फिल्‍मों की ग्रेडिंग क्‍या उसके उपभोक्‍ता की ग्रेडिंग नहीं है?

अडोर्नो के बहाने फिल्म समीक्षा से कुछ ‘सिली क्वेश्चंस’!

♦ शुभम श्री

श्चिम में फिल्म समीक्षक अडोर्नो से खास तौर पर खफा रहते हैं। स्थिति ये है कि एक समकालीन समीक्षक ने अपनी किताब का शीर्षक ही ‘रोल ओवर अडोर्नो’ रख दिया। पता नहीं क्यों, साहित्य और संगीत के लिए अडोर्नो का गहरा लगाव सिनेमा की तरफ मुड़ते ही निराशावादी रुख अपना लेता है। लेकिन इस निराशा से जो सवाल पैदा होते हैं, वो आज कहीं ज्यादा प्रासंगिक हो गये हैं, खास कर हिंदी सिनेमा के संदर्भ में।

अखबारी समीक्षाओं के अलावा सिनेमा और उससे जुड़ी चीजों के विश्लेषण की जब बात आती है, तो बड़ा सा शून्य दिखता है। हर फिल्म की सौंदर्यवादी व्याख्या से पन्ने रंगे पड़े हैं (हालांकि फिल्म को निरक्षरों का माध्यम कहा जाता है, पर वो पुरानी बात है!) लेकिन समाज जिसके लिए फिल्म बनी, उसका कहीं नाम नहीं। जिस चीज के लिए अडोर्नो ने ‘कल्चर इंडस्ट्री’ में आवाज उठायी, फिल्म समीक्षा ने उसे सिरे से नकार दिया।

आलम यह है कि सिनेमा का अर्थशास्त्र ऐसा अंधेरा कोना बन गया है, जहां आलोचकों की नजर नहीं जाती (जाती भी होगी, तो लेखन की शक्ल अख्तियार नहीं करती) और सिनेमा उद्योग इस पर बात नहीं करना चाहता। हिंदी सिनेमा ने बेशक अपने ऊपर इंडस्ट्री का तमगा लगा लिया हो, पर आलोचना उसके उत्पाद को आज भी कलाकृति की तरह देख रही है। अभी भी सिनेमा की बहसें दर्शक पर केंद्रित हैं, जबकि वो अरसे से उपभोक्ता है। सिनेमा को कला और उपभोक्ता को दर्शक बनाये रखना, इंडस्ट्री का फॉर्मूला होता है, जहां भ्रम को यथार्थ की तरह पेश किया जाता है। पर इसी अवधारणा को आलोचना भी स्वीकार कर ले, तो क्या कहा जाए?

यह सच है कि फिल्म में कैमरे की भाषा का सबसे ज्यादा महत्‍व होता है पर इस देश में जहां बड़ा वर्ग पाइरेटेड सीडी के जरिये फिल्म देखता है, वहां कैमरा एंगल, सिनेमेटोग्राफी, साउंड की बात की भी जाए, तो बेमानी है। तीस रुपये में छह फिल्म देखने वालों के लिए यूं भी ‘एस्थेटिक्स’ उतना मायने नहीं रखता। एक फिल्म को बनाने में जब करोड़ों रुपये खर्च हो रहे हों तो दर्शकों का ध्यान रखा जाएगा या शेयर होल्डरों का? मनोरंजन उद्योग में सबका मुनाफा आपस में जुड़ा रहता है, इसलिए कहानी, संगीत, कैमरा, कंटेंट वहीं तक जरूरी होते हैं, जहां तक वह बाजार में बिकने में मदद कर सकें। फिल्म समीक्षा का इन बिन्दुओं पर बात करते रहना भी इंडस्ट्री के मुनाफे से जुड़ा ही एक काम है। कहना नहीं होगा कि फिल्म उद्योग ने जिस चालाकी के साथ मीडिया को खुद में मिला लिया है और खुद मीडिया की एक विधा खड़ी कर दी है वह मार्केटिंग का बेहतरीन नमूना है। प्रिंट, इलेक्ट्रोनिक, वेब हर माध्यम पर फिल्म समीक्षा और विश्लेषण का होना इस बात का सबूत है।

दर्शक के नाम पर फिल्म इंडस्ट्री ने एक खूबसूरत यूटोपिया खड़ा किया है। “सब कुछ पब्लिक के हाथ में है”, “पब्लिक डिसाइड करेगी”, “व्यूअर इज किंग” जैसे जुमले सुनने में जितने अच्छे लगता हैं उतने हैं नहीं। जब फिल्मों को ‘ए’, ‘बी’ और ‘सी’ ग्रेड के लेबल लगा कर रिलीज किया जाता है तो वो दरअसल उपभोक्ताओं पर चस्पां की गयी श्रेणी होती है, फिल्मों पर नहीं। इसलिए जब अडोर्नो कल्चर इंडस्ट्री में तकनीक को महत्‍वपूर्ण न मान कर मार्केटिंग के महत्‍व को स्थापित करते हैं तो आधुनिक संस्कृति उद्योग की असली नब्ज हमारे हाथ में दे देते हैं।

‘ए’ ‘बी’ फिल्मों की बात करना इसलिए भी बेमानी है, क्योंकि यह पूरी बहस ‘गंभीर कला’ और ‘सतही कला’ के विवाद में जाकर उलझ जाती है। ऊंची और स्तरहीन कला की बात हमारे यहां उसी तरह की जाती है कि श्याम बेनेगल का सिनेमा तो असली और गंभीर है लेकिन डेविड धवन का हल्का-फुल्का। जैसे शास्त्रीय संगीत गंभीर माना जाता है और पॉप संगीत हल्का। क्या हर कला माध्यम अपनी श्रेष्ठता में गंभीर नहीं होता? शकीरा कई खयाल गायकों से अच्छा गाती है। पॉप में जो स्वीकार मडोना और ब्रिटनी स्पेयर्स का है, वही दूसरों का तो नहीं है। कला के हर माध्यम में गंभीरता और हल्केपन का द्वंद्व रहता है। स्चोंबर्ग के संगीत में भी उतना ही हल्कापन हो सकता है, जितना डिज्नी कार्टून में। इसलिए अडोर्नो की यह स्थापना कि पूरी तरह से गंभीर कला, कला नहीं रहती गंभीर और हलके के खांचों को चुनौती देती है।

सिनेमा में ये द्वंद्व बहुत ज्यादा दिखता है। इसलिए फिल्म उद्योग के उत्पाद खुद को गंभीरता से लिये जाने की मांग भी करते हैं और मनोरंजक भी होना चाहते हैं। हर फिल्म ज्यादा से ज्यादा उपभोक्ता चाहती है। सिर्फ कलात्मक संतुष्टि के लिए बनायी गयी फिल्में भी मनोरंजन करना चाहती हैं। इसलिए हर फिल्म हर किसी के लिए कुछ न कुछ मसाला रखती है। “Something is provided for all so that none can escape” इसलिए आरक्षण में यूनिवर्सिटी प्रोफेसर भी सड़क पर आइटम नंबर पर ठुमके लगता है और K2H2 में रानी मुखर्जी ॐ जय जगदीश गाती है!

यूनिवर्सल हिट, मल्टीप्लेक्स हिट का सिद्धांत भी मूलतः यही है। हर वर्ग के दर्शक के लिए फिल्म बनाने की बात जितनी अच्छी लगती है उतनी है क्या? हर किसी के लिए कुछ बनाया जा रहा है ताकि हर कोई उपभोक्ता बना रहे। इसलिए उड़ान और दबंग साथ-साथ बन रही हैं। इन्ही के साथ प्यासी जवानी और कातिल हसीना भी बन रही है। इसलिए यह अर्थशास्त्र है, जो सिनेमा का कंटेंट तय करता है, स्क्रिप्ट राइटर, डायरेक्टर या प्रोड्यूसर नहीं।

दर्शक को सर्वोपरि कहना फिल्म उद्योग द्वारा फैलाये गये भ्रम से ज्यादा कुछ नहीं है। अडोर्नो का यह कथन बिलकुल सही है कि ‘किंग मिडास की तरह, इन राजाओं (दर्शकों) को भी दिये गये मेनू से संतुष्ट होने की मजबूरी है। रेडी का हिट होना इसका सबूत है। रेडी जैसी फिल्में इसलिए हिट नहीं होतीं क्योंकि दर्शक उन्हें देखना चाहते हैं, क्योंकि दर्शकों के पास उस शुक्रवार रेडी के अलावा और कोई विकल्प नहीं है। उन्हें रेडी से संतुष्ट होना हो तो हों नहीं तो इंडस्ट्री उन्हें दूसरे विकल्प नहीं देगी। आम उपभोक्ता जो तीन चार सौ की टिकट लेकर फिल्म देखने जा रहा है, वह कितनी बार ठगा जाता है, इसका शायद ही कभी सर्वे किया जाता है। प्रोमो देख कर वह जिस उम्मीद में जाता है, फिल्म देख कर क्या वो पूरी होती है? नहीं होती फिर भी वो जाता है, क्योंकि बाजार उसे खुद से अलग रहने नहीं देता।

सिनेमा उद्योग के अरबों-खरबों के व्यापार में सेट पर काम करने वाले दिहाड़ी मजदूरों का हिस्सा क्या है? तकनीशियनों को कितना पैसा मिलता है, बीमा की शर्तें क्या हैं, फिल्म में किन-किन चीजों पर कितना खर्च होता है, मीडिया को कैसे मैनेज किया जाता है (याद रहे कि पेड न्यूज कांड से कहीं पहले से फिल्म इंडस्ट्री पेड समीक्षाएं लिखवाती रही है), ये सब अभी तक परदे के पीछे ही है। परदे पर सिर्फ ग्लैमर है, बनाये गये सितारे हैं, फेम के नाम पर उन्हें दी गयी एक अति लोकतांत्रिक प्रभुता है, मीडिया के लिए इनफोटेनमेंट के स्रोत हैं। इसलिए शाहरुख का सिक्स पैक और करीना का साइज जीरो खबर है, सेट पर घायल होने वाले स्टंट मैन और मजदूर की मौत खबर नहीं है। सवाल उठता है कि क्या फिल्म समीक्षा का मतलब सिर्फ a + b = c की तर्ज पर सिर्फ फिल्म की व्याख्या करना है?

हमारी फिल्म समीक्षा के केंद्र में कुरोसावा को पैदा न कर पाने का दुःख है, बर्गमैन की चर्चा है, अनुराग कश्यप की फिल्में हैं। उन्हें छोटे बजट की फिल्मों के लिए उम्मीद की तरह पेश किया जा रहा है। बदलते हुए सिनेमा का मुहावरा बनाया जा रहा है। लग रहा है मानो सचमुच ही वो दिन दूर नहीं, जब कम पैसे में बेहतरीन कलाकृति जैसी फिल्में बनायी जा सकेंगी। इन सबमें ये चर्चा कहीं नहीं है कि अनुराग की फिल्मों का मुनाफे का अनुपात बड़े बजट की फिल्मों से कहीं ज्यादा है? मनोरंजन उद्योग बदल रहा है, नया उपभोक्ता पैदा किया जा रहा है, विदेशी निवेश और सेंसेक्स का फिल्मों पर असर हो रहा है। सच तो ये है कि बाजार बदल रहा है, इसलिए सिनेमा बदला हुआ दिख रहा है। इस नये सिनेमा का अर्थशास्त्र क्या है? कई बातें हैं, जो स्क्रीन कल्चर से अनजान लोगों की समझ से परे हैं, इस ‘चीप टेस्ट’ वाली पब्लिक की समझ से परे हैं। पता नहीं इन सब सवालों के जवाब कब मिलेंगे? कौन इन्हें समझाएगा…

(शुभमश्री। रेडिकल फेमिनिस्ट। लेडी श्रीराम कॉलेज से ग्रेजुएशन। फिलहाल जेएनयू में एमए की छात्रा। कविताएं लिखती हैं। मुक्तिबोध पर कॉलेज लेवल रिसर्च। ब्लॉगिंग, फिल्म और मीडिया पर कई वर्कशॉप और विमर्श संयोजित किया। उनसे shubhamshree91@gmail.com पर संपर्क किया जा सकता है।)

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