यह अनेक संभावनाओं वाला समय है, बहुवचन समय

♦ मिहिर पंड्या

म रीगल के बाहर खड़े थे। भीतर से ‘दैट गर्ल इन येलो बूट्स’ का आदमकद पोस्टर झांक रहा था। हां, एक और डीएसएलआर कैमरे पर बनी फिल्म सिनेमाघरों में आने वाली थी। बंबई की बरसात सुबह से इस बे-छतरी दिल्लीवाले से लुका-छिपी खेल रही थी। तय हुआ लिओपोल्ड चलेंगे। पहुंचने ही वाले थे कि ठीक लिओपोल्ड के पहले बायें हाथ को एक रास्ता खुलता दिखा समंदर की ओर। मैं ठहर गया। सामने गेटवे था। समंदर देख दिल्लीवाले का मन मचल गया। मैंने रास्ता बदल लिया। स्वेतलाना और जगन्नाथन दूर खड़े मुझे घूर रहे थे। लेकिन मेरे पीछे मेरा घर था, जिसकी याद हमेशा मुझे पानी की ओर धकेलती है। आसमान बरसने को था और मैं अपने डीएसएलआर को पानी से बचाता इन घनेरे बादलों को समंदर में घुल जाने से पहले अपने कैमरे में कैद कर लेना चाहता था।

लेकिन पानी को कभी कोई बांध पाया है?

दो कॉफी के प्यालों और एक बियर मग के बीच, उस दीवार के एकदम नजदीक बैठे जहां गोलियों से बने निशानों को मेडल की तरह सजाया गया है, लियोपोल्ड की उस टेबल पर जगन्नाथन मुझे बंबई को कुछ और पास से देखने के लिए ग्रांट रोड के सिंगल स्क्रीन थिएटर्स देखने जाने की सलाह देता है और मैं उसे अपनी टूटी-फूटी याद्दाश्त से वीरेन डंगवाल की कविता ‘पी टी उषा’ सुनाता हूं। पिछले तीन दिन से मैं उसे हम सबकी बातें सुनते, कोरे कागजों पर स्कैच बनाते और अनवरत जेम्स हेडली चेज पढ़ते देख रहा हूं। क्या कोई मानेगा कि मेरी और जगन्नाथन की दोस्ती के पीछे जिस लड़के का हाथ है, उससे मैं आजतक नहीं मिला। “सगई राज मेरी फिल्म का केन्द्रीय चरित्र होगा यह पहले से तय नहीं था। बल्कि वो तो मेरा सहायक कैमरामैन था…” जगन बताता है। (आप ‘वीडियोकारन’ में आज भी उसका नाम ‘सिनैमेटोग्राफी’ के क्रेडिट्स में पढ़ सकते हैं) पिछले दो महीने में मैं अपने कम से कम दर्जन भर दोस्तों को उस विस्मयकारी सगई राज से मिलवा चुका हूं। मैं जगन से कहता हूं कि जो बनाने वो निकला था, वहां से खड़े होकर देखें तो उसने अपनी फिल्म की नरैशन स्टाइल और मैसेज से बहुत समझौता किया है, लेकिन बदले में जो चीज बचायी है वो कहीं ज्यादा कीमती है। ईमानदारी।

‘टाटा इंस्टीट्यूट ऑफ सोशल सांइसेस’ की जिस छोटी सी ग्रांट के दम पर जगन्नाथन कृष्णन ने ‘वीडियोकारन’ बनायी है, आमतौर पर उसे वहां शॉर्ट फिल्म के लिए ही उपयुक्त माना जाता है। शायद यह भी कि यह हिंदुस्तान में अपनी पसंद की फिल्में बनाने का ज्यादा पारंपरिक तरीका है। लेकिन एक ऐसे दौर में जहां योजनाबद्ध तरीके से तमाम संस्थानों और प्रक्रियाओं का निजीकरण ‘विकास’ के नाम पर किया जा रहा हो, वहां संस्थागत मदद का सही और जनतांत्रिक मूल्यों के हक में उपयोग दरअसल इस रास्ते को वापिस जिंदा करने की लड़ाई में एक कदम है। संस्थागत मदद में अपनी वाजिब हिस्सेदारी मांगना उसके ‘उदारीकरण’ के नाम पर कुछ हाथों में गैर-लोकतांत्रिक प्रक्रिया के तहत सीमित होने के खतरे का जवाब भी होता है। आज भी जगन्नाथन के पास इतने पैसे नहीं हैं कि वो अपनी डॉक्यूमेंट्री में आये तमाम फिल्मों के दृश्यों के अधिकार खरीद सके, और शायद इसी वजह से अनेक विदेशी फेस्टिवल्स में वह प्रतियोगिता से बाहर हो जाती है। जगन अब ‘वीडियोकारन’ से आगे बढ़ना चाहता है। उसके पास कहानी है लेकिन उसे बनाने के लिए पैसा नहीं। फिर एक बार फिल्म बनाने का संघर्ष उसे बनाने का सही आर्थिक मॉडल तलाश करने में छिपा है। लेकिन इस बार जगन को यह मालूम है कि वो अपनी दूसरी फिल्म बनाएगा। जल्द ही बनाएगा।

कुछ लड़ाइयां जैसे अब अनवरत हैं। पिछले दिनों जयदीप वर्मा दिल्ली में थे। राष्ट्रपति से अपनी फिल्म ‘लीविंग होम’ के लिए राष्ट्रीय फिल्म पुरस्कार लेने। कुछ महीने पहले इसी कॉलम में हमने ‘लीविंग होम’ की बात की थी। उनसे मुलाकात में फिर वो सारी कहानियां याद हो आयीं, जिनसे होकर यह दुर्लभ फिल्म यहां तक पहुंची है। वैसे एक नजरिया यह भी हो सकता है कि ‘लीविंग होम’ को हम हिंदुस्तान में स्वतंत्र सिनेमा की सफलता की कहानी के तौर पर पढ़ें। तमाम संघर्षों के साथ बनकर तैयार हुई यह संगीतमय डॉक्यूमेंट्री न सिर्फ सिनेमाघरों में प्रदर्शित हुई बल्कि साढ़े पांच घंटे के अनकट वर्जन के साथ अपने चाहनेवालों के घरों में, दिलों में पहुंची। राष्ट्रीय पुरस्कार इसकी कहानी को एक ‘हैप्पी एंडिंग’ भी देता है। लेकिन इस नजरिये में वो बहुत सारी पीड़ाएं कहीं छिप जाती हैं, जिन्हें अब हमने एक स्वतंत्र फिल्मकार का भाग्य मान लिया है। उस दिन से जोड़कर जब अखबारवालों ने उनसे उनकी फिल्म के प्रदर्शन वाले हफ्ते में उसकी अपने अखबार में लिस्टिंग भर के पैसे मांगे थे, उन पुरस्कारों तक जहां वाजिब हकदारों के सही नाम पुकारने में गलतियां हुईं, यह लिस्ट बहुत लंबी है। यहां एक फिल्मकार है, जिसे अपने काम में गुणवत्ता से जरा सा भी समझौता मंजूर नहीं, जिसकी रचनाशीलता सदा कुछ नया गढ़ती रहती है। लेकिन जिसे अपने हिस्से का पूरा मान, पूरी इज्जत चाहिए। सवाल हमसे है कि क्या हम इन जैसे स्वतंत्र फिल्मकारों के लिए एक ऐसा सिस्टम खड़ा कर सकते हैं जिसमें इन्हें अपना काम ईमानदारी और गुणवत्ता के साथ पूरा करने का मौका मिले?

लेकिन हिंदी सिनेमा में स्वतंत्र प्रयास अब एकाकी नहीं रहे। मैं कहानियों की तलाश में हूं। आधी रात हेमंत गाबा को फोन करता हूं। हेमंत की कहानी कुछ-कुछ ‘द अनटाइटल्ड कार्तिक कृष्णन प्रोजेक्ट’ के नायक से मिलती है। विदेश में बैठे सॉफ्टवेयर कोड लिखते-लिखते एक दिन अचानक यह लड़का तय करता है कि इसे फिल्म बनानी है। बाकायदा एक फीचर फिल्म। सच में यह दुस्साहसियों का जमाना है। लौटकर हिंदुस्तान आता है और मानिए या न मानिए, कैसे न कैसे कर अपनी फिल्म बना डालता है। इधर हेमंत अपनी कहानी सुना रहा है, वही फिल्म के प्रदर्शन से जुड़े ‘डिस्ट्रीब्यूटर-पब्लिसिटी’ के गोरखधंधे, और मुझे उसकी बातें सुनते हुए एक पुरानी कहानी, एक पुराना दोस्त याद आता है। अचानक मैं जयदीप वर्मा की ‘लीविंग होम’ का नाम लेता हूं और हेमंत मुझे बताता है कि उसने ‘लीविंग होम’ खास कनॉट प्लेस के सिनेमाहॉल में इसीलिए देखी थी क्योंकि ऐसा हर स्वतंत्र प्रयास उसकी लड़ाई का हिस्सा है। अलग-अलग भाषा और परिवेश से आये यह सभी स्वतंत्र फिल्मकार अब साथ खड़े होने का महत्व और जरूरत समझ रहे हैं।

हेमंत बताता है कि उसकी फिल्म बन कर तैयार है लेकिन किसी भी किस्म का वितरक उसके प्रदर्शन के लिए तैयार नहीं। उन्हें पैसा चाहिए। उसे ‘आपकी पैंतीस लाख की फिल्म में हम अपना सत्तर लाख क्यों डालें’ जैसे जवाब इस संघर्ष की बहुत शुरुआत में ही मिल चुके हैं। वो उस दिन को याद करता है, जब एक बड़ी फिल्म प्रोसेसिंग लैब ने उसकी बरसों की मेहनत को लगभग नष्ट करने के बाद उससे पहला सवाल यही पूछा था कि कहीं आप किसी फिल्मी खानदान से तो नहीं? इन्हीं सारे वितरण से जुड़े झमेलों को याद कर वो लिखता है,

“अब तो यह जाना-पहचाना तथ्य है कि आज फिल्म बनाने से कहीं ज्यादा मुश्किल उसका वितरण है। मुझे यह फिल्म (शटलकॉक ब्वॉयज) पूरा करने में दो साल से ज्यादा लगे हैं और अब भी मुझे यह नहीं पता कि आखिर कब यह फिल्म इसके असल दर्शकों तक पहुंचेगी। वितरकों से तो मिलना ही मुश्किल है, शायद इसलिए कि मैं इस इंडस्ट्री के लिए एक बाहरी व्यक्ति हूं और मेरे पीछे कोई फिल्मी बैकग्राउंड नहीं। लगातार प्रयास के बाद जिन कुछ मीडिया कॉर्पोरेट्स से मैं मिल पाया, उन्होंने भी बड़ी विनम्रता से मेरी कोशिश को यह कहकर किनारे कर दिया कि न तो इसमें कोई स्टार है और न ही सिर्फ पैंतीस लाख में बनी फिल्म के वितरण में पैसे डालना कोई समझदारी है। स्वतंत्र वितरक भी चाहते हैं कि प्रिंट और पब्लिसिटी का पैसा मैं खुद करूं, जो इन हालातों में मेरे लिए संभव नहीं। तो हाल-फिलहाल फिल्म को एक सीमित स्तर पर भी प्रदर्शित कर पाने की लड़ाई जारी है।”

हेमंत अपनी अमरीका की नौकरी से जो कुछ बचाकर लाया था वो तो इस फिल्म में लगा दिया। दोस्‍तों, घरवालों का भी मन और धन यहां अटका है। लेकिन वो कोई धन कुबेर नहीं। उसका अगली फिल्म बनाने का सपना पूरी तरह इस फिल्म के प्रदर्शन पर टिका है।

ऐसे में देश भर में होने वाले तमाम छोटे-बड़े फिल्म महोत्सव हेमंत के लिए उम्मीद की किरण हैं। और ऐसे फिल्मोत्सवों की संख्या हिंदी की लघु पत्रिकाओं की तरह लगातार बढ़ रही है। यहां उसकी फिल्म को अपने दर्शक मिल सकते हैं। बेशक यहां पैसा नहीं है लेकिन यहां दर्शक फिल्म देखेगा और पसंद करेगा तो उससे फिल्म का नाम और आगे जाएगा। रास्ते ऐसे ही निकलते हैं। फिर हमें समझ आता है कि फिल्म दिखाने का कोई ठीक-ठाक मॉडल खड़ा कर पाना हिंदुस्तान में स्वतंत्र सिनेमा के भविष्य की राह में सबसे महत्वपूर्ण तथ्य है। वो हिमाचल का जिक्र करता है, यमुनानगर में फिल्म फेस्टिवल की बात बता आश्चर्य मिश्रित खुशी जाहिर करता है। मैं उसे गोरखपुर का पता बताता हूं। दोस्तियां कुछ और गाढ़ी होती हैं। कुछ हंसी-ठट्ठों भर में हम फिल्म को उसके दर्शक तक पहुंचाने के इस अनवरत चलते संघर्ष को साझा लड़ाई में बदल देते हैं।

डॉक्यूमेंट्री वाले इसका रास्ता अब वितरण भी अपने हाथ में लेकर निकाल रहे हैं। ‘डेल्ही फिल्म आर्काइव’ जैसा प्रयास दिल्ली के वृत्तचित्र निर्देशकों का एक ऐसा ही सम्मिलित प्रयास है, जो सिनेमा की शहर में उपलब्धता सुनिश्चित करने का माध्यम है। ‘मैजिक लैंटर्न फाउंडेशन’ भी ‘अंडर कंस्ट्रक्शन’ के बैनर तले सिनेमा के वितरण का काम शुरू कर चुकी है। खुद गोरखपुर फिल्म फेस्टिवल की टीम के पास अब पचास से ज्यादा फिल्मों के वितरण अधिकार हैं। अब तो फिल्‍म्‍स डिविजन भी अपने अधिकार की फिल्मों का वितरण करने लगा है। कई दुर्लभ फिल्में फिर सामने आयी हैं। मान्य धारणा है कि हिंदुस्तान में डॉक्यूमेंट्री में जो पैसा है वो बनाने के पहले है, बनाने के बाद उसे दिखाकर कोई पैसा नहीं कमाया जा सकता। शायद इस कारण भी यहां नये वितरण तंत्र को खड़ा करना मुश्किल तो है लेकिन जटिल नहीं। यह नये प्रयास अब इस प्रचलित धारणा को कुछ अंशों में बदल भी रहे हैं। लेकिन फीचर फिल्म का सिनेमाघरों में प्रदर्शन आज भी टेढ़ी खीर है। वहां खेल बड़े पैसे और पहचान का है। और इसके बिना कोई सेटेलाइट राइट्स भी खरीदने को तैयार नहीं। कई अच्छी फिल्में जैसे ‘खरगोश’, ‘कबूतर’ सिनेमाघरों का कभी मुंह नहीं देख पायीं। और ‘दायें या बायें’, ‘हल्ला’ जैसी फिल्में सही प्रचार और शो टाइमिंग न मिलने के अभाव में किस अकाल मृत्यु को प्राप्त हुईं, ये हम सब जानते हैं।

यह अनेक संभावनाओं वाला समय है। बहुवचन समय। यहां नकारात्मक बंजर जमीनों पर जिंदगी और सिनेमा को चाहनेवाले उम्मीदों के पौधे लगा रहे हैं। उन्हें बढ़ने के लिए खाद-पानी की जरूरत है। और उस पानी का सोता हम दर्शकों से होकर गुजरता है। तो आएं, अपने-अपने डीएसएलआर कैमरे निकालें और शाश्वत नियमों को झुठलाएं और इस कलकल पानी को उम्मीदों की क्यारियों में कैद करना शुरू करें।

mihir pandya(मिहिर पंड्या। दिल्‍ली विश्‍वविद्यालय में रिसर्च फेलो। हिंदी सिनेमा में शहर दिल्‍ली की बदलती संरचना पर एमफिल। आवारा हूं नाम से मशहूर ब्‍लॉग। उनसे miyaamihir@gmail.com पर संपर्क करें।)

मिहिर पंड्या की बाकी पोस्‍ट पढ़ें : mohallalive.com/tag/mihir-pandya

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