तानाशाहों के झूठ पर बेवकूफ भरोसा करते हैं…!!!

♦ तवक्कुल कारमान

यह कहना कि तीन औरतों – लीमा बोवी, एलेन जॉन्सन सरलीफ और तवक्कुल कारमान – को नोबेल शांति पुरस्कार मिला है, अधूरा सच है। पूरा सच यह है कि तीन माताओं को यह पुरस्कार मिला है। इनके बारे में पहले भी बहुत कुछ लिखा-कहा जा चुका है और अब भी लिखा जा रहा है। यह पुरस्कार अगर इन्हें नहीं मिला होता हो, तो इनकी जगह मानवाधिकारों के लिए लड़ने वाले ऐसे ही कुछ नाम होते। और यह बात महत्वपूर्ण नहीं कि इन्हें ही क्यों मिला और किसी और को क्यों नहीं। शांति और बुनियादी अधिकारों की लड़ाई में संजीदगी से लगे हर कार्यकर्ता को यह पुरस्कार मिला है। यह बात भी बहुत मायने नहीं रखती कि नोबेल पुरस्कारों के पीछे ‘खास राजनीति’ होती है। सवाल यह है कि जिनको नोबेल मिलता है, वे इसके हकदार हैं या नहीं। खैर, ये सारी बातें आने वाले दिनों में होती रहेंगी।

इस बार के पुरस्कार की खास बात यह है कि इसमें एक ऐसा नाम है जो पिछले कुछ सालों से पत्रकारों – खासकर महिला पत्रकारों – के अधिकारों के लिए एक तानाशाही के खिलाफ लड़ रही थी। लेकिन कुछ महीनों में उसके देश और आसपास के देशों में इतिहास का चक्र इस तेजी से घूमा कि तीन बच्चों की मां उस देश की ‘क्रांति की मां’ बन गयी। जब उसे नोबेल पुरस्कार दिये जाने की घोषणा की जा रही थी तब वह यमन की राजधानी स’ना में उस स्थान पर थी, जहां वह पिछले आठ महीने से लगभग हर रोज जाती है – परिवर्तन चौक जो यमनी तानाशाह अली अब्दुल्लाह सालेह के खिलाफ विरोध का केंद्र बना हुआ है।

32 साल की तवक्कुल कारमान ने नोबेल की खबर सुन कर कहा – ” यह पुरस्कार तवक्कुल के लिए नहीं है। यह यमन की जनता के लिए है, शहीदों के लिए है, सालेह और उसके गिरोह के खिलाफ लड़ाई के लिए है। यह अरब के लिए है। यह अरब की क्रांति के लिए है। इस पुरस्कार को मैं अरब क्रांति के कार्यकर्ताओं को समर्पित करती हूं। ” कारमान के बारे में, उसकी लड़ाई के बारे में और यमन की क्रांति के बारे में बहुत कुछ लिखा जा सकता है, लिखा गया है और लिखा भी जाएगा। लिखा भी जाना चाहिए। आज तवक्कुल का दिन है। आज उसका सुना जाए। आइए पढ़ते हैं, तवक्कुल का एक आलेख, जो उसने अप्रैल के पहले हफ्ते में लिखा था।

→ प्रकाश के रे

ट्यूनीशिया में 14 जनवरी को बेन अली के पतन के तुरंत बाद यमन में क्रांति की शुरुआत हो गयी। जैसा कि मैं हर प्रदर्शन से पहले करती हूं, मैंने फेसबुक पर लोगों का आह्वान किया कि ट्यूनीशिया विद्रोह का उत्सव मनाने के लिए 16 जनवरी को इकठ्ठा हों।

अगले दिन स’ना विश्वविद्यालय के छात्रों के एक समूह ने ट्यूनीशियाई दूतावास के सामने प्रदर्शन में हिस्सा लेने के लिए मुझसे कहा। वहां जमा लोग नारे लगा रहे थे – ‘बहादुरो! बुरे शासकों के विरुद्ध इस अग्नि-पंक्ति में हम तुम्हारे साथ हैं।’ हमारे साथ सुरक्षाकर्मी बहुत जोर-जबरदस्ती कर रहे थे, और हम गा रहे थे ट्यूनीशिया के विद्रोहियों के नारे – ‘अगर, किसी दिन, लोगों ने जीने की आकांक्षा कर दी, तो भाग्य उनका साथ देगा’, और ‘इस रात का अंत तो होना ही चाहिए’।

प्रदर्शन जबरदस्त था। हजारों लोग शरीक हुए। और स’ना में सत्ता के विरुद्ध यह पहला शांतिपूर्ण प्रदर्शन था। हम चीख रहे थे – ‘चले जाओ, इससे पहले कि तुम्हें भगाया जाए’।

उस रात मानवाधिकार कार्यकर्ता अहमद सैफ हाशिद और लेखक अब्दुल बारी ताहिर के साथ छात्र और युवा नेता मेरे यहां आये। हम लोगों में यह आम राय बनी कि इस ऐतिहासिक क्षण को हाथ से जाने नहीं दिया जाना चाहिए, और हम भी इस तानाशाही के खात्मे के लिए शांतिपूर्ण क्रांति की शुरुआत कर सकते हैं। हमने तय किया कि संभावित भयंकर दमन के बावजूद हम पीछे नहीं हटेंगे। सरकार के ठगों की हरकतों के बावजूद रोज-ब-रोज रैलियों की ताकत बढ़ने लगी।

हफ्ते भर के विरोध के बाद मुझे आधी रात को गिरफ्तार कर लिया गया। यमनी क्रांति का यह निर्णायक क्षण था – मीडिया में मेरी गिरफ्तारी की खबर आने के साथ ही देश के अधिकतर हिस्सों में विरोध-प्रदर्शन शुरू हो गये। इन प्रदर्शनों को छात्रों, सिविल सोसाइटी कार्यकर्ताओं और राजनीतिकों ने आयोजित किया था। भारी दबाव के चलते सरकार को 36 घंटे के भीतर मुझे महिला कैदियों के कारागार से, जिसमें मुझे जंजीरों में बांध कर रखा गया था, रिहा करना पड़ा।

रिहाई के बाद मैं प्रदर्शनों में हिस्सा लेती रही। यमन के अलग-अलग दलों-गुटों, जिसमें दक्षिण के लोग, उत्तर के हूथियून, कबीले, ट्रेड यूनियन, सिविल सोसाइटी के संगठन और सेना शामिल थे, को निवेदन किया गया कि वे छात्रों के शांतिपूर्ण प्रदर्शन में हिस्सा लें और इस सत्ता से पद छोड़ने की मांग करें। हमने उन्हें आपसी मतभेदों को भूलने के लिए प्रोत्साहित किया और इस बात के लिए निश्चिंत किया कि अली अब्दुल्ला सालेह के बिना यमन बेहतर होगा, कि यमनी लोग अपनी समस्याओं, जिनमें सा’दा की लड़ाई, दक्षिणी यमन का सवाल और आतंकवाद भी शामिल हैं, को खुद सुलझाने में सक्षम हैं। हमें भरोसा है कि हम कानून-व्यवस्था के साथ एक नागरिक शासन की स्थापना कर सकते हैं। यह क्रांति के पहले हफ्ते का संदेश था।

देश भर में, ता’ज, अदन, अल-हदिदा जैसी जगहों पर, तंबू गड़ गये, काहिरा के तहरीर की तर्ज पर। ‘आजादी और बदलाव के चौकों’ पर हजारों की तादाद में लोग जुटने लगे। समाज के सभी वर्गों की भागीदारी से क्रांति अब बस छात्रों का आंदोलन भर नहीं थी।

तो इस तानाशाही के खात्मे के बाद क्या होगा? हम अपने देश में बदलाव के पहले चरण में हैं, और क्रांतिकारियों का मानना है कि इस सत्ता के जाने के बाद यमन के लोग अपनी मुश्किलों का हल निकाल लेंगे क्योंकि ज्यादातर परेशानियों का कारण मौजूदा शासन ही है। बेहतर भविष्य के साथ एक नया यमन हमारा इंतजार कर रहा है। हम सच से आगाह हैं, लेकिन असलियत तो यह है कि अपने भेदभाव को किनारे रख कर मूलभूत मसले पर लोगों की एकजुटता से इस क्रांति ने सामाजिक शांति का माहौल बनाया है। यह कोई साधारण उपलब्धि नहीं है, जबकि अनुमानतः यमन में सत्तर मिलियन हथियार हैं।

बीते पांच सालों में मेरे देश ने छह युद्ध देखा है, लेकिन अभी लोगों की बंदूकें शांत हैं, उन्होंने शांतिपूर्ण परिवर्तन का रास्ता चुना है। सरकार ने सैकड़ों प्रदर्शनकारियों की हत्या की है लेकिन एक भी पुलिसवाला या सुरक्षाकर्मी लोगों के द्वारा नहीं मारा गया है। मा’रब जैसे सर्वाधिक हिंसात्मक और अराजक प्रदेश में भी पहली बार अहिंसक प्रदर्शन हो रहे हैं।

एक-दूसरे से दशकों तक लड़ते रहने वाले हिंसक कबीले ‘परिवर्तन चौकों’ पर साथ खड़े हैं, खूनी संघर्ष बिसार दिया गया है। घात लगाकर पचास से अधिक प्रदर्शनकारियों को मारने और हजार से अधिक को घायल करने वाले बंदूकधारी हत्यारों को युवाओं ने धर दबोचा लेकिन क्रोध और आक्रोश के बावजूद उन्हें नुकसान नहीं पहुंचाया। यह क्रांति के शांतिपूर्ण स्‍वरूप का परिचायक था।

पहली बार दक्षिण के लोगों ने यमन से अलग होने की मांग करना बंद कर दिया, राष्ट्रीय झंडे को हाथ में लिया और तानाशाही खत्म करने की आवाज लगायी। देश गोलियों और आंसू-गैस की जगह रैलियों और धरने के रास्ते, नागरिक अवज्ञा और नारों के द्वारा इस सरकार से मुक्ति के लक्ष्य में एक साथ है।

हम आश्वस्त हैं कि हमारी क्रांति सफल हो चुकी है और सालेह की सत्ता असलियत में अपना असर खो चुकी है। यह वह सत्ता है जिसने पिछले 33 सालों से हिंसा और हरामखोरी से शासन किया है। आवश्यकता पड़ने पर महीनों तक चौकों पर डटे रहने की हमारी जिद, और शासन की बंदूकों के सामने सीना खोल कर खड़े होने वाले युवाओं के कारण हमने इस तानाशाही को घुटने टेकने पर मजबूर कर दिया है। राजनेताओं और सैनिकों के हमारे पक्ष में होने से हमारी सफलता अभी और आगे बढ़ेगी।

अल-कायदा और अतिवाद के बहाने को हमारे देश में चल रहे ऐतिहासिक बदलाव के रास्ते का रोड़ा नहीं बनने देंगे। सालेह सत्ता से चिपके रहने के लिए यह धमकी इस्तेमाल कर रहा है, जैसे कि देश में स्थायित्व लाने और आतंकवाद से लड़ने में वही सक्षम है। उसके झूठ पर भरोसा करना बेवकूफी होगी।

हम इस बात को समझें कि यमनी क्रांति ने युद्ध और संघर्षों से परेशान देश में आतंरिक स्थायित्व स्थापित कर दिया है। मैं पूरी दुनिया से निवेदन करती हूं कि वह इस शांतिपूर्ण क्रांति का समर्थन करे जैसा कि उसने ट्यूनीशिया और मिस्र में किया। मैं अमरीका और यूरोपीय संघ से निवेदन करती हूं कि वे लोगों की मांग को मानते हुए सालेह को पद छोड़ने के लिए कहें। उन्हें इस तानाशाही को दिया जाने वाला समर्थन रोक देना चाहिए, खासकर वैसी मददें जो लोगों को शांतिपूर्ण विरोध को कुचलने में इस्तेमाल की जा रही हैं – आंसू गैस के गोलों पर ‘मेड इन अमरीका’ लिखा हुआ होता है। उन्हें सालेह परिवार और उनके गुर्गों की संपत्तियां जब्त कर लेनी चाहिए तथा उन्हें यमनी लोगों को लौटा दिया जाना चाहिए।

अगर अमरीका और यूरोपीय संघ ईमानदारी से लोगों के साथ हैं, जैसा कि उनका दावा है, तो उन्हें हमारे शांतिपूर्ण क्रांति से धोखा नहीं करना चाहिए। यह यमन की बहुसंख्यक जनता की जनवादी आकांक्षा की अभिव्यक्ति है।

(अनुवाद और प्रस्‍तुति : प्रकाश कुमार रे। सामाजिक-राजनीतिक सक्रियता के साथ ही पत्रकारिता और फिल्म निर्माण में सक्रिय। दूरदर्शन, यूएनआई और इंडिया टीवी में काम किया। फिलहाल जेएनयू से फिल्म पर रिसर्च। उनसे pkray11@gmail.com पर संपर्क कर सकते हैं।)

You may also like...

Leave a Reply

Your email address will not be published. Required fields are marked *