हर फिक्र को धुएं में उड़ाता चला गया … #DevAnand

देव आनंद हमेशा जिंदगी के साथ रहे। आज जिंदगी ने उनका साथ छोड़ दिया। विनम्र श्रद्धांजलि। याद करें उन्‍हें उनकी फिल्‍मों, गानों और संस्‍मरणों से…

» अजय ब्रह्मात्‍मज

देव साहब ज़िंदगी का साथ छोड़ गये हैं। अब यह गाना बेमानी हो गया है। आपने ही हिंदुस्तान के मर्दो को खूबसूरती का सलीका सिखाया। जिसकी चर्चा मधुबाला से ज्‍यादा हुई। सब कुछ भुला दिये जाने के इस दौर में कोई याद करना चाहेगा, तो देव साहब आप खूब याद आएंगे। हमारे बाबूजी चाचा मामा भी याद आएंगे, जो हर फोटो के फ्रेम में आपकी तरह ख़ूबसूरत जवां मर्द दिखना चाहते थे।

» रवीश कुमार

सिने जगत का सदाबहार चेहरा

♦ संदीप पांडेय

विभाजित पंजाब के गुरदासपुर जिले के जाने माने वकील पिछौरीमल आनंद के घर 26 सितंबर सन 1923 को धर्मदेव पिछौरीमल आनंद का जन्म हुआ। धर्मदेव पिछौरीमल आनंद ही बाद में देव आनंद के नाम से हिंदी सिने जगत के आकाश में स्टाइल गुरु बनकर जगमगाया।

देव आनंद को राजेश खन्ना से भी पहले सिनेमा का पहला चॉकलेटी नायक होने का गौरव मिला। देव आनंद की लोकप्रियता का आलम ये था कि उन्होंने जो भी पहना, जो भी किया वो एक स्टाइल में तब्दील हो गया। फिर चाहे वो उनका बालों पर हाथ फेरने का अंदाज हो या काली कमीज पहनने का या फिर अपनी अनूठी शैली में जल्दी-जल्दी संवाद बोलने का।

लाहौर के गवर्नमेंट कॉलेज से अंग्रेजी साहित्य में स्नातक की पढ़ाई पूरी करने के बाद उन्होंने फिल्म इंडस्ट्री में अपना मुकाम बनाने के लिए घर छोड़ दिया और मुंबई चले आये। सन 1946 में आयी फिल्म ‘हम एक हैं’ से उन्होंने अपने करियर की शुरुआत की। पुणे में फिल्म की शूटिंग की शुरुआत के दौरान उनकी मुलाकात हुई मशहूर फिल्म निर्माता-निर्देशक गुरुदत्त से, जो उन दिनों फिल्मी दुनिया में अपनी जगह बनाने के लिए संघर्षरत थे।

एक साथ सपने देखते इन दोनों दोस्तों ने आपस में एक वादा किया। अगर देव कभी निर्माता बनेंगे तो उनकी फिल्म का निर्देशन करेंगे गुरुदत्त और अगर गुरुदत्त ने कभी फिल्म बनायी, तो उसके नायक होंगे देवानंद। सन 1949 में देवानंद ने नवकेतन बैनर के नाम से फिल्म निर्माण का काम शुरू किया। उन्होंने अपना वादा निभाया और सन 1951 में अपनी फिल्म बाजी का निर्देशन गुरुदत्त को सौंपा। फिल्म सुपरहिट हुई और दोनों दोस्तों की किस्मत चमक गयी।

गायिका-अभिनेत्री सुरैया के साथ देव आनंद का प्रेम प्रसंग जगजाहिर है। दोनों ने एक दूसरे के साथ छह फिल्मों में काम किया। एक फिल्म की शूटिंग के दौरान नाव पलट जाने पर जब सुरैया डूबने लगीं, तो देव ने उन्हें बचाया और यहीं से दोनों एक दूसरे के नजदीक आये। मगर सुरैया की नानी को यह रिश्ता मंजूर नहीं था और नतीजतन दोनों का रिश्ता परवान न चढ़ पाया। सुरैया ने आजीवन विवाह नहीं किया।

आरके नारायण के उपन्यास ‘गाइड’ पर देव आनंद ने इसी नाम से एक फिल्म बनायी, जिसका निर्देशन किया था उनके छोटे भाई विजय आनंद ने। अंग्रेजी और हिंदी में एक साथ बनी इस फिल्म ने आलोचकों को बहुत प्रभावित किया।

देव आनंद फिल्म जगत के उन गिने चुने लोगों में शामिल हैं, जो राजनीतिक और सामाजिक रूप से भी सक्रिय थे। सन 77 के संसदीय चुनावों के दौरान उन्होंने अपने समर्थकों के साथ मिलकर इंदिरा गांधी का जमकर विरोध किया। उल्लेखनीय है कि उस समय सिने जगत की अधिकांश हस्तियों ने चुप्पी साध रखी थी।

कुछ वर्ष पहले अपने जन्मदिन के अवसर पर ही उन्होंने ‘रोमांसिंग विद लाइफ’ नाम से अपनी जीवनी बाजार में उतारी थी। आमतौर पर मशहूर हस्तियों की जीवनियों के प्रसंग विवादों का विषय बनते हैं लेकिन उनकी जीवनी हर अर्थ में बेदाग रही, बिल्कुल उनके जीवन की तरह।

उन्हें सदाबहार अभिनेता कह कर पुकारा गया, तो वह भी यों ही नहीं। उन्होंने जिन अभिनेत्रियों के साथ नायक के रूप में काम किया था, कुछ वर्षो पहले तक वे उनकी पोतियों के साथ भी उसी भूमिका में देखे गये।

sandeep pandey(संदीप पांडेय। बिजनेस स्‍टैंडर्ड, भोपाल से जुड़े पत्रकार। इससे पहले दैनिक भास्‍कर, इंदौर में थे। शौकिया तौर पर रेडियो कंपियरिंग और एनाउंसिंग करते रहे हैं। कई पत्र पत्रिकाओं में लेख, कविताएं प्रकाशित। दिल ए नादां नाम से ब्लॉग। संदीप से aboutsandeep123@gmail.com पर संपर्क किया जा सकता है।)

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