“द डर्टी पिक्चर” ने दर्शकों से छल किया है!
♦ अमरेंद्र नाथ त्रिपाठी
» Vidya Balan
ए बी सी… हर ग्रेड की फिल्में होती ही हैं। सबके वजूद के अपने तर्क हैं। हम बहुत सुरुचिपूर्ण होकर एक की तारीफ कर सकते हैं, पर किसी दूसरे को पूरी तरह खारिज नहीं। फिल्म-समीक्षाओं की अपनी सीमाएं भी हैं, फिर भी कई दोष ऐसे होते हैं, जिन पर समीक्षाएं परदा डाल देती हैं। समीक्षाओं की एक अति का छोर वह मीनमेख-निकालू प्रवृत्ति है, जिस पर झुंझला कर किसी जर्मन फिल्मकार ने कहा था कि मैं फिल्में निरक्षरों के लिए बनाता हूं। वहीं दूसरी अति है सच्चाई का न बोलना। जैसे कोई सी ग्रेड की फिल्म हो, तो हम उसे भी ए ग्रेड की फिल्म कह के समीक्षित कर दें। उसके फेवर में मारे गर्दा उड़ा के रख दें। ऐसा करने के मूल में व्यावसायिक संस्कार होते हैं, और छूट लेकर कहूं तो व्यावसायिक छल। क्योंकि व्यावसायिक संस्कार को हम कुछ सकारात्मक कह सकते हैं लेकिन इस व्यावसायिक छल को नहीं। इसमें यह कोशिश होती है कि हर ग्रेड का देखैया उस फिल्म की ओर लुभा जाए। ऐसी ही कई समीक्षाओं को देखकर मैं हाल ही में आयी पिक्चर ‘द डर्टी पिक्चर’ देखने गया, और छले जाने का एहसास हुआ। समीक्षाओं के साथ स्टार की नत्थी भी क्या खूब होती है! अक्सर फिल्म देखने के बाद ये तारे अपनी चमक और विश्वसनीयता फीकी कर हैं।
पहली दिक्कत मुझे यही दिखती है कि इस फिल्म को सही-सही क्यों नहीं कहते कि यह सिल्क स्मिता के जीवन पर सिनेमा है। फिल्म-निर्माण से लेकर फिल्म-समीक्षा तक ईमानदारी का इतना अभाव क्यों है! या तो आप सिल्क स्मिता का किसी भी रूप में जिक्र न करें और अगर करें तो ठीक से करें। आशय यह कि जीवनाधारित सिनेमा की जिम्मेदारियों का निर्वाह करें नहीं तो ‘है भी और नहीं भी है’ वाला गेम न खेला जाय! वस्तुतः इसमें एक शातिरपना दिखता है, वह यह कि ‘है भी’ का पूरा लाभ ले लिया जाए और जब दिक्कत या जवाबदेही बने तो ‘नहीं है’ की छूट से काम चला लिया जाए। एक तरफ प्रगतिशीलता-संवेदनशीलता-गंभीरता की समाई दिखायी जाए और दूसरी तरफ हल्केपन-वायवीपन के तुक को भी साध लिया जाए। एक तरफ ए ग्रेड के दर्शकों को लुभा लिया जाए तो दूसरी तरफ अन्य ग्रेड के दर्शकों को भी ललचुआ लिया जाए। 80 का दशकीय दौर भी चुना जाता है, दक्षिण भारत का परिदृश्य रचा जाता है, फिल्म में ‘सिल्क’ नाम भी उसी छवि को दिखाने के लिए रखा जाता है; तब भी कहते हैं कि हम कुछ अलग रच रहे हैं। हुई समीक्षाओं का भी श्री-गणेश इसी के साथ होता है! फिर इस लुकाछिपी या खिचड़ी का क्या औचित्य! अगर सिल्क स्मिता जीवित होतीं और यह देखतीं तो क्या वैसे ही बात रखतीं जैसी ये समीक्षाएं! क्या वे जटिलता और समग्रता को लाने की मांग न करतीं! क्या वे न कहतीं कि त्रासदी के साथ इन चटपटे-द्विअर्थी संवादों की भूमिका कैसी! क्या यह फिल्म ‘सिल्क’ की मृत्यु के साथ न्याय कर सकी है! वैसे इन सब सवालों से बचने का एक खूबसूरत उत्तर तो है ही कि ‘यह फिल्म सिल्क स्मिता पर नहीं है’!
जहां-तहां इस फिल्म के संवादों पर लोग कहते दिखे कि संवाद अच्छे-अच्छे हैं। पूरी फिल्म में मुझे हंसाऊ संवाद मिले, हृदयस्पर्शी नहीं! ऐसे संवाद नहीं मिले जिनकी कोर कहीं संवेदन-तंत्र को कुरेदे रहे और उसके चित्त में आते ही त्रासदी विचारोद्यत करे जैसे किसी चोट के चिन्ह पर उंगली जाने पर किसी घटना की मार्मिकता हमें अपने साथ ले लेती हो। थियेटर में इन संवादों पर मैने सीटियों और हुल्लड़ के साथ समीप वालों को पाया। मैने पाया कि कहानी की प्रकृति अलग है और संवाद अलग ही परिवेश रच जा रहे हैं, अलग असर डाल रहे हैं। संवाद त्रासदी-सुलभ करुणा नहीं पैदा कर सके हैं! फिल्म की नजर में और फिल्म में कथित ‘इंटरटेनमेंटx3’ शायद यही हो, पर मुझे रास नहीं आया। कहानी की टूटन और गानों का अहैतुकी समावेशन दर्शक-चित्त को अपने साथ जोड़ पाने में असफल दिखा! ये कमियां हर ग्रेड के दर्शक-वर्ग को साधने की कोशिश का नतीजा हो सकती हैं। फिल्म-समीक्षाकार अजय ब्रह्मात्मज जी की एक बात का जिक्र करना चाहूंगा कि यह फिल्म ‘आम दर्शकों और खास दर्शकों को अलग-अलग कारणों से एंटरटेन कर सकती है!’
लीड रोल के तौर पर विद्या बालन के अभिनय की भूरि भूरि प्रशंसा हुई, जिन्होंने सिल्क का रोल किया है। लेकिन मैं इसे अभिभूत कर देने वाला अभिनय नहीं कह पा रहा। फिल्म की कमियों को कहीं कहीं भरता सा लग सकता है विद्या बालन का अभिनय, लेकिन फिल्म की वैतरणी इससे नहीं तरती। ‘रॉकस्टार’ फिल्म का संदर्भ लेकर कहूं तो उस फिल्म में कुछ खास न होने पर भी रणवीर कपूर ने स्वयं जैसे फिल्म की नौका को खे दिया हो, ऐसा इस फिल्म के बारे में नहीं कहा जा सकता।
अपनी बात को खत्म करते हुए कहूंगा कि यह फिल्म एक असफल फिल्म है, उन दावों के साथ तो बिल्कुल ही असफल जो समीक्षाओं में दागे गये। बेहतर होता अलग आधार पर इसे मसाला फिल्म ही बना देते, तो दोनों तरफ से ईमानदारी होती! बिचऊपुर में दुनहूं गवां गये!
(अमरेंद्र नाथ त्रिपाठी। भारतीय भाषा केंद्र, जेएनयू के शोध छात्र। देशभाषाओं से विशेष लगाव। इंटरनेट पर अवधी भाषा में पोर्टल का संचालन। उनसे amrendratjnu@gmail.com पर संपर्क किया जा सकता है।)










फ़िलिम चाहे जैसी हो लेकिन पैसा तो खूब बटोर रही है। यही चाहिये बनाने वालों कों। बाकी तो सब मिथ्या है उनके लिये।
“पूरी फिल्म में मुझे हंसाऊ संवाद मिले, हृदयस्पर्शी नहीं!”
पूर्णरूपेण सहमत हूँ आप से अमरेन्द्र जी| फिल्म देखकर मुझे भी पछतावा हुआ| संवाद तो केवल हँसाने के लिए थे ही, उनकी टाइमिंग भी ठीक नहीं थी| पार्श्व मे इमरान हाशमी की आवाज बहुत ही कमजोर थी| उनका अभिनय भी कुछ खास नहीं| विद्या बालन का अभिनय अच्छा था लेकिन ऐसा नहीं की उन्होने कोई नया प्रतिमान गढ़ा हो|
दक्षिण भारत का परिदृश्य तो ठीक दिखाया है| नसीरूदीन शाह ने भी अच्छा काम किया है| लेकिन सोचा था की फिल्म से ग्रेड फिल्मों या तथाकथित अश्लीलता के पक्ष को ईमानदारी से रखेगी, ऐसा कुछ नहीं कर पायी| अंजू महेंद्रू का समीक्षक का रोल भी उभर नहीं पाया|
फिल्मो और उससे जुडी बातो पर मोहल्ला वालो का ‘उत्साह’ देखते ही बनता हे बहुत अच्छा खूब तरक्की करो आने वाले कल के प्रसून जोशी जावेद अख्तर शोभा डे काज़मी ब्रह्म्ताज़ आदि बनो और बिना किसी खतरे के – दौलत शोहरत ग्लेमर पार्टियों के साथ साथ बुद्धिजीवी जागरूक वेगेरह वेगेरह भी कहलाओ अनुराग कश्यप रामगोपाल वर्मा यशराज इम्तियाज़ अली ,बज्मी आदि की टीम का ‘हिस्सा ‘ बनो बहुत बहुत शुभकामनाय
sir, aapke aalekh me kuch ansh samajh nahi aaye.
1.त्रासदी विचारोद्यत
2.संवाद त्रासदी-सुलभ करुणा नहीं पैदा कर सके हैं!
3.कहानी की टूटन और गानों का अहैतुकी समावेशन दर्शक-चित्त को अपने साथ जोड़ पाने में असफल दिखा!
itni shuddh hindi hai ki kai bat samajh nahi aayi. thoda aasan karenge plz. accha lekh aur bhasha to bilkul ramchandra shukl ke jaisi. bahut badhiya
@megha जी,
१-त्रासदी विचारोद्यत > त्रासदी तो आमफहम शब्द है ही, माने ट्रैजडी! यहाँ फिल्म में सिल्क के जीवन से जुड़ी त्रासदी। विचारोद्यत माने हुआ कि इस ट्रेजडी पर हम ठहर के विचार करें ( विचार करने के लिये उद्यत हों। उद्यत माने, प्रयास करने से है।
२- संवाद त्रासदी-सुलभ करुणा नहीं पैदा कर पाते > चूँकि संवाद अगम्भीर माहौल बना देते हैं, हँसी में बात चली जाती है, द्विअर्थे-पन में बात फ़ँस जाती है इसलिये संवाद ट्रेजडी के लिये जैसा आवश्यक होता है वैसी मार्मिकता का आधार (त्रासदी-सुलभ करुणा) नहीं दे पाते।
३-अहैतुकी समावेशन दर्शक-चित्त को अपने साथ जोड़ पाने में असफल दिखा! > अहैतुकी का मतलब है बिना तुक के, बिना किसी हेतु(कारण) के, ठूँस दिये गाने। समावेशन माने होता है ‘समावेश किये गये(रखे गये)। ‘दर्शक-चित्त’ यानी देखने वाले का मन। यानी देखने वाले का मन फिल्म के साथ बँध नहीं पाता। ‘असफल’ माने हुआ फेल होना।
भाषा से जुड़े पक्ष पर ध्यान दिलाने का शुक्रिया।
अच्छी बात है कि आपने इस फिल्म के दूसरे पक्ष को सामने रखा. पर आपसे सहमत या असहमत होने के लिए मुझे फिल्म देखनी पड़ेगी, जिसके लिए सम्प्रति मेरे पास समयाभाव है.
सिल्क के नाम का इस फिल्म के प्रचार में मिस-यूज किया गया है इसमें कोई दो राय नहीं.
मुझे लगता है कि आपने अभिषेक श्रीवास्तव की समीक्षा नहीं पढ़ी थी. नीचे दो लिंक हैं जहाँ पर यह समीक्षा मौजूद है. उम्मीद है इसे पढ़ कर आपकी नाराजगी थोड़ी कम होगी.
http://www.pratirodh.com/art-and-entertainment-news/133-05-Dec-2011/tdp-silk-without-worms-preferred.html
http://janpath.blogspot.com/2011/12/tdp-silk-without-worms-preferred.html?spref=fb
अमरेंद्र जी,
आपसे पूरी तरह समहत हूं, डर्टी पिक्चर ‘ग्रेट’ फिल्म नहीं है, ‘गुड’ कहने के लिए भी थोड़ा उदार होना पड़ेगा। संवाद सतही हैं, मन को कहीं नहीं छूते। आज की फिल्मों से शायद ‘डायलॉग’ नाम का तत्व गायब होता जा रहा है, यही वजह है कि किसी फिल्म में डायलॉग के नाम पर कुछ लिख दिया जाता है तो हम उसे हाथों हाथ लेने लगते हैं। याद कीजिए वन्स अपॉन अ टाइम इन मुंबई में भी संवादों की ऐसी ही तारीफ़ की गई थी।
हल्के फुल्के संवादों और विद्या बालन की बोल्डनेस की नुमाइश करके एक मसाला फिल्म बना दी गई है लेकिन इसे देखते हुए लगता है कि बड़े ही शातिराना तरीके से सिल्क की हॉट आइटम गर्ल वाली पॉपुलर छवि को इस्तेमाल कर लिया गया है, लेकिन उसकी जटिल और चुनौतीपूर्ण ज़िंदगी के साथ न्याय करने की कोशिश नहीं की गई है।
शायद फिल्म की टीम ने सिल्क को पढ़ा ही गलत है इसीलिए सिल्क की छवि के आगे विद्या अपनी पूरी कोशिश के बाद भी कहीं नहीं ठहरतीं। सिल्क की डार्क स्माइल के मुकाबले विद्या की मुस्कुराहट बचकानी लगती है…सिल्क की मुस्कुराहट बड़ी रेयर है जबकि विद्या पूरी फिल्म में मुस्कुराती ही नजर आती हैं….सिल्क की मुस्कान, उसकी आंखों के एक्सप्रेशन, उसकी भंगिमाएं बड़ी गहरी और मारक हैं, जबकि विद्या की अदाओं, उनकी मुस्कान में एडल्ट शरारत से ज्यादा कुछ नहीं दिखता…सिल्क अपने एक्सप्रेशन से खुद को निम्फ़ दिखा सकती थी, जबकि विद्या सिर्फ मर्दों को छेड़ती सी नज़र आती हैं…सिल्क सेंसुअस लगती थी, विद्या वल्गर लगने की कोशिश करती दिखती हैं..
समीक्षा/अनुभव और टिप्पणियों ,दोनों ही में विचार पढ़े..
यह क्षुब्धकारक विषय बहुत मथे हुए है मन को … हाँ, कारण वह नहीं जिसका यहाँ जिक्र है.. मेरे मन में कभी आया ही नहीं कि देखूं फिल्म बनी कैसी है, बल्कि एक आक्रोश भरा हुआ है मन में कि नग्नता परोस पैसा कमाने का यह अँधा दौड़ आखिर कब और कहाँ जाकर विराम पायेगा…?? ऊपर से नग्नता को जायज ठहराने के लिए उसे बोल्डनेस कह उसका यह महिमामंडन…
मैं आश्वस्त थी कि उस रास्ते की पीड़ा और दुखद परिणति दिखने का कोई लक्ष्य नहीं था फिल्मकार का, उसका लक्ष्य तो महज पैसा कमाना था और इस रास्ते उसने वही वही हाईलाईट किया होगा, जो दर्शकों को हाल तक बटोर लाने में सक्षम हो सके…
आपसे सहमत नहीं हूँ……
फिल्म एक अच्छी फिल्म है और विद्या वाकई में फिल्म का पूरा भार अपने कंधो पर ढोती हैं… नसरुद्दीन का अच्छा साथ मिला है…हाँ ‘मेरा इशक सूफियाना ‘ सोंग अच्छा होते हुवे भी ….फिल्म की केवल लम्बाई ही बढ़ता है… इसकी वजह से फिल्म में कसाव कम हुआ है… जिसका की इस समीक्षा में कहीं जिक्र भी नहीं है….
मेरी समझ से बेहतरीन फिल्म..कमल की एक्टिंग… हर किसी के देखने लायक…
हाँ एक चीज से जरुर सहमत हूँ ये सिल्क के ऊपर बनी फिल्म है और इसे सीना थोक कर स्वविकार किया जाना चाहिए…
@anjule ji, मेरे भाई समीक्षा(?) में गानों के ‘अहैतुकी समावेशन’ का जिक्र मैने उसी गाने को प्राथमिक रखके किया है, इस बिन्दु की उपेक्षा मैने नहीं की है, हाँ उतना ठहरा नहीं कारण कि अन्य बड़े दोषों के सामने यह दोष मुझे थोड़ा हल्का लगा।
बाकी पसंद थोड़ा सब्जेक्टिव मामला हो ही जाता है। आप विद्या की जिस एक्टिंक को काबिले-कमाल कह रहे उस पर उपरोक्त गिरिजेश जी के कमेंट पर भी ध्यान दिया जा सकता है। क्या रंजना जी का क्षोभ अनुचित है!
सुन्दर…. !
बहुत सुन्दर.
दरअसल क्वालिटी के मामले में आज हाल ये है कि हम कीचड में भी तुमसे ऊपर खड़े हैं इसलिए लोगों के पास भी विकल्प नहीं है. लंगड़ों के बीच कोई ठीक से चल सका हम ताली बजा दिए कि वाह मॉडल आ गया… ये फिल्म भी वैसे ही है.
मुझे नहीं लगता कि एकता के डंका पीट देने से कुछ बदल रहा है. वो भी इस फिल्म से पैसा बटोरेंगी और तुषार के लिए कोई योजना बना रही होंगी जिसमें दो अर्थी संवाद कूट के भरे होंगे…
मैं भी सिकंदर भाई से सहमत हूँ.ये आजकल मोहल्ला पर ज्यादा ही होने लगा है.ऐसे ही अनुराग कश्यप जैसे निर्देशक पर भी आपने बीस पच्चीस लेख दिए थे.
वैसे आश्चर्य है कि दिलीप मंडल जी के इंडिया टुडे के संपादक बनने पर कोई लेख अभी तक क्यों नहीं आया.
राजन भाई चाहे बात अंग्रेजी लेखन की हो या फिल्मो के पर्ती अति उत्साह की बात यही हे ” खूब तरक्की करो आने वाले कल के प्रसून जोशी जावेद अख्तर शोभा डे काज़मी ब्रह्म्ताज़ आदि बनो और बिना किसी खतरे के – दौलत शोहरत ग्लेमर पार्टियों के साथ साथ बुद्धिजीवी जागरूक वेगेरह वेगेरह भी कहलाओ अनुराग कश्यप रामगोपाल वर्मा यशराज इम्तियाज़ अली ,बज्मी वाजेपयी आदि की टीम का हिस्सा बनो ” बहोत बढ़िया बात हे ये सब क़ाबलियत बढ़िया कैरियर परचार आराम की मज़े की जिन्दगी की चाहत की बात हे जिसमे कोई बड़ी बुरी बात नहीं हे मगर हमारे देश को हर फिल्ड में सिर्फ काबिल लोगो की और उनके काबिल कैरियर की नहीं नहीं बल्कि महान लोगो और उनके महान विचारो संस्कारो और उनके महान कर्मो- महान त्यागो- की जरुरत हे वो कहा से आयेंगे? उनका तो नामो- निशान भी मिट रहा हे
Movie bakwas lagi as a whole, bahut kuch missing laga….
Aur jahan tak acting ki bat hai Emran Hashmi bahut hi ache lage… Vidya to khair behtar hai hi.. per story ko aur acha kiya ja sakta tha…
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