी कि अपनी मंजिल को कैसे तलाशा जाए। फिर मुझे समझ आया कि जिस काम को करने में इतना मजा आये कि दीन-दुनिया की सारी सुध-बुध खो जाए और यही मजा आपको इस हद तक ले जाए कि आप अपना सब-कुछ दावं पर लगाने को तैयार हो जाएं, वही मेरी मंजिल है। बचपन में मुझे चित्रकारी का शौक था, और लड़कपन में मैं एक रॉक-बैंड का का सदस्य होना चाहता था। मुझे अलहदा कलाकारियां आकर्षित करती थीं लेकिन सिर्फ आकर्षण पर टिके रोमांस की तरह ज्यादा देर साथ नहीं रहती थीं। लेकिन जब मैं न्यूयॉर्क में फिल्ममेकिंग की कार्यशालाओं में शामिल होने लगा, वो अनुभव मेरे साथ रहने लगा और जितना मैं उसमें डूबता जाता, उतना ही मुझे वो अपनी ओर खींचता। सिनेमा निर्माण में मिलने वाले इस आनंद ने ही मुझे वो हिम्मत दी कि मैं एक झटके में सब छोड़ हिंदुस्तान वापस आ गया और अपनी पहली फीचर फिल्म ‘शटलकॉक बॉयस’ पर काम शुरू कर दिया।

कहते हैं कि यह उद्योग ‘आउटसाइडर्स’ के लिए आज भी बड़ा बेरहम है। तुम तो बिल्कुल नये थे। कैसा अनुभव रहा ‘शटलकॉक बॉयज’ बनाने का? क्या तकनीक की सुलभता ने रास्ते कुछ आसान किये हैं?

च कहते हो। जो थोड़ा-बहुत अनुभव मुझे हुआ है इस इंडस्ट्री का, मैंने पाया कि यह इंडस्ट्री काफी हद तक rigged है। यहां यह महत्वपूर्ण नहीं कि आप ‘क्या’ जानते हैं, यहां इस बात की पूछ है कि आप ‘किसे’ जानते हैं। वैसे तो यह नेटवर्किंग और लॉबिंग आजकल हर इंडस्ट्री में सामान्य बातें हैं, लेकिन फिल्म उद्योग इनमें आज भी अव्वल है। फिर पैसे का भी बड़ा रोल है। पैसे की बदौलत नेटवर्किंग फटाफट हो सकती है, व्यावसायिक रिश्ते बनाये जा सकते हैं। दुर्भाग्य से, एक ‘आउटसाइडर’ होने के नाते मेरे पास इनमें से कोई सुविधा नहीं थी। लेकिन फिर यहां ऐसे फिल्ममेकर्स भी हैं, जिन्होंने आउडसाइडर होने के बावजूद अपनी जगह बनायी है। इसलिए प्रतिभा, निरंतर कोशिश और मेहनत के दम पर यहां सपने सच हो सकते हैं। हमें भी उसी राह पर चलना चाहिए।

हमने ‘शटलकॉक बॉयज’ फिल्म फॉर्मेट पर शूट की और डिजिटल के रास्ते नहीं गये, डिजिटल पर शूट करना शायद ज्यादा सस्ता होता। लेकिन यह तो सिर्फ फिल्म निर्माण की बात हुई। फिल्म का प्रदर्शन, खासकर वितरण (distribution) अब सबसे बड़ी चुनौती है।

दिल्ली के चार लड़कों की कहानी। कितना अपना सच है कहानी में और कितनी असल कहानी?

कुछ हिस्से हैं जो मेरी अपनी जिंदगी से हैं, कुछ हिस्से हैं जो कहानी हैं। मैं अपने लड़कपन के दिनों में दोस्तों के साथ बैडमिंटन खेला करता था। रात में मोहल्ले की सड़कों पर, ठीक वैसे ही जैसे ‘शटलकॉक बॉयज’ में पंकज, मानव, गौरव और लवलीन खेला करते हैं। यह चारों किरदार अलहदा पेशों से आते हैं और यह बैडमिंटन का खेल ही उनके बीच का वो धागा है, जिससे उनकी दोस्ती बंधी है। और हां, किरदारों के नाम और उनकी व्यक्तिगत जिंदगियों के किस्से भी मैंने अपने दोस्तों की जिंदगियों से चुरा लिये हैं।

फिल्म में जिस आइडिया को वो अमली जामा पहनाते हैं, वो कुछ वैसा ही है जैसा मैं सॉफ्टवेयर कोड्स लिखते-लिखते बोर हो जाने पर करने की सोचा करता था। फिल्म में आये तमाम चुटकुले भी अपने ही हैं। या तो ऐसे जिन्हें मैंने देखा या फिर वो जिनका मैं हिस्सा रहा!

अपने ही शहर में आउटडोर शूट करना कैसा अनुभव था?

म हमारे इलाके के डीसीपी के पास गये थे शूटिंग की इजाजत के लिए। उन्होंने पांच मिनट हमें सुना और हमारी एप्लीकेशन रख ली। दोबारा हमें उनके ऑफिस से कभी कोई जवाब नहीं मिला और न ही हमारी एप्लीकेशन लौटकर आयी। इतना समय हमारे पास था नहीं कि हम बार-बार उनके ऑफिस के चक्कर लगाते। तो हमने तमाम आउटडोर शूट ‘गुरिल्ला स्टाइल’ में किया। शूटिंग की लोकेशन से दोनों तरफ 500 मीटर की दूरी पर दो गाड़ियां खड़ी रहती थीं। किसी भी परेशानी की आहट सुनाई देते ही वो हमें सूचित करती थीं। हम उसी वक्त अपना बोरिया-बिस्तर समेटकर भाग लेते थे और बाकी का शूट अगले दिन पूरा करते थे। साथ ही हम एक बेनामी चिठ्ठी हमेशा साथ रखते थे, जिसे मौका पड़ने पर दिखाया जा सके, जिसमें लिखा होता था कि हम किसी सामाजिक मुद्दे पर वृत्तचित्र की शूटिंग कर रहे हैं। कुछ अवसरों पर हमें पैसा भी खिलाना पड़ा, जिससे सामनेवाला आदमी खुश होकर हमें शूटिंग की इजाजत दे दे। हां, मौहल्ले में बैडमिंटन वाले दृश्यों के लिए हमने पूरी कॉलोनी के लोगों को अपने विश्वास में लिया और उन्होंने आगे बढ़कर हमें हौसला दिया।

एक घटना फिर भी हुई। वो हमारी शूटिंग का पहला ही दिन था और हम एक पार्क में शूट कर रहे थे। वहां गश्त पर मौजूद हेड कॉन्सटेबल ने हमें देखकर एसएचओ और पंद्रह से ज्यादा पुलिसवालों सहित अपनी पूरी टीम को बुला लिया और हमें यह कहकर शूटिंग करने से मना कर दिया कि आनेवाले चुनावों के मद्देनजर यहां किसी भी तरह की शूटिंग पर रोक है। मुझे यह तर्क बिल्कुल भी समझ नहीं आया, लेकिन क्या करते, हमें शूटिंग वहीं रोकनी पड़ी। संयोग ऐसा हुआ कि वो पार्क वाला दृश्य वैसा नहीं बना, जैसा मैं चाहता था और मजबूरी में हमें जो भी फुटेज उस दिन हम शूट कर पाये थे, उससे ही काम चलाना पड़ा। आज भी फिल्म में वो दृश्य खटकता है और आज भी जब मैं फिल्म देखता हूं, हमारी इस अफसरशाही को एक बार कोसता जरूर हूं।

‘शटलकॉक बॉयस’ … अच्छा किसी पैसेवाले ने यह सलाह नहीं दी कि कहानी में बैडमिंटन को बदलकर क्रिकेट कर दो?

हा हा !! मैंने भी ऐसे किस्से सुने थे जिनमें निर्माता कहानी में अनर्गल बदलावों के लिए कहते हैं। इसीलिए मैंने पहले ही यह तय कर लिया कि मैं किसी ऐसे निर्माता के पास अपनी स्क्रिप्ट लेकर नहीं जाऊंगा जो इस फिल्म को शुरू होने से पहले ही एक ‘कभी-न-खत्म-होने-वाला’ प्रोजेक्ट बना दे। हां, एक बार एक संभावित एडिटर उर्फ भावी फिल्ममेकर उर्फ मीडिया अध्यापक ने ठीक ऐसी सलाह दी थी, जब मैं उनसे संभावित भागीदारी के लिए मिला था। फिर मैंने उनसे दोबारा पलटकर बात नहीं की।

अब वितरण के गोरखधंधे में फंसे हो। फिल्म बनाने से ज्यादा मुश्किल है फिल्म दिखाना। कैसी है यह राह?

ही कहा। अब तो यह सबका जाना हुआ तथ्य है कि फिल्म बनाने से कहीं ज्यादा मुश्किल है उसका वितरण। फिलहाल मैं अपने तमाम प्रयासों और चक्करों के बाद दो डिस्ट्रीब्यूटर्स को अपनी फिल्म दिखाने में सफल हो पाया हूं। उनके अनुसार फिल्म तो अच्छी है लेकिन इसमें कोई ‘स्टार’ नहीं है। एक अग्रणी कॉर्पोरेट वितरण कंपनी के मुखिया ने मुझे कहा कि अगर मैं एक करोड़ रुपया फिल्म की पब्लिसिटी के लिए लगाऊं तो वे कमीशन बेसिस पर फिल्म रिलीज कर सकते हैं। मुझे पता नहीं कि मैं उन्हें क्या जवाब दूं। सच में यह बहुत मुश्किल है। या तो आपके किसी वितरक से व्यक्तिगत संबंध हों (जो आमतौर पर तभी होता है, जब आप जानेमाने निर्माता या निर्देशक हों) या फिर आपके पास पब्लिसिटी पर खर्च करने के लिए बड़ा पैसा हो। बिना इन दोनों के कोई वितरक आपकी फिल्म को सिनेमाघरों में प्रदर्शित करने में रुचि नहीं लेता।

दुर्भाग्य ऐसा है कि हमारे यहां अमेरिका की तरह फिल्म वितरण का कोई वैकल्पिक मॉडल नहीं है। अमेरिका और यूरोप में फिल्में बिना सिनेमाघरों में आये टीवी और ‘विडियो ऑन डिमांड’ पर दिखायी जा सकती हैं। लेकिन हिंदुस्तान में जिस भी प्लेटफॉर्म पर जाओ, पहला सवाल यही पूछा जाता है कि क्या आपकी फिल्म थिएटर्स में रिलीज हुई? और मुझे यकीन है कि अगर हम किसी तरह इसे थिएटर्स में रिलीज करवा भी पाये, तो अगला सवाल हमसे यह पूछा जाएगा कि आपकी फिल्म को लेकर ‘buzz’ कैसा था, और आगे की सारी बिकवाली उसी आधार पर होगी। अब तो मैंने इन सब बातों को एक बड़ी सच्चाई का हिस्सा मानकर स्वीकार कर लिया है और अब मैं सिर्फ इसी कोशिश में हूं कि किसी तरह यह फिल्म लोगों तक पहुंचे।

एक स्वतंत्र फिल्मकार होने के नाते बताओ, क्या आज के हमारे इस मुख्यधारा सिनेमा के तंत्र में ऐसी फिल्मों के लिए सच में कोई जगह है? तुम्हारी फिल्म में तो हिंदी फिल्मों के सारे ‘मसाले’ भी हैं, और साथ में एक ईमानदार तरीके से कही कहानी भी, फिर भी सिनेमाघरों की राह इतनी मुश्किल। क्या तंत्र को बदलना ही एकमात्र उपाये है?

ह सही है कि इंडस्ट्री खुद आगे बढ़कर स्वतंत्र फिल्मकारों और उनके सिनेमा को जगह नहीं देती। यह जगह हमें खुद निरंतर चलती कोशिशों द्वारा बनानी पड़ती है। शायद ‘शटलकॉक बॉयज’ में वो सब है, जिसका तुमने ऊपर जिक्र किया, लेकिन इससे बड़ा सच यह है कि न तो हमारे इंडस्ट्री में संबंध हैं, न तो हमारे पास पैसा है और न ही हमारा वहां कोई गॉडफादर है। इसलिए हमें संघर्ष करना है, कल्पनाशील रहना है और अपना रास्ता खुद बनाना है।

हमें अपनी दुनिया में ले चलो। अपनी फिल्म से अलग, क्या देखना पसंद करते हो हिंदुस्तानी सिनेमा में, विश्व सिनेमा में? किसे देखकर लगता है कि अरे ये तो जैसे मैंने ही बनायी है, और किसे देखकर लगा कि यह मैं कभी नहीं बना पाऊंगा।

मैंने क्लासिक सिनेमा ज्यादा नहीं देखा है और इस बात का मुझे आज भी दुख है। पिछले दिनों आये हिंदुस्तानी सिनेमा में मुझे दो दूनी चार, चक दे इंडिया, रॉकेट सिंह, द अनटाइटल्ड कार्तिक कृष्णन प्रोजेक्ट, ओए लक्की लक्की ओए, लव सेक्स और धोखा, पीपली लाइव, आमिर, ए वेडनसडे, इश्किया, आई एम कलाम, फंस गये रे ओबामा जैसी फिल्में पसंद आयीं। इन सभी में खासकर ‘दो दूनी चार’ देखकर मुझे ऐसा लगा कि ऐसी फिल्म मैं भी बना सकता हूं, क्योंकि उसमें खास दिल्ली का तड़का था और मध्यवर्गीय भारत की एक ऐसी कहानी थी, जिससे मैं बहुत जुड़ाव महसूस करता हूं। फिर कहानी कहने के तरीके ने भी मुझे अपने साथ बांध लिया।

यूं तो विश्व सिनेमा भी मैं सीमित ही देख पाता हूं लेकिन मोटरसाइकिल डायरीज, थ्री मंकीज, अमोरेस पेरोस, बाबेल, द लाइव्स ऑफ अदर्स, इनसेप्शन, थ्री आयरन, ओल्डबॉय, चुंगकिंग एक्सप्रेस, इन दि मूड फॉर लव, सिनेमा पेराडिसो मुझे खास पसंद हैं। मशहूर फिल्में होने के कारण इन तक पहुंच ज्यादा आसान रहती है।

समकालीन विश्व सिनेमा में मुझे मैक्सिकन / स्पैनिश और कोरियन सिनेमा खास पसंद आता है। और एक दिन इंसेप्शन तथा बाबेल जैसी फिल्में बनाना मेरा भी सपना है। शायद अभी मेरे पास उतना कौशल नहीं, लेकिन आने वाले सालों में मैं उस स्तर का कौशल हासिल करने की पूरी कोशिश करूंगा।

फिल्म से अलग कोई और शौक लिखने-पढ़ने के?

फिल्मों से इतर मैं तकनीक और दूरसंचार के क्षेत्र में हो रही प्रगति के बारे में पढ़ता रहता हूं। भविष्य में इंटरनेट से जुड़ी एक परियोजना शुरू करने का भी विचार है। सात साल जो सॉफ्टवेयर के कोड लिखते हुए घिसाई करवायी है, वो किस दिन काम आएगी!

mihir pandya(इंटरव्‍यूअर : मिहिर पंड्या। दिल्‍ली विश्‍वविद्यालय में रिसर्च फेलो। हिंदी सिनेमा में शहर दिल्‍ली की बदलती संरचना पर एमफिल। आवारा हूं नाम से मशहूर ब्‍लॉग। उनसे miyaamihir@gmail.com पर संपर्क करें।)

मिहिर पंड्या की बाकी पोस्‍ट पढ़ें : mohallalive.com/tag/mihir-pandya

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