चिट्ठी न कोई संदेश, जाने वो कौन सा देश … [tribute]

♦ अमृता अय्यर

र्द की गहराइयों से उभरती आवाज जो आज हमेशा के लिए चुप हो गयी। चुप हो गयी एक दर्द भरी दास्तान भी। शायद ही कोई जानता होगा कि कि अपनी आवाज और दूसरों के दर्द से रिश्ता बनाने वाले जगजीत सिंह का खुद दर्द से कितना गहरा रिश्ता था। जगजीत सिंह लोगों के लिए एक मखमली आवाज के मालिक, एक गायक की तरह ही थे जिनकी आवाज में लोग खुद के दर्द को ढूंढते थे, पर जगजीत जी इससे परे भी एक शख्‍सीयत थे, जिसने अपने दर्द को ही नहीं, औरों के दुःख को भी समेटा था।

श्रीगंगानगर, राजस्थान में जन्मे जगजीत सिंह का हमसे आपसे रिश्‍ता तभी बन गया, जब वो मुंबई अपने भाग्य को आजमाने आये थे। ये दौर था 1965 का। वहीं उन्‍हें उनकी जिंदगी, उनका प्‍यार मिला। चित्रा सिंह। [भले ही उस समय मैं पैदा नहीं हुई थी, पर उनकी कहानियों, उनकी आवाज से मैं बचपन से ही जुड़ गयी थी।] चित्र जी इस समय खुद के आतीत से लड़ रही थीं, ऐसे में जगजीत जी का आना उनके जीवन के लिए एक नया सवेरा हुआ। शायद अपने इस गीत “तुम इतना जो मुस्कुरा रहे हो क्या गम हो जिसको छुपा रहे हो” की गहराइयों से ही जगजीत सिंह जी ने चित्रा जी के दर्द को समझने की कोशिश ही नहीं, उनके दर्द को समेटने की इजाजत भी मांगी होगी।

चित्रा जी के दर्द को खुद में समेट कर उनकी आवाज का रूमानी एहसास और गहरा गया। ‘साथ-साथ’ मूवी का यह गीत “ये तेरा घर ये मेरा घर, किसी को देखना हो गर, तो पहले आके मांग ले तेरी नजर मेरी नजर…” जैसे शायद चित्रा जी और जगजीत जी की प्रेम कहानी का शाब्दिक वर्णन हो गया। इस गीत को सुनना मेरे लिए दीप्ति नवल या फारुख शेख को देखना नहीं होता था, इस गीत के साथ मैंने हमेशा जगजीत जी और चित्रा जी को महसूस किया है। सिमटते दुःख और गहराते संबंधों के साथ हर पल जगजीत सिंह जी आपने प्रशंसकों से जुड़ते गये। जुड़ते गये मेरे जैसे कुछ लोग।

जीवन के उतार-चढ़ाव से लगते उनके गीत के साथ जगजीत सिंह के जीवन की एक घटना ने मुझे दिल की गहराइयों से उनके साथ जोड़ दिया। ये घटना थी जुलाई, 1990 में उनके पुत्र की आकस्मिक मृत्यु। उनके प्रशंसकों के लिए दुखद समाचार। पुत्र की मृत्यु के बाद बिखर गयी चित्रा जी को फिर से समेटा होगा जगजीत सिंह जी ने … पर कैसे समेटा होगा खुद को जगजीत सिंह जी ने? इस घटना के बाद चित्रा जी का फिर से गायकी से जुड़ना संभव न हुआ, पर जगजीत जी ने खुद को इसके लिए तैयार किया क्‍योंकि उन्हें अपने प्रशंसकों के लिए जीना था, गाना था। मैंने खुद को उनकी जगह रख कर महसूस किया, दर्द महसूस हुआ पर वो जज्बा नहीं ला सकी जो जगजीत सिंह जी ने खुद हर दर्द से निकलने में दिखाया। हम अपने दर्द को जाने अनजाने दिखा ही देते हैं, पर जगजीत सिंह जी ने छुपा लिया हर दर्द को, हर तरह से। 1998 में प्रदर्शित दुश्मन मूवी के गीत “चिट्ठी न कोई संदेश, जाने वो कौन सा देश जहां तुम चले गये” में मुझे उनका दर्द दिखा और लगा कि इस गीत की रेकॉर्डिंग के समय जगजीत जी ने विवेक (जगजीत जी के दिवंगत पुत्र का नाम) को सामने देखा होगा और अपने हर दर्द को इस गीत में पिरो दिया होगा। तभी आज भी इस गीत को सुन कर मेरी आंखों से आंसू निकल आते हैं।

समय के चलते जगजीत के घाव भर तो गये होंगे, पर टीस तो हर पल रही होगी। हर दर्द को छुपा कर जब वे कोई प्रेम गीत गाते, तो बस दिखती चित्रा और उनके अटूट प्रेम कि झलक। साल दर साल, पल हर पल प्रशंसकों से उनका लगाव गहराता गया। मैं शायद उनके हर पल से नहीं जुड़ी हूं, पर मैं उनके हर दुःख से जरूर जुड़ी हूं। उनके गीतों में खुद को ढूढ़ते हुए कब मैंने उन्हें ढूंढा मुझे पता ही नहीं चला। सुना था पर आज महसूस किया है कि जो हमारे दिल के करीब होता है, उसके होने का एहसास हर पल न हो पर उसे खोने के बाद उसके न होने का एहसास हर पल महसूस होता है।

जगजीत जी के जीवन के एक और दुःख ने मुझे उनके जीवन का हिस्सा ही बना। ये था 2009 में उनकी और चित्रा जी कि पुत्री (चित्रा जी के पूर्व विवाह से) का आत्महत्या करना। फिर से अंतहीन दुःख। फिर से एक सदमा। …और फिर जगजीत जी ने चित्रा को संभाला। इतना दुःख कैसे बर्दाश्त किया होगा आपने? कैसे हर बार संभाला होगा खुद को? और हम बस जान पाये एक महान गायक को। नहीं ये कम है उनके लिए। बहुत कम है … आपके दुःख को महसूस करते-करते, खुद को महसूस कर रही हूं, महसूस कर रही हूं कि हमने क्या खोया है … मैंने क्या खोया है, ये कहने का आधिकार नहीं है मुझे … पर आपके हर गीत में आपको महसूस करने का अधिकार है मुझे।

सुना था कभी कि हर कलाकार अपनी किसी एक कृति में अपने आपको ढालता है। आपके इस गीत में आपके जीवन का दर्द उभर आया … “जग ने छीना मुझसे, मुझे जो भी लगा प्यारा, सब जीता किये मुझे से, में हरदम ही हारा” … पर आप हारे नहीं थे अपने दर्द से। आप हर बार जीते थे … और आज भी मृत्यु की जीत के भ्रम को कायम रखते हुए भी जीते हैं, अपनी कभी न भूल पाने वाली आवाज का तोहफा हमें दे कर … अपने गीतों के साथ हमारे जीवन में … हमारे अंत तक!

(अमृता अय्यर। पत्रकारिता व अर्थशास्‍त्र में स्नातकोत्तर डिग्री। राजश्री टंडन मुक्त विश्वविद्यालय से पत्रकारिता पर फिलहाल शोध। उनसे mauli1503@gmail.com पर सपंर्क किया जा सकता है।)

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