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“हमने इतिहास की धूल झाड़ने की कोशिश की है…”

29 October 2011 5 Comments

लाल रत्‍नाकर द्वारा बनाया गया महिषासुर का रेखाचित्र


जेएनयू में महिषासुर की शहादत पर आयोजित आम सभा

फारवर्ड प्रेस के अक्‍टूबर अंक में हिंदी के साहित्‍यकार प्रेमकुमार मणि का लेख ‘किसकी पूजा कर रहे हैं बहुजन?’ प्रकाशित हुआ था। श्री मणि एक प्रतिष्ठित लेखक, सामाजिक न्‍याय के चिंतक व राजनीतिकर्मी रहे हैं। दिल्‍ली स्थित जवाहर लाल नेहरू विश्‍वविद्यालय (जेएनयू) समेत कुछ अन्‍य विश्‍वविद्यालयों में दक्षिणपंथी छात्र संगठन इस लेख का विरोध कर रहे हैं। इन संगठनों का कहना है कि उक्‍त लेख में हिुदुओं की देवी दुर्गा का अपमान किया गया है। इस तरह के आरोप किसी शोधपरक पत्रिका पर लगाया जाना अशोभनीय है। फारवर्ड प्रेस मुख्‍यत: भारत के शोषित बहुजनों के इतिहास, संस्‍क़ति और परंपरा से संबंधित प्रमाणिक और शोधपरक, नवीन तथ्‍यों को प्रकाशित करता है। इस पत्रिका के संपादकीय बोर्ड में भारत व विश्‍व के अनेक नामचीन शोधकर्ता आधिकारिक रूप से जुडे हैं। प्रभुगुप्‍त तारा (यूरोप), विशाल मंगलवादी (यूएसए) तथा गेल ऑम्‍वेट, (नई दिल्‍ली) इनमें प्रमुख हैं। इसके अलावा भारत के बहुजनों पर शोध करने वाले अनेक प्रतिष्ठित लेखक कांचा आयलैया, प्रेमकुमार मणि, दिलीप मंडल आदि इसके नियमित लेखकों में से हैं।

भारत में एक साथ कई संस्‍क़तियां और परंपराएं रही हैं। कबीर, जोतिबा फूले, पेरियार, अम्‍बेडकर, धर्मानन्‍द कोशांबी जैसे लोगों के लेखन ने विजेता शक्तियों के मिथकों, परंपराओं का पुनर्पाठ कर वंचित तबकों के नायकों की तलाश की। एकलव्‍य, शंबूक, बलिराजा आदि अनेक गुमनाम पराजित नायकों की प्राण प्रतिष्ठिा इसी का परिणाम है। महिषासुर भी ऐसा ही एक मिथक है, जिसपर से इतिहास की धूल झाडने की कोशिश फारवर्ड प्रेस के लेखक प्रेमकुमार मणि ने की है।

हम, जेएनयू में पिछले दिनों इस प्रसंग हुई मारपीट की घटना की निंदा करते हैं तथा इसे ज्ञान के प्रसार में सयास बाधा पहुंचाने की कोशिश के रूप में देखते हैं। साथ ही, जेएनयू के एक छात्र को उक्‍त लेख की प्रतियां प्रसारित करने के आरोप में जेएनयू प्रसाशन द्वारा दंडित किये जाने की घटना को अलोकतांत्रिक , तानाशाहिक और शोध के नये रूपों प्रति अवहेलना के रूप में देखते हैं। हम भारत के बुद्धिजीवी वर्ग से अपील करते हैं कि वे फारवर्ड प्रेस के प्रसार को सुचारू रूप सुनिश्चित करने के लिए दक्षिणपंथी ताकतों का विरोध करें।

 

5 Comments »

  • Prof. Shrawan Deore said:

    It is true that enlightenment of the people is based on criticism of religion. But one thing we have to keep in mind that it should be positive. Tatyasaheb Mahatma Jotirao Phuley and Dr. Babasaheb Ambedkar had criticized the religion in the negative manner, which resulted in driving the OBCs towards Brahminical camp i.e. Shivasena, BJP, VHP etc. You have repeated the same in the Forword.
    Aryas do not belong to matriarchy social system. They are patriarchal. And the Durga, Kali, Bhavani these are the Icons of matriarchy. The period of Mhaisasur, Ravan, Kans, Bali was the transition period from matriarchy to patriarchy. So it is obvious that such type of wars could have happened many times. And hence the war between Durga and Mhaisasur is symbol of above situation. It is needless to say that Mhaisasur was kiiled because of his cruelty.
    To show the Mhaisasur as a bad icon and Durga as a good one is Brahminical methodology vis-à-vis to show the Mhaisasur as a good and Durga as a bad icon is a Non-brahminical methodology. And both are negative. Brahmins have succeeded in enforcing their negative views on Bahujan because of powerful instruments they have.
    Being rationalist, we should have the ability of explaining any historical events in a more scientific way. It should be free from any kind of prejudice.
    ————————— Prof. Shrawan Deore, 9422788546

  • Dr.Lal Ratnakar said:

    यद्यपि दक्षिणपंथी और वामपंथी ताकतों का स्वरुप दिखाने के लिए अलग होता है पर भारतीय परिप्रेक्ष्य में वह एक जैसे ही हैं, अतः भारतीय पाखंडपूर्ण देवत्व उनके सामूहिक केंद्र हैं सत्ता और संपत्ति पर अनाधिकार अधिकार जमाये हैं. यही कारण है की दलित उत्थान की बात की सुगबुगाहट ही उनके लिए ‘अपराध’ जैसा हो जाता है. अतः उनसे सावधान रहने की जरूरत है. जिस भ्रष्टाचार के खिलाफ आन्दोलन किया जा रहा है वह भ्रष्टाचार क्या है?

  • Dr.Lal Ratnakar said:

    यद्यपि दक्षिणपंथी और वामपंथी ताकतों का स्वरुप दिखाने के लिए अलग होता है पर भारतीय परिप्रेक्ष्य में वह एक जैसे ही हैं, अतः भारतीय पाखंडपूर्ण देवत्व उनके सामूहिक केंद्र हैं सत्ता और संपत्ति पर अनाधिकार अधिकार जमाये रहने कस. यही कारण है की दलित उत्थान की बात की सुगबुगाहट ही उनके लिए ‘अपराध’ जैसी हो जाती है. अतः उनसे सावधान रहने की जरूरत है. जिस भ्रष्टाचार के खिलाफ आन्दोलन किया जा रहा है वह भ्रष्टाचार क्या है ? कहीं इन्ही आदर्शों को बचाने के लिए तो नहीं………………

  • धीरेन्द्र said:

    कुछ लोगों ने बाबरी मस्जिद के द्वारा इतिहास कि धुल झाड़ने कि कोशिश कि थी अब ये कुछ और तथाकथित इतिहास की धूल झाड़ने वाले आ गए है |देखना है कि अब इस धुल झाड़ने से कितना बड़ा बवंडर खड़ा होता है देश में |

  • Dharmender Chouhan said:

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