लखनऊ में कितनी अवधी? फिर भी शामे-अवध लखनऊ?
♦ अमरेंद्र नाथ त्रिपाठी
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जिस तरह व्यक्तियों के मध्य प्रभु व्यक्ति की प्रवृत्तियों का संचरण होता जाता है, उसी तरह भूभाग विशेष में किसी प्रभु स्थल का प्रभाव भी फैलने लगता है। इसके प्रति प्रश्नवाचकता कम अनुकरण अधिक किया जाता है। लखनऊ की जिस ‘संस्कृति’ की बात की जाती है, उसमें आज भी मूलतः नवाबी दौर की अकर्मकता, शेष अवध से असंवाद, नाजुकी-तमीज-तहजीब आदि के आत्ममुग्धी मुहावरों के चलते आत्मसमीक्षा भाव का अभाव और तमाम स्वरों को अनदेखा करने से वैविध्य-समृद्धि की अनुपस्थिति स्पष्ट तौर पर दिखती है। यहां की पृष्ठभूमि पर कथाकार प्रेमचंद की कहानी ‘शतरंज के खिलाड़ी’ को सत्ता-केंद्र पर रखकर देखिए, आज भी वह मनोविन्यास दिखेगा। यहां कल्चर को लेकर एक खास किस्म का विभाजन है, जिसकी तरफ ध्यान दिलाने पर वहीं के मित्रों ने कहा – यह ‘कल्चर’ और ‘एग्रीकल्चर’ का डिफरेंस है, और दोनों में फर्क होना चाहिए। मैं ऐसा विभाजन बेमानी समझता हूं, जिसमें पोएटिक कल्चर की बात हो व एग्रीकल्चरल रिप्रजेंटेशन को छांट दिया जाए। मसलन, एग्रीकल्चर के कवि घाघ को छांटकर कोई शामे-अवध की लखनवी सूरत रचे, तो यकीनन उसमें मगरूरिये-अमीरशाही दिख सकती है, लेकिन अवध की अविस्मरणीय किसानी-संस्कृति नहीं दिखेगी। मुझे समस्या इसी से है कि लखनऊ अवध की जिस कल्चरल-पैकेजिंग का नाम होता रहा है, उसमें अवधी संस्कृति का नितांत अभाव है। यहां वह अवधी संस्कृति क्यों नहीं दिखती, जिसमें जनभाषा का कर्म-सौंदर्य हो? लखनऊ में कितनी है अवधी? उसके बाद भी शामे-अवध लखनऊ? एक खास तरीके का बासी एस्थेटिक्स कल्चर का मुलम्मा चढ़ा-चढ़ा के जीता है लखनऊ में! वैविध्य कहां? गति कहां? दृष्टि कहां? प्रतिरोध कहां? प्रतिकार कहां? लोक कहां? जन कहां? जनभाषा कहां? – क्या यह परंपराएं नहीं होनी चाहिए लखनऊ में?
एक दृष्टि डालिए, दो शहरों की चाल के तुलनात्मक अध्ययन पर! एक लखनऊ व दूसरा बनारस! एक कल्चर यह और एक कल्चर वह भी। यहां आपको अधिक संसाधन में कम आउट-पुट दिखेगा (राजनीतिक अवसरों पर दीठ डालने पर), वहीं बनारस पुरानी लीक पर चलने के बाद भी एक सांस्कृतिक दायित्व को निभाता हुआ मिलेगा। बनारस पूर्वांचल की जातीयता का वाहक दिखेगा, लेकिन लखनऊ अवधी जातीयता का वाहक नहीं। भाषा संस्कृति-रूप है, इसके हवाले से कहूं तो बनारस में आपको भोजपुरी-भाषी परिवार मिलेंगे, घर के भीतर व बाहर सब बोलते हैं भोजपुरी, लेकिन लखनऊ में इस तरह अवधी को गौरवबोध के साथ बोलते हुए परिवार नहीं मिलेंगे। लखनऊ ने हिंदी-उर्दू के सामने ऐसे घुटना टेका, जैसे इसकी अपनी कोई जातीय भाषा ही न हो। फलतः जातीय निर्माण की प्रक्रिया में लखनऊ ने – अवधी कल्चर का मिथ्या दावा करने के बावजूद – नकारात्मक भूमिका निभायी। मैथिली जातीयता मिलेगी आपको, भोजपुरी जातीयता मिलेगी आपको, लेकिन अवधी जातीयता पर कुठाराघात लखनऊ ने ही कर दिया। (इसे आकाशवाणी लखनऊ में विगत 6-7 दशकों के अवधी कार्यक्रम के गिरते हुए ग्राफ से देख सकते हैं) जबकि अवध-अवधी की सचेत जातीयता भाषा से अलग भी विविध सांस्कृतिक रूपों में है, जिसकी पहचान खुद को इलाके का कल्चरल-हब कहलाने वाले लखनऊ ने नहीं की, तो इसके मूल में वहां लोगों को जाना चाहिए।
मैं यह नहीं कह रहा कि लखनऊ ‘नरक’ है बल्कि यह कह रहा हूं कि जिस नफासती-तहजीबी ‘स्वर्ग’ का दावा किया जाता है और पूरे अवध की कल्चरल पैकेजिंग कर दी जाती है, उसका हकदार लखनऊ कतई नहीं है। इसी बात को कहते हुए जिन कवियों ने कुछ कहा, उनकी बात को बड़े हल्के में लिया गया। खुद पर सोचने का प्रयास नहीं किया गया। देशभाषा की कविताओं में निहित व्यंग्येतर (व्यंग्य होने पर भी) सांस्कृतिक समीक्षा को नहीं देखा गया। इतनी व्यंग्य रचनाएं क्या यूं ही आ गयीं! बकौल मुक्तिबोध कवि/लेखक का काम सांस्कृतिक समीक्षा का है। अवधी कवि रमई काका जी ने अपनी कविताओं में प्रसंग-प्रसंग पर अपनी बात कही है, लखनऊ में सांस्कृतिक दाय की उपेक्षा का भाव देखकर! व्यंग्य काका की शैली है, पर उनका कार्य सांस्कृतिक समीक्षा का ही है। उन्होंने देखा था कि ओस को नाजुक बरसात कह लोग छाता लगाते थे। इसी को लक्ष्य करते हुए उनकी अवधी गजल की दो पंक्तियां है…
नाजुक सहर मा नाजुक हर बात ह्वै रही है!
अब लखनऊ मा नाजुक बरसात ह्वै रही है!
(अर्थ के लिए : अवधी में संबंधसूचक ‘मा’ का प्रयोग होता है, जो खड़ीबोली-हिंदी में ‘में’ है।)
इसके अतिरिक्त एक कविता में काका जी ने तो विस्तार में लखनौव्वा कल्चर को तार-तार करके दिखाया है। कल्चर के विशिष्ट तौर-तरीके में ढले नगर और नागरिकों पर उनकी यह कविता गौरतलब है…
ई आहीं पक्का लखनौव्वा
कहैं चीज के दूने दाम,
बात बात मा करैं सलाम,
चीकट तकिया चटख लिहाफ,
घर मा गंदे बाहर साफ,
बड़ा तकल्लुफ कैके खांय,
याक कौरु का सत्तर दांय,
नाजुक देहीं सिर पर पल्ला,
आंखिन सुरमा अंगुरिन छल्ला,
ख्यालैं नित बैठकुवा खेल,
आप आप मा छोड़ैं रेल,
तितुर लड़ावैं कबौ बटेर,
कबौं कबुतरन के हैं फेर,
तिउ-तिउहार उड़ै कनकौव्वा,
जानि लिह्यो पक्का लखनौव्वा!
(अर्थ के लिए : पल्ला – टोपी / बैठकुवा खेल – कमरे के भीतर खेलने वाले खेल जैसे तास-शतरंज आदि जिसका यहां व्यंजक संकेत समय के काटने और कर्म-हीनता से है। / कनकौव्वा – पतंग)
परंतु ऐसी आलोचनाओं को समीक्षा के लिए जरूरी समझा ही नहीं गया। यह माना गया कि यह सब बातें ग्राम्य-दोष की पैदावार हैं। यह आज तक नहीं समझ में आया कि मुख्यधारा के खास ट्रेंड की रचनाओं को ही ‘रचना’ क्यों माना जाता है जब उससे कम प्रभावकारी बातें ग्राम्य-गिरा में होने पर उनको मूल्यांकन के योग्य क्यों नहीं समझा जाता! लखनऊ के ऐसे ही माहौल पर लखनऊ से 25-30 किमी के फासले पर बाराबंकी के अवधी कवि मृगेश ने लिखा…
जौ अइसन टेक निराली तौ बिसहौ प्याला-प्याली,
लखनऊ सहर मा रहिके दुइ चार लिखौ कौव्वाली,
समझ्यो मूरखचंद बुढ़ौनू जुग बदला!
तुम करौ कबितई बंद बुढ़ौनू जुग बदला!
इसके बावजूद कभी भी इन आलोचनाओं पर विचार नहीं हुआ, जबकि साहित्य-संस्कृति का ठेका लिये वहीं अपनी गढ़ी हुई परिभाषाओं में मस्त रहा। इस मस्ती का गौरवगान हुआ। जिस इलाके में प्रेमचंद के ‘गोदान’ की सामाजिक संरचना आज भी मौजूद हो, वहां ‘होरी’ की जुबान आज भी अपनी पहचान और सवालों उपेक्षा में ही है। उल्टे दिखाया ऐसे जाता है कि सब चुस्त-दुरुस्त-चकाचक है! ऊपर जिन कवियों का जिक्र किया है, ये लोग कमोबेश उसी दौर में लिख रहे थे, जब बंबैया सिनेमा आदर्श और कल्पना की लुभाऊ छौंक लगाकर लखनऊ का इस रूप में गौरवगान कर रहा था…
ये लखनऊ की सरजमीं
ये रंग रूप का चमन
ये हुस्न-ओ-इश्क का वतन
ये तो वही मकाम है
जहां अवध की शाम है
जवां-जवां हसीं-हसीं
ये लखनऊ की सरजमीं!
अब सवाल है कि क्या रमई काका आदि जनभाषा के कवियों का दिमाग खराब था, जो लखनऊ की शान में गुस्ताखी कर रहे थे? नहीं भाई, नहीं! लखनऊ की इस परिणति पर औरों ने भी लिखा है। जनभाषाएं सहज होती हैं, सीधा-सपाट कहती हैं। अब मैं इस संदर्भ में ज्ञानपीठ सम्मान से सम्मानित कुंवर नारायण जी की कविता का हवाला दूंगा। याद रहे कि कुंवर जी पैदा हुए फैजाबाद में, रहे अधिकांश जीवन लखनऊ में, अब दिल्ली में हैं। हम उनके संदर्भ में नहीं कह सकते कि वे किसी ग्राम्यगिरा-सुलभ दोष के शिकार हैं या वे लखनऊ को समझ नहीं रहे। उन्हें कल्चर की बखूबी समझ है, किसी हड़बड़ी में नहीं कह रहे हैं! एक सोच है! लखनऊ पर उनकी ‘लखनऊ’ कविता के अंश देखिए…
किसी नौजवान के जवान तरीकों पर त्यौरियां चढ़ाये
एक टूटी आरामकुर्सी पर
अधलेटे
अधमरे बूढ़े सा खांसता हुआ लखनऊ।
कॉफी-हाउस, हजरतगंज अमीनाबाद और चौक तक
चार तहजीबों में बंटा हुआ लखनऊ।
…
किसी मुर्दा शानो-शौकत की कब्र सा,
किसी बेवा के सब्र सा,
जर्जर गुंबदों के ऊपर
अवध की उदास शामों का शामियाना थामे,
किसी तवाइफ की गजल सा
हर आने वाला दिन किसी बीते हुए कल-सा,
कमान-कमर नवाब के झुके हुए
शरीफ आदाब-सा लखनऊ,
खंडहरों में सिमटते हुए किसी बेगम के शबाब-सा लखनऊ,
बारीक मखमल पर कढ़ी हुई बारीकियों की तरह
इस शहर की कमजोर नफासत,
नवाबी जमाने की जनानी अदाओं में
किसी मनचले को रिझाने के लिए
कव्वालियां गाती हुई नजाकत:
किसी मरीज की तरह नयी जिंदगी के लिए तरसता,
सरशार और मजाज का लखनऊ,
किसी शौकीन और हाय किसी बेनियाज का लखनऊ:
यह है किब्ला
हमारा और आपका लखनऊ।
[कुंवर नारायण, संग्रह ‘अपने सामने’ 1979]
अंततः यही कहूंगा कि ‘नयी जिंदगी के लिए तरसते लखनऊ’ को समझना अत्यंत जरूरी है। कमियों को क्या ग्लोरीफाई करना! कल्चर के नये ढब तराशने की जरूरत है।
(अमरेंद्र नाथ त्रिपाठी। भारतीय भाषा केंद्र, जेएनयू के शोध छात्र। देशभाषाओं से विशेष लगाव। इंटरनेट पर अवधी भाषा में पोर्टल का संचालन। उनसे amrendratjnu@gmail.com पर संपर्क किया जा सकता है।)










कुंवर नारायण जी की कविता ने जैसे उघाड़ ही दिया है लखनऊ को …मगर तवायफ की इज्ज़त ही क्या
बनारस मानवीयता से सराबोर है आज भी और कल भी रहेगा -इसमें एक शाश्वतता की अंतर्धारा है …
बढ़िया विवरण
Waise to mai Luknow ka nahi hun par takreeban 9 saal waha rah ke jo ahasaas hua wo aaj bhi khinch le jata hai. Kash fir wahi kahi mil jate. Mai Lucknow ya Banaras ko compare to nahi kar paunga par dono hi shahar apni-apni khoobiyon me maahir hain. Bahut achha likha hai. Saadhuvad.
Amrendra ji … jaisa maine pehley kaha tha aapsey ki “Bander kya jaaney Adrak ka swaad”
…. aur mai abhi bhi yehi kahungi ki aapkey liye “Culture” aur “Agriculture” me diffrence karna bahot mushqil kaam hai. aur ek free ka suggestion hai aapkey liye … ki Awadhi per kaam kar rahey hai .. ek achha kaam hai aur sirf wo he kariye .. waise Aarzoo ne “Mir Taqi Mir” ka jo quote use kiya tha aapkey liye wo perfect hai … Mulayeza Farmaiye …. “Abhi ladkey ho kadra hamari kya jaano … shaoor chahiye imtiyaaz karney ko”
)
Shalini ji , उस दिन से आज तक आप लखनौव्वा तहजीब के संबंध में अदरक-बंदर की अपनी प्रिय कहावत से आगे नहीं कुछ कह सकी हैं। आपका कहावतकोश बहुत सीमित है, इसलिये एक कहावत का आग्रह कर रहा हूँ:
‘भैंसि के आगे बीन बजावो भैंसि खड़ी पगुराय’
सादर..!
btw for your information … sabdkosh seemit nahi ‘specific’ hai …. aur mai un logo me nahi hu jo ek “टुटपुँजिया” article per apni soch badal le
amrendra ji aapka lekh padha…pata nahi aapne kitna samay lucknow me gujara hai? kyuki hum lucknow ke hi rahne wale hai aur wahan ke gharo mein awadhi aaj bhi zinda hai… bolchaal ki bhasha mein hum lucknow wale kahte ki ghar ki boli hai par tatparya awadhi se hota hai..awadhi ki kahavate , muhavare aaj bhi bhi badi adabi ke sath bole jaate hai…
isha shukla जी, आपसे इस लेख को सर्वांगीणता में देखने का निवेदन करूँगा। मैं तकरीबन साल भर रहा हूँ लखनऊ में। मेरे नजदीकी रिश्तेदार भी हैं वहाँ। संभव है आप लोगों जैसा वहाँ का परंपरागत या दीर्घकालिक रहवैया नहीं हूँ लेकिन वहाँ की स्थिति को जानने में चूक गया होऊँ, ऐसा भी नहीं है। अगर अवधी की बात करूँ तो संभव हो यह आपके घर परिवार का सच हो, लेकिन मैने लखनऊ अवधी की अनुपस्थिति देखी है। दो पड़ोसी जो अवधी जानते हैं, लखनऊ में यह भाषा आपसी बात-चीत में नहीं लाते। यही वजह है कि लखनऊ में – सत्ता शक्ति का सुलभ केंद्र होने के बाद भी – अवधी भाषा के विकास के लिये लोग कभी कतारबद्ध नहीं हुये। अवधी के अध्ययन का कोई पीठ नहीं है। वहाँ के विश्वविद्यालयों में अवधी की यूनिट नहीं है। भोजपुरी के आठवीं अनुसूची में लाने की माँग बनारस से उठ सकती है लेकिन अवधी के आठवीं अनुसूची में लाने की माँग लखनऊ से नहीं उठती। आकाशवाणी ने कब का ही अलविदा कहना शुरू किया, इस तरह कि रमई काका की अवधी गद्य की धरोहरें – सैंकड़ों रेडियो एकांकियाँ – आकाशवाणी में बड़े आराम से बर्बाद कर डाली गयीं। यह सब दिखाता है कि वहाँ कितनी अवधी है और उसको लेकर सम्मान का भाव! इन सब नकारात्मकताओं को लेकर वहाँ के लोग कभी आंदिलित हुये?? यह उनकी अवधी की जागरुकता को दिखाता है। हकीकत बताता है। आज भी वहाँ के लोगों में उस भाषा के प्रति सहज-सम्मान का भाव नहीं है जो थोड़ी दूर किसानो-मजूरों की जीवन-भाषा है। करोड़ों की जीवंत भाषा है। रही बात मुहावरे आदि की तो वह दिल्ली में भी बोले जा रहे हैं, लेकिन इसी से बात नहीं बनती! सवाल उस पूरी भाषा का, उस पूरी भाषिक अस्मिता का, उस पूरी जातीयता का, उस पूरे ग्रामर का है कि वह कहाँ जा रहा है, कितना मिटनशील है!!
पहले तो मुझे यही आश्चर्य लग रहा है की प्रस्तावित पुनर्गठन में अवध बोल कर जिस प्रदेश का नाम लिए जा रहा है, उसमें खाँटी अवधी बोलने वाले सुल्तानपुर, प्रतापगढ़ और फैजाबाद ( जिसके अयोध्या के नाम पर ही अवध बना है ) जिले शामिल क्यों नहीं हैं? लखनऊ अवध से ज्यादा मिली जुली या कहें कि सामासिक संस्कृति का प्रतीक रहा है. इस लेख में बहुत सी कवितायेँ उद्धृत हैं. लखनऊ को जानने के लिए अमृतलाल नगर के ‘बूँद और समुद्र’, यशपाल के ‘लखनवी अंदाज़’ जैसी कथा-कृतियों को भी पढ़ा जाना चाहिए.
Shalini Singh जी, आपको अपनी राय से टस-से-मस न होने का पूरा हक है!
नीलांबुज भाई जी, (मीडिया द्वारा दिखायी) राज्य की जिस जनपदीय विसंगति का जिक्र आपने किया है वह यही है कि ‘अवध/अवधी’ की पहचान को लेकर बड़ा भुलावा है। जो भाषा १८५७ ई. में एक लोक-वृत्त बना रही थी, जनभाषा के ठोस आधार के साथ, वह बाद में दूर ढकेल दी गयी। एक सत्ता-केंद्र के तौर पर लखनऊ की भूमिका महत्वपूर्ण होती पर उसने आवश्यक बातों से असंवाद रखा। इसी का परिणाम है कि इस समय फैज़ाबाद भी अवध से बाहर हो जाय तो लखनऊ को ( वहाँ के लोगों को ) कोई मतलब नहीं। शामे-अवध लखनऊ में तो रहेगी न!
अमृतलाल नागर के उपन्यासों में लखनऊ, यह किसका रिसर्च है, याद नहीं आ रहा! कहीं देवेंद्र चौबे जी का तो नहीं!!
अमरेनद्र जी,
ईशा जी ने बिलकुल सही कहा है ऊपर कि लखनऊ में हम ‘घर की बोली’ बोलते हैं जो अवधी है और घर से बाहर वो भाषा, जो कभी उर्दू थी और अब ‘हिन्दुस्तानी’ हो गयी है।
रमई काका और कुँवर नारायण ने जो भी लिखा, उस में एक व्यंग्य तो आपने देख लिया लेकिन उस व्यंग्य कि नींव कितनी गहरी सभ्यता और संस्कृति की तरफ़ इंगित करती है, वो समझने की आपने ईमानदार कोशिश नहीं की।
शायद लखनऊ के प्रति आपकी ये शिकायत, गुस्सा, और अवसाद इसलिये है कि आप फ़ैज़ाबाद से हैं और उसे अवध का असली वारिस मानते हैं बजाय लखनऊ के। इस विषय में मैं केवल इतना कहूँगा कि ‘अवधी’ तहज़ीब में फ़ैज़ाबाद का योगदान जितना भी हो, अवध की पहचान लखनऊ से ही है।
और जिन गतिविधियों को आप कर्महीनता या अकर्मण्यता मान बैठे हैं, दरअसल वो सब विकसित सभ्यताओं के विलास हैं, जो अविकिसित मनव को किंकर्तव्यविमूढ़ ही करेंगे।
एक आखिरी बात और – काफ़ी दु:ख की बात है कि आप अवधी का झंडा उठाये घूम रहे हैं और हिन्दी के लेख में अंग्रेज़ी का बेधड़क प्रयोग करके दोनों ही भाषाओं का अपमान भी करने पर उतारू हैं। अच्छा लगेगा यदि अगली बार आप कल्चर, आउटपुट, ग्राफ़, और ट्रेंड से थोड़ा बचकर निकलें।
धन्यवाद
Siddhartha Rastogi जी, ईशा जी को मैने जवाब भी दे दिया है, वही जवाब आपको भी। आपने मेरी बातों को समझने की यकीनन इमानदार कोशिश नहीं की, नहीं तो फैज़ाबाद के न वारिस होने की बात और लखनऊ शान है – जैसी बातों से अलग आप कुछ कहने को प्रवृत्त होते। मैने कब कहा कि फैज़ाबाद वारिस हो – बड़ी कयामती आँखें हैं आपकी
विकास के साथ विलास का आपका लखनौव्वा फार्मूला कम नहीं है
शब्द प्रयोग के ऊपर यही कहूँगा कि वर्चुअल जगत में संप्रेषण के लिये आम-चलन के अंग्रेजी के शब्दों को लेने में मुझे परहेज नहीं है। इसलिये कल्चर, आउटपुट, ग्राफ़, और ट्रेंड से गुजरना भी अपराध नहीं! अपमान नहीं!
धन्यवाद..
@ shalini singh-r u dumb or something?don’t u know a little bit of history or sociology? the whole indian society is an agrarian society from last 3000 years.so every culture in india is primarily an agrarian culture.but u r useing your cheap phrases like “culture and agriculture” and thinking that u r so smart ? damm u girl !!!
अगर अमरेन्द्र फैजाबाद से है और अपने को अवध का असली वारिस मानते है तो क्या हुआ अरे मै तो ये चाहता हूँ के सारा उत्तर प्रदेश ही अपने को अवध का असली वारिस माने |अमरेन्द्र कुछ कर तो रहे है कम से कम अवधि क लिये बाकी जो लोग उनकी आलोचना कर रहे उन्होंने क्या किया अवधी के लिये और हा अब केवल गावों में ही अवधी बोली जाती है लखनऊ में अवधी बोलना धीरे धीरे कम हो रहा है |और एक कहावत प्रस्तुत है —”"”सूप बोले सूप बोले चलनी का बोले जेहिमा बहत्तर छेद |”"”
Shalini .. i like the word “टुटपुँजिया article”
Dipti r u fool??? tum bhi Culture aur Agriculture me difference karna seekh lo nahi to Shalini se training le lo
Amrendra ji … likhney ko aap kuch bhi likh dijiye per ussey kuch hona nahi hai … Jaisa Siddhartha ne kaha ki “Lucknow ya Banaras ko compare to nahi kar paunga par dono hi shahar apni-apni khoobiyon me maahir hain” bilkul sahi kaha hai. Aur “Mir Taqi Mir” ka ye quote “Abhi ladkey ho kadra hamari kya jaano … shaoor chahiye imtiyaaz karney ko” bilkul fit baithta hai yaha
बदलती हुई लखनवी-संस्कृति के बहाने लखनऊ पर आपका गुस्सा फाजिल हुआ है,जिसके लिए मैं समझता हूँ कि इसे आज के परिप्रेक्ष्य में नहीं देखा गया है.बदलाव बहुत हो चुका है,बोली,भाषा,रहन-सहन,पहनावा,खानपान,ईमान सभी में ! आज के ‘विकास’ को हांफते-भागते पकड़ते ऐसे अंध-समाज से क्या बनेगा? लखनऊ तो महानगरीय-संकृति के संक्रमण से ग्रसित है ही,क्या भारत के सुदूर गांव भी अब वैसे रह गए है ? हमारे तीज-त्यौहार,मेले सभी तो बदल गए ! क्या यहीं से हमारी संस्कृति का क्षरण नहीं शुरू हुआ? अब पहले जैसा समाज न रहा,मूल्य न रहे,प्राथमिकताएं न रहीं तो बोली-भाषा कब तक बचेगी ?
लखनऊ अभी भी बहुत कुछ समेटे है लेकिन प्रश्न यह है कि हम कब तक अपने अतीत की छत्र-छाया से गौरवान्वित होते रहेंगे ? आपके प्रश्न उद्वेलित तो करते हैं पर किसको,जिनके पास करने को कुछ नहीं है!
आपकी चिंताओं का एक ही उत्तर है-समय का बदलाव !
amrendra ji aapka jawab padh kar achaa laga ..haan hum aapki is baatse sahmat hai ki awadhi bhasha ka prayaog kam jaroor hua hai par woh viloopt nahi huyi hai… jaroorat hai jagrati failane ki jisse lucknow ke bashibde jaage aur bhasha ko bachaye…. dhanyavad…:)
मैं तो छतीसगढ़ से हूँ और अधिक नहीं जानता की अभी अवध मे क्या चल रहा है| लेकिन जो पीड़ा अमरेन्द्र जी की अवधी के बारे मे है, वही पीड़ा उन सभी भाषाओं से प्रेम करने वालों की है जिन भाषाओं को हिन्दी वालों ने बोली या उपभाषा कहकर निचला बना दिया|
अब हिन्दी मजबूरी है| लेकिन अवधी, छतीसगढ़ी, बुंदेलखंडी, ब्रज, निमाड़ी, बघेलखंडी, भोजपुरी आदि को बचाने के प्रयास जारी रहें| न केवल भाषाओं को बल्कि इन प्रान्तों की संस्कृति को भी संरक्षण मिलना ही चाहिए|
अमरेन्द्र जी, आपने बहुत ही बढियाँ लिखा है. मैं लखनऊ मे ६ वर्ष रहा हूँ और जो बातें आपने उठाई हैं वो सहत-प्रतिशत सहीं हैं. लखनऊ के लोग पूर्णतः आत्मकेंद्रित होतें हैं और अपने आपको सर्वश्रेष्ठ समझते हैं. काका जी ने तो पूरी पोल खोल के ही रख दी है.
मै अवध क्षेत्र का नहीं हूँ फिर भी अवधी भाषा बहुत प्रिय है. वैसे फूटपाथ के दुकानदार अवधी बोलते हुए मिल जातें हैं और मैंने उनसे बहुत सीखा है.
“बनारस पूर्वांचल की जातीयता का वाहक दिखेगा, लेकिन लखनऊ अवधी जातीयता का वाहक नहीं। भाषा संस्कृति-रूप है, इसके हवाले से कहूं तो बनारस में आपको भोजपुरी-भाषी परिवार मिलेंगे, घर के भीतर व बाहर सब बोलते हैं भोजपुरी, लेकिन लखनऊ में इस तरह अवधी को गौरवबोध के साथ बोलते हुए परिवार नहीं मिलेंगे। लखनऊ ने हिंदी-उर्दू के सामने ऐसे घुटना टेका, जैसे इसकी अपनी कोई जातीय भाषा ही न हो।”
Amarendra Ji badhai ho, kya marmasparshi lekh likha hai aapne. Hriday ko chho liya aapne…abhi samaya nahi hai lekin phir kabhi thoda vistar se aapki baton me jorna chahunga….philhaal ke liye punah dhanyawaad…
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