संवैधानिक संस्थाओं की बाइडिफॉल्ट स्वायत्तता भ्रामक है
♦ शशि कुमार झा
एक स्वतंत्र लोकपाल के क्या मायने हैं और लोकपाल हो या नहीं हो और हो भी तो क्या हो कैसा हो… इत्यादि सवाल और इनसे जुड़ी समस्याएं और विवाद अपनी जगह हैं लेकिन जब इसे एक संवैधानिक संस्था बनाये जाने की बात को यदि ऐसे परोसा जा रहा है कि चुनाव आयोग जैसी ‘संवैधानिक’ संस्था मात्र बना दिये जाने से वह बाय डिफॉल्ट एक स्वतंत्र, स्वायत्त, ईमानदार आदि संस्था बन जाएगी, तो इसके बारे में कुछ व्यावहारिक प्रश्न पूछे जाने जरूरी होंगे। अन्ना हजारे की इस पर सहमति के साथ ही सत्ताधारी पार्टी के उस सांसद की जय-जयकार फिर से शुरू हो चुकी है, जिनकी ओर से इस प्रस्ताव का आना कहा गया था।
पिछले कुछ वर्षों में कथित तौर पर स्वतंत्र और स्वायत्त निकायों के बारे में जिस प्रकार के तथ्य सामने आ रहे हैं, उससे लोगों का काफी ज्ञानवर्द्धन हुआ है। इनमें वे संवैधानिक संस्थाएं भी शामिल हैं, जिन्हें लोकतंत्र के प्रहरी जैसे विशेषणों से नवाजा गया था। इनमें से अब कुछ तो अपनी सक्रियता को लेकर सरकारों के निशाने पर हैं, और कुछ अपनी अकर्मण्यता और नखदंतविहीनता के लिए जनता के बीच चुटकुलों और मजाक का विषय बन चुके हैं। उच्चतर स्तर के न्यायालय, सीएजी, मानवाधिकार आयोग और जांच एजेंसियां ऐसी ही संस्थाएं हैं, जो उपरोक्त दोनों ही कारणों से चर्चा में रहती हैं। जनता दिग्भ्रमित है और इनके मूल चरित्र या वास्तविक अवस्थिति को पकड़ ही नहीं पा रही है। हम आस्थावादी लोग चूंकि बहुत सारी चीजों को केवल मान कर चलने से ही खुश हो जाते हैं, इसलिए उनके व्यावहारिक पहलुओं की गहराई से पड़ताल ही नहीं करते। कई बार तो इसे कुरेदने की हिमाकत करने वालों के प्रति भी उदारता दिखाने की बजाय उन्हें हतोत्साहित और प्रताड़ित करते हैं, क्योंकि वह हमारी मान ली गयी आस्था या पारंपरिक सहजज्ञान को चुनौती देता हुआ जान पड़ता है। चुनाव आयोग और चुनाव आयुक्त की संस्था भी वास्तव में एक ऐसी ही संस्था है।
चुनाव सुधार के किसी भी प्रयास में चुनाव आयोग की प्रशासकीय स्वायत्तता या निर्भरता को हम छूने का प्रयास क्यों नहीं करते? चुनाव आयुक्त की नियुक्ति प्रक्रिया पर नये सिरे से बहस क्यों आवश्यक नहीं है? आइए थोड़ा पीछे चलते हैं, उस समय में जब इस संस्था को सृजित किया जा रहा था। 15 और 16 जून 1949 को जब संविधान सभा में चुनाव के ऊपर अनुच्छेद 289 के ड्राफ्ट पर चर्चा शुरू हुई, तो कई सदस्यों ने चुनाव आयोग को व्यापक अधिकार दिये जाने की स्थिति में राष्ट्रपति द्वारा चुनाव आयुक्त के नियुक्त किये जाने के खतरनाक परिणामों की ओर इशारा करते हुए इस पर गंभीर आपत्ति दर्ज की। क्योंकि इसका सीधा सा मतलब था कि चुनाव आयुक्त की नियुक्ति वास्तव में किसी मंत्री, मंत्रिमंडल या प्रधानमंत्री की सलाह पर ही होती। प्रो सिब्बन लाल सक्सेना नाम के एक सदस्य ने इसकी आलोचना करते हुए एक संशोधन का प्रस्ताव किया कि मुख्य चुनाव आयुक्त की नियुक्ति में संसद के दोनों सदनों के संयुक्त अधिवेशन में दो-तिहाई बहुमत से इसकी पुष्टि की शर्त्त रखी जाए।
इस पर चर्चा का जवाब देते हुए डॉ अंबेडकर ने कहा, “जहां तक नियुक्ति का सवाल है, मुझे अवश्य ही यह बात स्वीकारनी चाहिए कि मेरे मित्र प्रो सक्सेना ने जो यह बात कही है, उसमें बहुत वजन है कि यदि संविधान में ऐसा कोई प्रावधान नहीं है जो किसी ऐसे व्यक्ति को चुनाव आयुक्त बनने से रोक सके जो मूर्ख या गुलामी बजाने वाला हो या कार्यपालिका के इशारों पर नाचने वाला हो, तो चुनाव आयुक्त के कार्यकाल को निश्चित और सुरक्षित बनाने का कोई मतलब नहीं है। मेरे प्रावधान में – मुझे स्वीकार करना चाहिए कि – ऐसा कुछ भी नहीं है जो किसी अयोग्य व्यक्ति को मुख्य चुनाव आयुक्त या अन्य चुनाव आयुक्त के लिए नामांकित किये जाने से रोक सके।”
अंबेडकर ने आगे कहा कि “मैं यह स्वीकार करना चाहता हूं कि यह एक अहम सवाल है और इसने मेरे लिए बहुत सरदर्द पैदा किया है, और मुझे इसमें कोई शक नहीं कि यह सदन के लिए भी सरदर्द पैदा करने जा रहा है।” अंत में संयुक्त राज्य अमेरिका में ऐसी नियुक्तियों में अपनायी जाने वाली व्यवस्था को अपनाये जाने में समस्याओं को देखते हुए अंबेडकर ने जो संशोधन पेश किया वह यह था कि “मुख्य चुनाव आयुक्त और अन्य चुनाव आयुक्तों की नियुक्ति राष्ट्रपति द्वारा की जाएगी और यह इस संदर्भ में संसद द्वारा बनाये गये किसी कानून के प्रावधान द्वारा परिवर्त्तनीय है।” भारतीय संविधान के अनुच्छेद 324 (2) में संविधान सभा के इसी निर्णय को स्थान दिया गया है।
अंबेडकर ने समझा होगा कि आनेवाले समय में अपने व्यावहारिक अनुभवों से सीखते हुए सरकारें अनुच्छेद 324 (2) की ‘परिवर्त्तनीय’ वाली भावना को समझते हुए इसमें जरूरी परिवर्तन करेंगे। लेकिन हुआ इसके उलट। अब तक कोई भी सत्ताधारी पार्टी इस लोभ का संवरण नहीं कर पायी है कि चुनाव आयुक्त उसकी पसंद का हो। आजादी के तीन दशक बाद जब तारकुंडे समिति ने चुनाव आयुक्त की नियुक्ति प्रक्रिया को व्यापक बनाने और इसमें विपक्ष के नेता समेत अन्य लोगों को भी शामिल किये जाने की बात की होगी तो अवश्य ही उसके पीछे तत्कालीन व्यावहारिक अनुभव रहे होंगे। उस समय तक तमाम संवैधानिक संस्थाओं पर शिकंजा कसने की प्रक्रिया व्यापक रूप से शुरू हो चुकी थी और स्पष्ट रूप से दिखने भी लगी थी। कमिटी के इस वक्तव्य में यही भावना झलकती है, “न्यायपालिका की भांति ही, चुनाव आयोग भी न केवल सैद्धांतिक तौर पर स्वतंत्र होना चाहिए, बल्कि इसे चुनाव की व्यवस्था और इसके संचालन करने की अपनी शक्तियों के इस्तेमाल में प्रकट रूप से स्वतंत्र दिखना भी होगा। हाल के वर्षों में यह भावना घर करती जा रही है कि आजादी के शुरुआती सालों की तुलना में अब चुनाव आयोग कार्यपालिका से कम से कमतर स्वतंत्र होती जा रही है, क्योंकि मुख्य चुनाव आयुक्त का चयन कभी भी उन कसौटियों पर आधारित नहीं रहा है जो जनमत के सभी तबकों के विश्वास पर खरा उतरता हो। इसे अवकाश प्राप्ति के करीब जा पहुंचे सरकारी अधिकारियों का पद बना देने का चलन ही शायद इस भावना लिए जिम्मेवार रहा है कि जिस पदग्राही को इससे लाभ मिला है, वह इस पद के लिए सरकार का आभारी होगा।”
15 साल बाद दिनेश गोस्वामी समिति ने भी जब इस मामले में तारकुंडे कमिटी की चिंताओं को दोहराया। कमिटी का मानना था कि चुनाव आयोग एक तीन सदस्यीय संस्था होनी चाहिए। मुख्य चुनाव आयोग की नियुक्ति भारत के मुख्य न्यायाधीश और विपक्ष के नेता के सलाह से ही होनी चाहिए, जबकि अन्य चुनाव आयुक्तों की नियुक्ति में उनके अलावा मुख्य चुनाव आयुक्त की सलाह भी ली जानी चाहिए। कई अन्य लोगों का मानना है कि इसमें संसद के दोनों सदनों के सभापतियों को भी शामिल किया जाना चाहिए। कुल मिलाकर यह बात स्पष्ट रूप से सामने आयी कि ऐसे स्वतंत्र संवैधानिक निकायों में नियुक्ति की शक्ति केवल सरकार के पास नहीं होनी चाहिए बल्कि इसके लिए एक विस्तृत कॉलेजियम बनायी जानी चाहिए जो निष्पक्ष और सक्षम हो।
दिलचस्प है कि 1998 और 1999 के अपने चुनावी घोषणा पत्र में भाजपा ने गोस्वामी समिति की सिफारिशों को अद्यतन और अंगीकार करने तथा चुनाव सुधारों को कार्यान्वित करने की बात कही थी, जो उसके शासनकाल में नहीं हो पाया। जून 2006 में तत्कालीन मुख्य चुनाव आयुक्त बीबी टंडन ने अवकाश प्राप्ति के समय राष्ट्रपति को चिट्ठी लिखी। ऐसा माना जाता है कि इस पत्र में टंडन ने राष्ट्रपति को सुझाव दिया कि मुख्य चुनाव आयुक्त की नियुक्ति प्रक्रिया को व्यापक बनाया जाना जरूरी है। उन्होंने कहा कि मुख्य चुनाव आयुक्त और अन्य चुनाव आयुक्तों की नियुक्ति प्रधानमंत्री की अध्यक्षता वाली एक कमिटी द्वारा की जानी चाहिए जिसमें सदस्य के तौर पर लोकसभा अध्यक्ष, कानून मंत्री, लोक सभा और राज्य सभा में नेता प्रतिपक्ष, राज्य सभा के उप-सभापति, और सुप्रीम कोर्ट के मुख्य न्यायाधीश द्वारा नामित सुप्रीम कोर्ट के एक न्यायाधीश हों।
क्या आपको लगता है कि यदि मुख्य चुनाव आयुक्त की नियुक्ति में यह प्रक्रिया अपनायी जाती, तो नवीन चावला जैसे व्यक्ति कभी मुख्य चुनाव आयुक्त बन पाते। ये वही नवीन चावला थे, जिनकी भूमिका आपातकाल के दौरान बरती गयी ज्यादतियों के संदर्भ में काफी विवादों में रहा था। संजय गांधी के बेहद करीबी माने जाने वाले चावला ने उन्हीं के साथ ही दून स्कूल में पढ़ाई की थी, और आपातकाल के दौरान वह दिल्ली के उप-राज्यपाल थे। आपातकाल के दौरान हुई बर्बरताओं की जांच के लिए बनी पूर्व मुख्य न्यायाधीश जेसी शाह की अध्यक्षता वाले आयोग ने चावला को ‘किसी भी सार्वजनिक पद के लिए अयोग्य’ करार दिया था। यहां तक कि उनके पूर्ववर्ती मुख्य चुनाव आयुक्त एन गोपालस्वामी ने 16 जनवरी, 2009 को राष्ट्रपति को 93 पृष्ठों की एक चिट्ठी लिखी, जिसमें चुनाव आयुक्त नवीन चावला को उनके कथित पक्षपातपूर्ण आचरण के लिए उनको हटाने की सिफारिश की थी। गोपालस्वामी ने 12 ऐसे अवसरों का जिक्र किया था, जब चावला ने किसी पार्टी विशेष को फायदा पहुंचाने की कोशिश की थी। 20 अप्रैल, 2009 को गोपालस्वामी रिटायर हो गये और उसी दिन नवीन चावला को राष्ट्रपति ने मुख्य चुनाव आयुक्त नियुक्त कर दिया।
ठीक इसी प्रकार 2008 में पूर्व मुख्य चुनाव आयुक्त मनोहर सिंह गिल को केंद्र में मंत्री बनाये जाने का भी यह कहते हुए विरोध किया गया था कि इससे एक बुरी परंपरा की शुरुआत हो जाएगी, और लोग इसे पूर्व में पहुंचाये गये फायदे के एवज में मिले पुरस्कार के रूप में देखेंगे। लेकिन इस सबके बावजूद चुनाव सुधारों के वर्तमान ढिंढोरेबाजी में यह मुद्दा सिरे से गायब है।
वास्तव में, यह पूरा शिगूफा स्वायत्त अथवा स्वतंत्र संस्थाओं की संभावनाओं पर हो रही बहस को भटकाने का प्रयास था, जिसमें उन्हें फिलहाल कामयाबी मिलती दीख रही है। यह कथित तौर पर पहले से अस्तित्व में रही ‘स्वतंत्र संवैधानिक संस्थाओं’ की अंदरूनी तकनीकी और व्यावहारिक असलियतों पर पर्दा डालने की एक और कोशिश है। चुनाव आयोग अथवा चुनाव आयुक्त की संस्था की इन असलियतों को देखते हुए बिना किसी अतिरिक्त कोशिश या व्यावहारिक चौकसी के ही इस जैसी किसी भी संस्था की स्वायत्तत हो जाने के बारे में हमें कोई भ्रम नहीं पालना चाहिए। पीजे थॉमस प्रकरण को अभी बहुत दिन नहीं हुए।
(शशि कुमार झा। डेमोक्रेसी कनेक्ट में विश्लेषक। बीबीसी जैसी संस्थाओं से जुड़े रहे। इंटरनेट पर हिंदी को जमाने में भी बड़ा हाथ रहा। डीयू से आईआईएमसी तक राजनीति और पत्रकारिता की पढ़ाई की।
वक्त मिले तो शशि के ब्लॉग अष्टावक्र पर भी जाएं। उनसे avyaktashashi@gmail.com पर संपर्क किया जा सकता है।)










समस्या का वास्तविक निदानं संवेधानिक संस्थाओं को स्थापित करने में नहीं बल्कि उन संस्थाओ तक पहुँचने हेतु अपनाई गई प्रक्रिया को पारदर्शी, लोकतान्त्रिक बनाने में है . इसकी शुरुआत चुनाव व्यवस्था को धन और बल की ताकतों से मुक्त कर ऐसा बनाने में है कि कोई भी व्यक्ति जो व्यक्तिगत लाभ हेतु संसद, विधाईका , पंचायत में ना पहुंचें ………………………….. maza aa gaya……… itana acha vislesan padh kar
बेहतरीन विश्लेषण शशि भाई
इस लेख में लोकपाल बिल पर तथ्यपरक जानकारी के लिए धन्यवाद| इस मुद्दे पर किसी नतीजे पर पहुँचाने के पहले व्यापक विचार-विमर्ष किया जाना जरूरी है….
दोहों के आगे दोहे
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पूजी जाती बाइबिल, गीता—और—क़ुरान।
संविधान क्या देश का, लावारिश सामान??
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सद्भावी- डॉ० डंडा लखनवी
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