टोरेक्स कफ सिरप है, तो अलविदा खांसी … [Tribute]
♦ विनीत कुमार
जगजीत सिंह नहीं रहे। इस खबर को सुनने के बाद मेरे दिमाग में सबसे पहली पंक्ति आयी – टोरेक्स कफ सिरप है तो अलविदा खांसी। खांसी का मौसम तो अभी शुरू ही हुआ है, नये सिरे से टोरेक्स कफ सिरप की बिक्री और विज्ञापन का दौर अभी शुरू ही हुआ है कि उससे पहले ही इस सिरप को लेकर दावे करनेवाला शख्स हमारे बीच से चला गया। जगजीत सिंह के लाखों कद्रदानों के लिए ये अफसोस और एक हद तक नाराज हो जाने तक की भी बात हो सकती है कि जिस शख्स ने जिंदगी और मौत के बीच लगभग सारे मनोभावों और अनुभूतियों को स्वर दिया, उसके गुजर जाने के ठीक बाद हम जैसों को टेलीविजन में ही सूचना, ज्ञान, आनंद, एक हद तक जीवन और इजहार के शब्द खोजनेवाले फटीचरों को उनकी कोई गजल की पंक्ति या नज्म याद आने के बजाय खांसी दूर करने के विज्ञापन याद आते हैं। आज इस सिरप कंपनी ने टेलीविजन चैनलों पर जगजीत सिंह को जमकर श्रद्धांजलि दी और उसी तरह से याद किया, जैसे उनके शागिर्द याद कर रहे हैं। ये बाजार के बीच से पैदा होनेवाली नयी किस्म की संवेदनशीलता है, जो कि अपने ब्रांड एंबेस्डर के गुजर जाने के बाद, मातम के बीच भी संभावना की तलाश करती है।
पता नहीं अब जबकि जगजीत सिंह नहीं रहे, उनकी गायकी पर टोरेक्स कंपनी कितना भरोसा करती है, दर्शक इस भरोसे से अपने को कितना जोड़ पाते हैं और इस विज्ञापन के प्रति मिथक और पौराणिक कथा जैसी श्रद्धा पैदा कर पाती है कि नहीं? लेकिन अगर टेलीविजन के विज्ञापन दर्शकों को उपभोक्ता में तब्दील करके बाजार तक पहुंचाने की एजेंसी होने के साथ-साथ, इसका संबंध अलग-अलग क्षेत्रों में प्रभावी व्यक्तित्व और भावनात्मक ट्रेंड को शामिल करने से भी है, तो यकीन मानिए कि कुछेक सालों से जगजीत सिंह के टेलीविजन पर बने रहने की ठोस वजह टोरेक्स कफ सिरप का विज्ञापन रहा है। विज्ञापन की शक्ल में ही सही, उनकी ये मौजूदगी लाखों टीवी दर्शकों को ये बताती रही कि वो इस देश के न केवल सबसे बड़े गजलकार हैं बल्कि उनकी गायकी हर दौर और उम्र के लोगों के बीच प्यार करने और होने की संभावना को जिंदा रखती है। नहीं तो न्यूज चैनलों के लिए जगजीत सिंह की गायकी और जिंदगी में ऐसा कुछ भी नहीं था, जिसके बीच से खबर पैदा की जाती, पैकेज और फिर टीआरपी के बताशे बनाये जाते, उनके अलबमों का भी इस तरह से प्रोमोशन नहीं हुआ करता कि शुक्रवार की शाम रियलिटी शो में जाकर कलाकार ऑन डिमांड बन जाते। ले-देकर ये एक अकेला कफ सिरप का विज्ञापन था, जिसने कि सास-बहू सीरियलों से लेकर “क्या एलियन गाय का दूध पीते हैं” और “तेरी मां की… [बीप]” से होकर गुजरनेवाले हर दूसरे रियलिटी शो और उनके दर्शकों के बीच जगजीत सिंह की मौजूदगी को बनाये रखा। जगजीत सिंह की आवाज और गले के प्रति भरोसा अगर टोरेक्स जैसी कफ सिरप के विज्ञापन के जरिये ही बरकरार रह पाती है, तो ये बाजार और विज्ञापन की तिकड़मी चाल हो सकती है और है भी लेकिन टेलीविजन के जरिये जगजीत सिंह को याद रखने का इसके अलावा और कौन सा विकल्प रह जाता है?
उनकी मौत पर इस प्रसंग को उठाना इसलिए भी जरूरी है कि जिस तरह से चैनलों ने उनकी याद में स्पेशल प्रोग्राम से लेकर खबरों का प्रसारण किया, उससे स्पष्ट हो गया कि पॉपुलरिटी के दावे और प्रसारण के बीच टेलीविजन के खुद के दावे कितने खोखले हैं?
न्यूज24 नाम के चैनल ने अपने कार्यक्रम का नाम दिया – जगजीत सिंह की कहानी, जगजीत सिंह की जुबानी। चैनल ने बड़े शान से बार-बार फ्लैश चलाया – टेलीविजन पर पहली बार। सवाल है कि अगर जगजीत सिंह की कहानी स्वयं उनकी जुबानी टेलीविजन पर पहली बार आया, तो ये टेलीविजन या किसी चैनल के लिए गा-गाकर बताने की बात है या फिर डूब मरने की? अव्वल अगर ऐसा कोई पहला कार्यक्रम नहीं होगा, तो चैनल खुद ही झूठ बोल रहा है और सच भी है, तो क्या चैनल के लिेए इस गजलकार की मौत का मतलब दावे और सट्टे लगाने भर के लिए है? मनोरंजन की खबरों से अटे पड़े चैनलों के बीच हम ऐसे ही मौके पर समझ पाते हैं कि मुख्यधारा के नाम पर पनपनेवाले मीडिया मशरूमों ने पॉपुलरिटी के नाम पर क्या किया है? जिस गजलकार को सुनते हुए कम से कम तीन पीढ़ियों के बीच के लोग जवान और बूढ़े होते रहे, इन चैनलों ने उस लोकप्रियता को अपने से बिल्कुल बेदखल कर दिया और लोकप्रियता के नाम पर जो गायक, गीत और गजलें शामिल की जाती रही हैं, वो विशुद्ध रूप से वितरण और प्रोमोशन के बीच की धंधेबाजी का हिस्सा रही है। आज जिस गजलकार के लिए एक तरफ लगभग सारे न्यूज चैनल बता रहे हैं कि उनकी मौत से पूरा देश सदमे है, वहीं दूसरी तरफ एक चैनल ये भी दावे कर रहा है कि उनकी जुबानी पहली बार उनकी कहानी पेश की जा रही है। यह तो अपने ही भीतर के भौंड़ापन को उघाड़कर सामने रख देने काम हुआ, जिसके व्यक्तिगत स्तर पर उपलब्धि होने के बावजूद टेलीविजन के लिए शर्म से सिर झुका लेनेवाली बात है। इस दावे ने ये स्पष्ट कर दिया कि टेलीविजन ने जगजीत सिंह को पॉपुलर नहीं बनाया जो कि आज उनकी मौत की खबर को बेशर्मी से हथियाने में जुटा है। उनके लगभग सभी कार्यक्रमों में वो आधार और विश्लेषण सिरे से गायब है, जिसने जगजीत सिंह को इतना अधिक पॉपुलर बनाया, जिसके लिए सीएनएन-आइबीएन ने गजलजीत सिंह का प्रयोग किया।
जगजीत सिंह मुख्यधारा मीडिया और सिनेमा से कहीं ज्यादा कैसेट(बाद में सीडी) के जरिये लोगों के बीच लोकप्रिय हुए। पीटर मैनुअल ने अपनी किताब “कैसेट कल्चरः पॉपुलर म्यूजिक एंड टेक्नलॉजी इन नार्थ इंडिया” में संस्थानों, व्यवस्थित मंचों से अलग संगीत के पॉपुलर होने के जिन तर्कों की चर्चा की है, उसके हिसाब से कैसेट ने मुख्यधारा मीडिया के समानांतर एक मजबूत माध्यम का काम किया। जगजीत सिंह की गजलें अगर आकाशवाणी की सत्ता की छन्नी से छनकर आती, तो शायद बीच में ही अटक कर रह जाती या फिर जगजीत सिंह पहुंच के स्तर पर दुर्लभ गजलकार करार दिये जाते। इस हिसाब से देखें, तो जगजीत सिंह यदि घर-घर और लाखों जोड़ी कानों के बीच पहुंचे हैं तो उसकी बड़ी वजह इसी समानांतर माध्यमों का योगदान रहा है। यह अलग बात है कि अलग-अलग दौर में इस माध्यम का रूप बदल गया। आकाशवाणी ने देश की संस्कृति का विस्तार करने का जो जिम्मा अपने ऊपर लिया था, उसमें एक तरफ शुद्धतावादी आग्रह (जो कि पॉपुलरिटी के खिलाफ जाती थी) और दूसरी तरफ व्यावसायिक हितों की रक्षा के लिए फिल्मी गीतों के प्रसारण ने संगीत की दुनिया के भीतर किस तरह की सड़ांध पैदा की, वो कल के न्यूज24 के दावे की तरह ही आगे भी खुलकर सामने आते रहेंगे। केशवचंद्र शर्मा ने रेडियो पर लिखी किताब “शब्द की साख” में चर्चा भी की है लेकिन इतना तो तय है कि गजल की दुनिया में जो पॉपुलरिटी जगजीत सिंह की बन रही थी, उसमें बहुत बड़ा हाथ रेडियो जैसे पॉपुलर माध्यम से कहीं ज्यादा कैसेट के कारण रहा। नब्बे के मध्य तक आते-आते जो रेडियो बुरी तरह लड़खड़ाता चला गया, उस वक्त कैसेट और आगे चलकर सीडी और डीवीडी ने ही ऐेसे गजलकारों को एक पीढ़ी से दूसरी पीढ़ी तक ट्रांसफर किया। हां, यह बात जरूर है कि इस कैसेट और सीडी इंडस्ट्री में भी कम झोलझाल नहीं था लेकिन कम से कम लोगों तक गजलों की पहुंच बन जाया करती थी।
अब जबकि एफएम रेडियो के आने के बाद से म्यूजिक ट्रैक को लेकर जो नये किस्म की धंधेबाजी, जिसे कि आप संगीत की दुनिया में माफियाराज का कायम होना कह सकते हैं, उसमें एक बार फिर से वही बर्बरता कायम हो गयी, जो कि कभी आकाशवाणी के जमाने में थी। फर्क सिर्फ इतना है कि आकाशवाणी की बर्बरता राजनीतिक और सत्ता की हैसियत के आधार पर कायम थी, अब एफएम चैनल पूरी तरह पैसा आधारित हो गये हैं। ऐसे में जगजीत सिंह की गजलें छोटे शहरों के एफएम पर या फिर वितरण से बाहर के गणित की गजलें नहीं बजती हैं, तो इस माफियाराज के संगीत की दुनिया का ही कारनामा है, लोग पसंद नहीं करते का तर्क नहीं है। ऐसे में एक बड़ा अफसोस तो रहेगा ही कि जीते जी जगजीत सिंह ने अपने उन कद्रदानों के लिए इस लिहाज से कोई लड़ाई नहीं लड़ी, जो उन्हें थोड़ा सुनकर आनंदित तो होते रहे, उनके कद को बड़ा करते रहे लेकिन जो इस नये संगीत माफियाराज के हाथों धीरे-धीरे बेदखल भी होते रहे। यूट्यूब की उम्मीद पर पलनेवाली मनोरंजन की दुनिया से इस तबके के लोग तो और भी अनजान और संसाधन के स्तर पर असमर्थ हैं। वैसे कहने को तो यह जरूर कहा जाएगा कि जगजीत सिंह की पॉपुलरिटी में हमेशा से समानांतर मीडिया ने बड़ा योगदान दिया जो कि अब यूट्यूब तक आकर ठहरती है। आगे दूसरे माध्यमों के विकास के बाद वो जगजीत सिंह को कितना आगे ले जाते हैं, यह देखना बाकी होगा।
सवाल है कि कैसेट संस्कृति के बीच से लोकप्रिय होनेवाले जगजीत सिंह ने गजल की दुनिया में आखिर क्या कर दिया कि गजल सुनने और न सुननेवालों के बीच की विभाजन रेखा खत्म होती जान पड़ती है। मतलब ये कि जो अटरिया पे लोटन कबूतर रे और ए स्साला, अभी-अभी हुआ यकीं (जेड जेनरेशन) सुननेवाला भी शाम से आंख में नमी सी है गुनगुनाता है और वो इस बात का दंभ नहीं भरता कि गजल सुन और गुनगुना रहा है बल्कि जगजीत सिंह को सुन और गुनगुना रहा है? चैनलों पर रजा मुराद की बाइट चली, “पूरी दुनिया में गजलों को जो लोकप्रियता मिली है वो दरअसल जगजीत सिंह की बदौलत मिली है। पहले गजलों में इतने मुश्किल अल्फाज हुआ करते थे कि आमलोगों के सिर के ऊपर गुजर जाते थे… गजल ने जगजीत सिंह को नहीं नवाजा है बल्कि जगजीत सिंह ने गजल को नवाजा है…” (स्टार न्यूज)। रजा मुराद की बात से स्पष्ट है (जिसकी लड़ाई आकाशवाणी और दूरदर्शन में जमकर चली कि क्या बेहतर संगीत, संस्कृति और कला है और क्या नहीं है) कि गजल को उच्च संस्कृति के तौर पर स्थापित करने की रवायत रही है, जिसका विस्तार गाने और सुननेवाले दोनों में क्रमशः एक खास किस्म के श्रेष्ठताबोध के पनपने का कारण रहा। आज भी आप तथाकथित पढ़े-लिखे समाज के बीच अभिरुचि को लेकर बात करें तो लोग गजल को प्राथमिकता के तौर पर शामिल करते हैं, जिसमें कई बार संभव हो कि ये स्टेटस सिंबल से ज्यादा कुछ नहीं होता। जगजीत सिंह ने गजल को लेकर इस श्रेष्ठताबोध और अकड़ को काफी हद तक खत्म किया और वही इनकी लोकप्रियता का आधार बना। जगजीत सिंह को सुननेवालों में इस बात की न तो कभी हेठी रही कि वो टिप्प-टिप्प बरसा पानी जैसे फिल्मी गानों से कुछ महान सुन रहा है और न ही इस बात को लेकर कभी कुंठा रही कि अगर वो मेंहदी हसन, गुलाम अली और बाकी दूसरे दुर्लभ और मंहगे कंसर्ट/सीडी में उपलब्ध होनेवाले गजलकारों को नहीं सुन रहा है तो गजल के नाम पर गजल का डुप्लीकेट सुन रहा है। उनकी गायकी ने कभी सुननेवालों से दुराग्रह नहीं किया कि तुम भाषा, सोच, चिंतन और ग्राह्यक्षमता के आधार पर खास हो सकोगे, तभी मुझे सुन सकोगे। वो दरअसल जगजीत सिंह को सुन रहा है, उसे चाहे जो भी नाम दिया जाए। कोई विधा किसी व्यक्ति का इस तरह पर्याय बन जाए, तो उसकी लोकप्रियता की जड़ें गंभीरता से खोजी जानी चाहिए।
विनोद दुआ लाइव की टेक रही कि चूंकि जगजीत सिंह की गजलों में नैस्टॉल्जिया है, इतिहास है और जिंदगी है इसलिए लोगों के बीच इस तरह से पॉपुलर है। यह बात लोकप्रियता के उसी आधार का विस्तार है, जहां गजल मनोरंजन के नाम पर कोई सत्ता बनने के बजाय लोगों को अपने-अपने तरीके से जोड़ने का जरिया बनती है। ये कम दिलचस्प बात नहीं है कि दो अलग-अलग पीढ़ी के लोगों के बीच प्रेम, रिश्ते, परिस्थितियों के बीच अलग-अलग अनुभव रहे हैं लेकिन उसका इजहार सटीक तौर पर जगजीत सिंह की उसी गजल से हो जाया करती है। ये साहित्य की तरह कालजयी होने का फार्मूला नहीं है बल्कि अनुभूति की उस लघुतम ईकाई को छू लेने की क्षमता है जो पीढ़ी दर पीढ़ी बदलते जाने के बावजूद भी बरकरार रहती है। यदि ये संगीत और मनोरंजन के स्तर पर गजलों के भीतर लोकतांत्रिक स्पेस का विस्तार है तो वही उच्च और निम्न सांस्कृतिक रूपों और झगड़ों को शांत करने की एक मुक्कमल कोशिश भी।
स्टार न्यूज की रिपोर्ट लोकप्रियता के इस आधार को थोड़ा और आगे ले जाकर सामाजिकता से जोड़ती नजर आयी। उसके हिसाब से जगजीत सिंह के कारण गजलें पहली बार माशूका की जुल्फों से निकल कर घर की देहरी में प्रेवश करती हैं और तब उसमें प्रेम के अलावा पारिवारिक जीवन के अनुभव, दर्द और सुखद क्षण शामिल होते हैं। स्टार न्यूज ये बात भले ही “ये तेरा घर – ये मेरा घर” जैसे गीतों के भावार्थ पेश करने के तौर पर कह गया और बाकी के चैनल भी उनकी पंक्तियों की गद्य़-शक्ल हमारे लिए पेश कर गये हों लेकिन नब्बे के दशक के पहले की पीढ़ी को नैस्टॉल्जिया से हटकर इस सिरे से विश्लेषण करने की दिशा में तो जरूर प्रेरित करता है कि अनुभूति की वो कौन सी लघुतम ईकाई है, जिसे पकड़कर जगजीत सिंह इतने दिलों पर राज करते आये। खय्याम के शब्दों में कहें तो दिल को जीतते रहे। चैनल इस मौके पर तो उनकी गजलों, गीतों को उठा-उठाकर अपनी भद्दी वॉइसओवर के साथ पेश करते ही रहेंगे। आज रात तक अधिकांश चैनल अपने कार्यक्रमों को दूरदर्शन की रंगोली की शक्ल देते ही रहेंगे लेकिन उच्च और निम्न संस्कृति के झगड़े और मनोरंजन की दुनिया में माफियाराज कायम होने की स्थिति में हमारा कलाकार किस हद तक लड़ पाता है, इस पर बात करें तो शायद हम नॉस्टैल्जिया को जगजीत सिंह की गजलों का मूल स्वर करार देने से अपने को बचा लें।
(विनीत कुमार। युवा और तीक्ष्ण मीडिया विश्लेषक। ओजस्वी वक्ता। दिल्ली विश्वविद्यालय से शोध। मशहूर ब्लॉग राइटर। कई राष्ट्रीय सेमिनारों में हिस्सेदारी, राष्ट्रीय पत्र-पत्रिकाओं में नियमित लेखन। हुंकार और टीवी प्लस नाम के दो ब्लॉग। उनसे vineetdu@gmail.com पर संपर्क किया जा सकता है।)
विनीत कुमार की बाकी पोस्ट पढ़ें : mohallalive.com/tag/vineet-kumar










जगजीत के जाने के बाद कई लेख पढ़े लेकिन मीडिया की नजर से यह पहला लेख दिखा। बाजार का गणित और मीडिया के लटके-झटके की खबर लेता हुआ।
जगजीत सिंह को हमारी विनम्र श्रद्धांजलि।
उम्मीद के अनुरूप बेहतर विश्लेषण,जगजीत सिंह की गजलों को और उससे जुड़ी दुनियादारी को समझने के लिए।
आपका लेख पढ़ने पर यश मालवीय की लिखी ये पंक्तियाँ याद आयीं -
हैं दिवंगत स्मृतियों में ,
पर खुद का आत्मकथन बहुत है,
संस्मरण अतीत में खुद को प्रायोजित करने की कला है ,
मर चुके हैं और मर रहें हैं
– में थोड़ा ही अन्तर है,
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