उम्रे दराज मांग के लाये थे चार दिन … #Madhubala

किशोर कुमार आलातरीन गायक थे। लेकिन आज उन पर प्रताप राव कदम की पोस्ट पढ़ते हुए यह संस्मरण बेइंतहा याद आया। इसे कभी दीवान पर से ही कॉपी किया था शायद… संदीप कुमार

Madhubala in her Room – Photographed by James Burke for Life Magazine 1951.

धुबाला सभी बहनों से अलग, अब्बा के मन में एक खास जगह बनाये हुए थी। उसकी गाना सीखने की इच्छा को सब मुश्किलों के बावजूद पूरा करने की कोशिश की गयी। दिल्ली आकाशवाणी पर उसे प्रोग्राम मिलने लगे। जिसने सुना उसी ने उसे सराहा। खां साहब के दोस्तों ने सलाह दी कि यहां इस लड़की की प्रतिभा को पनपने का अवसर नहीं मिलेगा। मुंबई जाना (इंपीरियल टुबैको कंपनी के एक पदाधिकारी खान अताउल्ला खान की तीसरी लड़की का) बिरादरीवालों ने विरोध किया। एक मुसलमान अपनी पर्दानशीं लड़की को फिल्मों में काम करवाने की मंशा से मुंबई ले जाएगा, यह बात उनको बड़ी नागवार गुजरी, पर खान साहब अपनी धुन के पक्के थे, जो सोच लिया, वह पूरा करते थे।

‘बांबे टाकीज’ में कुछ लोगों से मिलने की कोशिश की, दिनभर धूप में बच्ची को लेकर बैंच पर बैठे रहते। किसी से मिल भी पाते, तो सुनने को मिलता, ‘ये कोई यतीमखाना नहीं, जो कोई आये और भर्ती हो जाए’ … पर हिम्मत नहीं हारी। कुछ ही दिनों में ‘मुमताज शांति’ और उनके पति ‘वली साहब’ तक मुमताज के गाने की तारीफ पहुंची। उनको अपनी फिल्म में एक बच्ची की जरूरत थी। इस तरह फिल्म ‘वसंत’ में ‘मुमताज शांति’ की बेटी के रोल में बेबी मुमताज (मधुबाला) ने फिल्मों में सन 1942 में पहला कदम रखा।

इसके बाद इधर-उधर छोटे-छोटे रोल मिलने लगे। इसी बीच खां साहब केदार शर्मा के संपर्क में आये। वे राजकपूर और कमला चटर्जी (केदार शर्मा की पत्नी) की फिल्म ‘नीलकमल’ को डायरेक्ट कर रहे थे। मुमताज को कमला की सहेली का रोल मिला। दिनभर उनकी रिहर्सल देखते-देखते मुमताज को उन सभी के डायलाग रट गये थे। इस फिल्म का मुहूर्त होने वाला था। सभी सेट पर पहुंच चुके थे। कमलाजी रोज सबका खाना साथ लाती थीं, इसलिए देर में आनेवाली थीं, सभी प्रतीक्षा में थे। हीरो, सपोर्टिंग कास्ट, डायरेक्टर, प्रोड्यूसर … सब मौजूद पर हीरोइन कहीं नहीं। अचानक फोन आया, ‘कमलाजी नहीं रहीं।’ सब लोग सकते में आ गये। केदार शर्मा तो पागल जैसे हो गये, पत्नी के स्वर्गवास ने उन्हें गहरी चोट पहुंचायी। कुछ दिन वे काम से विरक्त रहे, फिर जुटे तो एक दिन बातों-बातों में कहा, ‘मैं सोचता हूं हीरोइन की जगह मुमताज (मधुबाला) को ले लूं।’ खां साहब ने कहा, ‘ठीक है आप उनके पति वली साहब से बात कर लीजिए।’ केदार शर्मा ने फिर बताया, ‘मैं बेबी मुमताज की बात कर रहा हूं, आपकी बेटी की।’ इस तरह ‘बेबी मुमताज’ 1947 में ‘नीलकमल’ में ‘मधुबाला’ बन गयी।

तेरह साल की बच्ची देखने में अपनी उम्र से ज्यादा बड़ी लगती थी। शिक्षा के नाम पर थोड़ी-सी उर्दू पढ़ लेती थी, पर उसकी प्रखर प्रतिभा ने सबकी शंकाओं को निर्मूल सिद्ध कर दिया। ‘नीलकमल’ बेहद पसंद की गयी। फिर तो हर तरफ से मांग बढ़ती गयी। उनकी यादगार फिल्मों में दुलारी (1949), महल (1949), बादल (1951), संगदिल (1952), अमर (1954), मि एंड मिसेज 55 (1955), चलती का नाम गाड़ी (1958), हावड़ा ब्रिज (1958), काला पानी (1958), फाल्गुन (1958), बरसात की रात (1960), झुमरू (1960), मुगले आजम (1960), पासपोर्ट (1961), हाफ टिकट (1962), शराबी (1964) आदि के नाम लिये जा सकते हैं। इस अभिनय यात्रा में 13 साल की उम्र से फिल्में करते-करते उनकी कला में निखार आता गया।

शुरू में अभिनय की अपेक्षा रूप पर ही सबका ध्यान था। ‘महल’ की रहस्यमयी सुंदरी के रूप में देखकर फिल्मी दुनिया चौंकी। फिर तो उस समय के सभी शीर्ष अभिनेता अशोक कुमार, दिलीप कुमार, देवानंद, रहमान के साथ काम करने का उन्हें अवसर मिला। एक बार हंसना शुरू करने पर हंसी रुकती नहीं थी, समझो उस दिन का काम ठप्प। खनकती हंसी के लिए वह अमर हो गयीं। उनके जिस्म का पोर-पोर शोखियों और शरारतों से भरा था। देवानंद के साथ ‘अच्छा जी मैं हारी’ (काला पानी) गाती हुई, किशोर की शैतानियों से टक्कर लेती मधुबाला को कौन भुला सकेगा?

16-17 साल की कच्ची उम्र की किशोरी ‘बादल’ और ‘साकी’ में प्रेमनाथ के संपर्क में आयीं। इस आयु के आकर्षण से पार पाना किशोर-किशोरियों के लिए मुश्किल होता है। पिता ने समझाने की कोशिश की, अभी तो फिल्मी जिंदगी की शुरुआत है। प्रेमनाथ भी उतने ही प्रेम में डूबे हुए थे। वे धर्म-परिवर्तन तक के लिए तैयार थे। इस सीमा तक जाने वाले प्रेमनाथ को अचानक शूटिंग के लिए विदेश जाना पड़ा। मधुबाला बेसब्री से उनका इंतजार कर रही थी, पर प्रेम लौटे तो ‘औरत’ फिल्म की हीरोइन बीना राय के पति बनकर। मधु का दिल पहली बार टूटा।

लगभग तैयार फिल्म ‘सय्याद’ में प्रेमनाथ के साथ आगे काम करना संभव न हो सका। उस जमाने में अताउल्ला खां साहब ने आठ लाख डुबोकर फिल्म ठप्प कर दी थी। जरा संभली तो ‘तराना’, ‘संगदिल’ और ‘अमर’ बनने के दौरान दिलीप कुमार का साथ मिला। ‘तराना’ फिल्म की किशोरी के रूप में मधुबाला और संजीदा डॉक्टर की भूमिका में दिलीप कुमार … दोनों के बीच आकर्षण बढ़ता गया और अगली फिल्मों में रिश्ते मजबूत हुए, पर न जाने ‘किसकी लगी जुल्मी नजरिया’, प्यार परवान न चढ़ सका।

इन्हीं दिनों वह ‘बहुत दिन हुए’ की शूटिंग के दौरान मद्रास गयीं, दक्षिण में काम करनेवाली वे पहली नायिका थीं। वहीं पर एक मनहूस सुबह मधु के गले से खून की धार सी फूट निकली। प्रोड्यूसर श्रीवासन के घर में ही वे सपरिवार रह रहीं थीं। उन्होंने इलाज में जमीन-आसमान एक कर दिया। यूसुफ साहब (दिलीप कुमार) मुंबई से डॉ शिरोडकर को लेकर आये। मधुबाला को तीन माह तक श्रीवासन के घर पर ही बेड रेस्ट के लिए कहा गया, सबने समझा, संकट टल गया मगर प्राणलेवा रोग उसी समय से अपनी जड़ें जमा चुका था।

मधुबाला दर्द को दरकिनार इससे बेखबर प्यार के नशे में डूबी थीं। नौ साल तक चले दिलीप के साथ इस रिश्ते को सभी ने कुबूल कर लिया था। इनकी जोड़ी पर्दे पर हिट थी, व्यक्तिगत जीवन में भी इस युगल को सराहा जाता था, अब्बा की चेतावनियां मनमानी करने से रोकती थीं, उन्मुक्त प्रेमी दिलीप कुमार को कभी-कभी यह बंदिशें नागवार गुजरने लगीं थीं। यह छोटी-छोटी खलिशें ‘नया दौर’ (निर्माता-निर्देशक) की शूटिंग के दौरान सामने आने लगीं।

पिता अताउल्ला खां ने कभी मधु को मुंबई से बाहर नहीं भेजा था। वे जानते थे कि एक तो सौंदर्य को बार-बार अनावृत्त करने से आकर्षण फीका पड़ने का डर रहता है। दूसरे उन्मादी भीड़ के अनियंत्रित उत्साह से अपमान की आशंका रहती थी। यह सब सोचते हुए शूटिंग के लिए बाहर जाना मना हो गया। बहुत कहा-सुनी हुई। बीआर चोपड़ा ने अनुबंध तोड़ने के लिए केस कर दिया। यह केस बहुत दिन चला। मधुबाला को जब भी कोर्ट जाना पड़ता, लोग हजारों की संख्या में एक झलक पाने के लिए कोर्ट के बाहर उमड़ आते। इस कोर्ट केस में नुकसान की भरपाई के लिए शौक से बनाया गया बंगला (किस्मत) बेचना पड़ा।

इसके बाद जिंदगीभर मधुबाला को ‘अपना’ घर न मिल पाया। सबसे बड़ी त्रासदी तब हुई, जब दिलीप कुमार बीआर चोपड़ा के पक्ष में चले गये। बहस में गवाही के दौरान भरी कचहरी में दिलीप कुमार ने अताउल्ला खां को ‘बेटी की कमाई पर रहनेवाला बाप’ तक कह डाला। इससे आहत होकर मधुबाला ने एक झटके में दिलीप कुमार से नाता तोड़ लिया। बाद में वे कई बार मनाने के लिए आये, मगर मधु की एक ही शर्त थी – ‘अब्बाजी के पैरों में पड़कर माफी मांगो।’ दोनों का झूठा अभिमान, प्यार के रिश्तों को मथता रहा। ‘मुगले आजम’ में ज्यादातर अनबोला था दोनों में। पर दिलों में गहरे बसा हुआ प्यार हमेशा वैसा ही बना रहा। इस तरह तृप्ति देनेवाला प्यार का निर्मल झरना सामने बहता रहा, पर दोनों अपनी-अपनी सीमाओं में बंधे प्यासे ही रहे।

‘मधुबाला’ की जिंदगी में किशोर कुमार का आना माता-पिता के अनुसार मौत (यमराज) का हावी होना था। किशोर कुमार पर मधुबाला का जादू इस कदर चढ़ गया था कि वह कई-कई घंटे मधु के घर पर आकर बैठे रहते। वह इतनी आजिज आ जातीं कि घर आने से पहले फोन करके पूछ लेतीं, ‘वह बैठा है क्या?’ और फिर घंटों गाड़ी को सड़कों पर घुमाती रहतीं। यह तरीका भी अक्सर बेअसर रहता। अपने प्यार को सिद्ध करने के लिए किशोर कभी पंखे में हाथ दे देते, तो कभी सड़क पर लेट जाते। घरवालों को भी कोई रास्ता नजर नहीं आ रहा था। इधर बीमारी और कमजोरी बढ़ती जा रही थी।

फिर एक दिन किशोर को समझाया गया कि बीमार से शादी करके क्या करोगे? मधुबाला के चेहरे पर अभी तक बीमारी के निशान नहीं देखे जा सकते थे। शायद इसीलिए किशोर भी इसी भुलावे में थे कि ठीक हो जाएगी। मधु उसके प्यार के पागलपन के जाल में आ गयी और शादी के लिए ‘हां’ कर दी। इलाज के लिए ‘लंदन’ जाने से पहले 16 नवंबर, 1960 को उनकी शादी हो गयी। लंदन में भी उनकी बीमारी को लाइलाज ही बताया गया। लौटकर ससुराल गयीं।

नौ साल की शादी में कुल तीन महीने ससुराल रहीं। सास का बार-बार का ताना सुनती, ‘तू बीमार रहती है, तेरा क्या फायदा, छोड़ दे इसे।’ अपमानित-आहत होकर वह मायके लौट आयी। रोग तन को छलनी कर रहा था और पति की उपेक्षा मन को। ससुराल से दूर एकांत में उसके प्यार को पाने की तमन्ना से वह कार्टर रोड पर एक फ्लैट में रहने लगीं। वहीं उनके हृदय रोग के साथ काली खांसी भी जुड़ गयी। अब कभी-कभी पुरुष (पति) का पौरुष भी दिखाया जाने लगा। मौन सिसकियां पड़ोसियों तक पहुंचतीं तो मां-बाप तक भी आहट पहुंच ही गयी। मधु, मां के घर लौट आयी।

अब नित्य नये औलिया और फकीरों के कदमों पर सर रखकर शौहर को पाने की दुआएं मांगतीं। अकेलेपन को दूर करने के लिए रोज रिकार्ड प्लेयर पर किशोर के एलपी सुनती रहतीं। सुननेवाले उनकी निष्ठा पर आश्चर्य करते। मधु के परिवार के सदस्य किशोर से विनती करते कि यह तुम्हारे बिना उदास रहती है, रोती रहती है। इसे अपने पास रखो। नर्स रख लो। शाम को तो तुम आ ही जाओगे। किशोर आधी रात को आते, घंटेभर बाद चले जाते। कभी कहते, ‘पंखा तेज करो।’ मधु के लिए हवा ठीक नहीं थी। एसी खरीदा गया। फिर कहते, ‘मुझे खुली हवा में सोने की आदत है। दिनभर काम करते-करते थक गया हूं। बत्ती बंद कर दो।’ 8 बजे आते, तो नौ बजे ड्राइवर लेने पहुंच जाता। मधु अपने हाथों से फलों की पुडिंग बनाकर रखतीं, पर सब अनखाया रह जाता। किशोर तीन-तीन महीने बिना बताये बाहर चले जाते। फोन काट देते। कभी आते तो बीमार-कमजोर मधु पति सेवा में लग जाती। उसके सिर में तेल डालती। नाखून काटती, पांव दबाती। मधुबाला का ‘हार्ट एनलार्ज’ हो चुका था। डाक्टर दिल में छेद होने की भी बात कह रहे थे। पहनने-ओढ़ने से उन्हें एकदम अरुचि हो गयी थी। बेहतरीन पोशाकों से अलमारी भरी थी पर वह रात-दिन ढीली-सी नाईटी ही पहने रहतीं।

बीमारी जोर पकड़ती जा रही थी। ‘पल्मनरी प्रेशर’ बढ़ता जा रहा था। हर पंद्रह दिन बाद अतिरिक्त रक्त उनके शरीर से निकाला जाता – नहीं तो नाक और गले से बहने लगता। इस अवस्था में भी उनकी जिजीविषा क्षीण नहीं हुई थी। दर्द से कराहते हुए भी घुटने मोड़कर प्रार्थना करती।

नौ साल की लंबी बीमारी में मधुबाला ने अकेलेपन को कैसे सहा होगा? हर त्यौहार पर चाहे वह ‘दीवाली’ हो या ‘ईद’, जिसके कमरे में फूलों और उपहारों के ढेर लग जाते थे, अब वही उजड़ा हुआ नजर आता था। जो लोग कार का दरवाजा खोलने के लिए भागकर आया करते थे कभी, अब टैक्सी के इंतजार में खड़ी मधुबाला को अनदेखा कर सर्र से निकल जाते। कभी-कभी कोई मिलने आता, तो बहुत खुश होतीं। नींद की चाहे कितनी गोलियां खातीं, पर पलक झपकती तक न थी। रात-रातभर रोती रहतीं। खुद इतनी बीमार थीं, पर किसी के छींकने की आवाज पर भी चौंक जातीं और कलमें पढ़-पढ़कर फूंकतीं।

रात को जरा-सी बात के लिए सबको सावधान करतीं। सोने से पहले रोज परिवारजनों, बहनों को फोन करतीं, ‘ए बहन, गैस बंद कर लीजो। सब चिटखनियां लगा लीजो।’ घर का एक भी सदस्य वक्त पर वापस नहीं लौटता, तो उनकी बेताबी शुरू हो जाती। सड़क पर दो-तीन आदमी बार-बार आते-जाते दिखाई पड़ते, तो फिर नीचे बहनों के घर फोन की घंटी बज उठती। ‘अरे ये लोग कौन हैं? जरा ध्यान से सोना।’ किसी का चेहरा फीका-सा दिखाई दिया, तो झटपट कोई टॉनिक खिलाने लगतीं। बच्चों से इस कदर प्यार था कि अक्सर मां से कहतीं, ‘अम्मा मैं सोचती हूं अब मेरे भी बच्चा होना ही चाहिए।’ मां अंदर ही अंदर मन मसोसकर रह जाती। डाक्टर का कहना था कि बच्चे को जन्म देना उनके लिए मृत्यु को आमंत्रित करना था। चार बहनों और मां-बाप की दुलारी बेटी तिल-तिलकर खत्म हो रही थी और वे सब बेबस थे।

लंबी बीमारी ने शरीर खोखला कर दिया था। एक रात उनकी चीखों ने सबको चौंका दिया। बहनें नीचे की मंजिल में रहती थीं फौरन पहुंच गयीं। जाकर देखा तो अब्बा-अम्मा सकते में थे। बेटी की पीड़ा सह नहीं पा रहे थे। डाक्टर बुलाया गया, पता चला ‘हार्ट अटैक’ है। बचना मुश्किल है। पति किशोर कुमार को खबर दी, उन्हें सुबह शूटिंग पर बाहर जाना था। बार-बार कहने पर आये, तो देखकर बोले, ‘ठीक तो है … ऐसी हालत तो हजारों बार हुई है।’ मधु ने कमजोर आवाज में कहा, ‘इससे कहो चला जाए यहां से।’ तब वह दूसरे कमरे में जाकर सो गये।

सुबह तक मधुबाला ने इस दुनिया को अलविदा कह दिया। शरीर स्थिर था, पर कोई तीन घंटे बाद बंद पलकों से न जाने कहां अटके हुए आंसुओं की धारा बह निकली थी। इस तरह 14 फरवरी, 1935 को शुरू हुआ सफर 23 फरवरी, 1969 को बिना साथी, बिना मंजिल के खत्म हो गया। सांताक्रूज के कब्रिस्तान में मधुबाला को सुपुर्दे खाक कर दिया गया। संगेमरमर की बनी मजार पर उनका प्यारा शेर इस तरह से लिखा गया – ‘उम्रे दराज मांगकर लाये थे चार दिन, दो आरजू में कट गये दो…

♦ सन 1985 में प्रसिद्ध निर्माता निर्देशक ओपी रल्हन का संस्मरण

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