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बात निकलेगी तो फिर दूर तलक जाएगी… [tribute]

10 October 2011 3 Comments

♦ शशि कुमार झा

गजलों को अपनी डूबी डूबी सी गहरी आवाज के दर्द में पिरोने वाले जगजीत सिंह का आज इंतकाल हो गया। हम सब शोकाकुल हैं। मोहल्‍ला लाइव की आप सबसे गुजारिश है कि आपकी जिंदगी में जगजीत सिंह के मायने क्‍या रहे हैं, हमसे साझा करें। शब्‍दों, वाक्‍यों की बंदिश नहीं है – आपकी भावनाएं जितने में व्‍यक्‍त हो सके। बातों बातों में सबसे पहले शशि भाई ने कुछ बातें शेयर की हैं, बेहद अनौपचारिक रूप से। आप सबकी नज्र : मॉडरेटर

र्ष 2005 में पाकिस्तानी युवाओं की एक टीम दिल्ली आयी थी। इंडो-पाक यूथ असेंबली ऑर्गेनाइज किया गया था, जिसका मैं इंडिया कॉर्डिनेटर था। उस कार्यक्रम में मुख्य अतिथि थे सुनील दत्त जो तत्कालीन खेल और युवा मामलों के मंत्री थे। मंच संचालन के अतिरिक्त मैंने जगजीत की गायी नज्म ‘बात निकलेगी तो फिर दूर तलक जाएगी’ गायी थी।

दत्त साहब ने मुझे गले लगाकर मेरी पीठ थपथपायी थी। आज भी उसे याद कर उसकी ऊष्मा से रोम सिहर उठता है और रोमांचित हो जाता हूं। उस कार्यक्रम में कराची (पाकिस्तान) से आये एक मित्र शामिल शम्स जगजीत सिंह के एक बहुत बड़े फैन थे और उन्होंने लंबे समय तक मुझे जूनियर जगजीत सिंह कह कर बुलाया। शामिल शम्स आजकल डॉयची बेले में संपादक और ब्रॉडकास्टर हैं और आज भी जगजीत सिंह के उतने ही बड़े फैन हैं।

इसके बाद तो यह नज्म मेरी सिगनेचर नज्म बन गयी जैसे। आईआईएमसी के दिनों में मैंने दसियों दफा क्लास में अपने मित्रों और फैकल्टी मेंबरानों के बीच इसे गाया होगा क्योंकि फरमाइश ही इसी की आती थी। आज भी इन मित्रों की पार्टियों में मुझसे इसे गाने की फरमाइश की जाती है। इसके अलावा भी यदि कुछ सुनाने की फरमाइश होती है तो ज्यादातर जगजीत सिंह की ही।

उनकी ज्यादातर गजलें मेरे कंप्यूटर की हार्ड ड्राइव में मौजूद हैं, जिन्हें यदा कदा सुनता ही रहता हूं। जगजीत सिंह की वजह से कॉलेज के दिनों में और बाद में भी मुझे कई अच्छे दोस्त मिले। उनमें लड़कियों की तादाद ज्यादा है, जिनसे मुझे बहुत कुछ सीखने-समझने को मिला।

लेकिन हममें से ज्यादातर की जिंदगी में कमोबेश यह सब होता है और इसमें कुछ भी अनूठापन नहीं है जिसे साझा किया जा सके…

[ हाल के दिनों में हालांकि मेरा झुकाव सुगम और शास्त्रीय संगीत के अन्य गायकों की ओर ज्यादा हुआ है। जगजीत सिंह थोड़े मोनोटोनस लगने लगे थे। फिर भी हमेशा ही उनकी कुछ रेयर रिकॉर्डिंग्स सुनना मुझे अच्छा लगता था। उनकी गायी हुई शुरुआती बहुत सी गजलें, जो बहुत पॉपुलर नहीं हैं, मुझे बेहद पसंद हैं। ]

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(शशि कुमार झाडेमोक्रेसी कनेक्ट में विश्‍लेषक। बीबीसी जैसी संस्‍थाओं से जुड़े रहे। इंटरनेट पर हिंदी को जमाने में भी बड़ा हाथ रहा। डीयू से आईआईएमसी तक राजनीति और पत्रकारिता की पढ़ाई की।
वक्‍त मिले तो शशि के ब्‍लॉग अष्‍टावक्र पर भी जाएं। उनसे avyaktashashi@gmail.com पर संपर्क किया जा सकता है।)

3 Comments »

  • चण्डीदत्त शुक्ल said:

    बहुत-से बर्फ पिघले थे, कई बाक़ी हैं अब तक
    हमारे होंठों पे तारी है उदास मुस्कुराहटों के रंग
    बहुत याद आती हैं, कागज़ की कश्तियां
    बारिशों के पानियों में, तुम्हारी आवाज़ की छपाक़…
    जब दर्द ज़िंदा है, है तड़प की तासीर हाज़िर…
    मोहब्बतों के जख़्म बाक़ी हैं और बिछोह की टेर भी जारी…
    बहुत नाराज़ हूं तुमसे…अकेला छोड़ क्यों चल दिए जगजीत? …

    मेरी मोहब्बत, दर्द, चाहत, ज़ुदाई… सब के हमराज़, तुम्हें श्रद्धांजलि…!

  • anchit said:

    कहते हैं कि सब से अच्छा मित्र वो है जो दर्द में और तन्हाई में साथ देता है.जब से जगजीत सिंह की आवाज़ मिली,तन्हाई का वो साथी मिल गया जो हर अँधेरे में साथ होता है.आज वो तन्हाई का साथी तनहा कर गया है.इस भाग-दौड़ में जो एक सुकून साथ चलता था,वो कहीं खो गया.
    उनके जाने से ऐसा लगता है बचपन चला गया है.

    धक्का सा है
    तुम्हारा यूँ उठ कर चले जाना.
    तुम्हारी आवाज़ की संवेदना में ही
    ये वेदना बस बंध सकेगी.

    बहुत याद आओगे
    जब पहली बार किसी को इश्क होगा,
    जब कोई तड़प उठेगी.
    बहुत याद आओगे
    जब बचपन रोयेगा,
    जब जवानी एहसासों को लोकगी.
    जब पानी बरसेगा,
    जब शाम ढलेगी.
    बहुत याद आओगे,जब तन्हाई होगी.

  • रोहित said:

    पिछले दो दिनों से ‘ग़ालिब’ के साथ हूँ… ‘मिर्जा ग़ालिब’ (गुलज़ार द्वारा निर्देशित सीरियल) के १७ एपिसोड कई बार देख चूका हूँ…..अजीब मनःस्थिति में हूँ….अभी-अभी खबर मिली है कि ‘जगजीत’ भी ‘पूरे’ हो गए… सोचता हूँ क्या ‘मिर्ज़ा ग़ालिब’ के बगैर पूरे हो पाते कभी वो…?

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