वो ख्वाब था जो शायद जालिम फासिस्ट ख्वाब था!

द साल्ट एंड सुगर ऑफ लंदन के आगे

♦ फ्रैंक हुजूर

न 1997 के स्प्रिंग टाइम की ही वो फिजा थी, जब जेहन में जैसे सुर्ख गुलाब ही गुलाब खिल उठे थे। हिंदू कालेज हॉस्टल के रूम नंबर 31 में रिहाईश के वो दिन और रात बस दरकने को नाम ही नहीं लेते। अब देखिए न कितने वर्ष फना हो गये। जमीं और आसमान का फर्क आ चला हर उन गलियों में, हर उन दिल की बस्ती में जो उस वक्त नाजुक बदन और हवा में परवाज करने वाली ख्यालों से बिजली गिराया करती थी। पोएट्री की आशिकी भी क्या आशिकी थी। वो कौन से पार्ट नहीं थे ख्वाबों की मल्लिका के बर्फीले रेगिस्तान जैसे बदन के, जिसमें नाचीज को समंदर की गहराई न नजर आती। वो हर एक जिस्म का कतरा हर एक दिमागी धागे के मकड़जाल को टक्कर दे रहा होता। हैरत होती, हंसी आती, अफसोस का पहाड़ तामीर हो जाता मगर दिल के बगीचे में लहू पानी बनकर नये ख्वाबों की आगवानी करता। ख्वाब भी उन बसंत में जैसे इंतजार करते। एक ख्वाब रंगीन सा इस्टमैन कलर का ख्वाब। वही दूसरा ख्वाब सफेद और काले लिबास से जगमगाता ख्वाब। ळिब्रोइतालिअनो ने इकोनोमिस्ट मैगजीन के एक बेहद रोमांचक अंक में एक इश्तेहार साया किया था इंटर-नेशनल-कोंतेम्पोरेरी पोएट सीरीज में 50 से ज्यादा अंग्रेजी पोएट्री के सबमिसन की। और मैंने अपने पांच साल के जवान पोएट्री ट्री से तोड़ कर 60 पोएट्री लिब्रोइतालिअनो के दफ्तर रगूसा, इटली पोस्ट कर दिया था। जवाब मार्च के 17 तारिख को आ धमका था कि आपकी पोएट्री कलेक्‍शन को पब्लिश करने के लिए मुंथखब कर लिया गया है। रोम और फिर वहां से रगूसा जाने की फाकामस्ती और इटली को दिल में बसाने के रोज बनते अरमानो के महलों ने दिल और दिमाग दोनों में कातिलाना हमला बोल दिया। 1997 स्प्रिंग-समर! व्हाट एन अटैक ऑफ इंसैनिटी अ पोएट एक्स्पेरिआंस!!! इतालियन क्लासिक विंटेज का चस्का और मस्का सुरूर बन चुका था। मुस्सोलीनी और मडोना और कालिगुला की सरजमीन से रिश्ता खबरों और किताबों की दुनिया ने गुलजार बहुत पहले से कर रखा था। मगर ये हो न सका, वो ख्वाब था जो शायद जालिम फासिस्ट ख्वाब था।

मडोना कहा करती थी कि हर इतालियन वर्जिन ‘रोज लेडी’ एक परफ्यूम की माफिक होती है। माफिया की हसीनाएं भी वर्जिन परफ्यूम ही होती है। ऐसा तो है ही कि हर एक परफ्यूम वर्जिनिटी का एक खास तोहफा है। जिंदगी भी उसी इतालियन क्लास्सिक विंटेज की तरह एक परफ्यूम ही है। और ये क्लासिक विंटेज पोकर सा ये खेल है, जिसको हम और आप जिंदगीनामा कह बैठे है।

उन्‍नीस वर्ष की उस उम्र में मेरे लिए ये “फार वेस्ट लव” की फिजां में गिरफ्तारी थी। ख्वाब मुकम्मल ख्वाब और फिर क्या बिसात कोई ख्वाब के हसीं दरवाजों पे दस्तक देकर वापस लौट जाए। ख्वाबों के दरवाजे कभी भी देखे तो खुले ही रहते है। कोई भी खिड़की और दरवाजा ख्वाबगाह का कभी बंद नहीं मिलता। ऐसा क्यों होता है? जब कभी बचपन के दिनों में बक्सर और गांव के हरे भरे खेत जेहन पर हमला बोलते हैं, तब ऐसा ही लगता है। बक्सर के मेरे दिल में बसे ख्वाब उरूज पे होते हैं, जब कभी ब्रिटेन के खेतों को देख के वही हरियाली और नशीली फिजां का एहसास होता है। क्या फर्क है मिटटी के इस नशीली फसल में। वही ग्रीन ग्रास और वही ग्रास-होप्पर … वही ओस की बूंदे शबनम की तरह परेशान करती… लंदन की सर्दियों से लबालब गलियों से हम बाहर हैं। अभी बर्फ के गोले गिरे नहीं हैं, मगर बोरिस जोंसन, लंदन मेयर के सिपहसालार सड़कों पे नमक की चादर बिछा रहे हैं। नमक बर्फ को पिघलाता है। साल्ट मेल्ट द स्नो। नमक की खपत सुगर का मुकाबला करने लगी है। साल्ट इज सुगर इन ब्रिटिश विंटर।

बर्नले छोटा सा एक गांव। मैनचेस्टर से करीब 40 किलोमीटर और नोर्थ की तरफ-बर्नले को मेरा साथी इबरार विल्लेज टावून कहते हैं। पेंडल हिल के मखमली पैरों के नीचे जगमाता सा हरे शबनमी ओस की मोतियों जैसी बूंदों के पहाड़ और नतालिया का वो खूबसूरत अंदाज ठीक हैलोजेन लंप के खंभे के नीचे, वो जमीन को चूमता हुआ गुलाबी और स्याह रंग का वो फ्रॉक और उसके ब्लोंड हेयर के ऊपर पहरा देता बोवलर हैट… नाक की वो नशीं स्लेंदर स्लोप-वाल्क जैसे सुराग वाली गहरी सी नीली आंखों से झूम झूम के गिरते वो आफताब के सितारे… मुश्किल से सर्दियों के आगोश की ये शाम पांच बजे है। घोर अंधेरा चारों तरफ छाने लगता है, चार बजते ही आजकल। लंदन की शाम भी ऐसी ही भीगी-भीगी सी है। चमकती हुई बूंदों को डार्क कोहरेनुमा पीली रोशनी में मन में अजीब सा बवंडर उठता रहता है। फिर लंदन के चॉकलेटी रंगों में सराबोर घरों के बाहर चॉकलेट ज्यादा और ग्रीन ग्रास की मस्ती कम… बर्नले में ये ग्रीन ग्रास की जवानी और शाम के पीले अंधेरे की वो चादर और उस के नीचे नतालिया का वो मुस्कुराना… मुझे नहीं मालूम वो कौन है। मगर मुझे ये ख्याल है कि वो एक बेहद हसीं मंजिल है। मुझे वहां तक सफर करना अच्छा लग रहा है। मैनचेस्टर यू या मैन यू के गोल्डेन गेट से हम बहुत दूर नहीं। अब वो कॉटन का समां वैसा नहीं मैनचेस्टर में जो हिंदुस्तान के कॉलोनी होने के वक्त था। अब फुटबॉल है यहां का जादू। रात के अंधेरे में ‘गे’ खूब सैर करते होते हैं, गोरियों की नजरें कभी-कभी धोखा खा जाती है। सर अलेक्स फर्गुसन के 25 वर्षों के अंग्रेजी फुटबाल के साम्राज्‍य से लबलाब एक दुनिया जहां ग्लैमर हर जवान दिलों की एक जुबान है। इश्क और सोहरत का एक अनूठा संगम। नतालिया एक पेंटिंग है इस हसीं ख्वाब में – एक जिंदगी जिसमें उसकी मुस्कान साल्ट और सुगर दोनों का नशा घोलती है। इस विलेज टाउन की ग्लैमर लगती है ये कमसीन नतालिया।

सिगरेट की लौ उसकी आंखों की झिलमिल रोशनी से खेल रही है। मेरी नजर उसके गुलाबी नेल पॉलिश पे जाती है। उसके दाएं हाथ की कोहनी और उसके ऊपर वो सिगरेट की स्टिक और उसके टिप से दहक रही वो बोनफायर की आग नतालिया के होठों से टकराती और जोड़ से दहकती। मैंने अपने को उसके सामने हाजिर कर दिया और आंखों के सुरंग में उतरते हुए मेरे होठों ने एक सवाल दाग डाला। ‘हिटिंग योर चिल्ली लिप्स, गर्ल? हे, आई ऍम फ्रैंक … फ्रैंक हुजुर। माय वर्जिन विजिट टु बर्नले …’

इतना सुनते ही नतालिया की मुस्कुराहट को मैंने फैलते हुए पाया, जैसे वो खेलना चाहती हो रूनी और द्रोगबा की माफिक पूरे मैदान पे। अजीब सी कशिश उसके होठों से जुदा होते सिगरेट की स्टिक और काले-सफेद धुओं के गुबारों में। छोटे बड़े स्मोक के छल्ले जैसे इतरा रहे हों और सर्द हवाओं की आगोश में फना हो जा रहे हों।

“डु नॉट टेल मे यू आर ऐन आर्टिस्ट? बर्नले में अजनबी जब कोई यहां दस्तक देता है, तो अक्सर वो या तो एक पेंटर होता है या पोएट” नतालिया ने धीरे से आह भरी। मुस्कुराते हुए दिल की जबान उसके कानो में गूंजने लगी। उसकी बातों ने जैसे साल्ट का एक टुकड़ा फेंक डाला मेरे दिल के ऊपर जम रहे बर्फ के गोलों पे। ईट मेल्ट फास्ट।

“आई स्मोक सम ब्लैक एंड ब्लू इंक इन अ मेटल स्टिक – आई राईट, नतालिया– दिस स्‍ट्रेंजर बिफोर यू इज अ पेन-पुशर।”

‘वाट डू यू राइट मैन?’ नतालिया ने झटके से पूछ डाला। मेरी नजर उसके बोवलर हैट से गिरते उसके नीली आंखों, सुर्ख गुलाबी होठों से फिसलकर उसके मिल्की व्हाइट गले से गुजरकर स्‍ट्रोबेरी ब्रेस्ट पे थोड़ा ठहरते और फिर सरकते हुए उसके फ्रॉक के नीचे मखमली स्‍क्‍वेयर बूट पर पिघल जाती ही है।

‘वही लिखता हूं, जो मेरे दिल के रास्‍ते गुजर जाता हे। इट कुड बी यू टु। लुक, नतालिया। आई एम राइटिंग यू एट द मोमेंट।” मैंने जहमत उठायी दिल के अफसाने को बाहर लाने की। कुछ वैसा ही तूफान था नतालिया में। बर्नले की नतालिया जैसे डैफोडिल हो इस नशीली शाम की… मेरी आंखों में कोई शरारत नहीं है। वैसे होता भी नहीं है कभी। नतालिया की आंखों में नशा है, शरारत इस डैफोडिल में भी नहीं। मैं बर्नले विलेज के मशहूर टाउन, ली हॉल के म्‍यूजियम के सामने नतालिया से मुखातिब हूं। मेरी दिलचस्पी सर जॉन तावोंली की फॅमिली हिस्ट्री मै है, जिसकी नतालिया एक अहम कड़ी है।

“बड़ी छोटी सी दुनिया है बर्नले की। सदियों से आबादी 40 हजार से आगे नहीं भागी। शहर के किनारे एक नहर मदहोश बहती रहती है। कभी कॉटन के मिल – स्टील के मिल के वर्कर फॅमिली यहां दो सौ साल पहले आबाद हुए। ये वही गांव है, जहां इंग्लिश क्रिकेट टीम का फास्ट गोलंदाज जेम्‍स एंडरसन जवान हुआ। हमारे गांव के लड़के और लड़कियां अपनी वर्जिनिटी को प्रोटेक्ट करते हैं। लंदन और बर्नले में सबसे नाजुक फर्क यही है। वी आर नॉट स्लट और होर। वी हैव एरोटिक पोजेसन, नॉट एरोटिक फंतासी,” नतालिया ने बड़े सुकून अंदाज में आहे भरी। सुपर नेचुरल डिजायर्स। इसको एक्स्ट्रा-सेक्‍सुअल पर्सेप्‍सन भी कह सकते हैं।

लंदन के आगे का रास्ता हजारों विलेज टाउन की हसीं और नशीली गलियों में जाता है। कहना आसान है की विलेज टाउन की ब्‍यूटी लंदन और बर्मिंघम या फिर मैनचेस्टर जैसे शहरों से बेहद उरूज पर है। नतालिया जैसी शोख हसीनाएं विलेज की आबो-हवा में मार्लिन मुनरो या लेडी गागा को देखकर नहीं जवान होती है। इनकी दाओं में मधुबाला और कैथरिन हेपबर्न जैसी चुलबुलाहट होती है। ये सोहो की गलियों की स्लट या होर नहीं नवाजी जा सकतीं।

जब लंदन से मै बर्मिंघम के लिए रवाना हुआ पिछले हफ्ते, मौसम दोपहर की सुहानी धूप में आबाद था। ट्रेन का सफर इस विंटर में और भी नुकीला लगता है क्योंकि रेल का सफर ज्यादा पौंड निगलता है। बस का सफर अलबेला न सिर्फ मजेदार है बल्कि ज्यादा गर्मियों से भरा। लंदन की कुछ गोरियां वीकेंड पे अपने साथियों के गले लगने के लिए सवार थीं और हर एक गोरी के बैग में वाइन की एक से एक बोतल। मैंने गौर से लेकर अपने हाथों में उन्हें देखा – रोज वाइन के सुनहरे खंभे और उसे सीने से चिपकी वो चुलबुली गोरी लड़की। मैंने पूछा, “लंदन से भाग रही हो सिर्फ वाइन पीने के लिए?” व्‍हाट कैन आई से बाई योर नेम? “एम्मा” एम्मा ने खूब जोर से खिलखिलाहट भरी, “वाइन विद गुड फ्रेंड्स। आई डू नॉट लाइक क्लबिंग। पब कैन बी कॉस्टली दिज डेज। वी फ्रेंड्स सेलेब्रेट एट अ प्राइवेट होम। फायर एंड वाइन एंड वी गो मैड।”

मेरे लैप पे डगलस थॉम्प्सन की लिखी हुई वो किताब है, जिसका टाइटल है ‘मडोना वेर्सेज गाई (गाई रिची)’ जो कहानी है, शोव्बिज के सबसे सनसनीखेज डिवोर्स की। जो रोमांच 8 साल के इस निकाह में ब्रिटिश सोसाइटी ने महसूस किया, उसको यहां लंदन के क्लब कल्चर में एक मील का पत्थर माना जाता है। गाई रिची एक ब्रिटिश मोविमकर है, जिसे पब से बेहद मोहब्बत है जैसे कि किसी भी ब्रिटिश लड़के को वही मडोना जिसे मर्द वाइफ की अदा में चाहिए। एम्मा ने चुटकी ली। “मडोना मिसेज रिची नहीं बन सकी। वो हमारा रिची मिसेज मडोना बनकर ही रह गया।”

ब्रिटेन की इकोनोमी में जब आज आग लगी हुई है, तो ऐसे खयालात का इजहार भी रसीला है। यूरोजोन जर्मनी की हथेली में आहे भर रहा है। जोर्ज ओस्बोर्न, ब्रिटिश फिनांस मिनिस्टर करीब 3 लाख और नौकरियों पे तलवार लटकाने के लिए लंगोटे बांध चले हैं। ये ब्रिटेन का बहुत ही ‘फ्रोजेन मटन’ विंटर है, जिसमें एक से एक जूनून और इश्क के शेख जो ‘समर के टाइगर’ होते हैं, आज वैसे ‘लायन’ लग रहे हैं, जो अपने विंटर में समां चला हो। इसी आग में सिर्फ मडोना और गायी जुदाई की लहर में नहीं समा रहे हैं। करीब-करीब हर वो हमसफर एक-दो-तीन साल आते-आते किसी और बांहों में झूमने लगते हैं। अगर जवान जोड़ों की बात करें, तब हैरत की इंतहां ये है कि 97 फीसदी पब और क्लबिंग के शौकीन लंदनर डिवोर्स के आशिक हो चले हैं। मडोना जिसको ‘री-इन्वेंसन का मिस्ट्रेस’ कहा जाता है, वो कहती है कि ‘डिवोर्स को गले लगाना मेरे लिए एक बहाना है एक जश्न का एलान करने के लिए – टु हैव अ पार्टी।’

एक वो लड़कियां और एक नतालिया। बर्नले की हसीना और लंदन की गोरियों में कुछ ऐसा ही फड़कीला शमां है। नतालिया की दुनिया में भी डिवोर्स है। फर्क सिर्फ पौंड-लैंड के सरकते रेशों का ही है।

“बर्नले की फिजां में पब और क्लब नहीं है। यहां वाटर-फ्रोंट गार्डेन है, तावोंली : म्‍युजियम है, पेंटिंग गैलरी है और बार-बी-क्‍यू के निगहबान है। लड़के और लड़कियां, मर्द और खातून यहां ऐसे ही जमा होते हैं और एक दूसरे के दिल का दीदार करते हैं। एक तहजीब अजीब सी, जहां कोई भी जवान दिल किसी भी हसीं लड़की को कुछ पल के लिए अपना बना लेता है। आपकी मुस्कान और आपके एटिकेट आपके लिए टिकट है किसी शोख हसीना के दिल में सैर करने के लिए। यूं तो ये लंदन की गलियों में भी होता है मगर वहां एक रात के पहरे ज्यादा होते हैं। बर्नले में जोड़े दिन में, रात में साथ होते है जबतक सर्दियां रवानगी की ओर न चले… लेकिन शायद लंदन इज लाइक हैविंग पुसी मैगनेट ऑन योर कॉक। बर्नले इस नॉट ओनली मैगनेट ऑफ पुसी एंड कॉक।

नतालिया की नरगिसी बातों से साफ जाहिर होता चला जा रहा है कि बर्नले जैसे विलेज टाउन में प्लेटोनिक लव की खुशबू मिल जाती है। लंदन के पब और क्लब में प्लेटोनिक कम और थर्मो-नुक्लिअर मोहब्बत की आग ज्यादा है। वो कहती है, “यू नो, वी प्ले सॉकर (फुटबॉल) मोर दैन क्रिकेट। आवर ब्‍वायज आर लाइक फुटबॉल। वी गर्ल्स किक उने इंटु प्लेजर एंड पैसन बट दे थिंक दे आर किकिंग गर्ल्स लाइक फुटबॉल! जब मैं दस साल की थी जेम्‍स भी क्या खूब आशिक था! ही वाज अ लवली किसर। यहां हम इसी उम्र में अपने प्यार का इजहार ‘किस’ करके करते हैं। आशिक प्यार की बाजी एक दिलचस्प ‘किस’ करने की अदा से ही जीत सकता है। मैंने किस करने की अदा अपने ग्रैंडपा और ग्रैंडमा को ‘किस’ की बहार में खोते वक्त सीखा था। बेहद नाजुक था वो अंदाज। प्लेटोनिक लव का कैनाल था वो। जेम्‍स और मैं नहर के किनारे जाते और किस करने के एक से एक नुस्‍खे आजमाते। कभी-कभी जेम्‍स अपने सर के बल खड़ा हो जाता हवा में नाचते हुए और कहता – नतालिया, प्लांट अ किस, बेबी, ओ माय चीक्स, हेअर, फोरहेड, नेक एंड किस सॉफ्ट ऑन लोअर लिप एंड किस हार्ड ऑन द अपर लिप। उसकी ये अदा देख मैं भी वैसे ही कलाबाजी करना चाहती और हम खूब हंसते हुए चुंबन के मैग्नेट बनाते। किस करते-करते हम कब एक-दूसरे को सहलाने लगते, ये भी एक लुत्फाना अंदाज हो चला था।”

नतालिया का अंदाज हर एक जवां दिल का अंदाज है। मोहब्बत की सौगात है चुंबन, सर्दियों में और गर्मियों में। लंदन और बर्नले में यही वो सरगोशी है, जिसमें फर्क कर पाना नामुमकिन है। नतालिया की अदाएं एक चार्मिंग पेंटिंग है। यहां की फिजां ने उसे पेंट किया है। वो ब्रोमले एंड ब्रोमले की पोस्टर मॉडल नहीं है, जो सेंट्रल लंदन के हाई स्ट्रीट–बोंड स्ट्रीट के सेल्फ्रिजेस के विंडो पे खिलती हो। उसमें नजाकत है एक फ्लावर की – रोज की, लोटस की, डैफोडिल की। नतालिया काप्तिवेट्स। वो लूसिफर है किसी भी ख्वाब की, जवां ख्वाब की, जिसमें रोशनी एक 16 साल का जवां भी खोज रहा होता है और एक बुजुर्ग भी, जिसने अपनी हसरत के महल में सेक्रेट गार्डेन अपने रूफ्टॉप पे लहलहा रखा है।

(फ्रैंक हुजूर। लेखक और स्वतंत्र पत्रकार। लंदन में रह रहे हैं। सुप्रसिद्ध क्रिकेट खिलाड़ी इमरान खान पर लिखी उनकी किताब इमरान वर्सेस इमरान : द अनटोल्ड स्टोरी हाल ही में प्रकाशित हुई है। उनसे frankhuzur@gmail.com पर संपर्क किया जा सकता है।)

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